The Old Testament of the Holy Bible

उत्पत्ति 1

1 आदि में परमेश्वर ने आकाश और पृय्वी की सृष्टि की। 2 और पृय्वी बेडौल और सुनसान पक्की यी; और गहरे जल के ऊपर अन्धिक्कारनेा या: तया परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डलाता या। 3 तब परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो: तो उजियाला हो गया। 4 और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्वर ने उजियाले को अन्धिक्कारने से अलग किया। 5 और परमेश्वर ने उजियाले को दिन और अन्धिक्कारने को रात कहा। तया सांफ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहिला दिन हो गया।। 6 फिर परमेश्वर ने कहा, जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए। 7 तब परमेश्वर ने एक अन्तर करके उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया। 8 और परमेश्वर ने उस अन्तर को आकाश कहा। तया सांफ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार दूसरा दिन हो गया।। 9 फिर परमेश्वर ने कहा, आकाश के नीचे का जल एक स्यान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे; और वैसा ही हो गया। 10 और परमेश्वर ने सूखी भूमि को पृय्वी कहा; तया जो जल इकट्ठा हुआ उसको उस ने समुद्र कहा: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। 11 फिर परमेश्वर ने कहा, पृय्वी से हरी घास, तया बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृझ भी जिनके बीज उन्ही में एक एक की जाति के अनुसार होते हैं पृय्वी पर उगें; और वैसा ही हो गया। 12 तो पृय्वी से हरी घास, और छोटे छोटे पेड़ जिन में अपक्की अपक्की जाति के अनुसार बीज होता है, और फलदाई वृझ जिनके बीज एक एक की जाति के अनुसार उन्ही में होते हैं उगे; और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। 13 तया सांफ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार तीसरा दिन हो गया।। 14 फिर परमेश्वर ने कहा, दिन को रात से अलग करने के लिथे आकाश के अन्तर में ज्योतियां हों; और वे चिन्हों, और नियत समयों, और दिनों, और वर्षोंके कारण हों। 15 और वे ज्योतियां आकाश के अन्तर में पृय्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें; और वैसा ही हो गया। 16 तब परमेश्वर ने दो बड़ी ज्योतियां बनाईं; उन में से बड़ी ज्योति को दिन पर प्रभुता करने के लिथे, और छोटी ज्योति को रात पर प्रभुता करने के लिथे बनाया: और तारागण को भी बनाया। 17 परमेश्वर ने उनको आकाश के अन्तर में इसलिथे रखा कि वे पृय्वी पर प्रकाश दें, 18 तया दिन और रात पर प्रभुता करें और उजियाले को अन्धिक्कारने से अलग करें: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। 19 तया सांफ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार चौया दिन हो गया।। 20 फिर परमेश्वर ने कहा, जल जीवित प्राणियोंसे बहुत ही भर जाए, और पक्की पृय्वी के ऊपर आकाश कें अन्तर में उड़ें। 21 इसलिथे परमेश्वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियोंकी भी सृष्टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया और एक एक जाति के उड़नेवाले पझियोंकी भी सृष्टि की : और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। 22 और परमेश्वर ने यह कहके उनको आशीष दी, कि फूलो-फलो, और समुद्र के जल में भर जाओ, और पक्की पृय्वी पर बढ़ें। 23 तया सांफ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पांचवां दिन हो गया। 24 फिर परमेश्वर ने कहा, पृय्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्यात्‌ घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृय्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों; और वैसा ही हो गया। 25 सो परमेश्वर ने पृय्वी के जाति जाति के वनपशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया : और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है। 26 फिर परमेश्वर ने कहा, हम मनुष्य को अपके स्वरूप के अनुसार अपक्की समानता में बनाएं; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पझियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृय्वी पर, और सब रेंगनेवाले जन्तुओं पर जो पृय्वी पर रेंगते हैं, अधिक्कारने रखें। 27 तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपके स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपके ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उस ने मनुष्योंकी सृष्टि की। 28 और परमेश्वर ने उनको आशीष दी : और उन से कहा, फूलो-फलो, और पृय्वी में भर जाओ, और उसको अपके वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तया आकाश के पझियों, और पृय्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओ पर अधिक्कारने रखो। 29 फिर परमेश्वर ने उन से कहा, सुनो, जितने बीजवाले छोटे छोटे पेड़ सारी पृय्वी के ऊपर हैं और जितने वृझोंमें बीजवाले फल होते हैं, वे सब मैं ने तुम को दिए हैं; वे तुम्हारे भोजन के लिथे हैं : 30 और जितने पृय्वी के पशु, और आकाश के पक्की, और पृय्वी पर रेंगनेवाले जन्तु हैं, जिन में जीवन के प्राण हैं, उन सब के खाने के लिथे मैं ने सब हरे हरे छोटे पेड़ दिए हैं; और वैसा ही हो गया। 31 तब परमेश्वर ने जो कुछ बनाया या, सब को देखा, तो क्या देखा, कि वह बहुत ही अच्छा है। तया सांफ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार छठवां दिन हो गया।।

उत्पत्ति 2

1 योंआकाश और पृय्वी और उनकी सारी सेना का बनाना समाप्त हो गया। 2 और परमेश्वर ने अपना काम जिसे वह करता या सातवें दिन समाप्त किया। और उस ने अपके किए हुए सारे काम से सातवें दिन विश्रम किया। 3 और परमेश्वर ने सातवें दिन को आशीष दी और पवित्र ठहराया; क्योंकि उस में उस ने अपक्की सृष्टि की रचना के सारे काम से विश्रम लिया। 4 आकाश और पृय्वी की उत्पत्ति का वृत्तान्त यह है कि जब वे उत्पन्न हुए अर्यात्‌ जिस दिन यहोवा परमेश्वर ने पृय्वी और आकाश को बनाया: 5 तब मैदान का कोई पौधा भूमि पर न या, और न मैदान का कोई छोटा पेड़ उगा या, क्योंकि यहोवा परमेश्वर ने पृय्वी पर जल नहीं बरसाया या, और भूमि पर खेती करने के लिथे मनुष्य भी नहीं या; 6 तौभी कुहरा पृय्वी से उठता या जिस से सारी भूमि सिंच जाती यी 7 और यहोवा परमेश्वर ने आदम को भूमि की मिट्टी से रचा और उसके नयनो में जीवन का श्वास फूंक दिया; और आदम जीवता प्राणी बन गया। 8 और यहोवा परमेश्वर ने पूर्व की ओर अदन देश में एक बाटिका लगाई; और वहां आदम को जिसे उस ने रचा या, रख दिया। 9 और यहोवा परमेश्वर ने भूमि से सब भांति के वृझ, जो देखने में मनोहर और जिनके फल खाने में अच्छे हैं उगाए, और बाटिका के बीच में जीवन के वृझ को और भले या बुरे के ज्ञान के वृझ को भी लगाया। 10 और उस बाटिका को सींचने के लिथे एक महानदी अदन से निकली और वहां से आगे बहकर चार धारा में हो गई। 11 पहिली धारा का नाम पीशोन्‌ है, यह वही है जो हवीला नाम के सारे देश को जहां सोना मिलता है घेरे हुए है। 12 उस देश का सोना चोखा होता है, वहां मोती और सुलैमानी पत्यर भी मिलते हैं। 13 और दूसरी नदी का नाम गीहोन्‌ है, यह वही है जो कूश के सारे देश को घेरे हुए है। 14 और तीसरी नदी का नाम हिद्देकेल्‌ है, यह वही है जो अश्शूर्‌ के पूर्व की ओर बहती है। और चौयी नदी का नाम फरात है। 15 जब यहोवा परमेश्वर ने आदम को लेकर अदन की बाटिका में रख दिया, कि वह उस में काम करे और उसकी रझा करे, 16 तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, कि तू बाटिका के सब वृझोंका फल बिना खटके खा सकता है: 17 पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृझ है, उसका फल तू कभी न खाना : क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाए उसी दिन अवश्य मर जाएगा।। 18 फिर यहोवा परमेश्वर ने कहा, आदम का अकेला रहना अच्छा नहीं; मै उसके लिथे एक ऐसा सहाथक बनाऊंगा जो उस से मेल खाए। 19 और यहोवा परमेश्वर भूमि में से सब जाति के बनैले पशुओं, और आकाश के सब भँाति के पझियोंको रचकर आदम के पास ले आया कि देखे, कि वह उनका क्या क्या नाम रखता है; और जिस जिस जीवित प्राणी का जो जो नाम आदम ने रखा वही उसका नाम हो गया। 20 सो आदम ने सब जाति के घरेलू पशुओं, और आकाश के पझियों, और सब जाति के बनैले पशुओं के नाम रखे; परन्तु आदम के लिथे कोई ऐसा सहाथक न मिला जो उस से मेल खा सके। 21 तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को भारी नीन्द में डाल दिया, और जब वह सो गया तब उस ने उसकी एक पसुली निकालकर उसकी सन्ती मांस भर दिया। 22 और यहोवा परमेश्वर ने उस पसुली को जो उस ने आदम में से निकाली यी, स्त्री बना दिया; और उसको आदम के पास ले आया। 23 और आदम ने कहा अब यह मेरी हड्डियोंमें की हड्डी और मेरे मांस में का मांस है : सो इसका नाम नारी होगा, क्योंकि यह नर में से निकाली गई है। 24 इस कारण पुरूष अपके माता पिता को छोड़कर अपक्की पत्नी से मिला रहेगा और वे एक तन बनें रहेंगे। 25 और आदम और उसकी पत्नी दोनोंनंगे थे, पर लजाते न थे।।

उत्पत्ति 3

1 यहोवा परमेश्वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त या, और उस ने स्त्री से कहा, क्या सच है, कि परमेश्वर ने कहा, कि तुम इस बाटिका के किसी वृझ का फल न खाना ? 2 स्त्री ने सर्प से कहा, इस बाटिका के वृझोंके फल हम खा सकते हैं। 3 पर जो वृझ बाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे। 4 तब सर्प ने स्त्री से कहा, तुम निश्चय न मरोगे, 5 वरन परमेश्वर आप जानता है, कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आंखे खुल जाएंगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्वर के तुल्य हो जाओगे। 6 सो जब स्त्री ने देखा कि उस वृझ का फल खाने में अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिथे चाहने योग्य भी है, तब उस ने उस में से तोड़कर खाया; और अपके पति को भी दिया, और उस ने भी खाया। 7 तब उन दोनोंकी आंखे खुल गई, और उनको मालूम हुआ कि वे नंगे है; सो उन्होंने अंजीर के पत्ते जोड़ जोड़ कर लंगोट बना लिथे। 8 तब यहोवा परमेश्वर जो दिन के ठंडे समय बाटिका में फिरता या उसका शब्द उनको सुनाई दिया। तब आदम और उसकी पत्नी बाटिका के वृझोंके बीच यहोवा परमेश्वर से छिप गए। 9 तब यहोवा परमेश्वर ने पुकारकर आदम से पूछा, तू कहां है? 10 उस ने कहा, मैं तेरा शब्द बारी में सुनकर डर गया क्योंकि मैं नंगा या; इसलिथे छिप गया। 11 उस ने कहा, किस ने तुझे चिताया कि तू नंगा है? जिस वृझ का फल खाने को मै ने तुझे बर्जा या, क्या तू ने उसका फल खाया है? 12 आदम ने कहा जिस स्त्री को तू ने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृझ का फल मुझे दिया, और मै ने खाया। 13 तब यहोवा परमेश्वर ने स्त्री से कहा, तू ने यह क्या किया है? स्त्री ने कहा, सर्प ने मुझे बहका दिया तब मै ने खाया। 14 तब यहोवा परमेश्वर ने सर्प से कहा, तू ने जो यह किया है इसलिथे तू सब घरेलू पशुओं, और सब बनैले पशुओं से अधिक शापित है; तू पेट के बल चला करेगा, और जीवन भर मिट्टी चाटता रहेगा : 15 और मै तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करुंगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा। 16 फिर स्त्री से उस ने कहा, मै तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दु:ख को बहुत बढ़ाऊंगा; तू पीड़ित होकर बालक उत्पन्न करेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा। 17 और आदम से उस ने कहा, तू ने जो अपक्की पत्नी की बात सुनी, और जिस वृझ के फल के विषय मै ने तुझे आज्ञा दी यी कि तू उसे न खाना उसको तू ने खाया है, इसलिथे भूमि तेरे कारण शापित है: तू उसकी उपज जीवन भर दु:ख के साय खाया करेगा : 18 और वह तेरे लिथे कांटे और ऊंटकटारे उगाएगी, और तू खेत की उपज खाएगा ; 19 और अपके माथे के पक्कीने की रोटी खाया करेगा, और अन्त में मिट्टी में मिल जाएगा; क्योंकि तू उसी में से निकाला गया है, तू मिट्टी तो है और मिट्टी ही में फिर मिल जाएगा। 20 और आदम ने अपक्की पत्नी का नाम हव्वा रखा; क्योंकि जितने मनुष्य जीवित हैं उन सब की आदिमाता वही हुई। 21 और यहोवा परमेश्वर ने आदम और उसकी पत्नी के लिथे चमड़े के अंगरखे बनाकर उनको पहिना दिए। 22 फिर यहोवा परमेश्वर ने कहा, मनुष्य भले बुरे का ज्ञान पाकर हम में से एक के समान हो गया है: इसलिथे अब ऐसा न हो, कि वह हाथ बढ़ाकर जीवन के वृझ का फल भी तोड़ के खा ले और सदा जीवित रहे। 23 तब यहोवा परमेश्वर ने उसको अदन की बाटिका में से निकाल दिया कि वह उस भूमि पर खेती करे जिस मे से वह बनाया गया या। 24 इसलिथे आदम को उस ने निकाल दिया और जीवन के वृझ के मार्ग का पहरा देने के लिथे अदन की बाटिका के पूर्व की ओर करुबोंको, और चारोंओर घूमनेवाली ज्वालामय तलवार को भी नियुक्त कर दिया।।

उत्पत्ति 4

1 जब आदम अपक्की पत्नी हव्वा के पास गया तब उस ने गर्भवती होकर कैन को जन्म दिया और कहा, मै ने यहोवा की सहाथता से एक पुरूष पाया है। 2 फिर वह उसके भाई हाबिल को भी जन्मी, और हाबिल तो भेड़-बकरियोंका चरवाहा बन गया, परन्तु कैन भूमि की खेती करने वाला किसान बना। 3 कुछ दिनोंके पश्चात्‌ कैन यहोवा के पास भूमि की उपज में से कुछ भेंट ले आया। 4 और हाबिल भी अपक्की भेड़-बकरियोंके कई एक पहिलौठे बच्चे भेंट चढ़ाने ले आया और उनकी चर्बी भेंट चढ़ाई; तब यहोवा ने हाबिल और उसकी भेंट को तो ग्रहण किया, 5 परन्तु कैन और उसकी भेंट को उस ने ग्रहण न किया। तब कैन अति क्रोधित हुआ, और उसके मुंह पर उदासी छा गई। 6 तब यहोवा ने कैन से कहा, तू क्योंक्रोधित हुआ ? और तेरे मुंह पर उदासी क्योंछा गई है ? 7 यदि तू भला करे, तो क्या तेरी भेंट ग्रहण न की जाएगी ? और यदि तू भला न करे, तो पाप द्वार पर छिपा रहता है, और उसकी लालसा तेरी और होगी, और तू उस पर प्रभुता करेगा। 8 तब कैन ने अपके भाई हाबिल से कुछ कहा : और जब वे मैदान में थे, तब कैन ने अपके भाई हाबिल पर चढ़कर उसे घात किया। 9 तब यहोवा ने कैन से पूछा, तेरा भाई हाबिल कहां है ? उस ने कहा मालूम नहीं : क्या मै अपके भाई का रखवाला हूं ? 10 उस ने कहा, तू ने क्या किया है ? तेरे भाई का लोहू भूमि में से मेरी ओर चिल्लाकर मेरी दोहाई दे रहा है ! 11 इसलिथे अब भूमि जिस ने तेरे भाई का लोहू तेरे हाथ से पीने के लिथे अपना मुंह खोला है, उसकी ओर से तू शापित है। 12 चाहे तू भूमि पर खेती करे, तौभी उसकी पूरी उपज फिर तुझे न मिलेगी, और तू पृय्वी पर बहेतू और भगोड़ा होगा। 13 तब कैन ने यहोवा से कहा, मेरा दण्ड सहने से बाहर है। 14 देख, तू ने आज के दिन मुझे भूमि पर से निकाला है और मै तेरी दृष्टि की आड़ मे रहूंगा और पृय्वी पर बहेतू और भगोड़ा रहूंगा; और जो कोई मुझे पाएगा, मुझे घात करेगा। 15 इस कारण यहोवा ने उस से कहा, जो कोई कैन को घात करेगा उस से सात गुणा पलटा लिया जाएगा। और यहोवा ने कैन के लिथे एक चिन्ह ठहराया ऐसा ने हो कि कोई उसे पाकर मार डाले।। 16 तब कैन यहोवा के सम्मुख से निकल गया, और नोद्‌ नाम देश में, जो अदन के पूर्व की ओर है, रहने लगा। 17 जब कैन अपक्की पत्नी के पास गया जब वह गर्भवती हुई और हनोक को जन्मी, फिर कैन ने एक नगर बसाया और उस नगर का नाम अपके पुत्र के नाम पर हनोक रखा। 18 और हनोक से ईराद उत्पन्न हुआ, और ईराद ने महूयाएल को जन्म दिया, और महूयाएल ने मतूशाएल को, और मतूशाएल ने लेमेक को जन्म दिया। 19 और लेमेक ने दो स्त्रियां ब्याह ली : जिन में से एक का नाम आदा, और दूसरी को सिल्ला है। 20 और आदा ने याबाल को जन्म दिया। वह तम्बुओं में रहना और जानवरोंका पालन इन दोनो रीतियोंका उत्पादक हुआ। 21 और उसके भाई का नाम यूबाल है : वह वीणा और बांसुरी आदि बाजोंके बजाने की सारी रीति का उत्पादक हुआ। 22 और सिल्ला ने भी तूबल्कैन नाम एक पुत्र को जन्म दिया : वह पीतल और लोहे के सब धारवाले हयियारोंका गढ़नेवाला हुआ: और तूबल्कैन की बहिन नामा यी। 23 और लेमेक ने अपक्की पत्नियोंसे कहा, हे आदा और हे सिल्ला मेरी सुनो; हे लेमेक की पत्नियों, मेरी बात पर कान लगाओ: मैंने एक पुरूष को जो मेरे चोट लगाता या, अर्यात्‌ एक जवान को जो मुझे घायल करता या, घात किया है। 24 जब कैन का पलटा सातगुणा लिया जाएगा। तो लेमेक का सतहरगुणा लिया जाएगा। 25 और आदम अपक्की पत्नी के पास फिर गया; और उस ने एक पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम यह कह के शेत रखा, कि परमेश्वर ने मेरे लिथे हाबिल की सन्ती, जिसको कैन ने घात किया, एक और वंश ठहरा दिया है। 26 और शेत के भी एक पुत्र उत्पन्न हुआ; और उस ने उसका नाम एनोश रखा, उसी समय से लोग यहोवा से प्रार्यना करने लगे।।

उत्पत्ति 5

1 आदम की वंशावली यह है। जब परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की तब अपके ही स्वरूप में उसको बनाया; 2 उस ने नर और नारी करके मनुष्योंकी सृष्टि की और उन्हें आशीष दी, और उनकी सृष्टि के दिन उनका नाम आदम रखा। 3 जब आदम एक सौ तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा उसकी समानता में उस ही के स्वरूप के अनुसार एक पुत्र उत्पन्न हुआ उसका नाम शेत रखा। 4 और शेत के जन्म के पश्चात्‌ आदम आठ सौ वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुईं। 5 और आदम की कुल अवस्या नौ सौ तीस वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।। 6 जब शेत एक सौ पांच वर्ष का हुआ, तब उस ने एनोश को जन्म दिया। 7 और एनोश के जन्म के पश्चात्‌ शेत आठ सौ सात वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुईं। 8 और शेत की कुल अवस्या नौ सौ बारह वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।। 9 जब एनोश नब्बे वर्ष का हुआ, तब उस ने केनान को जन्म दिया। 10 और केनान के जन्म के पश्चात्‌ एनोश आठ सौ पन्द्रह वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां हुई। 11 और एनोश की कुल अवस्या नौ सौ पांच वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।। 12 जब केनान सत्तर वर्ष का हुआ, तब उस ने महललेल को जन्म दिया। 13 और महललेल के जन्म के पश्चात्‌ केनान आठ सौ चालीस वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई। 14 और केनान की कुल अवस्या नौ सौ दस वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।। 15 जब महललेल पैंसठ वर्ष का हुआ, तब उस ने थेरेद को जन्म दिया। 16 और थेरेद के जन्म के पश्चात्‌ महललेल आठ सौ तीस वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई। 17 और महललेल की कुल अवस्या आठ सौ पंचानवे वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।। 18 जब थेरेद एक सौ बासठ वर्ष का हुआ, जब उस ने हनोक को जन्म दिया। 19 और हनोक के जन्म के पश्चात्‌ थेरेद आठ सौ वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई। 20 और थेरेद की कुल अवस्या नौ सौ बासठ वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया। 21 जब हनोक पैंसठ वर्ष का हुआ, तब उस ने मतूशेलह को जन्म दिया। 22 और मतूशेलह के जन्म के पश्चात्‌ हनोक तीन सौ वर्ष तक परमेश्वर के साय साय चलता रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई। 23 और हनोक की कुल अवस्या तीन सौ पैंसठ वर्ष की हुई। 24 और हनोक परमेश्वर के साय साय चलता या; फिर वह लोप हो गया क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया। 25 जब मतूशेलह एक सौ सत्तासी वर्ष का हुआ, तब उस ने लेमेक को जन्म दिया। 26 और लेमेक के जन्म के पश्चात्‌ मतूशेलह सात सौ बयासी वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई। 27 और मतूशेलह की कुल अवस्या नौ सौ उनहत्तर वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।। 28 जब लेमेक एक सौ बयासी वर्ष का हुआ, तब उस ने एक पुत्र जन्म दिया। 29 और यह कहकर उसका नाम नूह रखा, कि यहोवा ने जो पृय्वी को शाप दिया है, उसके विषय यह लड़का हमारे काम में, और उस कठिन परिश्र्म में जो हम करते हैं, हम को शान्ति देगा। 30 और नूह के जन्म के पश्चात्‌ लेमेक पांच सौ पंचानवे वर्ष जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई। 31 और लेमेक की कुल अवस्या सात सौ सतहत्तर वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।। 32 और नूह पांच सौ वर्ष का हुआ; और नूह ने शेम, और हाम और थेपेत को जन्म दिया।।

उत्पत्ति 6

1 फिर जब मनुष्य भूमि के ऊपर बहुत बढ़ने लगे, और उनके बेटियां उत्पन्न हुई, 2 तब परमेश्वर के पुत्रोंने मनुष्य की पुत्रियोंको देखा, कि वे सुन्दर हैं; सो उन्होंने जिस जिसको चाहा उन से ब्याह कर लिया। 3 और यहोवा ने कहा, मेरा आत्मा मनुष्य से सदा लोंविवाद करता न रहेगा, क्योंकि मनुष्य भी शरीर ही है : उसकी आयु एक सौ बीस वर्ष की होगी। 4 उन दिनोंमें पृय्वी पर दानव रहते थे; और इसके पश्चात्‌ जब परमेश्वर के पुत्र मनुष्य की पुत्रियोंके पास गए तब उनके द्वारा जो सन्तान उत्पन्न हुए, वे पुत्र शूरवीर होते थे, जिनकी कीत्तिर् प्राचीनकाल से प्रचलित है। 5 और यहोवा ने देखा, कि मनुष्योंकी बुराई पृय्वी पर बढ़ गई है, और उनके मन के विचार में जो कुछ उत्पन्न होता है सो निरन्तर बुरा ही होता है। 6 और यहोवा पृय्वी पर मनुष्य को बनाने से पछताया, और वह मन में अति खेदित हुआ। 7 तब यहोवा ने सोचा, कि मै मनुष्य को जिसकी मै ने सृष्टि की है पृय्वी के ऊपर से मिटा दूंगा क्योंकि मैं उनके बनाने से पछताता हूं। 8 परन्तु यहोवा के अनुग्रह की दृष्टि नूह पर बनी रही।। 9 नूह की वंशावली यह है। नूह धर्मी पुरूष और अपके समय के लोगोंमें खरा या, और नूह परमेश्वर ही के साय साय चलता रहा। 10 और नूह से, शेम, और हाम, और थेपेत नाम, तीन पुत्र उत्पन्न हुए। 11 उस समय पृय्वी परमेश्वर की दृष्टि में बिगड़ गई यी, और उपद्रव से भर गई यी। 12 और परमेश्वर ने पृय्वी पर जो दृष्टि की तो क्या देखा, कि वह बिगड़ी हुई है; क्योंकि सब प्राणियोंने पृय्वी पर अपक्की अपक्की चाल चलन बिगाड़ ली यी। 13 तब परमेश्वर ने नूह से कहा, सब प्राणियोंके अन्त करने का प्रश्न मेरे साम्हने आ गया है; क्योंकि उनके कारण पृय्वी उपद्रव से भर गई है, इसलिथे मै उनको पृय्वी समेत नाश कर डालूंगा। 14 इसलिथे तू गोपेर वृझ की लकड़ी का एक जहाज बना ले, उस में कोठरियां बनाना, और भीतर बाहर उस पर राल लगाना। 15 और इस ढंग से उसको बनाना : जहाज की लम्बाई तीन सौ हाथ, चौड़ाई पचास हाथ, और ऊंचाई तीस हाथ की हो। 16 जहाज में एक खिड़की बनाना, और इसके एक हाथ ऊपर से उसकी छत बनाना, और जहाज की एक अलंग में एक द्वार रखना, और जहाज में पहिला, दूसरा, तीसरा खण्ड बनाना। 17 और सुन, मैं आप पृय्वी पर जलप्रलय करके सब प्राणियोंको, जिन में जीवन की आत्मा है, आकाश के नीचे से नाश करने पर हूं : और सब जो पृय्वी पर है मर जाएंगे। 18 परन्तु तेरे संग मै वाचा बान्धता हूं : इसलिथे तू अपके पुत्रों, स्त्री, और बहुओं समेत जहाज में प्रवेश करना। 19 और सब जीवित प्राणियोंमें से, तू एक एक जाति के दो दो, अर्यात्‌ एक नर और एक मादा जहाज में ले जाकर, अपके साय जीवित रखना। 20 एक एक जाति के पक्की, और एक एक जाति के पशु, और एक एक जाति के भूमि पर रेंगनेवाले, सब में से दो दो तेरे पास आएंगे, कि तू उनको जीवित रखे। 21 और भांति भांति का भोज्य पदार्य जो खाया जाता है, उनको तू लेकर अपके पास इकट्ठा कर रखना सो तेरे और उनके भोजन के लिथे होगा। 22 परमेश्वर की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया।

उत्पत्ति 7

1 और यहोवा ने नूह से कहा, तू अपके सारे घराने समेत जहाज में जा; क्योंकि मै ने इस समय के लोगोंमें से केवल तुझी को अपक्की दृष्टि में धर्मी देखा है। 2 सब जाति के शुद्ध पशुओं में से तो तू सात सात, अर्यात्‌ नर और मादा लेना : पर जो पशु शुद्ध नहीं है, उन में से दो दो लेना, अर्यात्‌ नर और मादा : 3 और आकाश के पझियोंमें से भी, सात सात, अर्यात्‌ नर और मादा लेना : कि उनका वंश बचकर सारी पृय्वी के ऊपर बना रहे। 4 क्योंकि अब सात दिन और बीतने पर मैं पृय्वी पर चालीस दिन और चालीस रात तक जल बरसाता रहूंगा; जितनी वस्तुएं मैं ने बनाईं है सब को भूमि के ऊपर से मिटा दूंगा। 5 यहोवा की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने किया। 6 नूह की अवस्या छ: सौ वर्ष की यी, जब जलप्रलय पृय्वी पर आया। 7 नूह अपके पुत्रों, पत्नी और बहुओं समेत, जलप्रलय से बचने के लिथे जहाज में गया। 8 और शुद्ध, और अशुद्ध दोनो प्रकार के पशुओं में से, पझियों, 9 और भूमि पर रेंगनेवालोंमें से भी, दो दो, अर्यात्‌ नर और मादा, जहाज में नूह के पास गए, जिस प्रकार परमेश्वर ने नूह को आज्ञा दी यी। 10 सात दिन के उपरान्त प्रलय का जल पृय्वी पर आने लगा। 11 जब नूह की अवस्या के छ: सौवें वर्ष के दूसरे महीने का सत्तरहवां दिन आया; उसी दिन बड़े गहिरे समुद्र के सब सोते फूट निकले और आकाश के फरोखे खुल गए। 12 और वर्षा चालीस दिन और चालीस रात निरन्तर पृय्वी पर होती रही। 13 ठीक उसी दिन नूह अपके पुत्र शेम, हाम, और थेपेत, और अपक्की पत्नी, और तीनोंबहुओं समेत, 14 और उनके संग एक एक जाति के सब बनैले पशु, और एक एक जाति के सब घरेलू पशु, और एक एक जाति के सब पृय्वी पर रेंगनेवाले, और एक एक जाति के सब उड़नेवाले पक्की, जहाज में गए। 15 जितने प्राणियोंमें जीवन की आत्मा यी उनकी सब जातियोंमें से दो दो नूह के पास जहाज में गए। 16 और जो गए, वह परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार सब जाति के प्राणियोंमें से नर और मादा गए। तब यहोवा ने उसका द्वार बन्द कर दिया। 17 और पृय्वी पर चालीस दिन तक प्रलय होता रहा; और पानी बहुत बढ़ता ही गया जिस से जहाज ऊपर को उठने लगा, और वह पृय्वी पर से ऊंचा उठ गया। 18 और जल बढ़ते बढ़ते पृय्वी पर बहुत ही बढ़ गया, और जहाज जल के ऊपर ऊपर तैरता रहा। 19 और जल पृय्वी पर अत्यन्त बढ़ गया, यहां तक कि सारी धरती पर जितने बड़े बड़े पहाड़ थे, सब डूब गए। 20 जल तो पन्द्रह हाथ ऊपर बढ़ गया, और पहाड़ भी डूब गए 21 और क्या पक्की, क्या घरेलू पशु, क्या बनैले पशु, और पृय्वी पर सब चलनेवाले प्राणी, और जितने जन्तु पृय्वी मे बहुतायत से भर गए थे, वे सब, और सब मनुष्य मर गए। 22 जो जो स्यल पर थे उन में से जितनोंके नयनोंमें जीवन का श्वास या, सब मर मिटे। 23 और क्या मनुष्य, क्या पशु, क्या रेंगनेवाले जन्तु, क्या आकाश के पक्की, जो जो भूमि पर थे, सो सब पृय्वी पर से मिट गए; केवल नूह, और जितने उसके संग जहाज में थे, वे ही बच गए। 24 और जल पृय्वी पर एक सौ पचास दिन तक प्रबल रहा।।

उत्पत्ति 8

1 और परमेश्वर ने नूह की, और जितने बनैले पशु, और घरेलू पशु उसके संग जहाज में थे, उन सभोंकी सुधि ली : और परमेश्वर ने पृय्वी पर पवन बहाई, और जल घटने लगा। 2 और गहिरे समुद्र के सोते और आकाश के फरोखे बंद हो गए; और उस से जो वर्षा होती यी सो भी यम गई। 3 और एक सौ पचास दिन के पशचात्‌ जल पृय्वी पर से लगातार घटने लगा। 4 सातवें महीने के सत्तरहवें दिन को, जहाज अरारात नाम पहाड़ पर टिक गया। 5 और जल दसवें महीने तक घटता चला गया, और दसवें महीने के पहिले दिन को, पहाड़ोंकी चोटियाँ दिखलाई दीं। 6 फिर ऐसा हुआ कि चालीस दिन के पश्चात्‌ नूह ने अपके बनाए हुए जहाज की खिड़की को खोलकर, एक कौआ उड़ा दिया : 7 जब तक जल पृय्वी पर से सूख न गया, तब तक कौआ इधर उधर फिरता रहा। 8 फिर उस ने अपके पास से एक कबूतरी को उड़ा दिया, कि देखें कि जल भूमि से घट गया कि नहीं। 9 उस कबूतरी को अपके पैर के तले टेकने के लिथे कोई आधार ने मिला, सो वह उसके पास जहाज में लौट आई : क्योंकि सारी पृय्वी के ऊपर जल ही जल छाया या तब उस ने हाथ बढ़ाकर उसे अपके पास जहाज में ले लिया। 10 तब और सात दिन तक ठहरकर, उस ने उसी कबूतरी को जहाज में से फिर उड़ा दिया। 11 और कबूतरी सांफ के समय उसके पास आ गई, तो क्या देखा कि उसकी चोंच में जलपाई का एक नया पत्ता है; इस से नूह ने जान लिया, कि जल पृय्वी पर घट गया है। 12 फिर उस ने सात दिन और ठहरकर उसी कबूतरी को उड़ा दिया; और वह उसके पास फिर कभी लौटकर न आई। 13 फिर ऐसा हुआ कि छ: सौ एक वर्ष के पहिले महीने के पहिले दिन जल पृय्वी पर से सूख गया। तब नूह ने जहाज की छत खोलकर क्या देखा कि धरती सूख गई है। 14 और दूसरे महीने के सताईसवें दिन को पृय्वी पूरी रीति से सूख गई।। 15 तब परमेश्वर ने, नूह से कहा, 16 तू अपके पुत्रों, पत्नी, और बहुओं समेत जहाज में से निकल आ। 17 क्या पक्की, क्या पशु, क्या सब भांति के रेंगनेवाले जन्तु जो पृय्वी पर रेंगते हैं, जितने शरीरधारी जीवजन्तु तेरे संग हैं, उस सब को अपके साय निकाल ले आ, कि पृय्वी पर उन से बहुत बच्चे उत्पन्न हों; और वे फूलें-फलें, और पृय्वी पर फैल जाएं। 18 तब नूह, और उसके पुत्र, और पत्नी, और बहुएं, निकल आईं : 19 और सब चौपाए, रेंगनेवाले जन्तु, और पक्की, और जितने जीवजन्तु पृय्वी पर चलते फिरते हैं, सो सब जाति जाति करके जहाज में से निकल आए। 20 तब नूह ने यहोवा के लिथे एक वेदी बनाई; और सब शुद्ध पशुओं, और सब शुद्ध पझियोंमें से, कुछ कुछ लेकर वेदी पर होमबलि चढ़ाया। 21 इस पर यहोवा ने सुखदायक सुगन्ध पाकर सोचा, कि मनुष्य के कारण मैं फिर कभी भूमि को शाप न दूंगा, यद्यपि मनुष्य के मन में बचपन से जो कुछ उत्पन्न होता है सो बुरा ही होता है; तौभी जैसा मैं ने सब जीवोंको अब मारा है, वैसा उनको फिर कभी न मारूंगा। 22 अब से जब तक पृय्वी बनी रहेगी, तब तक बोने और काटने के समय, ठण्ड और तपन, धूपकाल और शीतकाल, दिन और रात, निरन्तर होते चले जाएंगे।।

उत्पत्ति 9

1 फिर परमेश्वर ने नूह और उसके पुत्रोंको आशीष दी और उन से कहा कि फूलो-फलो, और बढ़ो, और पृय्वी में भर जाओ। 2 और तुम्हारा डर और भय पृय्वी के सब पशुओं, और आकाश के सब पझियों, और भूमि पर के सब रेंगनेवाले जन्तुओं, और समुद्र की सब मछलियोंपर बना रहेगा : वे सब तुम्हारे वश में कर दिए जाते हैं। 3 सब चलनेवाले जन्तु तुम्हारा आहार होंगे; जैसा तुम को हरे हरे छोटे पेड़ दिए थे, वैसा ही अब सब कुछ देता हूं। 4 पर मांस को प्राण समेत अर्यात्‌ लोहू समेत तुम न खाना। 5 और निश्चय मैं तुम्हारा लोहू अर्यात्‌ प्राण का पलटा लूंगा : सब पशुओं, और मनुष्यों, दोनोंसे मैं उसे लूंगा : मनुष्य के प्राण का पलटा मै एक एक के भाई बन्धु से लूंगा। 6 जो कोई मनुष्य का लोहू बहाएगा उसका लोहू मनुष्य ही से बहाथा जाएगा क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्य को अपके ही स्वरूप के अनुसार बनाया है। 7 और तुम तो फूलो-फलो, और बढ़ो, और पृय्वी में बहुत बच्चे जन्मा के उस में भर जाओ।। 8 फिर परमेश्वर ने नूह और उसके पुत्रोंसे कहा, 9 सुनों, मैं तुम्हारे साय और तुम्हारे पश्चात्‌ जो तुम्हारा वंश होगा, उसके साय भी वाचा बान्धता हूं। 10 और सब जीवित प्राणियोंसे भी जो तुम्हारे संग है क्या पक्की क्या घरेलू पशु, क्या पृय्वी के सब बनैले पशु, पृय्वी के जितने जीवजन्तु जहाज से निकले हैं; सब के साय भी मेरी यह वाचा बन्धती है : 11 और मै तुम्हारे साय अपक्की इस वाचा को पूरा करूंगा; कि सब प्राणी फिर जलप्रलय से नाश न होंगे : और पृय्वी के नाश करने के लिथे फिर जलप्रलय न होगा। 12 फिर परमेश्वर ने कहा, जो वाचा मै तुम्हारे साय, और जितने जीवित प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साय भी युग युग की पीढिय़ोंके लिथे बान्धता हूं; उसका यह चिन्ह है : 13 कि मैं ने बादल मे अपना धनुष रखा है वह मेरे और पृय्वी के बीच में वाचा का चिन्ह होगा। 14 और जब मैं पृय्वी पर बादल फैलाऊं जब बादल में धनुष देख पकेगा। 15 तब मेरी जो वाचा तुम्हारे और सब जीवित शरीरधारी प्राणियोंके साय बान्धी है; उसको मैं स्मरण करूंगा, तब ऐसा जलप्रलय फिर न होगा जिस से सब प्राणियोंका विनाश हो। 16 बादल में जो धनुष होगा मैं उसे देख के यह सदा की वाचा स्मरण करूंगा जो परमेश्वर के और पृय्वी पर के सब जीवित शरीरधारी प्राणियोंके बीच बन्धी है। 17 फिर परमेश्वर ने नूह से कहा जो वाचा मैं ने पृय्वी भर के सब प्राणियोंके साय बान्धी है, उसका चिन्ह यही है।। 18 नूह के जो पुत्र जहाज में से निकले, वे शेम, हाम, और थेपेत थे : और हाम तो कनान का पिता हुआ। 19 नूह के तीन पुत्र थे ही हैं, और इनका वंश सारी पृय्वी पर फैल गया। 20 और नूह किसानी करने लगा, और उस ने दाख की बारी लगाई। 21 और वह दाखमधु पीकर मतवाला हुआ; और अपके तम्बू के भीतर नंगा हो गया। 22 तब कनान के पिता हाम ने, अपके पिता को नंगा देखा, और बाहर आकर अपके दोनोंभाइयोंको बतला दिया। 23 तब शेम और थेपेत दोनोंने कपड़ा लेकर अपके कन्धोंपर रखा, और पीछे की ओर उलटा चलकर अपके पिता के नंगे तन को ढ़ाप दिया, और वे अपना मुख पीछे किए हुए थे इसलिथे उन्होंने अपके पिता को नंगा न देखा। 24 जब नूह का नशा उतर गया, तब उस ने जान लिया कि उसके छोटे पुत्र ने उस से क्या किया है। 25 इसलिथे उस ने कहा, कनान शापित हो : वह अपके भाई बन्धुओं के दासोंका दास हो। 26 फिर उस ने कहा, शेम का परमेश्वर यहोवा धन्य है, और कनान शेम का दास होवे। 27 परमेश्वर थेपेत के वंश को फैलाए; और वह शेम के तम्बुओं मे बसे, और कनान उसका दास होवे। 28 जलप्रलय के पश्चात्‌ नूह साढ़े तीन सौ वर्ष जीवित रहा। 29 और नूह की कुल अवस्या साढ़े नौ सौ वर्ष की हुई : तत्पश्चात्‌ वह मर गया।

उत्पत्ति 10

1 नूह के पुत्र जो शेम, हाम और थेपेत थे उनके पुत्र जलप्रलय के पश्चात्‌ उत्पन्न हुए : उनकी वंशावली यह है।। 2 थेपेत के पुत्र : गोमेर, मागोग, मादै, यावान, तूबल, मेशेक, और तीरास हुए। 3 और गोमेर के पुत्र : अशकनज, रीपत, और तोगर्मा हुए। 4 और यावान के वंश में एलीशा, और तर्शीश, और कित्ती, और दोदानी लोग हुए। 5 इनके वंश अन्यजातियोंके द्वीपोंके देशोंमें ऐसे बंट गए, कि वे भिन्न भिन्न भाषाओं, कुलों, और जातियोंके अनुसार अलग अलग हो गए।। 6 फिर हाम के पुत्र : कूश, और मिस्र, और फूत और कनान हुए। 7 और कूश के पुत्र सबा, हवीला, सबता, रामा, और सबूतका हुए : और रामा के पुत्र शबा और ददान हुए। 8 और कूश के वंश में निम्रोद भी हुआ; पृय्वी पर पहिला वीर वही हुआ है। 9 वही यहोवा की दृष्टि में पराक्रमी शिकार खेलनेवाला ठहरा, इस से यह कहावत चक्की है; कि निम्रोद के समान यहोवा की दृष्टि में पराक्रमी शिकार खेलनेवाला। 10 और उसके राज्य का आरम्भ शिनार देश में बाबुल, अक्कद, और कलने हुआ। 11 उस देश से वह निकलकर अश्शूर्‌ को गया, और नीनवे, रहोबोतीर, और कालह को, 12 और नीनवे और कालह के बीच रेसेन है, उसे भी बसाया, बड़ा नगर यही है। 13 और मिस्र के वंश में लूदी, अनामी, लहाबी, नप्तूही, 14 और पत्रुसी, कसलूही, और कप्तोरी लोग हुए, कसलूहियोंमे से तो पलिश्ती लोग निकले।। 15 फिर कनान के वंश में उसका ज्थेष्ठ सीदोन, तब हित्त, 16 और यबूसी, एमोरी, गिर्गाशी, 17 हिव्वी, अर्की, सीनी, 18 अर्वदी, समारी, और हमाती लोग भी हुए : फिर कनानियोंके कुल भी फैल गए। 19 और कनानियोंका सिवाना सीदोन से लेकर गरार के मार्ग से होकर अज्जा तक और फिर सदोम और अमोरा और अदमा और सबोयीम के मार्ग से होकर लाशा तक हुआ। 20 हाम के वंश में थे ही हुए; और थे भिन्न भिन्न कुलों, भाषाओं, देशों, और जातियोंके अनुसार अलग अलग हो गए।। 21 फिर शेम, जो सब एबेरवंशियोंका मूलपुरूष हुआ, और जो थेपेत का ज्थेष्ठ भाई या, उसके भी पुत्र उत्पन्न हुए। 22 शेम के पुत्र : एलाम, अश्शूर्‌, अर्पझद्‌, लूद और आराम हुए। 23 और आराम के पुत्र : ऊस, हूल, गेतेर और मश हुए। 24 और अर्पझद्‌ ने शेलह को, और शेलह ने एबेर को जन्म दिया। 25 और एबेर के दो पुत्र उत्पन्न हुए, एक का नाम पेलेग इस कारण रखा गया कि उसके दिनोंमें पृय्वी बंट गई, और उसके भाई का नाम योक्तान है। 26 और योक्तान ने अल्मोदाद, शेलेप, हसर्मावेत, थेरह, 27 यदोरवाम, ऊजाल, दिक्ला, 28 ओबाल, अबीमाएल, शबा, 29 ओपीर, हवीला, और योबाब को जन्म दिया : थे ही सब योक्तान के पुत्र हुए। 30 इनके रहने का स्यान मेशा से लेकर सपारा जो पूर्व में एक पहाड़ है, उसके मार्ग तक हुआ। 31 शेम के पुत्र थे ही हुए; और थे भिन्न भिन्न कुलों, भाषाओं, देशोंऔर जातियोंके अनुसार अलग अलग हो गए।। 32 नूह के पुत्रोंके घराने थे ही हैं : और उनकी जातियोंके अनुसार उनकी वंशावलियां थे ही हैं; और जलप्रलय के पश्चात्‌ पृय्वी भर की जातियां इन्हीं में से होकर बंट गई।।

उत्पत्ति 11

1 सारी पृय्वी पर एक ही भाषा, और एक ही बोली यी। 2 उस समय लोग पूर्व की और चलते चलते शिनार देश में एक मैदान पाकर उस में बस गए। 3 तब वे आपस में कहने लगे, कि आओ; हम ईंटें बना बना के भली भंाति आग में पकाएं, और उन्होंने पत्यर के स्यान में ईंट से, और चूने के स्यान में मिट्टी के गारे से काम लिया। 4 फिर उन्होंने कहा, आओ, हम एक नगर और एक गुम्मट बना लें, जिसकी चोटी आकाश से बात करे, इस प्रकार से हम अपना नाम करें ऐसा न हो कि हम को सारी पृय्वी पर फैलना पके। 5 जब लोग नगर और गुम्मट बनाने लगे; तब इन्हें देखने के लिथे यहोवा उतर आया। 6 और यहोवा ने कहा, मैं क्या देखता हूं, कि सब एक ही दल के हैं और भाषा भी उन सब की एक ही है, और उन्होंने ऐसा ही काम भी आरम्भ किया; और अब जितना वे करने का यत्न करेंगे, उस में से कुछ उनके लिथे अनहोना न होगा। 7 इसलिथे आओ, हम उतर के उनकी भाषा में बड़ी गड़बड़ी डालें, कि वे एक दूसरे की बोली को न समझ सकें। 8 इस प्रकार यहोवा ने उनको, वहां से सारी पृय्वी के ऊपर फैला दिया; और उन्होंने उस नगर का बनाना छोड़ दिया। 9 इस कारण उस नगर को नाम बाबुल पड़ा; क्योंकि सारी पृय्वी की भाषा में जो गड़बड़ी है, सो यहोवा ने वहीं डाली, और वहीं से यहोवा ने मनुष्योंको सारी पृय्वी के ऊपर फैला दिया।। 10 शेम की वंशावली यह है। जल प्रलय के दो वर्ष पश्चात्‌ जब शेम एक सौ वर्ष का हुआ, तब उस ने अर्पझद्‌ को जन्म दिया। 11 और अर्पझद्‌ ने जन्म के पश्चात्‌ शेम पांच सौ वर्ष जीवित रहा; और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 12 जब अर्पझद्‌ पैंतीस वर्ष का हुआ, तब उस ने शेलह को जन्म दिया। 13 और शेलह के जन्म के पश्चात्‌ अर्पझद्‌ चार सौ तीन वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 14 जब शेलह तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा एबेर को जन्म हुआ। 15 और एबेर के जन्म के पश्चात्‌ शेलह चार सौ तीन वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 16 जब एबेर चौंतीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा पेलेग का जन्म हुआ। 17 और पेलेग के जन्म के पश्चात्‌ एबेर चार सौ तीस वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 18 जब पेलेग तीस वर्ष को हुआ, तब उसके द्वारा रू का जन्म हुआ। 19 और रू के जन्म के पश्चात्‌ पेलेग दो सौ नौ वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 20 जब रू बत्तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा सरूग का जन्म हुआ। 21 और सरूग के जन्म के पश्चात्‌ रू दो सौ सात वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 22 जब सरूग तीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा नाहोर का जन्म हुआ। 23 और नाहोर के जन्म के पश्चात्‌ सरूग दो सौ वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 24 जब नाहोर उनतीस वर्ष का हुआ, तब उसके द्वारा तेरह का जन्म हुआ। 25 और तेरह के जन्म के पश्चात्‌ नाहोर एक सौ उन्नीस वर्ष और जीवित रहा, और उसके और भी बेटे बेटियां उत्पन्न हुई।। 26 जब तक तेरह सत्तर वर्ष का हुआ, तब तक उसके द्वारा अब्राम, और नाहोर, और हारान उत्पन्न हुए।। 27 तेरह की यह वंशावली है। तेरह ने अब्राम, और नाहोर, और हारान को जन्म दिया; और हारान ने लूत को जन्म दिया। 28 और हारान अपके पिता के साम्हने ही, कस्‌दियोंके ऊर नाम नगर में, जो उसकी जन्मभूमि यी, मर गया। 29 अब्राम और नाहोर ने स्त्रियां ब्याह लीं : अब्राम की पत्नी का नाम तो सारै, और नाहोर की पत्नी का नाम मिल्का या, यह उस हारान की बेटी यी, जो मिल्का और यिस्का दोनोंका पिता या। 30 सारै तो बांफ यी; उसके संतान न हुई। 31 और तेरह अपना पुत्र अब्राम, और अपना पोता लूत जो हारान का पुत्र या, और अपक्की बहू सारै, जो उसके पुत्र अब्राम की पत्नी यी इन सभोंको लेकर कस्‌दियोंके ऊर नगर से निकल कनान देश जाने को चला; पर हारान नाम देश में पहुचकर वहीं रहने लगा। 32 जब तेरह दो सौ पांच वर्ष का हुआ, तब वह हारान देश में मर गया।।

उत्पत्ति 12

1 यहोवा ने अब्राम से कहा, अपके देश, और अपक्की जन्मभूमि, और अपके पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊंगा। 2 और मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊंगा, और तुझे आशीष दूंगा, और तेरा नाम बड़ा करूंगा, और तू आशीष का मूल होगा। 3 और जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूंगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूंगा; और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएंगे। 4 यहोवा के इस वचन के अनुसार अब्राम चला; और लूत भी उसके संग चला; और जब अब्राम हारान देश से निकला उस समय वह पचहत्तर वर्ष का या। 5 सो अब्राम अपक्की पत्नी सारै, और अपके भतीजे लूत को, और जो धन उन्होंने इकट्ठा किया या, और जो प्राणी उन्होंने हारान में प्राप्त किए थे, सब को लेकर कनान देश में जाने को निकल चला; और वे कनान देश में आ भी गए। 6 उस देश के बीच से जाते हुए अब्राम शकेम में, जहां मोरे का बांज वृझ है, पंहुचा; उस समय उस देश में कनानी लोग रहते थे। 7 तब यहोवा ने अब्राम को दर्शन देकर कहा, यह देश मैं तेरे वंश को दूंगा : और उस ने वहां यहोवा के लिथे जिस ने उसे दर्शन दिया या, एक वेदी बनाई। 8 फिर वहां से कूच करके, वह उस पहाड़ पर आया, जो बेतेल के पूर्व की ओर है; और अपना तम्बू उस स्यान में खड़ा किया जिसकी पच्छिम की ओर तो बेतेल, और पूर्व की ओर ऐ है; और वहां भी उस ने यहोवा के लिथे एक वेदी बनाई : और यहोवा से प्रार्यना की 9 और अब्राम कूच करके दक्खिन देश की ओर चला गया।। 10 और उस देश में अकाल पड़ा : और अब्राम मिस्र देश को चला गया कि वहां परदेशी होकर रहे -- क्योंकि देश में भयंकर अकाल पड़ा या। 11 फिर ऐसा हुआ कि मिस्र के निकट पहुंचकर, उस ने अपक्की पत्नी सारै से कहा, सुन, मुझे मालूम है, कि तू एक सुन्दर स्त्री है : 12 इस कारण जब मिस्री तुझे देखेंगे, तब कहेंगे, यह उसकी पत्नी है, सो वे मुझ को तो मार डालेंगे, पर तुझ को जीती रख लेंगे। 13 सो यह कहना, कि मैं उसकी बहिन हूं; जिस से तेरे कारण मेरा कल्याण हो और मेरा प्राण तेरे कारण बचे। 14 फिर ऐसा हुआ कि जब अब्राम मिस्र में आया, तब मिस्रियोंने उसकी पत्नी को देखा कि यह अति सुन्दर है। 15 और फिरौन के हाकिमोंने उसको देखकर फिरौन के साम्हने उसकी प्रशंसा की : सो वह स्त्री फिरौन के घर में रखी गई। 16 और उस ने उसके कारण अब्राम की भलाई की; सो उसको भेड़-बकरी, गाय-बैल, दास-दासियां, गदहे-गदहियां, और ऊंट मिले। 17 तब यहोवा ने फिरौन और उसके घराने पर, अब्राम की पत्नी सारै के कारण बड़ी बड़ी विपत्तियां डालीं। 18 सो फिरौन ने अब्राम को बुलवाकर कहा, तू ने मुझ से क्या किया है ? तू ने मुझे क्योंनहीं बताया कि वह तेरी पत्नी है ? 19 तू ने क्योंकहा, कि वह तेरी बहिन है ? मैं ने उसे अपक्की ही पत्नी बनाने के लिथे लिया; परन्तु अब अपक्की पत्नी को लेकर यहां से चला जा। 20 और फिरौन ने अपके आदमियोंको उसके विषय में आज्ञा दी और उन्होंने उसको और उसकी पत्नी को, सब सम्पत्ति समेत जो उसका या, विदा कर दिया।।

उत्पत्ति 13

1 तब अब्राम अपक्की पत्नी, और अपक्की सारी सम्पत्ति लेकर, लूत को भी संग लिथे हुए, मिस्र को छोड़कर कनान के दक्खिन देश में आया। 2 अब्राम भेड़-बकरी, गाय-बैल, और सोने-रूपे का बड़ा धनी या। 3 फिर वह दक्खिन देश से चलकर, बेतेल के पास उसी स्यान को पहुंचा, जहां उसका तम्बू पहले पड़ा या, जो बेतेल और ऐ के बीच में है। 4 यह स्यान उस वेदी का है, जिसे उस ने पहले बनाई यी, और वहां अब्राम ने फिर यहोवा से प्रार्यना की। 5 और लूत के पास भी, जो अब्राम के साय चलता या, भेड़-बकरी, गाय-बैल, और तम्बू थे। 6 सो उस देश में उन दोनोंकी समाई न हो सकी कि वे इकट्ठे रहें : क्योंकि उनके पास बहुत धन या इसलिथे वे इकट्ठे न रह सके। 7 सो अब्राम, और लूत की भेड़-बकरी, और गाय-बैल के चरवाहोंके बीच में फगड़ा हुआ : और उस समय कनानी, और परिज्जी लोग, उस देश में रहते थे। 8 तब अब्राम लूत से कहने लगा, मेरे और तेरे बीच, और मेरे और तेरे चरवाहोंके बीच में फगड़ा न होने पाए; क्योंकि हम लोग भाई बन्धु हैं। 9 क्या सारा देश तेरे साम्हने नहीं? सो मुझ से अलग हो, यदि तू बाईं ओर जाए तो मैं दहिनी ओर जाऊंगा; और यदि तू दहिनी ओर जाए तो मैं बाईं ओर जाऊंगा। 10 तब लूत ने आंख उठाकर, यरदन नदी के पास वाली सारी तराई को देखा, कि वह सब सिंची हुई है। 11 जब तक यहोवा ने सदोम और अमोरा को नाश न किया या, तब तक सोअर के मार्ग तक वह तराई यहोवा की बाटिका, और मिस्र देश के समान उपजाऊ यी। 12 अब्राम तो कनान देश में रहा, पर लूत उस तराई के नगरोंमें रहने लगा; और अपना तम्बू सदोम के निकट खड़ा किया। 13 सदोम के लोग यहोवा के लेखे में बड़े दुष्ट और पापी थे। 14 जब लूत अब्राम से अलग हो गया तब उसके पश्चात्‌ यहोवा ने अब्राम से कहा, आंख उठाकर जिस स्यान पर तू है वहां से उत्तर-दक्खिन, पूर्व-पश्चिम, चारोंओर दृष्टि कर। 15 क्योंकि जितनी भूमि तुझे दिखाई देती है, उस सब को मैं तुझे और तेरे वंश को युग युग के लिथे दूंगा। 16 और मैं तेरे वंश को पृय्वी की धूल के किनकोंकी नाई बहुत करूंगा, यहां तक कि जो कोई पृय्वी की धूल के किनकोंको गिन सकेगा वही तेरा वंश भी गिन सकेगा। 17 उठ, इस देश की लम्बाई और चौड़ाई में चल फिर; क्योंकि मैं उसे तुझी को दूंगा। 18 इसके पशचात्‌ अब्राम अपना तम्बू उखाड़कर, मम्रे के बांजोंके बीच जो हेब्रोन में थे जाकर रहने लगा, और वहां भी यहोवा की एक वेदी बनाई।।

उत्पत्ति 14

1 शिनार के राजा अम्रापेल, और एल्लासार के राजा अर्योक, और एलाम के राजा कदोर्लाओमेर, और गोयीम के राजा तिदाल के दिनोंमें ऐसा हुआ, 2 कि उन्होंने सदोम के राजा बेरा, और अमोरा के राजा बिर्शा, और अदमा के राजा शिनाब, और सबोयीम के राजा शेमेबेर, और बेला जो सोअर भी कहलाता है, इन राजाओं के विरूद्ध युद्ध किया। 3 इन पांचोंने सिद्दीम नाम तराई में, जो खारे ताल के पास है, एका किया। 4 बारह वर्ष तक तो थे कदोर्लाओमेर के अधीन रहे; पर तेरहवें वर्ष में उसके विरूद्ध उठे। 5 सो चौदहवें वर्ष में कदोर्लाओमेर, और उसके संगी राजा आए, और अशतरोत्कनम में रपाइयोंको, और हाम में जूजियोंको, और शबेकिर्यातैम में एमियोंको, 6 और सेईर नाम पहाड़ में होरियोंको, मारते मारते उस एल्पारान तक जो जंगल के पास है पहुंच गए। 7 वहां से वे लौटकर एन्मिशपात को आए, जो कादेश भी कहलाता है, और अमालेकियोंके सारे देश को, और उन एमोरियोंको भी जीत लिया, जो हससोन्तामार में रहते थे। 8 तब सदोम, अमोरा, अदमा, सबोयीम, और बेला, जो सोअर भी कहलाता है, इनके राजा निकले, और सिद्दीम नाम तराई। में, उनके साय युद्ध के लिथे पांति बान्धी। 9 अर्यात्‌ एलाम के राजा कदोर्लाओमेर, गोयीम के राजा तिदाल, शिनार के राजा अम्रापेल, और एल्लासार के राजा अर्योक, इन चारोंके विरूद्ध उन पांचोंने पांति बान्धी। 10 सिद्दीम नाम तराई में जहां लसार मिट्टी के गड़हे ही गड़हे थे; सदोम और अमोरा के राजा भागते भागते उन में गिर पके, और जो बचे वे पहाड़ पर भाग गए। 11 तब वे सदोम और अमोरा के सारे धन और भोजन वस्तुओं को लूट लाट कर चले गए। 12 और अब्राम का भतीजा लूत, जो सदोम में रहता या; उसको भी धन समेत वे लेकर चले गए। 13 तब एक जन जो भागकर बच निकला या उस ने जाकर इब्री अब्राम को समाचार दिया; अब्राम तो एमोरी मम्रे, जो एश्कोल और आनेर का भाई या, उसके बांज वृझोंके बीच में रहता या; और थे लोग अब्राम के संग वाचा बान्धे हुए थे। 14 यह सुनकर कि उसका भतीजा बन्धुआई में गया है, अब्राम ने अपके तीन सौ अठारह शिझित, युद्ध कौशल में निपुण दासोंको लेकर जो उसके कुटुम्ब में उत्पन्न हुए थे, अस्त्र शस्त्र धारण करके दान तक उनका पीछा किया। 15 और अपके दासोंके अलग अलग दल बान्धकर रात को उन पर चढ़ाई करके उनको मार लिया और होबा तक, जो दमिश्क की उत्तर ओर है, उनका पीछा किया। 16 और सारे धन को, और अपके भतीजे लूत, और उसके धन को, और स्त्रियोंको, और सब बन्धुओं को, लौटा ले आया। 17 जब वह कदोर्लाओमेर और उसके सायी राजाओं को जीतकर लौटा आता या तब सदोम का राजा शावे नाम तराई में, जो राजा की भी कहलाती है, उस से भेंट करने के लिथे आया। 18 जब शालेम का राजा मेल्कीसेदेक, जो परमप्रधान ईश्वर का याजक या, रोटी और दाखमधु ले आया। 19 और उस ने अब्राम को यह आशीर्वाद दिया, कि परमप्रधान ईश्वर की ओर से, जो आकाश और पृय्वी का अधिक्कारनेी है, तू धन्य हो। 20 और धन्य है परमप्रधान ईश्वर, जिस ने तेरे द्रोहियोंको तेरे वश में कर दिया है। तब अब्राम ने उसको सब का दशमांश दिया। 21 जब सदोम के राजा ने अब्राम से कहा, प्राणियोंको तो मुझे दे, और धन को अपके पास रख। 22 अब्राम ने सदोम के राजा ने कहा, परमप्रधान ईश्वर यहोवा, जो आकाश और पृय्वी का अधिक्कारनेी है, 23 उसकी मैं यह शपय खाता हूं, कि जो कुछ तेरा है उस में से न तो मै एक सूत, और न जूती का बन्धन, न कोई और वस्तु लूंगा; कि तू ऐसा न कहने पाए, कि अब्राम मेरे ही कारण धनी हुआ। 24 पर जो कुछ इन जवानोंने खा लिया है और उनका भाग जो मेरे साय गए थे; अर्यात्‌ आनेर, एश्कोल, और मम्रे मैं नहीं लौटाऊंगा वे तो अपना अपना भाग रख लें।।

उत्पत्ति 15

1 इन बातोंके पश्चात्‌ यहोवा को यह वचन दर्शन में अब्राम के पास पहुंचा, कि हे अब्राम, मत डर; तेरी ढाल और तेरा अत्यन्त बड़ा फल मैं हूं। 2 अब्राम ने कहा, हे प्रभु यहोवा मैं तो निर्वंश हूं, और मेरे घर का वारिस यह दमिश्की एलीएजेर होगा, सो तू मुझे क्या देगा ? 3 और अब्राम ने कहा, मुझे तो तू ने वंश नहीं दिया, और क्या देखता हूं, कि मेरे घर में उत्पन्न हुआ एक जन मेरा वारिस होगा। 4 तब यहोवा का यह वचन उसके पास पहुंचा, कि यह तेरा वारिस न होगा, तेरा जो निज पुत्र होगा, वही तेरा वारिस होगा। 5 और उस ने उसको बाहर ले जाके कहा, आकाश की ओर दृष्टि करके तारागण को गिन, क्या तू उनको गिन सकता है ? फिर उस ने उस से कहा, तेरा वंश ऐसा ही होगा। 6 उस ने यहोवा पर विश्वास किया; और यहोवा ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना। 7 और उस ने उस से कहा मैं वही यहोवा हूं जो तुझे कस्‌दियोंके ऊर नगर से बाहर ले आया, कि तुझ को इस देश का अधिक्कारने दूं। 8 उस ने कहा, हे प्रभु यहोवा मैं कैसे जानूं कि मैं इसका अधिक्कारनेी हूंगा ? 9 यहोवा ने उस से कहा, मेरे लिथे तीन वर्ष की एक कलोर, और तीन वर्ष की एक बकरी, और तीन वर्ष का एक मेंढ़ा, और एक पिण्डुक और कबूतर का एक बच्चा ले। 10 और इन सभोंको लेकर, उस ने बीच में से दो टुकड़े कर दिया, और टुकड़ोंको आम्हने-साम्हने रखा : पर चिडिय़ाओं को उस ने टुकड़े न किया। 11 और जब मांसाहारी पक्की लोयोंपर फपके, तब अब्राम ने उन्हें उड़ा दिया। 12 जब सूर्य अस्त होने लगा, तब अब्राम को भारी नींद आई; और देखो, अत्यन्त भय और अन्धकार ने उसे छा लिया। 13 तब यहोवा ने अब्राम से कहा, यह निश्चय जान कि तेरे वंश पराए देश में परदेशी होकर रहेंगे, और उसके देश के लोगोंके दास हो जाएंगे; और वे उनको चार सौ वर्ष लोंदु:ख देंगे; 14 फिर जिस देश के वे दास होंगे उसको मैं दण्ड दूंगा : और उसके पश्चात्‌ वे बड़ा धन वहां से लेकर निकल आएंगे। 15 तू तो अपके पितरोंमें कुशल के साय मिल जाएगा; तुझे पूरे बुढ़ापे में मिट्टी दी जाएगी। 16 पर वे चौयी पीढ़ी में यहां फिर आएंगे : क्योंकि अब तक एमोरियोंका अधर्म पूरा नहीं हुआ। 17 और ऐसा हुआ कि जब सूर्य अस्त हो गया और घोर अन्धकार छा गया, तब एक अंगेठी जिस में से धुआं उठता या और एक जलता हुआ पक्कीता देख पड़ा जो उन टुकड़ोंके बीच में से होकर निकल गया। 18 उसी दिन यहोवा ने अब्राम के साय यह वाचा बान्धी, कि मिस्र के महानद से लेकर परात नाम बड़े नद तक जितना देश है, 19 अर्यात्‌, केनियों, कनिज्जियों, कद्क़ोनियों, 20 हित्तियों, पक्कीज्जियों, रपाइयों, 21 एमोरियों, कनानियों, गिर्गाशियोंऔर यबूसियोंका देश मैं ने तेरे वंश को दिया है।।

उत्पत्ति 16

1 अब्राम की पत्नी सारै के कोई सन्तान न यी : और उसके हाजिरा नाम की एक मिस्री लौंडी यी। 2 सो सारै ने अब्राम से कहा, देख, यहोवा ने तो मेरी कोख बन्द कर रखी है सो मैं तुझ से बिनती करती हूं कि तू मेरी लौंडी के पास जा : सम्भव है कि मेरा घर उसके द्वारा बस जाए। 3 सो सारै की यह बात अब्राम ने मान ली। सो जब अब्राम को कनान देश में रहते दस वर्ष बीत चुके तब उसकी स्त्री सारै ने अपक्की मिस्री लौंडी हाजिरा को लेकर अपके पति अब्राम को दिया, कि वह उसकी पत्नी हो। 4 और वह हाजिरा के पास गया, और वह गर्भवती हुई और जब उस ने जाना कि वह गर्भवती है तब वह अपक्की स्वामिनी को अपक्की दृष्टि में तुच्छ समझने लगी। 5 तब सारै ने अब्राम से कहा, जो मुझ पर उपद्रव हुआ सो तेरे ही सिर पर हो : मैं ने तो अपक्की लौंडी को तेरी पत्नी कर दिया; पर जब उस ने जाना कि वह गर्भवती है, तब वह मुझे तुच्छ समझने लगी, सो यहोवा मेरे और तेरे बीच में न्याय करे। 6 अब्राम ने सारै से कहा, देख तेरी लौंडी तेरे वश में है : जैसा तुझे भला लगे वैसा ही उसके साय कर। सो सारै उसको दु:ख देने लगी और वह उसके साम्हने से भाग गई। 7 तब यहोवा के दूत ने उसके जंगल में शूर के मार्ग पर जल के एक सोते के पास पाकर कहा, 8 हे सारै की लौंडी हाजिरा, तू कहां से आती और कहां को जाती है ? उस ने कहा, मैं अपक्की स्वामिनी सारै के साम्हने से भग आई हूं। 9 यहोवा के दूत ने उस से कहा, अपक्की स्वामिनी के पास लौट जा और उसके वश में रह। 10 और यहोवा के दूत ने उस से कहा, मैं तेरे वंश को बहुत बढ़ाऊंगा, यहां तक कि बहुतायत के कारण उसकी गणना न हो सकेगी। 11 और यहोवा के दूत ने उस से कहा, देख तू गर्भवती है, और पुत्र जनेगी, सो उसका नाम इश्माएल रखना; क्योंकि यहोवा ने तेरे दु:ख का हाल सुन लिया है। 12 और वह मनुष्य बनैले गदहे के समान होगा उसका हाथ सबके विरूद्ध उठेगा, और सब के हाथ उसके विरूद्ध उठेंगे; और वह अपके सब भाई बन्धुओं के मध्य में बसा रहेगा। 13 तब उस ने यहोवा का नाम जिस ने उस से बातें की यीं, अत्ताएलरोई रखकर कहा कि, कया मैं यहां भी उसको जाते हुए देखने पाई जो मेरा देखनेहारा है ? 14 इस कारण उस कुएं का नाम लहैरोई कुआं पड़ा; वह तो कादेश और बेरेद के बीच में है। 15 सो हाजिरा अब्राम के द्वारा एक पुत्र जनी : और अब्राम ने अपके पुत्र का नाम, जिसे हाजिरा जनी, इश्माएल रखा। 16 जब हाजिरा ने अब्राम के द्वारा इश्माएल को जन्म दिया उस समय अब्राम छियासी वर्ष का या।

उत्पत्ति 17

1 जब अब्राम निन्नानवे वर्ष का हो गया, तब यहोवा ने उसको दर्शन देकर कहा मैं सर्वशक्तिमान ईश्वर हूं; मेरी उपस्यिति में चल और सिद्ध होता जा। 2 और मैं तेरे साय वाचा बान्धूंगा, और तेरे वंश को अत्यन्त ही बढ़ाऊंगा, और तेरे वंश को अत्यन्त ही बढ़ाऊंगा। 3 तब अब्राम मुंह के बल गिरा : और परमेश्वर उस से योंबातें कहता गया, 4 देख, मेरी वाचा तेरे साय बन्धी रहेगी, इसलिथे तू जातियोंके समूह का मूलपिता हो जाएगा। 5 सो अब से तेरा नाम अब्राम न रहेगा परन्तु तेरा नाम इब्राहीम होगा क्योंकि मैं ने तुझे जातियोंके समूह का मूलपिता ठहरा दिया है। 6 और मैं तुझे अत्यन्त ही फुलाऊं फलाऊंगा, और तुझ को जाति जाति का मूल बना दूंगा, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे। 7 और मैं तेरे साय, और तेरे पश्चात्‌ पीढ़ी पीढ़ी तक तेरे वंश के साय भी इस आशय की युग युग की वाचा बान्धता हूं, कि मैं तेरा और तेरे पश्चात्‌ तेरे वंश का भी परमेश्वर रहूंगा। 8 और मैं तुझ को, और तेरे पश्चात्‌ तेरे वंश को भी, यह सारा कनान देश, जिस में तू परदेशी होकर रहता है, इस रीति दूंगा कि वह युग युग उनकी निज भूमि रहेगी, और मैं उनका परमेश्वर रहूंगा। 9 फिर परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, तू भी मेरे साय बान्धी हुई वाचा का पालन करना; तू और तेरे पश्चात्‌ तेरा वंश भी अपक्की अपक्की पीढ़ी में उसका पालन करे। 10 मेरे साय बान्धी हुई वाचा, जो तुझे और तेरे पश्चात्‌ तेरे वंश को पालनी पकेगी, सो यह है, कि तुम में से एक एक पुरूष का खतना हो। 11 तुम अपक्की अपक्की खलड़ी का खतना करा लेना; जो वाचा मेरे और तुम्हारे बीच में है, उसका यही चिन्ह होगा। 12 पीढ़ी पीढ़ी में केवल तेरे वंश ही के लोग नहीं पर जो तेरे घर में उत्पन्न हों, वा परदेशियोंको रूपा देकर मोल लिथे जाएं, ऐसे सब पुरूष भी जब आठ दिन के होंजाएं, तब उनका खतना किया जाए। 13 जो तेरे घर में उत्पन्न हो, अयवा तेरे रूपे से मोल लिया जाए, उसका खतना अवश्य ही किया जाए; सो मेरी वाचा जिसका चिन्ह तुम्हारी देह में होगा वह युग युग रहेगी। 14 जो पुरूष खतनारहित रहे, अर्यात्‌ जिसकी खलड़ी का खतना न हो, वह प्राणी अपके लोगोंमे से नाश किया जाए, क्योंकि उस ने मेरे साय बान्धी हुई वाचा को तोड़ दिया।। 15 फिर परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, तेरी जो पत्नी सारै है, उसको तू अब सारै न कहना, उसका नाम सारा होगा। 16 और मैं उसको आशीष दूंगा, और तुझ को उसके द्वारा एक पुत्र दूंगा; और मैं उसको ऐसी आशीष दूंगा, कि वह जाति जाति की मूलमाता हो जाएगी; और उसके वंश में राज्य राज्य के राजा उत्पन्न होंगे। 17 तब इब्राहीम मुंह के बल गिर पड़ा और हंसा, और अपके मन ही मन कहने लगा, क्या सौ वर्ष के पुरूष के भी सन्तान होगा और क्या सारा जो नब्बे वर्ष की है पुत्र जनेगी ? 18 और इब्राहीम ने परमेश्वर से कहा, इश्माएल तेरी दृष्टि में बना रहे! यही बहुत है। 19 तब परमेश्वर ने कहा, निश्चय तेरी पत्नी सारा के तुझ से एक पुत्र उत्पन्न होगा; और तू उसका नाम इसहाक रखना : और मैं उसके साय ऐसी वाचा बान्धूंगा जो उसके पश्चात्‌ उसके वंश के लिथे युग युग की वाचा होगी। 20 और इश्माएल के विषय में भी मै ने तेरी सुनी है : मैं उसको भी आशीष दूंगा, और उसे फुलाऊं फलाऊंगा और अत्यन्त ही बढ़ा दूंगा; उस से बारह प्रधान उत्पन्न होंगे, और मैं उस से एक बड़ी जाति बनाऊंगा। 21 परन्तु मैं अपक्की वाचा इसहाक ही के साय बान्धूंगा जो सारा से अगले वर्ष के इसी नियुक्त समय में उत्पन्न होगा। 22 तब परमेश्वर ने इब्राहीम से बातें करनी बन्द कीं और उसके पास से ऊपर चढ़ गया। 23 तब इब्राहीम ने अपके पुत्र इश्माएल को, उसके घर में जितने उत्पन्न हुए थे, और जितने उसके रूपके से मोल लिथे गए थे, निदान उसके घर में जितने पुरूष थे, उन सभोंको लेके उसी दिन परमेश्वर के वचन के अनुसार उनकी खलड़ी का खतना किया। 24 जब इब्राहीम की खलड़ी का खतना हुआ तब वह निन्नानवे वर्ष का या। 25 और जब उसके पुत्र इश्माएल की खलड़ी का खतना हुआ तब वह तेरह वर्ष का या। 26 इब्राहीम और उसके पुत्र इश्माएल दोनोंका खतना एक ही दिन हुआ। 27 और उसके घर में जितने पुरूष थे जो घर में उत्पन्न हुए, तया जो परदेशियोंके हाथ से मोल लिथे गए थे, सब का खतना उसके साय ही हुआ।।

उत्पत्ति 18

1 इब्राहीम मम्रे के बांजो के बीच कड़ी धूप के समय तम्बू के द्वार पर बैठा हुआ या, तब यहोवा ने उसे दर्शन दिया : 2 और उस ने आंख उठाकर दृष्टि की तो क्या देखा, कि तीन पुरूष उसके साम्हने खड़े हैं : जब उस ने उन्हे देखा तब वह उन से भेंट करने के लिथे तम्बू के द्वार से दौड़ा, और भूमि पर गिरकर दण्डवत्‌ की और कहने लगा, 3 हे प्रभु, यदि मुझ पर तेरी अनुग्रह की दृष्टि है तो मैं बिनती करता हूं, कि अपके दास के पास से चले न जाना। 4 मैं योड़ा सा जल लाता हूं और आप अपके पांव धोकर इस वृझ के तले विश्रम करें। 5 फिर मैं एक टुकड़ा रोटी ले आऊं और उस से आप अपके जीव को तृप्त करें; तब उसके पश्चात्‌ आगे बढें : क्योंकि आप अपके दास के पास इसी लिथे पधारे हैं। उन्होंने कहा, जैसा तू कहता है वैसा ही कर। 6 सो इब्राहीम ने तम्बू में सारा के पास फुर्ती से जाकर कहा, तीन सआ मैदा फुर्ती से गून्ध, और फुलके बना। 7 फिर इब्राहीम गाय बैल के फुण्ड में दौड़ा, और एक कोमल और अच्छा बछड़ा लेकर अपके सेवक को दिया, और उसने फुर्ती से उसको पकाया। 8 तब उस ने मक्खन, और दूध, और वह बछड़ा, जो उस ने पकवाया या, लेकर उनके आगे परोस दिया; और आप वृझ के तले उनके पास खड़ा रहा, और वे खाने लगे। 9 उन्होंने उस से पूछा, तेरी पत्नी सारा कहां है? उस ने कहा, वह तो तम्बू में है। 10 उस ने कहा मैं वसन्त ऋतु में निश्चय तेरे पास फिर आऊंगा; और तब तेरी पत्नी सारा के एक पुत्र उत्पन्न होगा। और सारा तम्बू के द्वार पर जो इब्राहीम के पीछे या सुन रही यी। 11 इब्राहीम और सारा दोनो बहुत बूढ़े थे; और सारा का स्त्रीधर्म बन्द हो गया या 12 सो सारा मन में हंस कर कहने लगी, मैं तो बूढ़ी हूं, और मेरा पति भी बूढ़ा है, तो क्या मुझे यह सुख होगा? 13 तब यहोवा ने इब्राहीम से कहा, सारा यह कहकर कयोंहंसी, कि क्या मेरे, जो ऐसी बुढिय़ा हो गई हूं, सचमुच एक पुत्र उत्पन्न होगा? 14 क्या यहोवा के लिथे कोई काम कठिन है? नियत समय में, अर्यात्‌ वसन्त ऋतु में, मैं तेरे पास फिर आऊंगा, और सारा के पुत्र उत्पन्न होगा। 15 तब सारा डर के मारे यह कहकर मुकर गई, कि मैं नहीं हंसी। उस ने कहा, नहीं; तू हंसी तो यी।। 16 फिर वे पुरूष वहां से चलकर, सदोम की ओर ताकने लगे : और इब्राहीम उन्हें विदा करने के लिथे उनके संग संग चला। 17 तब यहोवा ने कहा, यह जो मैं करता हूं सो क्या इब्राहीम से छिपा रखूं ? 18 इब्राहीम से तो निश्चय एक बड़ी और सामर्यी जाति उपकेगी, और पृय्वी की सारी जातियां उसके द्वारा आशीष पाएंगी। 19 क्योंकि मैं जानता हूं, कि वह अपके पुत्रोंऔर परिवार को जो उसके पीछे रह जाएंगे आज्ञा देगा कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें, इसलिथे कि जो कुछ यहोवा ने इब्राहीम के विषय में कहा है उसे पूरा करे। 20 क्योंकि मैं जानता हूं, कि वह अपके पुत्रोंऔर परिवार को जो उसके पीछे रह जाएंगे आज्ञा देगा कि वे यहोवा के मार्ग में अटल बने रहें, और धर्म और न्याय करते रहें, इसलिथे कि जो कुछ यहोवा ने इब्राहीम के विषय में कहा है उसे पूरा करे। 21 इसलिथे मैं उतरकर देखूंगा, कि उसकी जैसी चिल्लाहट मेरे कान तक पहुंची है, उन्होंने ठीक वैसा ही काम किया है कि नहीं : और न किया हो तो मैं उसे जान लूंगा। 22 सो वे पुरूष वहां से मुड़ के सदोम की ओर जाने लगे : पर इब्राहीम यहोवा के आगे खड़ा रह गया। 23 तब इब्राहीम उसके समीप जाकर कहने लगा, क्या सचमुच दुष्ट के संग धर्मी को भी नाश करेगा ? 24 कदाचित्‌ उस नगर में पचास धर्मी हों: तो क्या तू सचमुच उस स्यान को नाश करेगा और उन पचास धमिर्योंके कारण जो उस में हो न छोड़ेगा ? 25 इस प्रकार का काम करना तुझ से दूर रहे कि दुष्ट के संग धर्मी को भी मार डाले और धर्मी और दुष्ट दोनोंकी एक ही दशा हो। 26 यहोवा ने कहा यदि मुझे सदोम में पचास धर्मी मिलें, तो उनके कारण उस सारे स्यान को छोडूंगा। 27 फिर इब्राहीम ने कहा, हे प्रभु, सुन मैं तो मिट्टी और राख हूं; तौभी मैं ने इतनी ढिठाई की कि तुझ से बातें करूं। 28 कदाचित्‌ उन पचास धमिर्योंमे पांच घट जाए : तो क्या तू पांच ही के घटने के कारण उस सारे नगर का नाश करेगा ? उस ने कहा, यदि मुझे उस में पैंतालीस भी मिलें, तौभी उसका नाश न करूंगा। 29 फिर उस ने उस से यह भी कहा, कदाचित्‌ वहां चालीस मिलें। उस ने कहा, तो मैं चालीस के कारण भी ऐसा ने करूंगा। 30 फिर उस ने कहा, हे प्रभु, क्रोध न कर, तो मैं कुछ और कहूं : कदाचित्‌ वहां तीस मिलें। उस ने कहा यदि मुझे वहां तीस भी मिलें, तौभी ऐसा न करूंगा। 31 फिर उस ने कहा, हे प्रभु, सुन, मैं ने इतनी ढिठाई तो की है कि तुझ से बातें करूं : कदाचित्‌ उस में बीस मिलें। उस ने कहा, मैं बीस के कारण भी उसका नाश न करूंगा। 32 फिर उस ने कहा, हे प्रभु, क्रोध न कर, मैं एक ही बार और कहूंगा : कदाचित्‌ उस में दस मिलें। उस ने कहा, तो मैं दस के कारण भी उसका नाश न करूंगा। 33 जब यहोवा इब्राहीम से बातें कर चुका, तब चला गया : और इब्राहीम अपके घर को लौट गया।।

उत्पत्ति 19

1 सांफ को वे दो दूत सदोम के पास आए : और लूत सदोम के फाटक के पास बैठा या : सो उनको देखकर वह उन से भेंट करने के लिथे उठा; और मुंह के बल फुककर दण्डवत्‌ कर कहा; 2 हे मेरे प्रभुओं, अपके दास के घर में पधारिए, और रात भर विश्रम कीजिए, और अपके पांव धोइथे, फिर भोर को उठकर अपके मार्ग पर जाइए। उन्होंने कहा, नहीं; हम चौक ही में रात बिताएंगे। 3 और उस ने उन से बहुत बिनती करके उन्हें मनाया; सो वे उसके साय चलकर उसके घर में आए; और उस ने उनके लिथे जेवनार तैयार की, और बिना खमीर की रोटियां बनाकर उनको खिलाई। 4 उनके सो जाने के पहिले, उस सदोम नगर के पुरूषोंने, जवानोंसे लेकर बूढ़ोंतक, वरन चारोंओर के सब लोगोंने आकर उस घर को घेर लिया; 5 और लूत को पुकारकर कहने लगे, कि जो पुरूष आज रात को तेरे पास आए हैं वे कहां हैं? उनको हमारे पास बाहर ले आ, कि हम उन से भोग करें। 6 तब लूत उनके पास द्वार बाहर गया, और किवाड़ को अपके पीछे बन्द करके कहा, 7 हे मेरे भाइयों, ऐसी बुराई न करो। 8 सुनो, मेरी दो बेटियां हैं जिन्होंने अब तक पुरूष का मुंह नहीं देखा, इच्छा हो तो मैं उन्हें तुम्हारे पास बाहर ले आऊं, और तुम को जैसा अच्छा लगे वैसा व्यवहार उन से करो : पर इन पुरूषोंसे कुछ न करो; क्योंकि थे मेरी छत के तले आए हैं। 9 उनहोंने कहा, हट जा। फिर वे कहने लगे, तू एक परदेशी होकर यहां रहने के लिथे आया पर अब न्यायी भी बन बैठा है : सो अब हम उन से भी अधिक तेरे साय बुराई करेंगे। और वे पुरूष लूत को बहुत दबाने लगे, और किवाड़ तोड़ने के लिथे निकट आए। 10 तब उन पाहुनोंने हाथ बढ़ाकर, लूत को अपके पास घर में खींच लिया, और किवाड़ को बन्द कर दिया। 11 और उन्होंने क्या छोटे, क्या बड़े, सब पुरूषोंको जो घर के द्वार पर थे अन्धा कर दिया, सो वे द्वार को टटोलते टटोलते यक गए। 12 फिर उन पाहुनोंने लूत से पूछा, यहां तेरे और कौन कौन हैं? दामाद, बेटे, बेटियां, वा नगर में तेरा जो कोई हो, उन सभोंको लेकर इस स्यान से निकल जा। 13 क्योंकि हम यह स्यान नाश करने पर हैं, इसलिथे कि उसकी चिल्लाहट यहोवा के सम्मुख बढ़ गई है; और यहोवा ने हमें इसका सत्यनाश करने के लिथे भेज दिया है। 14 तब लूत ने निकलकर अपके दामादोंको, जिनके साय उसकी बेटियोंकी सगाई हो गई यी, समझा के कहा, उठो, इस स्यान से निकल चलो : क्योंकि यहोवा इस नगर को नाश किया चाहता है। पर वह अपके दामादोंकी दृष्टि में ठट्ठा करनेहारा सा जान पड़ा। 15 जब पह फटने लगी, तब दूतोंने लूत से फुर्ती कराई और कहा, कि उठ, अपक्की पत्नी और दोनो बेटियोंको जो यहां हैं ले जा : नहीं तो तू भी इस नगर के अधर्म में भस्म हो जाएगा। 16 पर वह विलम्ब करता रहा, इस से उन पुरूषोंने उसका और उसकी पत्नी, और दोनोंबेटियोंको हाथ पकड़ लिया; क्योंकि यहोवा की दया उस पर यी : और उसको निकालकर नगर के बाहर कर दिया। 17 और ऐसा हुआ कि जब उन्होंने उनको बाहर निकाला, तब उस ने कहा अपना प्राण लेकर भाग जा; पीछे की और न ताकना, और तराई भर में न ठहरना; उस पहाड़ पर भाग जाना, नहीं तो तू भी भस्म हो जाएगा। 18 लूत ने उन से कहा, हे प्रभु, ऐसा न कर : 19 देख, तेरे दास पर तेरी अनुग्रह की दृष्टि हुई है, और तू ने इस में बड़ी कृपा दिखाई, कि मेरे प्राण को बचाया है; पर मैं पहाड़ पर भाग नहीं सकता, कहीं ऐसा न हो, कि कोई विपत्ति मुझ पर आ पके, और मैं मर जाऊं : 20 देख, वह नगर ऐसा निकट है कि मैं वहां भाग सकता हूं, और वह छोटा भी है : मुझे वहीं भाग जाने दे, क्या वह छोटा नहीं हैं? और मेरा प्राण बच जाएगा। 21 उस ने उस से कहा, देख, मैं ने इस विषय में भी तेरी बिनती अंगीकार की है, कि जिस नगर की चर्चा तू ने की है, उसको मैं नाश न करूंगा। 22 फुर्ती से वहां भाग जा; क्योंकि जब तक तू वहां न पहुचे तब तक मैं कुछ न कर सकूंगा। इसी कारण उस नगर का नाम सोअर पड़ा। 23 लूत के सोअर के निकट पहुचते ही सूर्य पृय्वी पर उदय हुआ। 24 तब यहोवा ने अपक्की ओर से सदोम और अमोरा पर आकाश से गन्धक और आग बरसाई; 25 और उन नगरोंको और सम्पूर्ण तराई को, और नगरोंको और उस सम्पूर्ण तराई को, और नगरोंके सब निवासिक्कों, भूमि की सारी उपज समेत नाश कर दिया। 26 लूत की पत्नी ने जो उसके पीछे यी दृष्टि फेर के पीछे की ओर देखा, और वह नमक का खम्भा बन गई। 27 भोर को इब्राहीम उठकर उस स्यान को गया, जहां वह यहोवा के सम्मुख खड़ा या; 28 और सदोम, और अमोरा, और उस तराई के सारे देश की ओर आंख उठाकर क्या देखा, कि उस देश में से धधकती हुई भट्टी का सा धुआं उठ रहा है। 29 और ऐसा हुआ, कि जब परमेश्वर ने उस तराई के नगरोंको, जिन में लूत रहता या, उलट पुलट कर नाश किया, तब उस ने इब्राहीम को याद करके लूत को उस घटना से बचा लिया। 30 और लूत ने सोअर को छोड़ दिया, और पहाड़ पर अपक्की दोनोंबेटियोंसमेत रहने लगा; क्योंकि वह सोअर में रहने से डरता या : इसलिथे वह और उसकी दोनोंबेटियां वहां एक गुफा में रहने लगे। 31 तब बड़ी बेटी ने छोटी से कहा, हमारा पिता बूढ़ा है, और पृय्वी भर में कोई ऐसा पुरूष नहीं जो संसार की रीति के अनुसार हमारे पास आए : 32 सो आ, हम अपके पिता को दाखमधु पिलाकर, उसके साय सोएं, जिस से कि हम अपके पिता के वंश को बचाए रखें। 33 सो उन्होंने उसी दिन रात के समय अपके पिता को दाखमधु पिलाया, तब बड़ी बेटी जाकर अपके पिता के पास लेट गई; पर उस ने न जाना, कि वह कब लेटी, और कब उठ गई। 34 और ऐसा हुआ कि दूसरे दिन बड़ी ने छोटी से कहा, देख, कल रात को मैं अपके पिता के साय सोई : सो आज भी रात को हम उसको दाखमधु पिलाएं; तब तू जाकर उसके साय सोना कि हम अपके पिता के द्वारा वंश उत्पन्न करें। 35 सो उन्होंने उस दिन भी रात के समय अपके पिता को दाखमधु पिलाया : और छोटी बेटी जाकर उसके पास लौट गई : पर उसको उसके भी सोने और उठने के समय का ज्ञान न या। 36 इस प्रकार से लूत की दोनो बेटियां अपके पिता से गर्भवती हुई। 37 और बड़ी एक पुत्र जनी, और उसका नाम मोआब रखा : वह मोआब नाम जाति का जो आज तक है मूलपिता हुआ। 38 और छोटी भी एक पुत्र जनी, और उसका नाम बेनम्मी रखा; वह अम्मोन्‌ वंशियोंका जो आज तक हैं मूलपिता हुआ।।

उत्पत्ति 20

1 फिर इब्राहीम वहां से कूच कर दक्खिन देश में आकर कादेश और शूर के बीच में ठहरा, और गरार में रहने लगा। 2 और इब्राहीम अपक्की पत्नी सारा के विषय में कहने लगा, कि वह मेरी बहिन है : सो गरार के राजा अबीमेलेक ने दूत भेजकर सारा को बुलवा लिया। 3 रात को परमेश्वर ने स्वप्न में अबीमेलेक के पास आकर कहा, सुन, जिस स्त्री को तू ने रख लिया है, उसके कारण तू मर जाएगा, क्योंकि वह सुहागिन है। 4 परन्तु अबीमेलेक उसके पास न गया या : सो उस ने कहा, हे प्रभु, क्या तू निर्दोष जाति का भी घात करेगा ? 5 क्या उसी ने स्वयं मुझ से नहीं कहा, कि वह मेरी बहिन है ? और उस स्त्री ने भी आप कहा, कि वह मेरा भाई है : मैं ने तो अपके मन की खराई और अपके व्यवहार की सच्चाई से यह काम किया। 6 परमेश्वर ने उस से स्वप्न में कहा, हां, मैं भी जानता हूं कि अपके मन की खराई से तू ने यह काम किया है और मैं ने तुझे रोक भी रखा कि तू मेरे विरूद्ध पाप न करे : इसी कारण मैं ने तुझ को उसे छूने नहीं दिया। 7 सो अब उस पुरूष की पत्नी को उसे फेर दे; क्योंकि वह नबी है, और तेरे लिथे प्रार्यना करेगा, और तू जीता रहेगा : पर यदि तू उसको न फेर दे तो जान रख, कि तू, और तेरे जितने लोग हैं, सब निश्चय मर जाएंगे। 8 बिहान को अबीमेलेक ने तड़के उठकर अपके सब कर्मचारियोंको बुलवाकर थे सब बातें सुनाई : और वे लोग बहुत डर गए। 9 तब अबीमेलेक ने इब्राहीम को बुलवाकर कहा, तू ने हम से यह क्या किया है ? और मैं ने तेरा क्या बिगाड़ा या, कि तू ने मेरे और मेरे राज्य के ऊपर ऐसा बड़ा पाप डाल दिया है ? तू ने मुझ से वह काम किया है जो उचित न या। 10 फिर अबीमेलेक ने इब्राहीम से पूछा, तू ने क्या समझकर ऐसा काम किया ? 11 इब्राहीम ने कहा, मैं ने यह सोचा या, कि इस स्यान में परमेश्वर का कुछ भी भय न होगा; सो थे लोग मेरी पत्नी के कारण मेरा घात करेंगे। 12 और फिर भी सचमुच वह मेरी बहिन है, वह मेरे पिता की बेटी तो है पर मेरी माता की बेटी नहीं; फिर वह मेरी पत्नी हो गई। 13 और ऐसा हुआ कि जब परमेश्वर ने मुझे अपके पिता का घर छोड़कर निकलने की आज्ञा दी, तब मैं ने उस से कहा, इतनी कृपा तुझे मुझ पर करनी होगी : कि हम दोनोंजहां जहां जाएं वहां वहां तू मेरे विषय में कहना, कि यह मेरा भाई है। 14 तब अबीमेलेक ने भेड़-बकरी, गाय-बैल, और दास-दासियां लेकर इब्राहीम को दीं, और उसकी पत्नी सारा को भी उसे फेर दिया। 15 और अबीमेलेक ने कहा, देख, मेरा देश तेरे साम्हने है; जहां तुझे भावे वहां रह। 16 और सारा से उस ने कहा, देख, मैं ने तेरे भाई को रूपे के एक हजार टुकड़े दिए हैं : देख, तेरे सारे संगियोंके साम्हने वही तेरी आंखोंका पर्दा बनेगा, और सभोंके साम्हने तू ठीक होगी। 17 तब इब्राहीम ने यहोवा से प्रार्यना की, और यहोवा ने अबीमेलेक, और उसकी पत्नी, और दासिक्कों चंगा किया और वे जनने लगीं। 18 क्योंकि यहोवा ने इब्राहीम की पत्नी सारा के कारण अबीमेलेक के घर की सब स्त्रियोंकी कोखोंको पूरी रीति से बन्द कर दिया या।।

उत्पत्ति 21

1 सो यहोवा ने जैसा कहा या वैसा ही सारा की सुधि लेके उसके साय अपके वचन के अनुसार किया। 2 सो सारा को इब्राहीम से गर्भवती होकर उसके बुढ़ापे में उसी नियुक्त समय पर जो परमेश्वर ने उस से ठहराया या एक पुत्र उत्पन्न हुआ। 3 और इब्राहीम ने अपके पुत्र का नाम जो सारा से उत्पन्न हुआ या इसहाक रखा। 4 और जब उसका पुत्र इसहाक आठ दिन का हुआ, तब उस ने परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार उसक खतना किया। 5 और जब इब्राहीम का पुत्र इसहाक उत्पन्न हुआ तब वह एक सौ वर्ष का या। 6 और सारा ने कहा, परमेश्वर ने मुझे प्रफुल्लित कर दिया है; इसलिथे सब सुननेवाले भी मेरे साय प्रफुल्लित होंगे। 7 फिर उस ने यह भी कहा, कि क्या कोई कभी इब्राहीम से कह सकता या, कि सारा लड़कोंको दूध पिलाएगी ? पर देखो, मुझ से उसके बुढ़ापे में एक पुत्र उत्पन्न हुआ। 8 और वह लड़का बढ़ा और उसका दूध छुड़ाया गया : और इसहाक के दूध छुड़ाने के दिन इब्राहीम ने बड़ी जेवनार की। 9 तब सारा को मिस्री हाजिरा का पुत्र, जो इब्राहीम से उत्पन्न हुआ या, हंसी करता हुआ देख पड़ा। 10 सो इस कारण उस ने इब्राहीम से कहा, इस दासी को पुत्र सहित बरबस निकाल दे : क्योंकि इस दासी का पुत्र मेरे पुत्र इसहाक के साय भागी न होगा। 11 यह बात इब्राहीम को अपके पुत्र के कारण बुरी लगी। 12 तब परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, उस लड़के और अपक्की दासी के कारण तुझे बुरा न लगे; जो बात सारा तुझ से कहे, उसे मान, क्योंकि जो तेरा वंश कहलाएगा सो इसहाक ही से चलेगा। 13 दासी के पुत्र से भी मैं एक जाति उत्पन्न करूंगा इसलिथे कि वह तेरा वंश है। 14 सो इब्राहीम ने बिहान को तड़के उठकर रोटी और पानी से भरी चमड़े की यैली भी हाजिरा को दी, और उसके कन्धे पर रखी, और उसके लड़के को भी उसे देकर उसको विदा किया : सो वह चक्की गई, और बेर्शेबा के जंगल में भ्रमण करने लगी। 15 जब यैली का जल चुक गया, तब उस ने लड़के को एक फाड़ी के नीचे छोड़ दिया। 16 और आप उस से तीर भर के टप्पे पर दूर जाकर उसके साम्हने यह सोचकर बैठ गई, कि मुझ को लड़के की मृत्यु देखनी न पके। तब वह उसके साम्हने बैठी हुई चिल्ला चिल्ला के रोने लगी। 17 और परमेश्वर ने उस लड़के की सुनी; और उसके दूत ने स्वर्ग से हाजिरा को पुकार के कहा, हे हाजिरा तुझे क्या हुआ ? मत डर; क्योंकि जहां तेरा लड़का है वहां से उसकी आवाज परमेश्वर को सुन पक्की है। 18 उठ, अपके लड़के को उठा और अपके हाथ से सम्भाल क्योंकि मैं उसके द्वारा एक बड़ी जाति बनाऊंगा। 19 परमेश्वर ने उसकी आंखे खोल दी, और उसको एक कुंआ दिखाई पड़ा; सो उस ने जाकर यैली को जल से भरकर लड़के को पिलाया। 20 और परमेश्वर उस लड़के के साय रहा; और जब वह बड़ा हुआ, तब जंगल में रहते रहते धनुर्धारी बन गया। 21 वह तो पारान नाम जंगल में रहा करता या : और उसकी माता ने उसके लिथे मिस्र देश से एक स्त्री मंगवाई।। 22 उन दिनोंमें ऐसा हुआ कि अबीमेलेक अपके सेनापति पीकोल को संग लेकर इब्राहीम से कहने लगा, जो कुछ तू करता है उस में परमेश्वर तेरे संग रहता है : 23 सो अब मुझ से यहां इस विषय में परमेश्वर की किरिया खा, कि तू न तो मुझ से छल करेगा, और न कभी मेरे वंश से करेगा, परन्तु जैसी करूणा मैं ने तुझ पर की है, वैसी ही तू मुझ पर और इस देश पर भी जिस में तू रहता है करेगा 24 इब्राहीम ने कहा, मैं किरिया खाऊंगा। 25 और इब्राहीम ने अबीमेलेक को एक कुएं के विषय में, जो अबीमेलेक के दासोंने बरीयाई से ले लिया या, उलाहना दिया। 26 तब अबीमेलेक ने कहा, मै नहीं जानता कि किस ने यह काम किया : और तू ने भी मुझे नहीं बताया, और न मै ने आज से पहिले इसके विषय में कुछ सुना। 27 तक इब्राहीम ने भेड़-बकरी, और गाय-बैल लेकर अबीमेलेक को दिए; और उन दोनोंने आपस में वाचा बान्धी। 28 और इब्राहीम ने भेड़ की सात बच्ची अलग कर रखीं। 29 तब अबीमेलेक ने इब्राहीम से पूछा, इन सात बच्चियोंका, जो तू ने अलग कर रखी हैं, क्या प्रयोजन है ? 30 उस ने कहा, तू इन सात बच्चियोंको इस बात की साझी जानकर मेरे हाथ से ले, कि मै ने कुंआ खोदा है। 31 उन दोनोंने जो उस स्यान में आपस में किरिया खाई, इसी कारण उसका नाम बेर्शेबा पड़ा। 32 जब उन्होंने बेर्शेबा में परस्पर वाचा बान्धी, तब अबीमेलेक, और उसका सेनापति पीकोल उठकर पलिश्तियोंके देश में लौट गए। 33 और इब्राहीम ने बेर्शेबा में फाऊ का एक वृझ लगाया, और वहां यहोवा, जो सनातन ईश्वर है, उस से प्रार्यना की। 34 और इब्राहीम पलिश्तियोंके देश में बहुत दिनोंतक परदेशी होकर रहा।।

उत्पत्ति 22

1 इन बातोंके पश्चात्‌ ऐसा हुआ कि परमेश्वर ने, इब्राहीम से यह कहकर उसकी पक्कीझा की, कि हे इब्राहीम : उस ने कहा, देख, मैं यहां हूं। 2 उस ने कहा, अपके पुत्र को अर्यात्‌ अपके एकलौते पुत्र इसहाक को, जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा, और वहां उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊंगा होमबलि करके चढ़ा। 3 सो इब्राहीम बिहान को तड़के उठा और अपके गदहे पर काठी कसकर अपके दो सेवक, और अपके पुत्र इसहाक को संग लिया, और होमबलि के लिथे लकड़ी चीर ली; तब कूच करके उस स्यान की ओर चला, जिसकी चर्चा परमेश्वर ने उस से की यी। 4 तीसरे दिन इब्राहीम ने आंखें उठाकर उस स्यान को दूर से देखा। 5 और उस ने अपके सेवकोंसे कहा गदहे के पास यहीं ठहरे रहो; यह लड़का और मैं वहां तक जाकर, और दण्डवत्‌ करके, फिर तुम्हारे पास लौट आऊंगा। 6 सो इब्राहीम ने होमबलि की लकड़ी ले अपके पुत्र इसहाक पर लादी, और आग और छुरी को अपके हाथ में लिया; और वे दोनोंएक साय चल पके। 7 इसहाक ने अपके पिता इब्राहीम से कहा, हे मेरे पिता; उस ने कहा, हे मेरे पुत्र, क्या बात है उस ने कहा, देख, आग और लकड़ी तो हैं; पर होमबलि के लिथे भेड़ कहां है ? 8 इब्राहीम ने कहा, हे मेरे पुत्र, परमेश्वर होमबलि की भेड़ का उपाय आप ही करेगा। 9 सो वे दोनोंसंग संग आगे चलते गए। और वे उस स्यान को जिसे परमेश्वर ने उसको बताया या पहुंचे; तब इब्राहीम ने वहां वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपके पुत्र इसहाक को बान्ध के वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। 10 और इब्राहीम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपके पुत्र को बलि करे। 11 तब यहोवा के दूत ने स्वर्ग से उसको पुकार के कहा, हे इब्राहीम, हे इब्राहीम; उस ने कहा, देख, मैं यहां हूं। 12 उस ने कहा, उस लड़के पर हाथ मत बढ़ा, और न उस से कुछ कर : क्योंकि तू ने जो मुझ से अपके पुत्र, वरन अपके एकलौते पुत्र को भी, नहीं रख छोड़ा; इस से मै अब जान गया कि तू परमेश्वर का भय मानता है। 13 तब इब्राहीम ने आंखे उठाई, और क्या देखा, कि उसके पीछे एक मेढ़ा अपके सींगो से एक फाड़ी में बफा हुआ है : सो इब्राहीम ने जाके उस मेंढ़े को लिया, और अपके पुत्र की सन्ती होमबलि करके चढ़ाया। 14 और इब्राहीम ने उस स्यान का नाम यहोवा यिरे रखा : इसके अनुसार आज तक भी कहा जाता है, कि यहोवा के पहाड़ पर उपाय किया जाएगा। 15 फिर यहोवा के दूत ने दूसरी बार स्वर्ग से इब्राहीम को पुकार के कहा, 16 यहोवा की यह वाणी है, कि मैं अपक्की ही यह शपय खाता हूं, कि तू ने जो यह काम किया है कि अपके पुत्र, वरन अपके एकलौते पुत्र को भी, नहीं रख छोड़ा; 17 इस कारण मैं निश्चय तुझे आशीष दूंगा; और निश्चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर की बालू के किनकोंके समान अनगिनित करूंगा, और तेरा वंश अपके शत्रुओं के नगरोंका अधिक्कारनेी होगा : 18 और पृय्वी की सारी जातियां अपके को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी : क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है। 19 तब इब्राहीम अपके सेवकोंके पास लौट आया, और वे सब बेर्शेबा को संग संग गए; और इब्राहीम बेर्शेबा में रहता रहा।। 20 इन बातोंके पश्चात्‌ ऐसा हुआ कि इब्राहीम को यह सन्देश मिला, कि मिल्का के तेरे भाई नाहोर से सन्तान उत्पन्न हुए हैं। 21 मिल्का के पुत्र तो थे हुए, अर्यात्‌ उसका जेठा ऊस, और ऊस का भाई बूज, और कमूएल, जो अराम का पिता हुआ। 22 फिर केसेद, हज़ो, पिल्दाश, यिद्‌लाप, और बतूएल। 23 इन आठोंको मिल्का इब्राहीम के भाई नाहोर के जन्माए जनी। और बतूएल ने रिबका को उत्पन्न किया। 24 फिर नाहोर के रूमा नाम एक रखेली भी यी; जिस से तेबह, गहम, तहश, और माका, उत्पन्न हुए।।

उत्पत्ति 23

1 सारा तो एक सौ सत्ताईस बरस की अवस्या को पहुंची; और जब सारा की इतनी अवस्या हुई; 2 तब वह किर्यतर्बा में मर गई। यह तो कनान देश में है, और हेब्रोन भी कहलाता है : सो इब्राहीम सारा के लिथे रोने पीटने को वंहा गया। 3 तब इब्राहीम अपके मुर्दे के पास से उठकर हित्तियोंसे कहने लगा, 4 मैं तुम्हारे बीच पाहुन और परदेशी हूं : मुझे अपके मध्य में कब्रिस्तान के लिथे ऐसी भूमि दो जो मेरी निज की हो जाए, कि मैं अपके मुर्दे को गाड़के अपके आंख की ओट करूं। 5 हित्तियोंने इब्राहीम से कहा, 6 हे हमारे प्रभु, हमारी सुन : तू तो हमारे बीच में बड़ा प्रधान है : सो हमारी कब्रोंमें से जिसको तू चाहे उस में अपके मुर्दे को गाड़; हम में से कोई तुझे अपक्की कब्र के लेने से न रोकेगा, कि तू अपके मुर्दे को उस में गाड़ने न पाए। 7 तब इब्राहीम उठकर खड़ा हुआ, और हित्तियोंके सम्मुख, जो उस देश के निवासी थे, दण्डवत करके कहने लगा, 8 यदि तुम्हारी यह इच्छा हो कि मैं अपके मुर्दे को गाड़के अपक्की आंख की ओट करूं, तो मेरी प्रार्यना है, कि सोहर के पुत्र एप्रोन से मेरे लिथे बिनती करो, 9 कि वह अपक्की मकपेलावाली गुफा, जो उसकी भूमि की सीमा पर है; उसका पूरा दाम लेकर मुझे दे दे, कि वह तुम्हारे बीच कब्रिस्तान के लिथे मेरी निज भूमि हो जाए। 10 और एप्रोन तो हित्तियोंके बीच वहां बैठा हुआ या। सो जितने हित्ती उसके नगर के फाटक से होकर भीतर जाते थे, उन सभोंके साम्हने उस ने इब्राहीम को उत्तर दिया, 11 कि हे मेरे प्रभु, ऐसा नहीं, मेरी सुन; वह भूमि मैं तुझे देता हूं, और उस में जो गुफा है, वह भी मैं तुझे देता हूं; अपके जातिभाइयोंके सम्मुख मैं उसे तुझ को दिए देता हूं: सो अपके मुर्दे को कब्र में रख। 12 तब इब्राहीम ने उस देश के निवासियोंके साम्हने दण्डवत की। 13 और उनके सुनते हुए एप्रोन से कहा, यदि तू ऐसा चाहे, तो मेरी सुन : उस भूमि का जो दाम हो, वह मैं देना चाहता हूं; उसे मुझ से ले ले, तब मैं अपके मुर्दे को वहां गाडूंगा। 14 एप्रोन ने इब्राहीम को यह उत्तर दिया, 15 कि, हे मेरे प्रभु, मेरी बात सुन; एक भूमि का दाम तो चार सौ शेकेल रूपा है; पर मेरे और तेरे बीच में यह क्या है ? अपके मुर्दे को कब्र मे रख। 16 इब्राहीम न एप्रोन की मानकर उसको उतना रूपा तौल दिया, जितना उस ने हित्तियोंके सुनते हुए कहा या, अर्यात्‌ चार सौ ऐसे शेकेल जो व्यापारियोंमें चलते थे। 17 सो एप्रोन की भूमि, जो मम्रे के सम्मुख की मकपेला में यी, वह गुफा समेत, और उन सब वृझोंसमेत भी जो उस में और उसके चारोंऔर सीमा पर थे, 18 जितने हित्ती उसके नगर के फाटक से होकर भीतर जाते थे, उन सभोंके साम्हने इब्राहीम के अधिक्कारने में पक्की रीति से आ गई। 19 इसके पश्चात्‌ इब्राहीम ने अपक्की पत्नी सारा को, उस मकपेला वाली भूमि की गुफा में जो मम्रे के अर्यात्‌ हेब्रोन के साम्हने कनान देश में है, मिट्टी दी। 20 और वह भूमि गुफा समेत, जो उस में यी, हित्तियोंकी ओर से कब्रिस्तान के लिथे इब्राहीम के अधिक्कारने में पक्की रीति से आ गई।

उत्पत्ति 24

1 इब्राहीम वृद्ध या और उसकी आयु बहुत भी और यहोवा ने सब बातोंमें उसको आशीष दी यी। 2 सो इब्राहीम ने अपके उस दास से, जो उसके घर में पुरनिया और उसकी सारी सम्पत्ति पर अधिक्कारनेी या, कहा, अपना हाथ मेरी जांघ के नीचे रख : 3 और मुझ से आकाश और पृय्वी के परमेश्वर यहोवा की इस विषय में शपय खा, कि तू मेरे पुत्र के लिथे कनानियोंकी लड़कियोंमें से जिनके बीच मैं रहता हूं, किसी को न ले आएगा। 4 परन्तु तू मेरे देश में मेरे ही कुटुम्बियोंके पास जाकर मेरे पुत्र इसहाक के लिथे एक पत्नी ले आएगा। 5 दास ने उस से कहा, कदाचित्‌ वह स्त्री इस देश में मेरे साय आना न चाहे; तो क्या मुझे तेरे पुत्र को उस देश में जहां से तू आया है ले जाना पकेगा ? 6 इब्राहीम ने उस से कहा, चौकस रह, मेरे पुत्र को वहां कभी न ले जाना। 7 स्वर्ग का परमेश्वर यहोवा, जिस ने मुझे मेरे पिता के घर से और मेरी जन्मभूमि से ले आकर मुझ से शपय खाकर कहा, कि मैं यह देश तेरे वंश को दूंगा; वही अपना दूत तेरे आगे आगे भेजेगा, कि तू मेरे पुत्र के लिथे वहां से एक स्त्री ले आए। 8 और यदि वह स्त्री तेरे साय आना न चाहे तब तो तू मेरी इस शपय से छूट जाएगा : पर मेरे पुत्र को वहां न ले जाना। 9 तब उस दास ने अपके स्वामी इब्राहीम की जांघ के नीचे अपना हाथ रखकर उस से इसी विषय की शपय खाई। 10 तब वह दास अपके स्वामी के ऊंटो में से दस ऊंट छंाटकर उसके सब उत्तम उत्तम पदार्योंमें से कुछ कुछ लेकर चला : और मसोपोटामिया में नाहोर के नगर के पास पहुंचा। 11 और उस ने ऊंटोंको नगर के बाहर एक कुएं के पास बैठाया, वह संध्या का समय या, जिस समय स्त्रियां जल भरने के लिथे निकलती है। 12 सो वह कहने लगा, हे मेरे स्वामी इब्राहीम के परमेश्वर, यहोवा, आज मेरे कार्य को सिद्ध कर, और मेरे स्वामी इब्राहीम पर करूणा कर। 13 देख मैं जल के इस सोते के पास खड़ा हूं; और नगरवासियोंकी बेटियोंजल भरने के लिथे निकली आती हैं : 14 सो ऐसा होने दे, कि जिस कन्या से मैं कहूं, कि अपना घड़ा मेरी ओर फुका, कि मैं पीऊं; और वह कहे, कि ले, पी ले, पीछे मैं तेरे ऊंटो को भी पीलाऊंगी : सो वही हो जिसे तू ने अपके दास इसहाक के लिथे ठहराया हो; इसी रीति मैं जान लूंगा कि तू ने मेरे स्वामी पर करूणा की है। 15 और ऐसा हुआ कि जब वह कह ही रहा या कि रिबका, जो इब्राहीम के भाई नाहोर के जन्माथे मिल्का के पुत्र, बतूएल की बेटी यी, वह कन्धे पर घड़ा लिथे हुए आई। 16 वह अति सुन्दर, और कुमारी यी, और किसी पुरूष का मुंह न देखा या : वह कुएं में सोते के पास उतर गई, और अपना घड़ा भर के फिर ऊपर आई। 17 तब वह दास उस से भेंट करने को दौड़ा, और कहा, अपके घड़े मे से योड़ा पानी मुझे पिला दे। 18 उस ने कहा, हे मेरे प्रभु, ले, पी ले: और उस ने फुर्ती से घड़ा उतारकर हाथ में लिथे लिथे उसको पिला दिया। 19 जब वह उसको पिला चुकी, तक कहा, मैं तेरे ऊंटोंके लिथे भी तब तक पानी भर भर लाऊंगी, जब तक वे पी न चुकें। 20 तब वह फुर्ती से अपके घड़े का जल हौदे में उण्डेलकर फिर कुएं पर भरने को दौड़ गई; और उसके सब ऊंटोंके लिथे पानी भर दिया। 21 और वह पुरूष उसकी ओर चुपचाप अचम्भे के साय ताकता हुआ यह सोचता या, कि यहोवा ने मेरी यात्रा को सुफल किया है कि नहीं। 22 जब ऊंट पी चुके, तब उस पुरूष ने आध तोले सोने का एक नत्य निकालकर उसको दिया, और दस तोले सोने के कंगन उसके हाथोंमें पहिना दिए; 23 और पूछा, तू किस की बेटी है? यह मुझ को बता दे। क्या तेरे पिता के घर में हमारे टिकने के लिथे स्यान है ? 24 उस ने उत्तर दिया, मैं तो नाहोर के जन्माए मिल्का के पुत्र बतूएल की बेटी हूं। 25 फिर उस ने उस से कहा, हमारे वहां पुआल और चारा बहुत है, और टिकने के लिथे स्यान भी है। 26 तब उस पुरूष ने सिर फुकाकर यहोवा को दण्डवत्‌ करके कहा, 27 धन्य है मेरे स्वामी इब्राहीम का परमेश्वर यहोवा, कि उस ने अपक्की करूणा और सच्चाई को मेरे स्वामी पर से हटा नहीं लिया : यहोवा ने मुझ को ठीक मार्ग पर चलाकर मेरे स्वामी के भाई बन्धुओं के घर पर पहुचा दिया है। 28 और उस क्न्या ने दौड़कर अपक्की माता के घर में यह सारा वृत्तान्त कह सुनाया। 29 तब लाबान जो रिबका का भाई या, सो बाहर कुएं के निकट उस पुरूष के पास दौड़ा गया। 30 और ऐसा हुआ कि जब उस ने वह नत्य और अपक्की बहिन रिबका के हाथोंमें वे कंगन भी देखे, और उसकी यह बात भी सुनी, कि उस पुरूष ने मुझ से ऐसी बातें कहीं; तब वह उस पुरूष के पास गया; और क्या देखा, कि वह सोते के निकट ऊंटोंके पास खड़ा है। 31 उस ने कहा, हे यहोवा की ओर से धन्य पुरूष भीतर आ : तू क्योंबाहर खड़ा है ? मैं ने घर को, और ऊंटो के लिथे भी स्यान तैयार किया है। 32 और वह पुरूष घर में गया; और लाबान ने ऊंटोंकी काठियां खोलकर पुआल और चारा दिया; और उसके, और उसके संगी जनो के पांव धोने को जल दिया। 33 तब इब्राहीम के दास के आगे जलपान के लिथे कुछ रखा गया : पर उस ने कहा मैं जब तक अपना प्रयोजन न कह दूं, तब तक कुछ न खाऊंगा। लाबान ने कहा, कह दे। 34 तक उस ने कहा, मैं तो इब्राहीम का दास हूं। 35 और यहोवा ने मेरे स्वामी को बड़ी आशीष दी है; सो वह महान पुरूष हो गया है; और उस ने उसको भेड़-बकरी, गाय-बैल, सोना-रूपा, दास-दासियां, ऊंट और गदहे दिए है। 36 और मेरे स्वामी की पत्नी सारा के बुढ़ापे में उस से एक पुत्र उत्पन्न हुआ है। और उस पुत्र को इब्राहीम ने अपना सब कुछ दे दिया है। 37 और मेरे स्वामी ने मुझे यह शपय खिलाई, कि मैं उसके पुत्र के लिथे कनानियोंकी लड़कियोंमें से जिन के देश में वह रहता है, कोई स्त्री न ले आऊंगा। 38 मैं उसके पिता के घर, और कुल के लोगोंके पास जाकर उसके पुत्र के लिथे एक स्त्री ले आऊंगा। 39 तब मैं ने अपके स्वामी से कहा, कदाचित्‌ वह स्त्री मेरे पीछे न आए। 40 तब उस ने मुझ से कहा, यहोवा, जिसके साम्हने मैं चलता आया हूं, वह तेरे संग अपके दूत को भेजकर तेरी यात्रा को सुफल करेगा; सो तू मेरे कुल, और मेरे पिता के घराने में से मेरे पुत्र के लिथे एक स्त्री ले आ सकेगा। 41 तू तब ही मेरी इस शपय से छूटेगा, जब तू मेरे कुल के लोगोंके पास पहुंचेगा; अर्यात्‌ यदि वे मुझे कोई स्त्री न दें, तो तू मेरी श्पय से छूटेगा। 42 सो मैं आज उस कुएं के निकट आकर कहने लगा, हे मेरे स्वामी इब्राहीम के परमेश्वर यहोवा, यदि तू मेरी इस यात्रा को सुफल करता हो : 43 तो देख मैं जल के इस कुएं के निकट खड़ा हूं; सो ऐसा हो, कि जो कुमारी जल भरने के लिथे निकल आए, और मैं उस से कहूं, अपके घड़े में से मुझे योड़ा पानी पिला; 44 और वह मुझ से कहे, पी ले और मै तेरे ऊंटो के पीने के लिथे भी पानी भर दूंगी : वह वही स्त्री हो जिसको तू ने मेरे स्वामी के पुत्र के लिथे ठहराया हो। 45 मैं मन ही मन यह कह ही रहा या, कि देख रिबका कन्धे पर घड़ा लिथे हुए निकल आई; फिर वह सोते के पास उतरके भरने लगी : और मै ने उस से कहा, मुझे पिला दे। 46 और उस ने फुर्ती से अपके घड़े को कन्धे पर से उतारके कहा, ले, पी ले, पीछे मैं तेरे ऊंटोंको भी पिलाऊंगी : सो मैं ने पी लिया, और उस ने ऊंटोंको भी पिला दिया। 47 तब मैं ने उस से पूछा, कि तू किस की बेटी है ? और उस ने कहा, मैं तो नाहोर के जन्माए मिल्का के पुत्र बतूएल की बेटी हूं : तब मैं ने उसकी नाक में वह नत्य, और उसके हाथोंमें वे कंगन पहिना दिए। 48 फिर मैं ने सिर फुकाकर यहोवा को दण्डवत्‌ किया, और अपके स्वामी इब्राहीम के परमेश्वर यहोवा को धन्य कहा, क्योंकि उस ने मुझे ठीक मार्ग से पहुंचाया कि मै अपके स्वामी के पुत्र के लिथे उसकी भतीजी को ले जाऊं। 49 सो अब, यदि तू मेरे स्वामी के साय कृपा और सच्चाई का व्यवहार करना चाहते हो, तो मुझ से कहो : और यदि नहीं चाहते हो, तौभी मुझ से कह दो; ताकि मैं दाहिनी ओर, वा बाईं ओर फिर जाऊं। 50 तब लाबान और बतूएल ने उत्तर दिया, यह बात यहोवा की ओर से हुई है : सो हम लोग तुझ से न तो भला कह सकते हैं न बुरा। 51 देख, रिबका तेरे साम्हने है, उसको ले जा, और वह यहोवा के वचन के अनुसार, तेरे स्वामी के पुत्र की पत्नी हो जाए। 52 उनका यह वचन सुनकर, इब्राहीम के दास ने भूमि पर गिरके यहोवा को दण्डवत्‌ किया। 53 फिर उस दास ने सोने और रूपे के गहने, और वस्त्र निकालकर रिबका को दिए : और उसके भाई और माता को भी उस ने अनमोल अनमोल वस्तुएं दी। 54 तब उस ने अपके संगी जनोंसमेत भोजन किया, और रात वहीं बिताई : और तड़के उठकर कहा, मुझ को अपके स्वामी के पास जाने के लिथे विदा करो। 55 रिबका के भाई और माता ने कहा, कन्या को हमारे पास कुछ दिन, अर्यात्‌ कम से कम दस दिन रहने दे; फिर उसके पश्चात्‌ वह चक्की जाएगी। 56 उस ने उन से कहा, यहोवा ने जो मेरी यात्रा को सुफल किया है; सो तुम मुझे मत रोको अब मुझे विदा कर दो, कि मैं अपके स्वामी के पास जाऊं। 57 उन्होंने कहा, हम कन्या को बुलाकर पूछते हैं, और देखेंगे, कि वह क्या कहती है। 58 सो उन्होंने रिबका को बुलाकर उस से पूछा, क्या तू इस मनुष्य के संग जाएगी? उस ने कहा, हां मैं जाऊंगी। 59 तब उन्होंने अपक्की बहिन रिबका, और उसकी धाय और इब्राहीम के दास, और उसके सायी सभोंको विदा किया। 60 और उन्होंने रिबका को आशीर्वाद देके कहा, हे हमारी बहिन, तू हजारोंलाखोंकी आदिमाता हो, और तेरा वंश अपके बैरियोंके नगरोंका अधिक्कारनेी हो। 61 इस पर रिबका अपक्की सहेलियोंसमेत चक्की; और ऊंट पर चढ़के उस पुरूष के पीछे हो ली : सो वह दास रिबका को साय लेकर चल दिया। 62 इसहाक जो दक्खिन देश में रहता या, सो लहैरोई नाम कुएं से होकर चला आता या। 63 और सांफ के समय वह मैदान में ध्यान करने के लिथे निकला या : और उस ने आंखे उठाकर क्या देखा, कि ऊंट चले आ रहे हैं। 64 और रिबका ने भी आंख उठाकर इसहाक को देखा, और देखते ही ऊंट पर से उतर पक्की 65 तब उस ने दास से पूछा, जो पुरूष मैदान पर हम से मिलने को चला आता है, सो कौन है? दास ने कहा, वह तो मेरा स्वामी है। तब रिबका ने घूंघट लेकर अपके मुंह को ढ़ाप लिया। 66 और दास ने इसहाक से अपना सारा वृत्तान्त वर्णन किया। 67 तब इसहाक रिबका को अपक्की माता सारा के तम्बू में ले आया, और उसको ब्याहकर उस से प्रेम किया : और इसहाक को माता की मृत्यु के पश्चात्‌ शान्ति हुई।।

उत्पत्ति 25

1 तब इब्राहीम ने एक और पत्नी ब्याह ली जिसका नाम कतूरा या। 2 और उस से जिम्रान, योझान, मदना, मिद्यान, यिशबाक, और शूह उत्पन्न हुए। 3 और योझान से शबा और ददान उत्पन्न हुए। और ददान के वंश में अश्शूरी, लतूशी, और लुम्मी लोग हुए। 4 और मिद्यान के पुत्र एपा, एपेर, हनोक, अबीदा, और एल्दा हुए, से सब कतूरा के सन्तान हुए। 5 इसहाक को तो इब्राहीम ने अपना सब कुछ दिया। 6 पर अपक्की रखेलियोंके पुत्रोंको, कुछ कुछ देकर अपके जीते जी अपके पुत्र इसहाक के पास से पूरब देश में भेज दिया। 7 इब्राहीम की सारी अवस्या एक सौ पचहत्तर वर्ष की हुई। 8 और इब्राहीम का दीर्घायु होने के कारण अर्यात्‌ पूरे बुढ़ापे की अवस्या में प्राण छूट गया। 9 और उसके पुत्र इसहाक और इश्माएल ने, हित्ती सोहर के पुत्र एप्रोन की मम्रे के सम्मुखवाली भूमि में, जो मकपेला की गुफा यी, उस में उसको मिट्टी दी गई। 10 अर्यात्‌ जो भूमि इब्राहीम ने हित्तियोंसे मोल ली यी : उसी में इब्राहीम, और उस की पत्नी सारा, दोनोंको मिट्टी दी गई। 11 इब्राहीम के मरने के पश्चात्‌ परमेश्वर ने उसके पुत्र इसहाक को जो लहैरोई नाम कुएं के पास रहता या आशीष दी।। 12 इब्राहीम का पुत्र इश्माएल जो सारा की लौंडी हाजिरा मिस्री से उत्पन्न हुआ या, उसकी यह वंशावली है। 13 इश्माएल के पुत्रोंके नाम और वंशावली यह है : अर्यात्‌ इश्माएल का जेठा पुत्र नबायोत, फिर केदार, अद्‌बेल, मिबसाम, 14 मिश्मा, दूमा, मस्सा, 15 हदर, तेमा, यतूर, नपीश, और केदमा। 16 इश्माएल के पुत्र थे ही हुए, और इन्हीं के नामोंके अनुसार इनके गांवों, और छावनियोंके नाम भी पके; और थे ही बारह अपके अपके कुल के प्रधान हुए। 17 इश्माएल की सारी अवस्या एक सौ सैंतीस वर्ष की हुई : तब उसके प्राण छूट गए, और वह अपके लोगोंमें जा मिला। 18 और उसके वंश हवीला से शूर तक, जो मिस्र के सम्मुख अश्शूर्‌ के मार्ग में है, बस गए। और उनका भाग उनके सब भाईबन्धुओं के सम्मुख पड़ा।। 19 इब्राहीम के पुत्र इसहाक की वंशावली यह है : इब्राहीम से इसहाक उत्पन्न हुआ। 20 और इसहाक ने चालीस वर्ष का होकर रिबका को, जो पद्दनराम के वासी, अरामी बतूएल की बेटी, और अरामी लाबान की बहिन भी, ब्याह लिया। 21 इसहाक की पत्नी तो बांफ यी, सो उस ने उसके निमित्त यहोवा से बिनती की: और यहोवा ने उसकी बिनती सुनी, सो उसकी पत्नी रिबका गर्भवती हुई। 22 और लड़के उसके गर्भ में आपस में लिपटके एक दूसरे को मारने लगे : तब उस ने कहा, मेरी जो ऐसी ही दशा रहेगी तो मैं क्योंकर जीवित रहूंगी? और वह यहोवा की इच्छा पूछने को गई। 23 तब यहोवा ने उस से कहा तेरे गर्भ में दो जातियां हैं, और तेरी कोख से निकलते ही दो राज्य के लोग अलग अलग होंगे, और एक राज्य के लोग दूसरे से अधिक सामर्यी होंगे और बड़ा बेटा छोटे के अधीन होगा। 24 जब उसके पुत्र उत्पन्न होने का समय आया, तब क्या प्रगट हुआ, कि उसके गर्भ में जुड़वे बालक है। 25 और पहिला जो उत्पन्न हुआ सो लाल निकला, और उसका सारा शरीर कम्बल के समान रोममय या; सो उसका नाम एसाव रखा गया। 26 पीछे उसका भाई अपके हाथ से एसाव की एड़ी पकडे हुए उत्पन्न हुआ; और उसका नाम याकूब रखा गया। और जब रिबका ने उनको जन्म दिया तब इसहाक साठ वर्ष का या। 27 फिर वे लड़के बढ़ने लगे और एसाव तो वनवासी होकर चतुर शिकार खेलनेवाला हो गया, पर याकूब सीधा मनुष्य या, और तम्बुओं में रहा करता या। 28 और इसहाक तो एसाव के अहेर का मांस खाया करता या, इसलिथे वह उस से प्रीति रखता या : पर रिबका याकूब से प्रीति रखती यी।। 29 याकूब भोजन के लिथे कुछ दाल पका रहा या : और एसाव मैदान से यका हुआ आया। 30 तब एसाव ने याकूब से कहा, वह जो लाल वस्तु है, उसी लाल वस्तु में से मुझे कुछ खिला, क्योंकि मैं यका हूं। इसी कारण उसका नाम एदोम भी पड़ा। 31 याकूब ने कहा, अपना पहिलौठे का अधिक्कारने आज मेरे हाथ बेच दे। 32 एसाव ने कहा, देख, मै तो अभी मरने पर हूं : सो पहिलौठे के अधिक्कारने से मेरा क्या लाभ होगा ? 33 याकूब ने कहा, मुझ से अभी शपय खा : सो उस ने उस से शपय खाई : और अपना पहिलौठे का अधिक्कारने याकूब के हाथ बेच डाला। 34 इस पर याकूब ने एसाव को रोटी और पकाई हुई मसूर की दाल दी; और उस ने खाया पिया, तब उठकर चला गया। योंएसाव ने अपना पहिलौठे का अधिक्कारने तुच्छ जाना।।

उत्पत्ति 26

1 और उस देश में अकाल पड़ा, वह उस पहिले अकाल से अलग या जो इब्राहीम के दिनोंमें पड़ा या। सो इसहाक गरार को पलिश्तियोंके राजा अबीमेलेक के पास गया। 2 वहां यहोवा ने उसको दर्शन देकर कहा, मिस्र में मत जा; जो देश मैं तुझे बताऊं उसी में रह। 3 तू इसी देश में रह, और मैं तेरे संग रहूंगा, और तुझे आशीष दूंगा; और थे सब देश मैं तुझ को, और तेरे वंश को दूंगा; और जो शपय मैं ने तेरे पिता इब्राहीम से खाई यी, उसे मैं पूरी करूंगा। 4 और मैं तेरे वंश को आकाश के तारागण के समान करूंगा। और मैं तेरे वंश को थे सब देश दूंगा, और पृय्वी की सारी जातियां तेरे वंश के कारण अपके को धन्य मानेंगी। 5 क्योंकि इब्राहीम ने मेरी मानी, और जो मैं ने उसे सौंपा या उसको और मेरी आज्ञाओं विधियों, और व्यवस्या का पालन किया। 6 सो इसहाक गरार में रह गया। 7 जब उस स्यान के लोगोंने उसकी पत्नी के विषय में पूछा, तब उस ने यह सोचकर कि यदि मैं उसको अपक्की पत्नी कहूं, तो यहां के लोग रिबका के कारण जो परम सुन्दरी है मुझ को मार डालेंगे, उत्तर दिया, वह तो मेरी बहिन है। 8 जब उसको वहां रहते बहुत दिन बीत गए, तब एक दिन पलिश्तियोंके राजा अबीमेलेक ने खिड़की में से फांकके क्या देखा, कि इसहाक अपक्की पत्नी रिबका के साय क्रीड़ा कर रहा है। 9 तब अबीमेलेक ने इसहाक को बुलवाकर कहा, वह तो निश्चय तेरी पत्नी है; फिर तू ने क्योंकर उसको अपक्की बहिन कहा ? इसहाक ने उत्तर दिया, मैं ने सोचा या, कि ऐसा न हो कि उसके कारण मेरी मृत्यु हो। 10 अबीमेलेक ने कहा, तू ने हम से यह क्या किया ? ऐसे तो प्रजा में से कोई तेरी पत्नी के साय सहज से कुकर्म कर सकता, और तू हम को पाप में फंसाता। 11 और अबीमेलेक ने अपक्की सारी प्रजा को आज्ञा दी, कि जो कोई उस पुरूष को वा उस स्त्री को छूएगा, सो निश्चय मार डाला जाएगा। 12 फिर इसहाक ने उस देश में जोता बोया, और उसी वर्ष में सौ गुणा फल पाया : और यहोवा ने उसको आशीष दी। 13 और वह बढ़ा और उसकी उन्नति होती चक्की गई, यहां तक कि वह अति महान पुरूष हो गया। 14 जब उसके भेड़-बकरी, गाय-बैल, और बहुत से दास-दासियां हुई, तब पलिश्ती उस से डाह करने लगे। 15 सो जितने कुओं को उसके पिता इब्राहीम के दासोंने इब्राहीम के जीते जी खोदा या, उनको पलिश्तियोंने मिट्टी से भर दिया। 16 तब अबीमेलेक ने इसहाक से कहा, हमारे पास से चला जा; क्योंकि तू हम से बहुत सामर्यी हो गया है। 17 सो इसहाक वहां से चला गया, और गरार के नाले में तम्बू खड़ा करके वहां रहने लगा। 18 तब जो कुएं उसके पिता इब्राहीम के दिनोंमें खोदे गए थे, और इब्राहीम के मरने के पीछे पलिश्तियोंने भर दिए थे, उनको इसहाक ने फिर से खुदवाया; और उनके वे ही नाम रखे, जो उसके पिता ने रखे थे। 19 फिर इसहाक के दासोंको नाले में खोदते खोदते बहते जल का एक सोता मिला। 20 तब गरारी चरवाहोंने इसहाक के चरवाहोंसे फगड़ा किया, और कहा, कि यह जल हमारा है। सो उस ने उस कुएं का नाम एसेक रखा इसलिथे कि वे उस से फगड़े थे। 21 फिर उन्होंने दूसरा कुआं खोदा; और उन्होंने उसके लिथे भी फगड़ा किया, सो उस ने उसका नाम सित्रा रखा। 22 तब उस ने वहां से कूच करके एक और कुआं खुदवाया; और उसके लिथे उन्होंने फगड़ा न किया; सो उस ने उसका नाम यह कहकर रहोबोत रखा, कि अब तो यहोवा ने हमारे लिथे बहुत स्यान दिया है, और हम इस देश में फूलें-फलेंगे। 23 वहां से वह बेर्शेबा को गया। 24 और उसी दिन यहोवा ने रात को उसे दर्शन देकर कहा, मैं तेरे पिता इब्राहीम का परमेश्वर हूं; मत डर, क्योंकि मैं तेरे साय हूं, और अपके दास इब्राहीम के कारण तुझे आशीष दूंगा, और तेरा वंश बढ़ाऊंगा 25 तब उस ने वहां एक वेदी बनाई, और यहोवा से प्रार्यना की, और अपना तम्बू वहीं खड़ा किया; और वहां इसहाक के दासोंने एक कुआं खोदा। 26 तब अबीमेलेक अपके मित्र अहुज्जत, और अपके सेनापति पीकोल को संग लेकर, गरार से उसके पास गया। 27 इसहाक ने उन से कहा, तुम ने मुझ से बैर करके अपके बीच से निकाल दिया या; सो अब मेरे पास क्योंआए हो ? 28 उन्होंने कहा, हम ने तो प्रत्यझ देखा है, कि यहोवा तेरे साय रहता है : सो हम ने सोचा, कि तू तो यहोवा की ओर से धन्य है, सो हमारे तेरे बीच में शपय खाई जाए, और हम तुझ से इस विषय की वाचा बन्धाएं; 29 कि जैसे हम ने तुझे नहीं छूआ, वरन तेरे साय निरी भलाई की है, और तुझ को कुशल झेम से विदा किया, उसके अनुसार तू भी हम से कोई बुराई न करेगा। 30 तब उस ने उनकी जेवनार की, और उन्होंने खाया पिया। 31 बिहान को उन सभोंने तड़के उठकर आपस में शपय खाई; तब इसहाक ने उनको विदा किया, और वे कुशल झेम से उसके पास से चले गए। 32 उसी दिन इसहाक के दासोंने आकर अपके उस खोदे हुए कुएं का वृत्तान्त सुना के कहा, कि हम को जल का एक सोता मिला है। 33 तब उस ने उसका नाम शिबा रखा : इसी कारण उस नगर का नाम आज तक बेर्शेबा पड़ा है।। 34 जब एसाव चालीस वर्ष का हुआ, तब उस ने हित्ती बेरी की बेटी यहूदीत, और हित्ती एलोन की बेटी बाशमत को ब्याह लिया। 35 और इन स्त्रियोंके कारण इसहाक और रिबका के मन को खेद हुआ।।

उत्पत्ति 27

1 जब इसहाक बूढ़ा हो गया, और उसकी आंखें ऐसी धुंधली पड़ गई, कि उसको सूफता न या, तब उस ने अपके जेठे पुत्र एसाव को बुलाकर कहा, हे मेरे पुत्र; उस ने कहा, क्या आज्ञा। 2 उस ने कहा, सुन, मैं तो बूढ़ा हो गया हूं, और नहीं जानता कि मेरी मृत्यु का दिन कब होगा : 3 सो अब तू अपना तरकश और धनुष आदि हयियार लेकर मैदान में जा, और मेरे लिथे हिरन का अहेर कर ले आ। 4 तब मेरी रूचि के अनुसार स्वादिष्ट भोजन बनाकर मेरे पास ले आना, कि मै उसे खाकर मरने से पहले तुझे जी भर के आशीर्वाद दूं। 5 तब एसाव अहेर करने को मैदान में गया। जब इसहाक एसाव से यह बात कह रहा या, तब रिबका सुन रही यी। 6 सो उस ने अपके पुत्र याकूब से कहा सुन, मैं ने तेरे पिता को तेरे भाई एसाव से यह कहते सुना, 7 कि तू मेरे लिथे अहेर करके उसका स्वादिष्ट भोजन बना, कि मैं उसे खाकर तुझे यहोवा के आगे मरने से पहिले आशीर्वाद दूं 8 सो अब, हे मेरे पुत्र, मेरी सुन, और यह आज्ञा मान, 9 कि बकरियोंके पास जाकर बकरियोंके दो अच्छे अच्छे बच्चे ले आ; और मैं तेरे पिता के लिथे उसकी रूचि के अनुसार उन के मांस का स्वादिष्ट भोजन बनाऊंगी। 10 तब तू उसको अपके पिता के पास ले जाना, कि वह उसे खाकर मरने से पहिले तुझ को आशीर्वाद दे। 11 याकूब ने अपक्की माता रिबका से कहा, सुन, मेरा भाई एसाव तो रोंआर पुरूष है, और मैं रोमहीन पुरूष हूं। 12 कदाचित्‌ मेरा पिता मुझे टटोलने लगे, तो मैं उसकी दृष्टि में ठग ठहरूंगा; और आशीष के बदले शाप ही कमाऊंगा। 13 उसकी माता ने उस से कहा, हे मेरे, पुत्र, शाप तुझ पर नहीं मुझी पर पके, तू केवल मेरी सुन, और जाकर वे बच्चे मेरे पास ले आ। 14 तब याकूब जाकर उनको अपक्की माता के पास ले आया, और माता ने उसके पिता की रूचि के अनुसार स्वादिष्ट भोजन बना दिया। 15 तब रिबका ने अपके पहिलौठे पुत्र एसाव के सुन्दर वस्त्र, जो उसके पास घर में थे, लेकर अपके लहुरे पुत्र याकूब को पहिना दिए। 16 और बकरियोंके बच्चोंकी खालोंको उसके हाथोंमें और उसके चिकने गले में लपेट दिया। 17 और वह स्वादिष्ट भोजन और अपक्की बनाई हुई रोटी भी अपके पुत्र याकूब के हाथ में दे दी। 18 सो वह अपके पिता के पास गया, और कहा, हे मेरे पिता : उस ने कहा क्या बात है ? हे मेरे पुत्र, तू कौन है ? 19 याकूब ने अपके पिता से कहा, मैं तेरा जेठा पुत्र एसाव हूं। मैं ने तेरी आज्ञा मे अनुसार किया है; सो उठ और बैठकर मेरे अहेर के मांस में से खा, कि तू जी से मुझे आशीर्वाद दे। 20 इसहाक ने अपके पुत्र से कहा, हे मेरे पुत्र, क्या कारण है कि वह तुझे इतनी जल्दी मिल गया ? उस ने यह उत्तर दिया, कि तेरे परमेश्वर यहोवा ने उसको मेरे साम्हने कर दिया। 21 फिर इसहाक ने याकूब से कहा, हे मेरे पुत्र, निकट आ, मैं तुझे टटोलकर जानूं, कि तू सचमुच मेरा पुत्र एसाव है वा नहीं। 22 तब याकूब अपके पिता इसहाक के निकट गया, और उस ने उसको टटोलकर कहा, बोल तो याकूब का सा है, पर हाथ एसाव ही के से जान पड़ते हैं। 23 और उस ने उसको नहीं चीन्हा, क्योंकि उसके हाथ उसके भाई के से रोंआर थे। 24 और उस ने पूछा, क्या तू सचमुच मेरा पुत्र एसाव है ? उस ने कहा मैं हूं। 25 तब उस ने कहा, भोजन को मेरे निकट ले आ, कि मैं, अपके पुत्र के अहेर के मांस में से खाकर, तुझे जी से आशीर्वाद दूं। तब वह उसको उसके निकट ले आया, और उस ने खाया; और वह उसके पास दाखमधु भी लाया, और उस ने पिया। 26 तब उसके पिता इसहाक ने उस से कहा, हे मेरे पुत्र निकट आकर मुझे चूम। 27 उस ने निकट जाकर उसको चूमा। और उस ने उसके वोंको सुगन्ध पाकर उसको वह आशीर्वाद दिया, कि देख, मेरे पुत्र का सुगन्ध जो ऐसे खेत का सा है जिस पर यहोवा ने आशीष दी हो : 28 सो परमेश्वर तुझे आकाश से ओस, और भूमि की उत्तम से उत्तम उपज, और बहुत सा अनाज और नया दाखमधु दे : 29 राज्य राज्य के लोग तेरे अधीन हों, और देश देश के लोग तुझे दण्डवत्‌ करें : तू अपके भाइयोंका स्वामी हो, और तेरी माता के पुत्र तुझे दण्डवत्‌ करें : जो तुझे शाप दें सो आप ही स्रापित हों, और जो तुझे आशीर्वाद दें सो आशीष पाएं।। 30 यह आशीर्वाद इसहाक याकूब को दे ही चुका, और याकूब अपके पिता इसहाक के साम्हने से निकला ही या, कि एसाव अहेर लेकर आ पहुंचा। 31 तब वह भी स्वादिष्ट भोजन बनाकर अपके पिता के पास ले आया, और उस ने कहा, हे मेरे पिता, उठकर अपके पुत्र के अहेर का मांस खा, ताकि मुझे जी से आशीर्वाद दे। 32 उसके पिता इसहाक ने पूछा, तू कौन है ? उस ने कहा, मैं तेरा जेठा पुत्र एसाव हूं। 33 तब इसहाक ने अत्यन्त यरयर कांपके हुए कहा, फिर वह कौन या जो अहेर करके मेरे पास ले आया या, और मैं ने तेरे आने से पहिले सब में से कुछ कुछ खा लिया और उसको आशीर्वाद दिया ? वरन उसको आशीष लगी भी रहेगी। 34 अपके पिता की यह बात सुनते ही एसाव ने अत्यन्त ऊंचे और दु:ख भरे स्वर से चिल्लाकर अपके पिता से कहा, हे मेरे पिता, मुझ को भी आशीर्वाद दे। 35 उस ने कहा, तेरा भाई धूर्तता से आया, और तेरे आशीर्वाद को लेके चला गया। 36 उस ने कहा, क्या उसका नाम याकूब ययार्य नहीं रखा गया ? उस ने मुझे दो बार अड़ंगा मारा, मेरा पहिलौठे का अधिक्कारने तो उस ने ले ही लिया या : और अब देख, उस ने मेरा आशीर्वाद भी ले लिया है : फिर उस ने कहा, क्या तू ने मेरे लिथे भी कोई आशीर्वाद नहीं सोच रखा है ? 37 इसहाक ने एसाव को उत्तर देकर कहा, सुन, मैं ने उसको तेरा स्वामी ठहराया, और उसके सब भाइयोंको उसके अधीन कर दिया, और अनाज और नया दाखमधु देकर उसको पुष्ट किया है : सो अब, हे मेरे पुत्र, मैं तेरे लिथे क्या करूं ? 38 एसाव ने अपके पिता से कहा हे मेरे पिता, क्या तेरे मन में एक ही आशीर्वाद है ? हे मेरे पिता, मुझ को भी आशीर्वाद दे : योंकहकर एसाव फूट फूटके रोया। 39 उसके पिता इसहाक ने उस से कहा, सुन, तेरा निवास उपजाऊ भूमि पर हो, और ऊपर से आकाश की ओस उस पर पके।। 40 और तू अपक्की तलवार के बल से जीवित रहे, और अपके भाई के अधीन तो होए, पर जब तू स्वाधीन हो जाएगा, तब उसके जूए को अपके कन्धे पर से तोड़ फेंके। 41 एसाव ने तो याकूब से अपके पिता के दिए हुए आशीर्वाद के कारण बैर रखा; सो उस ने सोचा, कि मेरे पिता के अन्तकाल का दिन निकट है, फिर मैं अपके भाई याकूब को घात करूंगा। 42 जब रिबका को अपके पहिलौठे पुत्र एसाव की थे बातें बताई गई, तब उस ने अपके लहुरे पुत्र याकूब को बुलाकर कहा, सुन, तेरा भाई एसाव तुझे घात करने के लिथे अपके मन को धीरज दे रहा है। 43 सो अब, हे मेरे पुत्र, मेरी सुन, और हारान को मेरे भाई लाबान के पास भाग जा ; 44 और योड़े दिन तक, अर्यात्‌ जब तक तेरे भाई का क्रोध न उतरे तब तक उसी के पास रहना। 45 फिर जब तेरे भाई का क्रोध ने उतरे, और जो काम तू ने उस से किया है उसको वह भूल जाए; तब मैं तुझे वहां से बुलवा भेजूंगी : ऐसा क्योंहो कि एक ही दिन में मुझे तुम दोनोंसे रहित होना पके ? 46 फिर रिबका ने इसहाक से कहा, हित्ती लड़कियोंके कारण मैं अपके प्राण से घिन करती हूं; सो यदि ऐसी हित्ती लड़कियोंमें से, जैसी इस देश की लड़कियां हैं, याकूब भी एक को कहीं ब्याह ले, तो मेरे जीवन में क्या लाभ होगा?

उत्पत्ति 28

1 तब इसहाक ने याकूब को बुलाकर आशीर्वाद दिया, और आज्ञा दी, कि तू किसी कनानी लड़की को न ब्याह लेना। 2 पद्दनराम में अपके नाना बतूएल के घर जाकर वहां अपके मामा लाबान की एक बेटी को ब्याह लेना। 3 और सर्वशक्तिमान ईश्वर तुझे आशीष दे, और फुला-फलाकर बढ़ाए, और तू राज्य राज्य की मण्डली का मूल हो। 4 और वह तुझे और तेरे वंश को भी इब्राहीम की सी आशीष दे, कि तू यह देश जिस में तू परदेशी होकर रहता है, और जिसे परमेश्वर ने इब्राहीम को दिया या, उसका अधिक्कारनेी हो जाए। 5 और इसहाक ने याकूब को विदा किया, और वह पद्दनराम को अरामी बतूएल के उस पुत्र लाबान के पास चला, जो याकूब और एसाव की माता रिबका का भाई या। 6 जब इसहाक ने याकूब को आशीर्वाद देकर पद्दनराम भेज दिया, कि वह वहीं से पत्नी ब्याह लाए, और उसको आशीर्वाद देने के समय यह आज्ञा भी दी, कि तू किसी कनानी लड़की को ब्याह न लेना; 7 और याकूब माता पिता की मानकर पद्दनराम को चल दिया; 8 तब एसाव यह सब देख के और यह भी सोचकर, कि कनानी लड़कियां मेरे पिता इसहाक को बुरी लगती हैं, 9 इब्राहीम के पुत्र इश्माएल के पास गया, और इश्माएल की बेटी महलत को, जो नबायोत की बहिन भी, ब्याहकर अपक्की पत्नियोंमे मिला लिया।। 10 सो याकूब बेर्शेबा से निकलकर हारान की ओर चला। 11 और उस ने किसी स्यान में पहुंचकर रात वहीं बिताने का विचार किया, क्योंकि सूर्य अस्त हो गया या; सो उस ने उस स्यान के पत्यरोंमें से एक पत्यर ले अपना तकिया बनाकर रखा, और उसी स्यान में सो गया। 12 तब उस ने स्वप्न में क्या देखा, कि एक सीढ़ी पृय्वी पर खड़ी है, और उसका सिरा स्वर्ग तक पहुंचा है : और परमेश्वर के दूत उस पर से चढ़ते उतरते हैं। 13 और यहोवा उसके ऊपर खड़ा होकर कहता है, कि मैं यहोवा, तेरे दादा इब्राहीम का परमेश्वर, और इसहाक का भी परमेश्वर हूं : जिस भूमि पर तू पड़ा है, उसे मैं तुझ को और तेरे वंश को दूंगा। 14 और तेरा वंश भूमि की धूल के किनकोंके समान बहुत होगा, और पच्छिम, पूरब, उत्तर, दक्खिन, चारोंओर फैलता जाएगा : और तेरे और तेरे वंश के द्वारा पृय्वी के सारे कुल आशीष पाएंगे। 15 और सुन, मैं तेरे संग रहूंगा, और जहां कहीं तू जाए वहां तेरी रझा करूंगा, और तुझे इस देश में लौटा ले आऊंगा : मैं अपके कहे हुए को जब तक पूरा न कर लूं तब तक तुझ को न छोडूंगा। 16 तब याकूब जाग उठा, और कहने लगा; निश्चय इस स्यान में यहोवा है; और मैं इस बात को न जानता या। 17 और भय खाकर उस ने कहा, यह स्यान क्या ही भयानक है ! यह तो परमेश्वर के भवन को छोड़ और कुछ नहीं हो सकता; वरन यह स्वर्ग का फाटक ही होगा। 18 भोर को याकूब तड़के उठा, और अपके तकिए का पत्यर लेकर उसका खम्भा खड़ा किया, और उसके सिक्के पर तेल डाल दिया। 19 और उस ने उस स्यान का नाम बेतेल रखा; पर उस नगर का नाम पहिले लूज या। 20 और याकूब ने यह मन्नत मानी, कि यदि परमेश्वर मेरे संग रहकर इस यात्रा में मेरी रझा करे, और मुझे खाने के लिथे रोटी, और पहिनने के लिथे कपड़ा दे, 21 और मैं अपके पिता के घर में कुशल झेम से लौट आऊं : तो यहोवा मेरा परमेश्वर ठहरेगा। 22 और यह पत्यर, जिसका मैं ने खम्भा खड़ा किया है, परमेश्वर का भवन ठहरेगा : और जो कुछ तू मुझे दे उसका दशमांश मैं अवश्य ही तुझे दिया करूंगा।।

उत्पत्ति 29

1 फिर याकूब ने अपना मार्ग लिया, और पूव्विर्योंके देश में आया। 2 और उस ने दृष्टि करके क्या देखा, कि मैदान में एक कुंआ है, और उसके पास भेड़-बकरियोंके तीन फुण्ड बैठे हुए हैं; क्योंकि जो पत्यर उस कुएं के मुंह पर धरा रहता या, जिस में से फुण्डोंको जल पिलाया जाता या, वह भारी या। 3 और जब सब फुण्ड वहां इकट्ठे हो जाते तब चरवाहे उस पत्यर को कुएं के मुंह पर से लुढ़काकर भेड़-बकरियोंको पानी पिलाते, और फिर पत्यर को कुएं के मुंह पर ज्योंका त्योंरख देते थे। 4 सो याकूब ने चरवाहोंसे पूछा, हे मेरे भाइयो, तुम कहां के हो? उन्होंने कहा, हम हारान के हैं। 5 तब उस ने उन से पूछा, क्या तुम नाहोर के पोते लाबान को जानते हो ? उन्होंने कहा, हां, हम उसे जानते हैं। 6 फिर उस ने उन से पूछा, क्या वह कुशल से है ? उन्होंने कहा, हां, कुशल से तो है और वह देख, उसकी बेटी राहेल भेड़-बकरियोंको लिथे हुए चक्की आती है। 7 उस ने कहा, देखो, अभी तो दिन बहुत है, पशुओं के इकट्ठे होने का समय नहीं : सो भेड़-बकरियोंको जल पिलाकर फिर ले जाकर चराओ। 8 उन्होंने कहा, हम अभी ऐसा नहीं कर सकते, जब सब फुण्ड इकट्ठे होते हैं तब पत्यर कुएं के मुंह से लुढ़काया जाता है, और तब हम भेड़-बकरियोंको पानी पिलाते हैं। 9 उनकी यह बातचीत हो रही यी, कि राहेल जो पशु चराया करती यी, सो अपके पिता की भेड़-बकरियोंको लिथे हुए आ गई। 10 अपके मामा लाबान की बेटी राहेल को, और उसकी भेड़-बकरियोंको भी देखकर याकूब ने निकट जाकर कुएं के मुंह पर से पत्यर को लुढ़काकर अपके मामा लाबान की भेड़-बकरियोंको पानी पिलाया। 11 तब याकूब ने राहेल को चूमा, और ऊंचे स्वर से रोया। 12 और याकूब ने राहेल को बता दिया, कि मैं तेरा फुफेरा भाई हूं, अर्यात्‌ रिबका का पुत्र हूं : तब उस ने दौड़ के अपके पिता से कह दिया। 13 अपके भानजे याकूब को समाचार पाते ही लाबान उस से भेंट करने को दौड़ा, और उसको गले लगाकर चूमा, फिर अपके घर ले आया। और याकूब ने लाबान से अपना सब वृत्तान्त वर्णन किया। 14 तब लाबान ने याकूब से कहा, तू तो सचमुच मेरी हड्डी और मांस है। सो याकूब एक महीना भर उसके साय रहा। 15 तब लाबान ने याकूब से कहा, भाईबन्धु होने के कारण तुझ से सेंतमेंत सेवा कराना मुझे उचित नहीं है, सो कह मैं तुझे सेवा के बदले क्या दूं ? 16 लाबान के दो बेटियां यी, जिन में से बड़ी का नाम लिआ : और छोटी का राहेल या। 17 लिआ : के तो धुन्धली आंखे यी, पर राहेल रूपवती और सुन्दर यी। 18 सो याकूब ने, जो राहेल से प्रीति रखता या, कहा, मैं तेरी छोटी बेटी राहेल के लिथे सात बरस तेरी सेवा करूंगा। 19 लाबान ने कहा, उसे पराए पुरूष को देने से तुझ को देना उत्तम होगा; सो मेरे पास रह। 20 सो याकूब ने राहेल के लिथे सात बरस सेवा की; और वे उसको राहेल की प्रीति के कारण योड़े ही दिनोंके बराबर जान पके। 21 तब याकूब ने लाबान से कहा, मेरी पत्नी मुझे दे, और मैं उसके पास जाऊंगा, क्योंकि मेरा समय पूरा हो गया है। 22 सो लाबान ने उस स्यान के सब मनुष्योंको बुलाकर इकट्ठा किया, और उनकी जेवनार की। 23 सांफ के समय वह अपक्की बेटी लिआ : को याकूब के पास ले गया, और वह उसके पास गया। 24 और लाबान ने अपक्की बेटी लिआ : को उसकी लौंडी होने के लिथे अपक्की लौंडी जिल्पा दी। 25 भोर को मालूम हुआ कि यह तो लिआ है, सो उस ने लाबान से कहा यह तू ने मुझ से क्या किया है ? मैं ने तेरे साय रहकर जो तेरी सेवा की, सो क्या राहेल के लिथे नहीं की ? फिर तू ने मुझ से क्योंऐसा छल किया है ? 26 लाबान ने कहा, हमारे यहां ऐसी रीति नहीं, कि जेठी से पहिले दूसरी का विवाह कर दें। 27 इसका सप्ताह तो पूरा कर; फिर दूसरी भी तुझे उस सेवा के लिथे मिलेगी जो तू मेरे साय रहकर और सात वर्ष तक करेगा। 28 सो याकूब ने ऐसा ही किया, और लिआ : के सप्ताह को पूरा किया; तब लाबान ने उसे अपक्की बेटी राहेल को भी दिया, कि वह उसकी पत्नी हो। 29 और लाबान ने अपक्की बेटी राहेल की लौंडी होने के लिथे अपक्की लौंडी बिल्हा को दिया। 30 तब याकूब राहेल के पास भी गया, और उसकी प्रीति लिआ: से अधिक उसी पर हुई, और उस ने लाबान के साय रहकर सात वर्ष और उसकी सेवा की।। 31 जब यहोवा ने देखा, कि लिआ: अप्रिय हुई, तब उस ने उसकी कोख खोली, पर राहेल बांफ रही। 32 सो लिआ: गर्भवती हुई, और उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ, और उस ने यह कहकर उसका नाम रूबेन रखा, कि यहोवा ने मेरे दु:ख पर दृष्टि की है : सो अब मेरा पति मुझ से प्रीति रखेगा। 33 फिर वह गर्भवती हुई और उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ; और उस ने यह कहा कि यह सुनके, कि मै अप्रिय हूं यहोवा ने मुझे यह भी पुत्र दिया : इसलिथे उस ने उसका नाम शिमोन रखा। 34 फिर वह गर्भवती हुई और उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ; और उस ने कहा, अब की बार तो मेरा पति मुझ से मिल जाएगा, क्योंकि उस से मेरे तीन पुत्र उत्पन्न हुए : इसलिथे उसका नाम लेवी रखा गया। 35 और फिर वह गर्भवती हुई और उसके एक और पुत्र उत्पन्न हुआ; और उस ने कहा, अब की बार तो मैं यहोवा का धन्यवाद करूंगी, इसलिथे उस ने उसका नाम यहूदा रखा; तब उसकी कोख बन्द को गई।।

उत्पत्ति 30

1 जब राहेल ने देखा, कि याकूब के लिथे मुझ से कोई सन्तान नहीं होता, तब वह अपक्की बहिन से डाह करने लगी : और याकूब से कहा, मुझे भी सन्तान दे, नहीं तो मर जाऊंगी। 2 तब याकूब ने राहेल से क्रोधित होकर कहा, क्या मैं परमेश्वर हूं? तेरी कोख तो उसी ने बन्द कर रखी है। 3 राहेल ने कहा, अच्छा, मेरी लौंडी बिल्हा हाजिर है: उसी के पास जा, वह मेरे घुटनोंपर जनेगी, और उसके द्वारा मेरा भी घर बसेगा। 4 तो उस ने उसे अपक्की लौंडी बिल्हा को दिया, कि वह उसकी पत्नी हो; और याकूब उसके पास गया। 5 और बिल्हा गर्भवती हुई और याकूब से उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ। 6 और राहेल ने कहा, परमेश्वर ने मेरा न्याय चुकाया और मेरी सुनकर मुझे एक पुत्र दिया : इसलिथे उस ने उसका नाम दान रखा। 7 और राहेल की लौंडी बिल्हा फिर गर्भवती हुई और याकूब से एक पुत्र और उत्पन्न हुआ। 8 तब राहेल ने कहा, मैं ने अपक्की बहिन के साय बड़े बल से लिपटकर मल्लयुद्ध किया और अब जीत गई : सो उस ने उसका नाम नप्ताली रखा। 9 जब लिआ: ने देखा कि मैं जनने से रहित हो गई हूं, तब उस ने अपक्की लौंडी जिल्पा को लेकर याकूब की पत्नी होने के लिथे दे दिया। 10 और लिआ: की लौंडी जिल्पा के भी याकूब से एक पुत्र उत्पन्न हुआ। 11 तब लिआ: ने कहा, अहो भाग्य! सो उस ने उसका नाम गाद रखा। 12 फिर लिआ: की लौंडी जिल्पा के याकूब से एक और पुत्र उत्पन्न हुआ। 13 तब लिआ: ने कहा, मै धन्य हूं; निश्चय स्त्रियां मुझे धन्य कहेंगी : सो उस ने उसका नाम आशेर रखा। 14 गेहूं की कटनी के दिनोंमें रूबेन को मैदान में दूदाफल मिले, और वह उनको अपक्की माता लिआ: के पास ले गया, तब राहेल ने लिआ: से कहा, अपके पुत्र के दूदाफलोंमें से कुछ मुझे दे। 15 उस ने उस से कहा, तू ने जो मेरे पति को ले लिया है सो क्या छोटी बात है ? अब क्या तू मेरे पुत्र के दूदाफल भी लेने चाहती है? राहेल ने कहा, अच्छा, तेरे पुत्र के दूदाफलोंके बदले वह आज रात को तेरे संग सोएगा। 16 सो सांफ को जब याकूब मैदान से आ रहा या, तब लिआ: उस से भेंट करने को निकली, और कहा, तुझे मेरे ही पास आना होगा, क्योंकि मै ने अपके पुत्र के दूदाफल देकर तुझे सचमुच मोल लिया। तब वह उस रात को उसी के संग सोया। 17 तब परमेश्वर ने लिआ: की सुनी, सो वह गर्भवती हुई और याकूब से उसके पांचवां पुत्र उत्पन्न हुआ। 18 तब लिआ: ने कहा, में ने जो अपके पति को अपक्की लौंडी दी, इसलिथे परमेश्वर ने मुझे मेरी मंजूरी दी है : सो उस ने उसका नाम इस्साकार रखा। 19 और लिआ: फिर गर्भवती हुई और याकूब से उसके छठवां पुत्र उत्पन्न हुआ। 20 तब लिआ: ने कहा, परमेश्वर ने मुझे अच्छा दान दिया है; अब की बार मेरा पति मेरे संग बना रहेगा, क्योंकि मेरे उस से छ: पुत्र उत्पन्न चुके हैं : से उस ने उसका नाम जबूलून रखा। 21 तत्पश्चात्‌ उसके एक बेटी भी हुई, और उस ने उसका नाम दीना रखा। 22 और परमेश्वर ने राहेल की भी सुधि ली, और उसकी सुनकर उसकी कोख खोली। 23 सो वह गर्भवती हुई और उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ; सो उस ने कहा, परमेश्वर ने मेरी नामधराई को दूर कर दिया है। 24 सो उस ने यह कहकर उसका नाम यूसुफ रखा, कि परमेश्वर मुझे एक पुत्र और भी देगा। 25 जब राहेल से यूसुफ उत्पन्न हुआ, तब याकूब ने लाबान से कहा, मुझे विदा कर, कि मैं अपके देश और स्यान को जाऊं। 26 मेरी स्त्रियां और मेरे लड़के-बाले, जिनके लिथे मैं ने तेरी सेवा की है, उन्हें मुझे दे, कि मैं चला जाऊं; तू तो जानता है कि मैं ने तेरी कैसी सेवा की है। 27 लाबान ने उस से कहा, यदि तेरी दृष्टि में मैं ने अनुग्रह पाया है, तो रह जा : क्योंकि मैं ने अनुभव से जान लिया है, कि यहोवा ने तेरे कारण से मुझे आशीष दी है। 28 फिर उस ने कहा, तू ठीक बता कि मैं तुझ को क्या दूं, और मैं उसे दूंगा। 29 उस ने उस से कहा तू जानता है कि मैं ने तेरी कैसी सेवा की, और तेरे पशु मेरे पास किस प्रकार से रहे। 30 मेरे अपके से पहिले वे कितने थे, और अब कितने हो गए हैं; और यहोवा ने मेरे आने पर तुझे तो आशीष दी है : पर मैं अपके घर का काम कब करने पाऊंगा? 31 उस ने फिर कहा, मैं तुझे क्या दूं? याकूब ने कहा, तू मुझे कुछ न दे; यदि तू मेरे लिथे एक काम करे, तो मै फिर तेरी भेड़-बकरियोंको चराऊंगा, और उनकी रझा करूंगा। 32 मैं आज तेरी सब भेड़-बकरियोंके बीच होकर निकलूंगा, और जो भेड़ वा बकरी चित्तीवाली वा चित्कबरी हो, और जो भेड़ काली हो, और जो बकरी चित्कबरी वा चित्तीवाली हो, उन्हें मैं अलग कर रखूंगा : और मेरी मजदूरी में वे ही ठहरेंगी। 33 और जब आगे को मेरी मजदूरी की चर्चा तेरे साम्हने चले, तब धर्म की यही साझी होगी; अर्यात्‌ बकरियोंमें से जो कोई न चित्तीवाली न चित्कबरी हो, और भेड़ोंमें से जो कोई काली न हो, सो यदि मेरे पास निकलें, तो चोरी की ठहरेंगी। 34 तब लाबान ने कहा, तेरे कहने के अनुसार हो। 35 सो उस ने उसी दिन सब धारीवाले और चित्कबरे बकरों, और सब चित्तीवाली और चित्कबरी बकरियोंको, अर्यात्‌ जिन में कुछ उजलापन या, उनको और सब काली भेड़ोंको भी अलग करके अपके पुत्रोंके हाथ सौप दिया। 36 और उस ने अपके और याकूब के बीच में तीन दिन के मार्ग का अन्तर ठहराया : सो याकूब लाबान की भेड़-बकरियोंको चराने लगा। 37 और याकूब ने चनार, और बादाम, और अर्मोन वृझोंकी हरी हरी छडिय़ां लेकर, उनके छिलके कहीं कहीं छीलके, उन्हें धारीदार बना दिया, ऐसी कि उन छडिय़ोंकी सफेदी दिखाई देने लगी। 38 और तब छीली हुई छडिय़ोंको भेड़-बकरियोंके साम्हने उनके पानी पीने के कठौतोंमें खड़ा किया; और जब वे पानी पीने के लिथे आई तब गाभिन हो गई। 39 और छडिय़ोंके साम्हने गाभिन होकर, भेड़-बकरियां धारीवाले, चित्तीवाले और चित्कबरे बच्चे जनीं। 40 तब याकूब ने भेड़ोंके बच्चोंको अलग अलग किया, और लाबान की भेड़-बकरियोंके मुंह को चित्तीवाले और सब काले बच्चोंकी ओर कर दिया; और अपके फुण्ड़ोंको उन से अलग रखा, और लाबान की भेड़-बकरियोंसे मिलने न दिया। 41 और जब जब बलवन्त भेड़-बकरियां गाभिन होती यी, तब तब याकूब उन छडिय़ोंको कठौतोंमे उनके साम्हने रख देता या; जिस से वे छडिय़ोंको देखती हुई गाभिन हो जाएं। 42 पर जब निर्बल भेड़-बकरियां गाभिन होती यी, तब वह उन्हें उनके आगे नहीं रखता या। इस से निर्बल निर्बल लाबान की रही, और बलवन्त बलवन्त याकूब की हो गई। 43 सो वह पुरूष अत्यन्त धनाढय हो गया, और उसके बहुत सी भेड़-बकरियां, और लौंडियां और दास और ऊंट और गदहे हो गए।।

उत्पत्ति 31

1 फिर लाबान के पुत्रोंकी थे बातें याकूब के सुनने में आई, कि याकूब ने हमारे पिता का सब कुछ छीन लिया है, और हमारे पिता के धन के कारण उसकी यह प्रतिष्ठा है। 2 और याकूब ने लाबान के मुखड़े पर दृष्टि की और ताड़ लिया, कि वह उसके प्रति पहले के समान नहीं है। 3 तब यहोवा ने याकूब से कहा, अपके पितरोंके देश और अपक्की जन्मभूमि को लौट जा, और मैं तेरे संग रहूंगा। 4 तब याकूब ने राहेल और लिआ: को, मैदान में अपक्की भेड़-बकरियोंके पास, बुलवाकर कहा, 5 तुम्हारे पिता के मुखड़े से मुझे समझ पड़ता है, कि वह तो मुझे पहिले की नाई अब नहीं देखता; पर मेरे पिता का परमेश्वर मेरे संग है। 6 और तुम भी जानती हो, कि मैं ने तुम्हारे पिता की सेवा शक्ति भर की है। 7 और तुम्हारे पिता ने मुझ से छल करके मेरी मजदूरी को दस बार बदल दिया; परन्तु परमेश्वर ने उसको मेरी हानि करने नहीं दिया। 8 जब उस ने कहा, कि चित्तीवाले बच्चे तेरी मजदूरी ठहरेंगे, तब सब भेड़-बकरियां चित्तीवाले ही जनने लगीं, और जब उस ने कहा, कि धारीवाले बच्चे तेरी मजदूरी ठहरेंगे, तब सब भेड़-बकरियां धारीवाले जनने लगीं। 9 इस रीति से परमेश्वर ने तुम्हारे पिता के पशु लेकर मुझ को दे दिए। 10 भेड़-बकरियोंके गाभिन होने के समय मैं ने स्वप्न में क्या देखा, कि जो बकरे बकरियोंपर चढ़ रहे हैं, सो धारीवाले, चित्तीवाले, और धब्बेवाले है। 11 और परमेश्वर के दूत ने स्वप्न में मुझ से कहा, हे याकूब : मैं ने कहा, क्या आज्ञा। 12 उस ने कहा, आंखे उठाकर उन सब बकरोंको, जो बकरियोंपर चढ़ रहे हैं, देख, कि वे धारीवाले, चित्तीवाले, और धब्बेवाले हैं; क्योंकि जो कुछ लाबान तुझ से करता है, सो मैं ने देखा है। 13 मैं उस बेतेल का ईश्वर हूं, जहां तू ने एक खम्भे पर तेल डाल दिया, और मेरी मन्नत मानी यी : अब चल, इस देश से निकलकर अपक्की जन्मभूमि को लौट जा। 14 तब राहेल और लिआ : ने उस से कहा, क्या हमारे पिता के घर में अब भी हमारा कुछ भाग वा अंश बचा है? 15 क्या हम उसकी दृष्टि में पराथे न ठहरीं? देख, उस ने हम को तो बेच डाला, और हमारे रूपे को खा बैठा है। 16 सो परमेश्वर ने हमारे पिता का जितना धन ले लिया है, सो हमारा, और हमारे लड़केबालोंको है : अब जो कुछ परमेश्वर ने तुझ से कहा सो कर। 17 तब याकूब ने अपके लड़केबालोंऔर स्त्रियोंको ऊंटोंपर चढ़ाया; 18 और जितने पशुओं को वह पद्दनराम में इकट्ठा करके धनाढय हो गया या, सब को कनान में अपके पिता इसहाक के पास जाने की मनसा से, साय ले गया। 19 लाबान तो अपक्की भेड़ोंका ऊन कतरने के लिथे चला गया या। और राहेल अपके पिता के गृहदेवताओं को चुरा ले गई। 20 सो याकूब लाबान अरामी के पास से चोरी से चला गया, उसको न बताया कि मैं भागा जाता हूं। 21 वह अपना सब कुछ लेकर भागा : और महानद के पार उतरकर अपना मुंह गिलाद के पहाड़ी देश की ओर किया।। 22 तीसरे दिन लाबान को समाचार मिला, कि याकूब भाग गया है। 23 सो उस ने अपके भाइयोंको साय लेकर उसका सात दिन तक पीछा किया, और गिलाद के पहाड़ी देश में उसको जा पकड़ा। 24 तब परमेश्वर ने रात के स्वप्न में आरामी लाबान के पास आकर कहा, सावधान रह, तू याकूब से न तो भला कहना और न बुरा। 25 और लाबान याकूब के पास पहुंच गया, याकूब तो अपना तम्बू गिलाद नाम पहाड़ी देश में खड़ा किए पड़ा या : और लाबान ने भी अपके भाइयोंके साय अपना तम्बू उसी पहाड़ी देश में खड़ा किया। 26 तब लाबान याकूब से कहने लगा, तू ने यह क्या किया, कि मेरे पास से चोरी से चला आया, और मेरी बेटियोंको ऐसा ले आया, जैसा कोई तलवार के बल से बन्दी बनाए गए? 27 तू क्योंचुपके से भाग आया, और मुझ से बिना कुछ कहे मेरे पास से चोरी से चला आया; नहीं तो मैं तुझे आनन्द के साय मृदंग और वीणा बजवाते, और गीत गवाते विदा करता ? 28 तू ने तो मुझे अपके बेटे बेटियोंको चूमने तक न दिया? तू ने मूर्खता की है। 29 तुम लोगोंकी हानि करने की शक्ति मेरे हाथ में तो है; पर तुम्हारे पिता के परमेश्वर ने मुझ से बीती हुई रात में कहा, सावधान रह, याकूब से न तो भला कहना और न बुरा। 30 भला अब तू अपके पिता के घर का बड़ा अभिलाषी होकर चला आया तो चला आया, पर मेरे देवताओं को तू क्योंचुरा ले आया है? 31 याकूब ने लाबान को उत्तर दिया, मैं यह सोचकर डर गया या : कि कहीं तू अपक्की बेटियोंको मुझ से छीन न ले। 32 जिस किसी के पास तू अपके देवताओं को पाए, सो जीता न बचेगा। मेरे पास तेरा जो कुछ निकले, सो भाई-बन्धुओं के साम्हने पहिचानकर ले ले। क्योंकि याकूब न जानता या कि राहेल गृहदेवताओं को चुरा ले आई है। 33 यह सुनकर लाबान, याकूब और लिआ : और दोनोंदासियोंके तम्बुओं मे गया; और कुछ न मिला। तब लिआ: के तम्बू में से निकलकर राहेल के तम्बू में गया। 34 राहेल तो गृहदेवताओं को ऊंट की काठी में रखके उन पर बैठी यी। सो लाबान ने उसके सारे तम्बू में टटोलने पर भी उन्हें न पाया। 35 राहेल ने अपके पिता से कहा, हे मेरे प्रभु; इस से अप्रसन्न न हो, कि मैं तेरे साम्हने नहीं उठी; क्योंकि मैं स्त्रीधर्म से हूं। सो उसके ढूंढ़ ढांढ़ करने पर भी गृहदेवता उसको न मिले। 36 तब याकूब क्रोधित होकर लाबान से फगड़ने लगा, और कहा, मेरा क्या अपराध है? मेरा क्या पाप है, कि तू ने इतना क्रोधित होकर मेरा पीछा किया है ? 37 तू ने जो मेरी सारी सामग्री को टटोलकर देखा, सो तुझ को सारी सामग्री में से क्या मिला? कुछ मिला हो तो उसको यहां अपके और मेरे भाइयोंके सामहने रख दे, और वे हम दोनोंके बीच न्याय करें। 38 इन बीस वर्षोंसे मै तेरे पास रहा; उन में न तो तेरी भेड़-बकरियोंके गर्भ गिरे, और न तेरे मेढ़ोंका मांस मै ने कभी खाया। 39 जिसे बनैले जन्तुओं ने फाड़ डाला उसको मैं तेरे पास न लाता या, उसकी हानि मैं ही उठाता या; चाहे दिन को चोरी जाता चाहे रात को, तू मुझ ही से उसको ले लेता या। 40 मेरी तो यह दशा यी, कि दिन को तो घाम और रात को पाला मुझे खा गया; और नीन्द मेरी आंखोंसे भाग जाती यी। 41 बीस वर्ष तक मैं तेरे घर में रहो; चौदह वर्ष तो मै ने तेरी दोनो बेटियोंके लिथे, और छ: वर्ष तेरी भेड़-बकरियोंके लिथे सेवा की : और तू ने मेरी मजदूरी को दस बार बदल डाला। 42 मेरे पिता का परमेश्वर अर्यात्‌ इब्राहीम का परमेश्वर, जिसका भय इसहाक भी मानता है, यदि मेरी ओर न होता, तो निश्चय तू अब मुझे छूछे हाथ जाने देता। मेरे दु:ख और मेरे हाथोंके परिश्र्म को देखकर परमेश्वर ने बीती हुई रात में तुझे दपटा। 43 लाबान ले याकूब से कहा, थे बेटियोंतो मेरी ही हैं, और थे पुत्र भी मेरे ही हैं, और थे भेड़-बकरियोंभी मेरी ही हैं, और जो कुछ तुझे देख पड़ता है सो सब मेरा ही है : और अब मैं अपक्की इन बेटियोंवा इनके सन्तान से क्या कर सकता हूं ? 44 अब आ मैं और तू दोनोंआपस में वाचा बान्धें, और वह मेरे और तेरे बीच साझी ठहरी रहे। 45 तब याकूब ने एक पत्यर लेकर उसका खम्भा खड़ा किया। 46 तब याकूब ने अपके भाई-बन्धुओं से कहा, पत्यर इकट्ठा करो; यह सुनकर उन्होंने पत्यर इकट्ठा करके एक ढेर लगाया और वहीं ढेर के पास उन्होंने भोजन किया। 47 उस ढेर का नाम लाबान ने तो यज्र सहादुया, पर याकूब ने जिलियाद रखा। 48 लाबान ने कहा, कि यह ढेर आज से मेरे और तेरे बीच साझी रहेगा। इस कारण उसका नाम जिलियाद रखा गया, 49 और मिजपा भी; क्योंकि उस ने कहा, कि जब हम उस दूसरे से दूर रहें तब यहोवा मेरी और तेरी देखभाल करता रहे। 50 यदि तू मेरी बेटियोंको दु:ख दे, वा उनके सिवाय और स्त्रियां ब्याह ले, तो हमारे साय कोई मनुष्य तो न रहेगा; पर देख मेरे तेरे बीच में परमेश्वर साझी रहेगा। 51 फिर लाबान ने याकूब से कहा, इस ढेर को देख और इस खम्भे को भी देख, जिनको मैं ने अपके और तेरे बीच में खड़ा किया है। 52 यह ढेर और यह खम्भा दोनोंइस बात के साझी रहें, कि हानि करने की मनसा से न तो मैं इस ढेर को लांघकर तेरे पास जाऊंगा, न तू इस ढेर और इस खम्भे को लांघकर मेरे पास आएगा। 53 इब्राहीम और नाहोर और उनके पिता; तीनोंका जो परमेश्वर है, सो हम दोनो के बीच न्याय करे। तब याकूब ने उसकी शपय खाई जिसका भय उसका पिता इसहाक मानता या। 54 और याकूब ने उस पहाड़ पर मेलबलि चढ़ाया, और अपके भाई-बन्धुओं को भोजन करने के लिथे बुलाया, सो उन्होंने भोजन करके पहाड़ पर रात बिताई। 55 बिहान को लाबान तड़के उठा, और अपके बेटे बेटियोंको चूमकर और आशीर्वाद देकर चल दिया, और अपके स्यान को लौट गया।

उत्पत्ति 32

1 और याकूब ने भी अपना मार्ग लिया और परमेश्वर के दूत उसे आ मिले। 2 उनको देखते ही याकूब ने कहा, यह तो परमेश्वर का दल है सो उस ने उस स्यान का नाम महनैम रखा।। 3 तब याकूब ने सेईर देश में, अर्यात्‌ एदोम देश में, अपके भाई एसाव के पास अपके आगे दूत भेज दिए। 4 और उस ने उन्हें यह आज्ञा दी, कि मेरे प्रभु एसाव से योंकहना; कि तेरा दास याकूब तुझ से योंकहता है, कि मैं लाबान के यहां परदेशी होकर अब तक रहा; 5 और मेरे पास गाय-बैल, गदहे, भेड़-बकरियां, और दास-दासियां है: सो मैं ने अपके प्रभु के पास इसलिथे संदेशा भेजा है, कि तेरी अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर हो। 6 वे दूत याकूब के पास लौटके कहने लगे, हम तेरे भाई एसाव के पास गए थे, और वह भी तुझ से भेंट करने को चार सौ पुरूष संग लिथे हुए चला आता है। 7 तब याकूब निपट डर गया, और संकट में पड़ा : और यह सोचकर, अपके संगवालोंके, और भेड़-बकरियों, और गाय-बैलों, और ऊंटो के भी अलग अलग दो दल कर लिथे, 8 कि यदि एसाव आकर पहिले दल को मारने लगे, तो दूसरा दल भागकर बच जाएगा। 9 फिर याकूब ने कहा, हे यहोवा, हे मेरे दादा इब्राहीम के परमेश्वर, तू ने तो मुझ से कहा, कि अपके देश और जन्मभूमि में लौट जा, और मैं तेरी भलाई करूंगा : 10 तू ने जो जो काम अपक्की करूणा और सच्चाई से अपके दास के साय किए हैं, कि मैं जो अपक्की छड़ी ही लेकर इस यरदन नदी के पार उतर आया, सो अब मेरे दो दल हो गए हैं, तेरे ऐसे ऐसे कामोंमें से मैं एक के भी योग्य तो नहीं हूं। 11 मेरी बिनती सुनकर मुझे मेरे भाई एसाव के हाथ से बचा : मैं तो उस से डरता हूं, कहीं ऐसा ने हो कि वह आकर मुझे और मां समेत लड़कोंको भी मार डाले। 12 तू ने तो कहा है, कि मैं निश्चय तेरी भलाई करूंगा, और तेरे वंश को समुद्र की बालू के किनकोंके समान बहुत करूंगा, जो बहुतायत के मारे गिने नहीं जो सकते। 13 और उस ने उस दिन की रात वहीं बिताई; और जो कुछ उसके पास या उस में से अपके भाई एसाव की भेंट के लिथे छांट छांटकर निकाला; 14 अर्यात्‌ दो सौ बकरियां, और बीस बकरे, और दो सौ भेड़ें, और बीस मेढ़े, 15 और बच्चोंसमेत दूध देनेवाली तीस ऊंटनियां, और चालीस गाथें, और दस बैल, और बीस गदहियां और उनके दस बच्चे। 16 इनको उस ने फुण्ड फुण्ड करके, अपके दासोंको सौंपकर उन से कहा, मेरे आगे बढ़ जाओ; और फुण्डोंके बीच बीच में अन्तर रखो। 17 फिर उस ने अगले फुण्ड के रखवाले को यह आज्ञा दी, कि जब मेरा भाई एसाव तुझे मिले, और पूछने लगे, कि तू किस का दास है, और कहां जाता है , और थे जो तेरे आगे आगे हैं, सो किस के हैं? 18 तब कहना, कि यह तेरे दास याकूब के हैं। हे मेरे प्रभु एसाव, थे भेंट के लिथे तेरे पास भेजे गए हैं, और वह आप भी हमारे पीछे पीछे आ रहा है। 19 और उस ने दूसरे और तीसरे रखवालोंको भी, वरन उस सभोंको जो फुण्डोंके पीछे पीछे थे ऐसी ही आज्ञा दी, कि जब एसाव तुम को मिले तब इसी प्रकार उस से कहना। 20 और यह भी कहना, कि तेरा दास याकूब हमारे पीछे पीछे आ रहा है। क्योंकि उस ने यह सोचा, कि यह भेंट जो मेरे आगे आगे जाती है, इसके द्वारा मैं उसके क्रोध को शान्त करके तब उसका दर्शन करूंगा; हो सकता है वह मुझ से प्रसन्न हो जाए। 21 सो वह भेंट याकूब से पहिले पार उतर गई, और वह आप उस रात को छावनी में रहा।। 22 उसी रात को वह उठा और अपक्की दोनोंस्त्रियों, और दोनोंलौंडियों, और ग्यारहोंलड़कोंको संग लेकर घाट से यब्बोक नदी के पार उतर गया। 23 और उस ने उन्हें उस नदी के पार उतार दिया वरन अपना सब कुछ पार उतार दिया। 24 और याकूब आप अकेला रह गया; तब कोई पुरूष आकर पह फटने तक उस से मल्लयुद्ध करता रहा। 25 जब उस ने देखा, कि मैं याकूब पर प्रबल नहीं होता, तब उसकी जांघ की नस को छूआ; सो याकूब की जांघ की नस उस से मल्लयुद्ध करते ही करते चढ़ गई। 26 तब उस ने कहा, मुझे जाने दे, क्योंकि भोर हुआ चाहता है; याकूब ने कहा जब तक तू मुझे आशीर्वाद न दे, तब तक मैं तुझे जाने न दूंगा। 27 और उस ने याकूब से पूछा, तेरा नाम क्या है? उस ने कहा याकूब। 28 उस ने कहा तेरा नाम अब याकूब नहीं, परन्तु इस्राएल होगा, क्योंकि तू परमेश्वर से और मनुष्योंसे भी युद्ध करके प्रबल हुआ है। 29 याकूब ने कहा, मैं बिनती करता हूं, मुझे अपना नाम बता। उस ने कहा, तू मेरा नाम क्योंपूछता है? तब उस ने उसको वहीं आशीर्वाद दिया। 30 तब याकूब ने यह कहकर उस स्यान का नाम पक्कीएल रखा: कि परमेश्वर को आम्हने साम्हने देखने पर भी मेरा प्राण बच गया है। 31 पनूएल के पास से चलते चलते सूर्य उदय हो गया, और वह जांघ से लंगड़ाता या। 32 इस्राएली जो पशुओं की जांघ की जोड़वाले जंघानस को आज के दिन तक नहीं खाते, इसका कारण यही है, कि उस पुरूष ने याकूब की जांघ की जोड़ में जंघानस को छूआ या।।

उत्पत्ति 33

1 और याकूब ने आंखें उठाकर यह देखा, कि एसाव चार सौ पुरूष संग लिथे हुए चला जाता है। तब उस ने लड़केबालोंको अलग अलग बांटकर लिआ, और राहेल, और दोनोंलौंडियोंको सौप दिया। 2 और उस ने सब के आगे लड़कोंसमेत लौंडियोंको उसके पीछे लड़कोंसमेत लिआ: को, और सब के पीछे राहेल और यूसुफ को रखा, 3 और आप उन सब के आगे बढ़ा, और सात बार भूमि पर गिरके दण्डवत्‌ की, और अपके भाई के पास पहुंचा। 4 तब एसाव उस से भेंट करने को दौड़ा, और उसको ह्रृदय से लगाकर, गले से लिपटकर चूमा : फिर वे दोनोंरो पके। 5 तब उस ने आंखे उठाकर स्त्रियोंऔर लड़के बालोंको देखा; और पूछा, थे जो तेरे साय हैं सो कौन हैं? उस ने कहा, थे तेरे दास के लड़के हैं, जिन्हें परमेश्वर ने अनुग्रह करके मुझ को दिया है। 6 तब लड़कोंसमेत लौंडियोंने निकट आकर दण्डवत्‌ की। 7 फिर लड़कोंसमेत लिआ: निकट आई, और उन्होंने भी दण्डवत्‌ की: पीछे यूसुफ और राहेल ने भी निकट आकर दण्डवत्‌ की। 8 तब उस ने पूछा, तेरा यह बड़ा दल जो मुझ को मिला, उसका क्या प्रयोजन है? उस ने कहा, यह कि मेरे प्रभु की अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर हो। 9 एसाव ने कहा, हे मेरे भाई, मेरे पास तो बहुत है; जो कुछ तेरा है सो तेरा ही रहे। 10 याकूब ने कहा, नहीं नहीं, यदि तेरा अनुग्रह मुझ पर हो, तो मेरी भेंट ग्रहण कर : क्योंकि मैं ने तेरा दर्शन पाकर, मानो परमेश्वर का दर्शन पाया है, और तू मुझ से प्रसन्न हुआ है। 11 सो यह भेंट, जो तुझे भेजी गई है, ग्रहण कर : क्योंकि परमेश्वर ने मुझ पर अनुग्रह किया है, और मेरे पास बहुत है। 12 फिर एसाव ने कहा, आ, हम बढ़ चलें: और मै तेरे आगे आगे चलूंगा। 13 याकूब ने कहा, हे मेरे प्रभु, तू जानता ही है कि मेरे साय सुकुमार लड़के, और दूध देनेहारी भेड़-बकरियां और गाथें है; यदि ऐसे पशु एक दिन भी अधिक हांके जाएं, तो सब के सब मर जाएंगे। 14 सो मेरा प्रभु अपके दास के आगे बढ़ जाए, और मैं इन पशुओं की गति के अनुसार, जो मेरे आगे है, और लड़केबालोंकी गति के अनुसार धीरे धीरे चलकर सेईर में अपके प्रभु के पास पहुंचूंगा। 15 एसाव ने कहा, तो अपके संगवालोंमें से मैं कई एक तेरे साय छोड़ जाऊं। उस ने कहा, यह क्यों? इतना ही बहुत है, कि मेरे प्रभु की अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर बनी रहे। 16 तब एसाव ने उसी दिन सेईर जाने को अपना मार्ग लिया। 17 और याकूब वहां से कूच करके सुक्कोत को गया, और वहां अपके लिथे एक घर, और पशुओं के लिथे फोंपके बनाए: इसी कारण उस स्यान का नाम सुक्कोत पड़ा।। 18 और याकूब जो पद्दनराम से आया या, सो कनान देश के शकेम नगर के पास कुशल झेम से पहुंचकर नगर के साम्हने डेरे खड़े किए। 19 और भूमि के जिस खण्ड पर उस ने अपना तम्बू खड़ा किया, उसको उस ने शकेम के पिता हमोर के पुत्रोंके हाथ से एक सौ कसीतोंमें मोल लिया। 20 और वहां उस ने एक वेदी बनाकर उसका नाम एलेलोहे इस्राएल रखा।।

उत्पत्ति 34

1 और लिआ: की बेटी दीना, जो याकूब से उत्पन्न हुई यी, उस देश की लड़कियोंसे भेंट करने को निकली। 2 तब उस देश के प्रधान हित्ती हमोर के पुत्र शकेम ने उसे देखा, और उसे ले जाकर उसके साय कुकर्म करके उसको भ्रष्ट कर डाला। 3 तब उसका मन याकूब की बेटी दीना से लग गया, और उस ने उस कन्या से प्रेम की बातें की, और उस से प्रेम करने लगा। 4 और शकेम ने अपके पिता हमोर से कहा, मुझे इस लड़की को मेरी पत्नी होने के लिथे दिला दे। 5 और याकूब ने सुना, कि शकेम ने मेरी बेटी दीना को अशुद्ध कर डाला है , पर उसके पुत्र उस समय पशुओं के संग मैदान में थे, सो वह उनके आने तक चुप रहा। 6 और शकेम का पिता हमोर निकलकर याकूब से बातचीत करने के लिथे उसके पास गया। 7 और याकूब के पुत्र सुनते ही मैदान से बहुत उदास और क्रोधित होकर आए: क्योंकि शकेम ने याकूब की बेटी के साय कुकर्म करके इस्राएल के घराने से मूर्खता का ऐसा काम किया या, जिसका करना अनुचित या। 8 हमोर ने उन सब से कहा, मेरे पुत्र शकेम का मन तुम्हारी बेटी पर बहुत लगा है, सो उसे उसकी पत्नी होने के लिथे उसको दे दो। 9 और हमारे साय ब्याह किया करो; अपक्की बेटियां हम को दिया करो, और हमारी बेटियोंको आप लिया करो। 10 और हमारे संग बसे रहो: और यह देश तुम्हारे सामने पड़ा है; इस में रहकर लेनदेन करो, और इसकी भूमि को अपके लिथे ले लो। 11 और शकेम ने भी दीना के पिता और भाइयोंसे कहा, यदि मुझ पर तुम लोगोंकी अनुग्रह की दृष्टि हो, तो जो कुछ तुम मुझ से कहा, सो मैं दूंगा। 12 तुम मुझ से कितना ही मूल्य वा बदला क्योंन मांगो, तौभी मैं तुम्हारे कहे के अनुसार दूंगा : परन्तु उस कन्या को पत्नी होने के लिथे मुझे दो। 13 तब यह सोचकर, कि शकेम ने हमारी बहिन दीना को अशुद्ध किया है, याकूब के पुत्रोंने शकेम और उसके पिता हमोर को छल के साय यह उत्तर दिया, 14 कि हम ऐसा काम नहीं कर सकते, कि किसी खतनारहित पुरूष को अपक्की बहिन दें; क्योंकि इस से हमारी नामधराई होगी : 15 इस बात पर तो हम तुम्हारी मान लेंगे, कि हमारी नाई तुम में से हर एक पुरूष का खतना किया जाए। 16 तब हम अपक्की बेटियां तुम्हें ब्याह देंगे, और तुम्हारी बेटियां ब्याह लेंगे, और तुम्हारे संग बसे भी रहेंगे, और हम दोनोंएक ही समुदाय के मनुष्य हो जाएंगे। 17 पर यदि तुम हमारी बात न मानकर अपना खतना न कराओगे, तो हम अपक्की लड़की को लेके यहां से चले जाएंगे। 18 उसकी इस बात पर हमोर और उसका पुत्र शकेम प्रसन्न हुए। 19 और वह जवान, जो याकूब की बेटी को बहुत चाहता या, इस काम को करने में उस ने विलम्ब न किया। वह तो अपके पिता के सारे घराने में अधिक प्रतिष्ठित या। 20 सो हमोर और उसका पुत्र शकेम अपके नगर के फाटक के निकट जाकर नगरवासिक्कों योंसमझाने लगे; 21 कि वे मनुष्य तो हमारे संग मेल से रहना चाहते हैं; सो उन्हें इस देश में रहके लेनदेन करने दो; देखो, यह देश उनके लिथे भी बहुत है; फिर हम लोग उनकी बेटियोंको ब्याह लें, और अपक्की बेटियोंको उन्हें दिया करें। 22 वे लोग केवल इस बात पर हमारे संग रहने और एक ही समुदाय के मनुष्य हो जाने को प्रसन्न हैं, कि उनकी नाई हमारे सब पुरूषोंका भी खतना किया जाए। 23 क्या उनकी भेड़-बकरियां, और गाय-बैल वरन उनके सारे पशु और धन सम्पत्ति हमारी न हो जाएगी? इतना की करें कि हम लोग उनकी बात मान लें, तो वे हमारे संग रहेंगे। 24 सो जितने उस नगर के फाटक से निकलते थे, उन सभोंने हमोर की और उसके पुत्र शकेम की बात मानी; और हर एक पुरूष का खतना किया गया, जितने उस नगर के फाटक से निकलते थे। 25 तीसरे दिन, जब वे लोग पीड़ित पके थे, तब ऐसा हुआ कि शिमोन और लेवी नाम याकूब के दो पुत्रोंने, जो दीना के भाई थे, अपक्की अपक्की तलवार ले उस नगर में निधड़क घुसकर सब पुरूषोंको घात किया। 26 और हमोर और उसके पुत्र शकेम को उन्होंने तलवार से मार डाला, और दीना को शकेम के घर से निकाल ले गए। 27 और याकूब के पुत्रोंने घात कर डालने पर भी चढ़कर नगर को इसलिथे लूट लिया, कि उस में उनकी बहिन अशुद्ध की गई यी। 28 उन्होंने भेड़-बकरी, और गाय-बैल, और गदहे, और नगर और मैदान में जितना धन या ले लिया। 29 उस सब को, और उनके बाल-बच्चों, और स्त्रियोंको भी हर ले गए, वरन घर घर में जो कुछ या, उसको भी उन्होंने लूट लिया। 30 तब याकूब ने शिमोन और लेवी से कहा, तुम ने जो उस देश के निवासी कनानियोंऔर परिज्जियोंके मन में मेरी ओर घृणा उत्पन्न कराई है, इस से तुम ने मुझे संकट में डाला है, क्योंकि मेरे साय तो योड़े की लोग हैं, सो अब वे इकट्ठे होकर मुझ पर चढ़ेंगे, और मुझे मार डालेंगे, सो मैं अपके घराने समेत सत्यानाश हो जाऊंगा। 31 उन्होंने कहा, क्या वह हमारी बहिन के साय वेश्या की नाई बर्ताव करे?

उत्पत्ति 35

1 तब परमेश्वर ने याकूब से कहा, यहां से कूच करके बेतेल को जा, और वहीं रह: और वहां ईश्वर के लिथे वेदी बना, जिस ने तुझे उस समय दर्शन दिया, जब तू अपके भाई एसाव के डर से भागा जाता या। 2 तब याकूब ने अपके घराने से, और उन सब से भी जो उसके संग थे, कहा, तुम्हारे बीच में जो पराए देवता हैं, उन्हें निकाल फेंको; और अपके अपके को शुद्ध करो, और अपके वस्त्र बदल डालो; 3 और आओ, हम यहां से कूच करके बेतेल को जाएं; वहां मैं ईश्वर के लिथे एक वेदी बनाऊंगा, जिस ने संकट के दिन मेरी सुन ली, और जिस मार्ग से मैं चलता या, उस में मेरे संग रहा। 4 सो जितने पराए देवता उनके पास थे, और जितने कुण्डल उनके कानोंमें थे, उन सभोंको उन्होंने याकूब को दिया; और उस ने उनको उस सिन्दूर वृझ के नीचे, जो शकेम के पास है, गाड़ दिया। 5 तब उन्होंने कूच किया: और उनके चारोंओर के नगर निवासियोंके मन में परमेश्वर की ओर से ऐसा भय समा गया, कि उन्होंने याकूब के पुत्रोंका पीछा न किया। 6 सो याकूब उन सब समेत, जो उसके संग थे, कनान देश के लूज नगर को आया। वह नगर बेतेल भी कहलाता है। 7 वहां उस ने एक वेदी बनाई, और उस स्यान का नाम एलबेतेल रखा; क्योंकि जब वह अपके भाई के डर से भागा जाता या तब परमेश्वर उस पर वहीं प्रगट हुआ या। 8 और रिबका की दूध पिलानेहारी धाय दबोरा मर गई, और बेतेल के नीचे सिन्दूर वृझ के तले उसको मिट्टी दी गई, और उस सिन्दूर वृझ का नाम अल्लोनबक्कूत रखा गया।। 9 फिर याकूब के पद्दनराम से आने के पश्चात्‌ परमेश्वर ने दूसरी बार उसको दर्शन देकर आशीष दी। 10 और परमेश्वर ने उस से कहा, अब तक तो तेरा नाम याकूब रहा है; पर आगे को तेरा नाम याकूब न रहेगा, तू इस्राएल कहलाएगा : 11 फिर परमेश्वर ने उस से कहा, मैं सर्वशक्तिमान ईश्वर हूं: तू फूले-फले और बढ़े; और तुझ से एक जाति वरन जातियोंकी एक मण्डली भी उत्पन्न होगी, और तेरे वंश में राजा उत्पन्न होंगे। 12 और जो देश मैं ने इब्राहीम और इसहाक को दिया है, वही देश तुझे देता हूं, और तेरे पीछे तेरे वंश को भी दूंगा। 13 तब परमेश्वर उस स्यान में, जहां उस ने याकूब से बातें की, उनके पास से ऊपर चढ़ गया। 14 और जिस स्यान में परमेश्वर ने याकूब से बातें की, वहां याकूब ने पत्यर का एक खम्बा खड़ा किया, और उस पर अर्घ देकर तेल डाल दिया। 15 और जहां परमेश्वर ने याकूब से बातें की, उस स्यान का नाम उस ने बेतेल रखा। 16 फिर उन्होंने बेतेल से कूच किया; और एप्राता योड़ी ही दूर रह गया या, कि राहेल को बच्चा जनने की बड़ी पीड़ा आने लगी। 17 जब उसको बड़ी बड़ी पीड़ा उठती यी तब धाय ने उस से कहा, मत डर; अब की भी तेरे बेटा ही होगा। 18 तब ऐसा हुआ, कि वह मर गई, और प्राण निकलते निकलते उस ने उस बेटे को नाम बेनोनी रखा: पर उसके पिता ने उसका नाम बिन्यामीन रखा। 19 योंराहेल मर गई, और एप्राता, अर्यात्‌ बेतलेहेम के मार्ग में, उसको मिट्टी दी गई। 20 और याकूब ने उसकी कब्र पर एक खम्भा खड़ा किया: राहेल की कब्र का वही खम्भा आज तक बना है। 21 फिर इस्राएल ने कूच किया, और एदेर नाम गुम्मट के आगे बढ़कर अपना तम्बू खड़ा किया। 22 जब इस्राएल उस देश में बसा या, तब एक दिन ऐसा हुआ, कि रूबेन ने जाकर अपके पिता की रखेली बिल्हा के साय कुकर्म किया : और यह बात इस्राएल को मालूम हो गई।। 23 याकूब के बारह पुत्र हुए। उन में से लिआ: के पुत्र थे थे; अर्यात्‌ याकूब का जेठा, रूबेन, फिर शिमोन, लेवी, यहूदा, इस्साकार, और जबूलून। 24 और राहेल के पुत्र थे थे; अर्यात्‌ यूसुफ, और बिन्यामीन। 25 और राहेल की लौन्डी बिल्हा के पुत्र थे थे; अर्यात्‌ दान, और नप्ताली। 26 और लिआ: की लौन्डी जिल्पा के पुत्र थे थे : अर्यात्‌ गाद, और आशेर; याकूब के थे ही पुत्र हुए, जो उस से पद्दनराम में उत्पन्न हुए।। 27 और याकूब मम्रे में, जो करियतअर्बा, अर्यात्‌ हब्रोन है, जहां इब्राहीम और इसहाक परदेशी होकर रहे थे, अपके पिता इसहाक के पास आया। 28 इसहाक की अवस्या एक सौ अस्सी बरस की हुई। 29 और इसहाक का प्राण छूट गया, और वह मर गया, और वह बूढ़ा और पूरी आयु का होकर अपके लोगोंमें जा मिला: और उसके पुत्र एसाव और याकूब ने उसको मिट्टी दी।।

उत्पत्ति 36

1 एसाव जो एदोम भी कहलाता है, उसकी यह वंशावली है। 2 एसाव ने तो कनानी लड़कियां ब्याह लीं; अर्यात्‌ हित्ती एलोन की बेटी आदा को, और अहोलीबामा को जो अना की बेटी, और हिव्वी सिबोन की नतिनी यी। 3 फिर उस ने इश्माएल की बेटी बासमत को भी, जो नबायोत की बहिन यी, ब्याह लिया। 4 आदा ने तो एसाव के जन्माए एलीपज को, और बासमत ने रूएल को उत्पन्न किया। 5 और ओहोलीबामा ने यूश, और यालाम, और कोरह को उत्पन्न किया, एसाव के थे ही पुत्र कनान देश में उत्पन्न हुए। 6 और एसाव अपक्की पत्नियों, और बेटे-बेटियों, और घर के सब प्राणियों, और अपक्की भेड़-बकरी, और गाय-बैल आदि सब पशुओं, निदान अपक्की सारी सम्पत्ति को, जो उस ने कनान देश में संचय की यी, लेकर अपके भाई याकूब के पास से दूसरे देश को चला गया। 7 क्योंकि उनकी सम्पत्ति इतनी हो गई यी, कि वे इकट्ठे न रह सके; और पशुओं की बहुतायत के मारे उस देश में, जहां वे परदेशी होकर रहते थे, उनकी समाई न रही। 8 एसाव जो एदोम भी कहलाता है : सो सेईर नाम पहाड़ी देश में रहने लगा। 9 सेईर नाम पहाड़ी देश में रहनेहारे एदोमियोंके मूल पुरूष एसाव की वंशावली यह है : 10 एसाव के पुत्रोंके नाम थे हैं; अर्यात्‌ एसाव की पत्नी आदा का पुत्र एलीपज, और उसी एसाव की पत्नी बासमत का पुत्र रूएल। 11 और एलीपज के थे पुत्र हुए; अर्यात्‌ तेमान, ओमार, सपो, गाताम, और कनज। 12 और एसाव के पुत्र एलीपज के तिम्ना नाम एक सुरैतिन यी, जिस ने एलीपज के जन्माए अमालेक को जन्म दिया : एसाव की पत्नी आदा के वंश में थे ही हुए। 13 और रूएल के थे पुत्र हुए; अर्यात्‌ नहत, जेरह, शम्मा, और मिज्जा : एसाव की पत्नी बासमत के वंश में थे ही हुए। 14 और ओहोलीबामा जो एसाव की पत्नी, और सिबोन की नतिनी और अना की बेटी यी, उसके थे पुत्र हुए : अर्यात्‌ उस ने एसाव के जन्माए यूश, यालाम और कोरह को जन्म दिया। 15 एसाववंशियोंके अधिपति थे हुए : अर्यात्‌ एसाव के जेठे एलीपज के वंश में से तो तेमान अधिपति, ओमार अधिपति, सपो अधिपति, कनज अधिपति, 16 कोरह अधिपति, गाताम अधिपति, अमालेख अधिपति : एलीपज वंशियोंमे से, एदोम देश में थे ही अधिपति हुए : और थे ही आदा के वंश में हुए। 17 और एसाव के पुत्र रूएल के वंश में थे हुए; अर्यात्‌ नहत अधिपति, जेरह अधिपति, शम्मा अधिपति, मिज्जा अधिपति: रूएलवंशियोंमें से, एदोम देश में थे ही अधिपति हुए; और थे ही एसाव की पत्नी बासमत के वंश में हुए। 18 और एसाव की पत्नी ओहोलीबामा के वंश में थे हुए; अर्यात्‌ यूश अधिपति, यालाम अधिपति, कोरह अधिपति, अना की बेटी ओहोलीबामा जो एसाव की पत्नी यी उसके वंश में थे ही हुए। 19 एसाव जो एदोम भी कहलाता है, उसके वंश थे ही हैं, और उनके अधिपति भी थे ही हुए।। 20 सेईर जो होरी नाम जाति का या उसके थे पुत्र उस देश में पहिले से रहते थे; अर्यात्‌ लोतान, शोबाल, शिबोन, अना, 21 दीशोन, एसेर, और दीशान; एदोम देश में सेईर के थे ही होरी जातिवाले अधिपति हुए। 22 और लोतान के पुत्र, होरी, और हेमाम हुए; और लोतान की बहिन तिम्ना यी। 23 और शोबाल के थे पुत्र हुए; अर्यात्‌ आल्वान, मानहत, एबाल, शपो, और ओनाम। 24 और सिदोन के थे पुत्र हुए; अर्यात्‌ अय्या, और अना; यह वही अना है जिस को जंगल में अपके पिता सिबोन के गदहोंको चराते चराते गरम पानी के फरने मिले। 25 और अना के दीशोन नाम पुत्र हुआ, और उसी अना के ओहोलीबामा नाम बेटी हुई। 26 और दीशोन के थे पुत्र हुए; अर्यात्‌ हेमदान, एश्बान, यित्रान, और करान। 27 एसेर के थे पुत्र हुए; अर्यात्‌ बिल्हान, जावान, और अकान। 28 दीशान के थे पुत्र हुए; अर्यात्‌ ऊस, और अकान। 29 होरियोंके अधिपति थे हुए; अर्यात्‌ लोतान अधिपति, शोबाल अधिपति, शिबोन अधिपति, अना अधिपति, 30 दीशोन अधिपति, एसेर अधिपति, दीशान अधिपति, सेईर देश में होरी जातिवाले थे ही अधिपति हुए। 31 फिर जब इस्राएलियोंपर किसी राजा ने राज्य न किया या, तब भी एदोम के देश में थे राजा हुए; 32 अर्यात्‌ बोर के पुत्र बेला ने एदोम में राज्य किया, और उसकी राजधानी का नाम दिन्हाबा है। 33 बेला के मरने पर, बोस्रानिवासी जेरह का पुत्र योबाब उसके स्यान पर राजा हुआ। 34 और योबाब के मरने पर, तेमानियोंके देश का निवासी हूशाम उसके स्यान पर राजा हुआ। 35 और हूशाम के मरने पर, बदद का पुत्र हदद उसके स्यान पर राजा हुआ : यह वही है जिस ने मिद्यानियोंको मोआब के देश में मार लिया, और उसकी राजधानी का नाम अबीत है। 36 और हदद के मरने पर, मस्रेकावासी सम्ला उसके स्यान पर राजा हुआ। 37 फिर सम्ला के मरने पर, शाऊल जो महानद के तटवाले रहोबोत नगर का या, सो उसके स्यान पर राजा हुआ। 38 और शाऊल के मरने पर, अकबोर का पुत्र बाल्हानान उसके स्यान पर राजा हुआ। 39 और अकबोर के पुत्र बाल्हानान के मरने पर, हदर उसके स्यान पर राजा हुआ : और उसकी राजधानी का नाम पाऊ है; और उसकी पत्नी का नाम महेतबेल है, जो मेजाहब की नतिनी और मत्रेद की बेटी यी। 40 फिर एसाववंशियोंके अधिपतियोंके कुलों, और स्यानोंके अनुसार उनके नाम थे हैं; अर्यात्‌ तिम्ना अधिपति, अल्बा अधिपति, यतेत अधिपति, 41 ओहोलीबामा अधिपति, एला अधिपति, पीनोन अधिपति, 42 कनज अधिपति, तेमान अधिपति, मिसबार अधिपति, 43 मग्दीएल अधिपति, ईराम अधिपति: एदोमवंशियोंने जो देश अपना कर लिया या, उसके निवासस्यानोंमें उनके थे ही अधिपति हुए। और एदोमी जाति का मूलपुरूष एसाव है।।

उत्पत्ति 37

1 याकूब तो कनान देश में रहता या, जहां उसका पिता परदेशी होकर रहा या। 2 और याकूब के वंश का वृत्तान्त यह है : कि यूसुफ सतरह वर्ष का होकर भाइयोंके संग भेड़-बकरियोंको चराता या; और वह लड़का अपके पिता की पत्नी बिल्हा, और जिल्पा के पुत्रोंके संग रहा करता या : और उनकी बुराईयोंका समाचार अपके पिता के पास पहुंचाया करता या : 3 और इस्राएल अपके सब पुत्रोंसे बढ़के यूसुफ से प्रीति रखता या, क्योंकि वह उसके बुढ़ापे का पुत्र या : और उस ने उसके लिथे रंग बिरंगा अंगरखा बनवाया। 4 सो जब उसके भाईयोंने देखा, कि हमारा पिता हम सब भाइयोंसे अधिक उसी से प्रीति रखता है, तब वे उस से बैर करने लगे और उसके साय ठीक तौर से बात भी नहीं करते थे। 5 और यूसुफ ने एक स्वप्न देखा, और अपके भाइयोंसे उसका वर्णन किया : तब वे उस से और भी द्वेष करने लगे। 6 और उस ने उन से कहा, जो स्वप्न मैं ने देखा है, सो सुनो : 7 हम लोग खेत में पूले बान्ध रहे हैं, और क्या देखता हूं कि मेरा पूला उठकर सीधा खड़ा हो गया; तब तुम्हारे पूलोंने मेरे पूले को चारोंतरफ से घेर लिया और उसे दण्डवत्‌ किया। 8 तब उसके भाइयोंने उस से कहा, क्या सचमुच तू हमारे ऊपर राज्य करेगा ? वा सचमुच तू हम पर प्रभुता करेगा ? सो वे उसके स्वप्नोंऔर उसकी बातोंके कारण उस से और भी अधिक बैर करने लगे। 9 फिर उस ने एक और स्वप्न देखा, और अपके भाइयोंसे उसका भी योंवर्णन किया, कि सुनो, मैं ने एक और स्वप्न देखा है, कि सूर्य और चन्द्रमा, और ग्यारह तारे मुझे दण्डवत्‌ कर रहे हैं। 10 यह स्वप्न उस ने अपके पिता, और भाइयोंसे वर्णन किया : तब उसके पिता ने उसको दपटके कहा, यह कैसा स्वप्न है जो तू ने देखा है? क्या सचमुच मैं और तेरी माता और तेरे भाई सब जाकर तेरे आगे भूमि पर गिरके दण्डवत्‌ करेंगे? 11 उसके भाई तो उससे डाह करते थे; पर उसके पिता ने उसके उस वचन को स्मरण रखा। 12 और उसके भाई अपके पिता की भेड़-बकरियोंको चराने के लिथे शकेम को गए। 13 तब इस्राएल ने यूसुफ से कहा, तेरे भाई तो शकेम ही में भेड़-बकरी चरा रहें होंगे, सो जा, मैं तुझे उनके पास भेजता हूं। उस ने उस से कहा जो आज्ञा मैं हाजिर हूं। 14 उस ने उस से कहा, जा, अपके भाइयोंऔर भेड़-बकरियोंका हाल देख आ कि वे कुशल से तो हैं, फिर मेरे पास समाचार ले आ। सो उस ने उसको हेब्रोन की तराई में विदा कर दिया, और वह शकेम में आया। 15 और किसी मनुष्य ने उसको मैदान में इधर उधर भटकते हुए पाकर उस से पूछा, तू क्या ढूंढता है? 16 उस ने कहा, मैं तो अपके भाइयोंको ढूंढता हूं : कृपा कर मुझे बता, कि वे भेड़-बकरियोंको कहां चरा रहे हैं? 17 उस मनुष्य ने कहा, वे तो यहां से चले गए हैं : और मैं ने उनको यह कहते सुना, कि आओ, हम दोतान को चलें। सो यूसुफ अपके भाइयोंके पास चला, और उन्हें दोतान में पाया। 18 और ज्योंही उन्होंने उसे दूर से आते देखा, तो उसके निकट आने के पहिले ही उसे मार डालने की युक्ति की। 19 और वे आपस में कहने लगे, देखो, वह स्वप्न देखनेहारा आ रहा है। 20 सो आओ, हम उसको घात करके किसी गड़हे में डाल दें, और यह कह देंगे, कि कोई दुष्ट पशु उसको खा गया। फिर हम देखेंगे कि उसके स्वप्नोंका क्या फल होगा। 21 यह सुनके रूबेन ने उसको उनके हाथ से बचाने की मनसा से कहा, हम उसको प्राण से तो न मारें। 22 फिर रूबेन ने उन से कहा, लोहू मत बहाओ, उसको जंगल के इस गड़हे में डाल दो, और उस पर हाथ मत उठाओ। वह उसको उनके हाथ से छुड़ाकर पिता के पास फिर पहुंचाना चाहता या। 23 सो ऐसा हुआ, कि जब यूसुफ अपके भाइयोंके पास पहुंचा तब उन्होंने उसका रंगबिरंगा अंगरखा, जिसे वह पहिने हुए या, उतार लिया। 24 और यूसुफ को उठाकर गड़हे में डाल दिया : वह गड़हा तो सूखा या और उस में कुछ जल न या। 25 तब वे रोटी खाने को बैठ गए : और आंखे उठाकर क्या देखा, कि इश्माएलियोंका एक दल ऊंटो पर सुगन्धद्रव्य, बलसान, और गन्धरस लादे हुए, गिलाद से मिस्र को चला जा रहा है। 26 तब यहूदा ने अपके भाइयोंसे कहा, अपके भाई को घात करने और उसका खून छिपाने से क्या लाभ होगा ? 27 आओ, हम उसे इश्माएलियोंके हाथ बेच डालें, और अपना हाथ उस पर न उठाएं, क्योंकि वह हमारा भाई और हमारी हड्डी और मांस है, सो उसके भाइयोंने उसकी बात मान ली। तब मिद्यानी व्यापारी उधर से होकर उनके पास पहुंचे : 28 सो यूसुफ के भाइयोंने उसको उस गड़हे में से खींचके बाहर निकाला, और इश्माएलियोंके हाथ चांदी के बीस टुकड़ोंमें बेच दिया : और वे यूसुफ को मिस्र में ले गए। 29 और रूबेन ने गड़हे पर लौटकर क्या देखा, कि यूसुफ गड़हे में नहीं हैं; सो उस ने अपके वस्त्र फाड़े। 30 और अपके भाइयोंके पास लौटकर कहने लगा, कि लड़का तो नहीं हैं; अब मैं किधर जाऊं ? 31 और तब उन्होंने यूसुफ का अंगरखा लिया, और एक बकरे को मारके उसके लोहू में उसे डुबा दिया। 32 और उन्होंने उस रंग बिरंगे अंगरखे को अपके पिता के पास भेजकर कहला दिया; कि यह हम को मिला है, सो देखकर पहिचान ले, कि यह तेरे पुत्र का अंगरखा है कि नहीं। 33 उस ने उसको पहिचान लिया, और कहा, हां यह मेरे ही पुत्र का अंगरखा है; किसी दुष्ट पशु ने उसको खा लिया है; नि:सन्देह यूसुफ फाड़ डाला गया है। 34 तब याकूब ने अपके वस्त्र फाड़े और कमर में टाट लपेटा, और अपके पुत्र के लिथे बहुत दिनोंतक विलाप करता रहा। 35 और उसके सब बेटे-बेटियोंने उसको शान्ति देने का यत्न किया; पर उसको शान्ति न मिली; और वह यही कहता रहा, मैं तो विलाप करता हुआ अपके पुत्र के पास अधोलोक में उतर जाऊंगा। इस प्रकार उसका पिता उसके लिथे रोता ही रहा। 36 और मिद्यानियोंने यूसुफ को मिस्र में ले जाकर पोतीपर नाम, फिरौन के एक हाकिम, और जल्लादोंके प्रधान, के हाथ बेच डाला।।

उत्पत्ति 38

1 उन्हीं दिनोंमें ऐसा हुआ, कि यहूदा अपके भाईयोंके पास से चला गया, और हीरा नाम एक अदुल्लामवासी पुरूष के पास डेरा किया। 2 वहां यहूदा ने शूआ नाम एक कनानी पुरूष की बेटी को देखा; और उसको ब्याहकर उसके पास गया। 3 वह गर्भवती हुई, और उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ; और यहूदा ने उसका नाम एर रखा। 4 और वह फिर गर्भवती हुई, और उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ; और उसका नाम ओनान रखा गया। 5 फिर उसके एक पुत्र और उत्पन्न हुआ, और उसका नाम शेला रखा गया : और जिस समय इसका जन्म हुआ उस समय यहूदा कजीब में रहता या। 6 और यहूदा ने तामार नाम एक स्त्री से अपके जेठे एर का विवाह कर दिया। 7 परन्तु यहूदा का वह जेठा एर यहोवा के लेखे में दुष्ट या, इसलिथे यहोवा ने उसको मार डाला। 8 तब यहूदा ने ओनान से कहा, अपक्की भौजाई के पास जा, और उसके साय देवर का धर्म पूरा करके अपके भाई के लिथे सन्तान उत्पन्न कर। 9 ओनान तो जानता या कि सन्तान तो मेरी न ठहरेगी: सो ऐसा हुआ, कि जब वह अपक्की भौजाई के पास गया, तब उस ने भूमि पर वीर्य गिराकर नाश किया, जिस से ऐसा न हो कि उसके भाई के नाम से वंश चले। 10 यह काम जो उस ने किया उसे यहोवा अप्रसन्न हुआ: और उस ने उसको भी मार डाला। 11 तब यहूदा ने इस डर के मारे, कि कहीं ऐसा न हो कि अपके भाइयोंकी नाई शेला भी मरे, अपक्की बहू तामार से कहा, जब तक मेरा पुत्र शेला सियाना न हो तब तक अपके पिता के घर में विधवा की बैठी रह, सो तामार अपके पिता के घर में जाकर रहने लगी। 12 बहुत समय के बीतने पर यहूदा की पत्नी जो शूआ की बेटी यी सो मर गई; फिर यहूदा शोक से छूटकर अपके मित्र हीरा अदुल्लामवासी समेत अपक्की भेड़-बकरियोंका ऊन कतराने के लिथे तिम्नाय को गया। 13 और तामार को यह समाचार मिला, कि तेरा ससुर अपक्की भेड़-बकरियोंका ऊन कतराने के लिथे तिम्नाय को जा रहा है। 14 तब उस ने यह सोचकर, कि शेला सियाना तो हो गया पर मैं उसकी स्त्री नहीं होने पाई; अपना विधवापन का पहिरावा उतारा, और घूंघट डालकर अपके को ढांप लिया, और एनैम नगर के फाटक के पास, जो तिम्नाय के मार्ग में है, जा बैठी: 15 जब यहूदा ने उसको देखा, उस ने उस को वेश्या समझा; क्योंकि वह अपना मुंह ढ़ापे हुए यी। 16 और वह मार्ग से उसकी ओर फिरा और उस से कहने लगा, मुझे अपके पास आने दे, (क्योंकि उसे यह मालूम न या कि वह उसकी बहू है)। और वह कहने लगी, कि यदि मैं तुझे अपके पास आने दूं, तो तू मुझे क्या देगा? 17 उस ने कहा, मैं अपक्की बकरियोंमें से बकरी का एक बच्चा तेरे पास भेज दूंगा। 18 उस ने पूछा, मैं तेरे पास क्या रेहन रख जाऊं? उस ने कहा, अपक्की मुहर, और बाजूबन्द, और अपके हाथ की छड़ी। तब उस ने उसको वे वसतुएं दे दीं, और उसके पास गया, और वह उस से गर्भवती हुई। 19 तब वह उठकर चक्की गई, और अपना घूंघट उतारके अपना विधवापन का पहिरावा फिर पहिन लिया। 20 तब यहूदा ने बकरी का बच्चा अपके मित्र उस अदुल्लामवासी के हाथ भेज दिया, कि वह रेहन रखी हुई वस्तुएं उस स्त्री के हाथ से छुड़ा ले आए; पर वह स्त्री उसको न मिली। 21 तब उस ने वहां के लोगोंसे पूछा, कि वह देवदासी जो एनैम में मार्ग की एक और बैठी यी, कहां है? उन्होंने कहा, यहां तो कोई देवदासी न यी। 22 सो उस ने यहूदा के पास लौटके कहा, मुझे वह नहीं मिली; और उस स्यान के लोगोंने कहा, कि यहां तो कोई देवदासी न यी। 23 तब यहूदा ने कहा, अच्छा, वह बन्धक उस के पास रहने दे, नहीं तो हम लोग तुच्छ गिने जाएंगे: देख, मैं ने बकरी का यह बच्चा भेज दिया, पर वह तुझे नहीं मिली। 24 और तीन महीने के पीछे यहूदा को यह समाचार मिला, कि तेरी बहू तामार ने व्यभिचार किया है; वरन वह व्यभिचार से गर्भवती भी हो गई है। तब यहूदा ने कहा, उसको बाहर ले आओ, कि वह जलाई जाए। 25 जब उसे बाहर निकाल रहे थे, तब उस ने, अपके ससुर के पास यह कहला भेजा, कि जिस पुरूष की थे वस्तुएं हैं, उसी से मैं गर्भवती हूं; फिर उस ने यह भी कहलाया, कि पहिचान तो सही, कि यह मुहर, और वाजूबन्द, और छड़ी किस की है। 26 यहूदा ने उन्हें पहिचानकर कहा, वह तो मुझ से कम दोषी है; क्योंकि मैं ने उसे अपके पुत्र शेला को न ब्याह दिया। और उस ने उस से फिर कभी प्रसंग न किया। 27 जब उसके जनने का समय आया, तब यह जान पड़ा कि उसके गर्भ में जुड़वे बच्चे हैं। 28 और जब वह जनने लगी तब एक बालक ने अपना हाथ बढ़ाया: और धाय ने लाल सूत लेकर उसके हाथ में यह कहते हुथे बान्ध दिया, कि पहिले यही उत्पन्न हुआ। 29 जब उस ने हाथ समेट लिया, तब उसका भाई उत्पन्न हो गया: तब उस धाय ने कहा, तू क्योंबरबस निकल आया है ? इसलिथे उसका नाम पेरेस रखा गया। 30 पीछे उसका भाई जिसके हाथ में लाल सूत बन्धा या उत्पन्न हुआ, और उसका नाम जेरह रखा गया।।

उत्पत्ति 39

1 जब यूसुफ मिस्र में पहुंचाया गया, तब पोतीपर नाम एक मिस्री, जो फिरौन का हाकिम, और जल्लादोंका प्रधान या, उस ने उसको इश्माएलियोंके हाथ, से जो उसे वहां ले गए थे, मोल लिया। 2 और यूसुफ अपके मिस्री स्वामी के घर में रहता या, और यहोवा उसके संग या; सो वह भाग्यवान्‌ पुरूष हो गया। 3 और यूसुफ के स्वामी ने देखा, कि यहोवा उसके संग रहता है, और जो काम वह करता है उसको यहोवा उसके हाथ से सुफल कर देता है। 4 तब उसकी अनुग्रह की दृष्टि उस पर हुई, और वह उसकी सेवा टहल करने के लिथे नियुक्त किया गया : फिर उस ने उसको अपके घर का अधिक्कारनेी बनाके अपना सब कुछ उसके हाथ में सौप दिया। 5 और जब से उस ने उसको अपके घर का और अपक्की सारी सम्पत्ति का अधिक्कारनेी बनाया, तब से यहोवा यूसुफ के कारण उस मिस्री के घर पर आशीष देने लगा; और क्या घर में, क्या मैदान में, उसका जो कुछ या, सब पर यहोवा की आशीष होने लगी। 6 सो उस ने अपना सब कुछ यूसुफ के हाथ में यहां तक छोड़ दिया: कि अपके खाने की रोटी को छोड़, वह अपक्की सम्पत्ति का हाल कुछ न जानता या। और यूसुफ सुन्दर और रूपवान्‌ या। 7 इन बातोंके पश्चात्‌ ऐसा हुआ, कि उसके स्वामी की पत्नी ने यूसुफ की ओर आंख लगाई; और कहा, मेरे साय सो। 8 पर उस ने अस्वीकार करते हुए अपके स्वामी की पत्नी से कहा, सुन, जो कुछ इस घर में है मेरे हाथ में है; उसे मेरा स्वामी कुछ नहीं जानता, और उस ने अपना सब कुछ मेरे हाथ में सौप दिया है। 9 इस घर में मुझ से बड़ा कोई नहीं; और उस ने तुझे छोड़, जो उसकी पत्नी है; मुझ से कुछ नहीं रख छोड़ा; सो भला, मैं ऐसी बड़ी दुष्टता करके परमेश्वर का अपराधी क्योंकर बनूं ? 10 और ऐसा हुआ, कि वह प्रति दिन यूसुफ से बातें करती रही, पर उस ने उसकी न मानी, कि उसके पास लेटे वा उसके संग रहे। 11 एक दिन क्या हुआ, कि यूसुफ अपना काम काज करने के लिथे घर में गया, और घर के सेवकोंमें से कोई भी घर के अन्दर न या। 12 तब उस स्त्री ने उसका वस्त्र पकड़कर कहा, मेरे साय सो, पर वह अपना वस्त्र उसके हाथ में छोड़कर भागा, और बाहर निकल गया। 13 यह देखकर, कि वह अपना वस्त्र मेरे हाथ में छोड़कर बाहर भाग गया, 14 उस स्त्री ने अपके घर के सेवकोंको बुलाकर कहा, देखो, वह एक इब्री मनुष्य को हमारा तिरस्कार करने के लिथे हमारे पास ले आया है। वह तो मेरे साय सोने के मतलब से मेरे पास अन्दर आया या और मैं ऊंचे स्वर से चिल्ला उठी। 15 और मेरी बड़ी चिल्लाहट सुनकर वह अपना वस्त्र मेरे पास छोड़कर भागा, और बाहर निकल गया। 16 और वह उसका वस्त्र उसके स्वामी के घर आने तक अपके पास रखे रही। 17 तब उस ने उस से इस प्रकार की बातें कहीं, कि वह इब्री दास जिसको तू हमारे पास ले आया है, सो मुझ से हंसी करने के लिथे मेरे पास आया या। 18 और जब मैं ऊंचे स्वर से चिल्ला उठी, तब वह अपना वस्त्र मेरे पास छोड़कर बाहर भाग गया। 19 अपक्की पत्नी की थे बातें सुनकर, कि तेरे दास ने मुझ से ऐसा ऐसा काम किया, यूसुफ के स्वामी का कोप भड़का। 20 और यूसुफ के स्वामी ने उसको पकड़कर बन्दीगृह में, जहां राजा के कैदी बन्द थे, डलवा दिया : सो वह उस बन्दीगृह में रहने लगा। 21 पर यहोवा यूसुफ के संग संग रहा, और उस पर करूणा की, और बन्दीगृह के दरोगा के अनुग्रह की दृष्टि उस पर हुई। 22 सो बन्दीगृह के दरोगा ने उन सब बन्धुओं को, जो कारागार में थे, यूसुफ के हाथ में सौप दिया; और जो जो काम वे वहां करते थे, वह उसी की आज्ञा से होता या। 23 बन्दीगृह के दरोगा के वश में जो कुछ या; क्योंकि उस में से उसको कोई भी वस्तु देखनी न पड़ती यी; इसलिथे कि यहोवा यूसुफ के साय या; और जो कुछ वह करता या, यहोवा उसको उस में सफलता देता या।

उत्पत्ति 40

1 इन बातोंके पश्चात्‌ ऐसा हुआ, कि मिस्र के राजा के पिलानेहारे और पकानेहारे ने अपके स्वामी का कुछ अपराध किया। 2 तब फिरौन ने अपके उन दोनोंहाकिमोंपर, अर्यात्‌ पिलानेहारे के प्रधान, और पकानेहारोंके प्रधान पर क्रोधित होकर 3 उन्हें कैद कराके, जल्लादोंके प्रधान के घर के उसी बन्दीगृह में, जहां यूसुफ बन्धुआ या, डलवा दिया। 4 तब जल्लादोंके प्रधान ने उनको यूसुफ के हाथ सौपा, और वह उनकी सेवा टहल करने लगा: सो वे कुछ दिन तक बन्दीगृह में रहे। 5 और मिस्र के राजा का पिलानेहारा और पकानेहारा, जो बन्दीगृह में बन्द थे, उन दोनोंने एक ही रात में, अपके अपके होनहार के अनुसार, स्वप्न देखा। 6 बिहान को जब यूसुफ उनके पास अन्दर गया, तब उन पर उस ने जो दृष्टि की, तो क्या देखता है, कि वे उदास हैं। 7 सो उस ने फिरौन के उन हाकिमोंसे, जो उसके साय उसके स्वामी के घर के बन्दीगृह में थे, पूछा, कि आज तुम्हारे मुंह क्योंउदास हैं ? 8 उन्होंने उस से कहा, हम दोनो ने स्वप्न देखा है, और उनके फल का बतानेवाला कोई भी नहीं। यूसुफ ने उन से कहा, क्या स्वप्नोंका फल कहना परमेश्वर का काम नहीं है? मुझे अपना अपना स्वप्न बताओ। 9 तब पिलानेहारोंका प्रधान अपना स्वप्न यूसुफ को योंबताने लगा: कि मैं ने स्वप्न में देखा, कि मेरे साम्हने एक दाखलता है; 10 और उस दाखलता में तीन डालियां हैं: और उस में मानो कलियां लगीं हैं, और वे फूलीं और उसके गुच्छोंमें दाख लगकर पक गई। 11 और फिरौन का कटोरा मेरे हाथ में या: सो मै ने उन दाखोंको लेकर फिरौन के कटोरे में निचोड़ा और कटोरे को फिरौन के हाथ में दिया। 12 यूसुफ ने उस से कहा, इसका फल यह है; कि तीन डालियोंका अर्य तीन दिन है: 13 सो अब से तीन दिन के भीतर फिरौन तेरा सिर ऊंचा करेगा, और फिर से तेरे पद पर तुझे नियुक्त करेगा, और तू पहले की नाई फिरौन का पिलानेहारा होकर उसका कटोरा उसके हाथ में फिर दिया करेगा। 14 सो जब तेरा भला हो जाए तब मुझे स्मरण करना, और मुझ पर कृपा करके, फिरौन से मेरी चर्चा चलाना, और इस घर से मुझे छुड़वा देना। 15 क्योंकि सचमुच इब्रानियोंके देश से मुझे चुरा कर ले आए हैं, और यहां भी मै ने कोई ऐसा काम नहीं किया, जिसके कारण मैं इस कारागार में डाला जाऊं। 16 यह देखकर, कि उसके स्वप्न का फल अच्छा निकला, पकानेहारोंके प्रधान ने यूसुफ से कहा, मैं ने भी स्वप्न देखा है, वह यह है: मै ने देखा, कि मेरे सिर पर सफेद रोटी की तीन टोकरियां है: 17 और ऊपर की टोकरी में फिरौन के लिथे सब प्रकार की पक्की पकाई वस्तुएं हैं; और पक्की मेरे सिर पर की टोकरी में से उन वस्तुओं को खा रहे हैं। 18 यूसुफ ने कहा, इसका फल यह है; कि तीन टोकरियोंका अर्य तीन दिन है। 19 सो अब से तीन दिन के भीतर फिरौन तेरा सिर कटवाकर तुझे एक वृझ पर टंगवा देगा, और पक्की तेरे मांस को नोच नोच कर खाएंगे। 20 और तीसरे दिन फिरौन का जन्मदिन या, उस ने अपके सब कर्मचारियोंकी जेवनार की, और उन में से पिलानेहारोंके प्रधान, और पकानेहारोंके प्रधान दोनोंको बन्दीगृह से निकलवाया। 21 और पिलानेहारोंके प्रधान को तो पिलानेहारे के पद पर फिर से नियुक्त किया, और वह फिरौन के हाथ में कटोरा देने लगा। 22 पर पकानेहारोंके प्रधान को उस ने टंगवा दिया, जैसा कि यूसुफ ने उनके स्वप्नोंका फल उन से कहा या। 23 फिर भी पिलानेहारोंके प्रधान ने यूसुफ को स्मरण न रखा; परन्तु उसे भूल गया।।

उत्पत्ति 41

1 पूरे दो बरस के बीतने पर फिरौन ने यह स्वप्न देखा, कि वह नील नदी के किनारे पर खड़ा है। 2 और उस नदी में से सात सुन्दर और मोटी मोटी गाथें निकलकर कछार की घास चरने लगीं। 3 और, क्या देखा, कि उनके पीछे और सात गाथें, जो कुरूप और दुर्बल हैं, नदी से निकली; और दूसरी गायोंके निकट नदी के तट पर जा खड़ी हुई। 4 तब थे कुरूप और दुर्बल गाथें उन सात सुन्दर और मोटी मोटी गायोंको खा गई। तब फिरौन जाग उठा। 5 और वह फिर सो गया और दूसरा स्वप्न देखा, कि एक डंठी में से सात मोटी और अच्छी अच्छी बालें निकलीं। 6 और, क्या देखा, कि उनके पीछे सात बालें पतली और पुरवाई से मुरफाई हुई निकलीं। 7 और इन पतली बालोंने उन सातोंमोटी और अन्न से भरी हुई बालोंको निगल लिया। तब फिरौन जागा, और उसे मालूम हुआ कि यह स्वप्न ही या। 8 भोर को फिरौन का मन व्याकुल हुआ; और उस ने मिस्र के सब ज्योतिषियों, और पण्डितोंको बुलवा भेजा; और उनको अपके स्वप्न बताएं; पर उन में से कोई भी उनका फल फिरौन से न कह सहा। 9 तब पिलानेहारोंका प्रधान फिरौन से बोल उठा, कि मेरे अपराध आज मुझे स्मरण आए: 10 जब फिरौन अपके दासोंसे क्रोधित हुआ या, और मुझे और पकानेहारोंके प्रधान को कैद कराके जल्लादोंके प्रधान के घर के बन्दीगृह में डाल दिया या; 11 तब हम दोनोंने, एक ही रात में, अपके अपके होनहार के अनुसार स्वप्न देखा; 12 और वहां हमारे साय एक इब्री जवान या, जो जल्लादोंके प्रधान का दास या; सो हम ने उसको बताया, और उस ने हमारे स्वप्नोंका फल हम से कहा, हम में से एक एक के स्वप्न का फल उस ने बता दिया। 13 और जैसा जैसा फल उस ने हम से कहा या, वैसा की हुआ भी, अर्यात्‌ मुझ को तो मेरा पद फिर मिला, पर वह फांसी पर लटकाया गया। 14 तब फिरौन ने यूसुफ को बुलवा भेजा। और वह फटपट बन्दीगृह से बाहर निकाला गया, और बाल बनवाकर, और वस्त्र बदलकर फिरौन के साम्हने आया। 15 फिरौन ने यूसुफ से कहा, मैं ने एक स्वप्न देखा है, और उसके फल का बतानेवाला कोई भी नहीं; और मैं ने तेरे विषय में सुना है, कि तू स्वप्न सुनते ही उसका फल बता सकता है। 16 यूसुफ ने फिरौन से कहा, मै तो कुछ नहीं जानता : परमेश्वर ही फिरौन के लिथे शुभ वचन देगा। 17 फिर फिरौन यूसुफ से कहने लगा, मै ने अपके स्वप्न में देखा, कि मैं नील नदी के किनारे पर खड़ा हूं 18 फिर, क्या देखा, कि नदी में से सात मोटी और सुन्दर सुन्दर गाथें निकलकर कछार की घास चरने लगी। 19 फिर, क्या देखा, कि उनके पीछे सात और गाथें निकली, जो दुबली, और बहुत कुरूप, और दुर्बल हैं; मै ने तो सारे मिस्र देश में ऐसी कुडौल गाथें कभी नहीं देखीं। 20 और इन दुर्बल और कुडौल गायोंने उन पहली सातोंमोटी मोटी गायोंको खा लिया। 21 और जब वे उनको खा गई तब यह मालूम नहीं होता या कि वे उनको खा गई हैं, क्योंकि वे पहिले की नाई जैसी की तैसी कुडौल रहीं। तब मैं जाग उठा। 22 फिर मैं ने दूसरा स्वप्न देखा, कि एक ही डंठी में सात अच्छी अच्छी और अन्न से भरी हुई बालें निकलीं। 23 फिर, क्या देखता हूं, कि उनके पीछे और सात बालें छूछी छूछी और पतली और पुरवाई से मुरफाई हुई निकलीं। 24 और इन पतली बालोंने उन सात अच्छी अच्छी बालोंको निगल लिया। इसे मैं ने ज्योतिषियोंको बताया, पर इस का समझनेहारा कोई नहीं मिला। 25 तब यूसुफ ने फिरौन से कहा, फिरौन का स्वप्न एक ही है, परमेश्वर जो काम किया चाहता है, उसको उस ने फिरौन को जताया है। 26 वे सात अच्छी अच्छी गाथें सात वर्ष हैं; और वे सात अच्छी अच्छी बालें भी सात वर्ष हैं; स्वप्न एक ही है। 27 फिर उनके पीछे जो दुर्बल और कुडौल गाथें निकलीं, और जो सात छूछी और पुरवाई से मुरफाई हुई बालें निकाली, वे अकाल के सात वर्ष होंगे। 28 यह वही बात है, जो मैं फिरौन से कह चुका हूं, कि परमेश्वर जो काम किया चाहता है, उसे उस ने फिरौन को दिखाया है। 29 सुन, सारे मिस्र देश में सात वर्ष तो बहुतायत की उपज के होंगे। 30 उनके पश्चात्‌ सात वर्ष अकाल के आथेंगे, और सारे मिस्र देश में लोग इस सारी उपज को भूल जाथेंगे; और अकाल से देश का नाश होगा। 31 और सुकाल (बहुतायत की उपज) देश में फिर स्मरण न रहेगा क्योंकि अकाल अत्यन्त भयंकर होगा। 32 और फिरौन ने जो यह स्वप्न दो बार देखा है इसका भेद यही है, कि यह बात परमेश्वर की ओर से नियुक्त हो चुकी है, और परमेश्वर इसे शीघ्र ही पूरा करेगा। 33 इसलिथे अब फिरौन किसी समझदार और बुद्धिमान्‌ पुरूष को ढूंढ़ करके उसे मिस्र देश पर प्रधानमंत्री ठहराए। 34 फिरौन यह करे, कि देश पर अधिक्कारनेियोंको नियुक्त करे, और जब तक सुकाल के सात वर्ष रहें तब तक वह मिस्र देश की उपज का पंचमांश लिया करे। 35 और वे इन अच्छे वर्षोंमें सब प्रकार की भोजनवस्तु इकट्ठा करें, और नगर नगर में भण्डार घर भोजन के लिथे फिरौन के वश में करके उसकी रझा करें। 36 और वह भोजनवस्तु अकाल के उन सात वर्षोंके लिथे, जो मिस्र देश में आएंगे, देश के भोजन के निमित्त रखी रहे, जिस से देश उस अकाल से स्त्यानाश न हो जाए। 37 यह बात फिरौन और उसके सारे कर्मचारियोंको अच्छी लगी। 38 सो फिरौन ने अपके कर्मचारियोंसे कहा, कि क्या हम को ऐसा पुरूष जैसा यह है, जिस में परमेश्वर का आत्मा रहता है, मिल सकता है ? 39 फिर फिरौन ने यूसुफ से कहा, परमेश्वर ने जो तुझे इतना ज्ञान दिया है, कि तेरे तुल्य कोई समझदार और बुद्धिमान्‌ नहीं; 40 इस कारण तू मेरे घर का अधिक्कारनेी होगा, और तेरी आज्ञा के अनुसार मेरी सारी प्रजा चलेगी, केवल राजगद्दी के विषय मैं तुझ से बड़ा ठहरूंगा। 41 फिर फिरौन ने यूसुफ से कहा, सुन, मैं तुझ को मिस्र के सारे देश के ऊपर अधिक्कारनेी ठहरा देता हूं 42 तब फिरौन ने अपके हाथ से अंगूठी निकालके यूसुफ के हाथ में पहिना दी; और उसको बढिय़ा मलमल के वस्त्र पहिनवा दिए, और उसके गले में सोने की जंजीर डाल दी; 43 और उसको अपके दूसरे रय पर चढ़वाया; और लोग उसके आगे आगे यह प्रचार करते चले, कि घुटने टेककर दण्डवत करो और उस ने उसको मिस्र के सारे देश के ऊपर प्रधान मंत्री ठहराया। 44 फिर फिरौन ने यूसुफ से कहा, फिरौन तो मैं हूं, और सारे मिस्र देश में कोई भी तेरी आज्ञा के बिना हाथ पांव न हिलाएगा। 45 और फिरौन ने यूसुफ का नाम सापन त्‌पानेह रखा। और ओन नगर के याजक पोतीपेरा की बेटी आसनत से उसका ब्याह करा दिया। और यूसुफ मिस्र के सारे देश में दौरा करने लगा। 46 जब यूसुफ मिस्र के राजा फिरौन के सम्मुख खड़ा हुआ, तब वह तीस वर्ष का या। सो वह फिरौन के सम्मुख से निकलकर मिस्र के सारे देश में दौरा करने लगा। 47 सुकाल के सातोंवर्षोंमें भूमि बहुतायत से अन्न उपजाती रही। 48 और यूसुफ उन सातोंवर्षोंमें सब प्रकार की भोजनवस्तुएं, जो मिस्र देश में होती यीं, जमा करके नगरोंमें रखता गया, और हर एक नगर के चारोंओर के खेतोंकी भोजनवस्तुओं को वह उसी नगर में इकट्ठा करता गया। 49 सो यूसुफ ने अन्न को समुद्र की बालू के समान अत्यन्त बहुतायत से राशि राशि करके रखा, यहां तक कि उस ने उनका गिनना छोड़ दिया; क्योंकि वे असंख्य हो गई। 50 अकाल के प्रयम वर्ष के आने से पहिले यूसुफ के दो पुत्र, ओन के याजक पोतीपेरा की बेटी आसनत से जन्मे। 51 और यूसुफ ने अपके जेठे का नाम यह कहके मनश्शे रखा, कि परमेश्वर ने मुझ से सारा क्लेश, और मेरे पिता का सारा घराना भुला दिया है। 52 और दूसरे का नाम उस ने यह कहकर एप्रैम रखा, कि मुझे दु:ख भोगने के देश में परमेश्वर ने फुलाया फलाया है। 53 और मिस्र देश के सुकाल के वे सात वर्ष समाप्त हो गए। 54 और यूसुफ के कहने के अनुसार सात वर्षोंके लिथे अकाल आरम्भ हो गया। और सब देशोंमें अकाल पड़ने लगा; परन्तु सारे मिस्र देश में अन्न या। 55 जब मिस्र का सारा देश भूखोंमरने लगा; तब प्रजा फिरोन से चिल्ला चिल्लाकर रोटी मांगने लगी : और वह सब मिस्रियोंसे कहा करता या, यूसुफ के पास जाओ: और जो कुछ वह तुम से कहे, वही करो। 56 सो जब अकाल सारी पृय्वी पर फैल गया, और मिस्र देश में काल का भयंकर रूप हो गया, तब यूसुफ सब भण्डारोंको खोल खोलके मिस्रियोंके हाथ अन्न बेचने लगा। 57 सो सारी पृय्वी के लोग मिस्र में अन्न मोल लेने के लिथे यूसुफ के पास आने लगे, क्योंकि सारी पृय्वी पर भयंकर अकाल या।

उत्पत्ति 42

1 जब याकूब ने सुना कि मिस्र में अन्न है, तब उस ने अपके पुत्रोंसे कहा, तुम एक दूसरे का मुंह क्योंदेख रहे हो। 2 फिर उस ने कहा, मैं ने सुना है कि मिस्र में अन्न है; इसलिथे तुम लोग वहां जाकर हमारे लिथे अन्न मोल ले आओ, जिस से हम न मरें, वरन जीवित रहें। 3 सो यूसुफ के दस भाई अन्न मोल लेने के लिथे मिस्र को गए। 4 पर यूसुफ के भाई बिन्यामीन को याकूब ने यह सोचकर भाइयोंके साय न भेजा, कि कहीं ऐसा न हो कि उस पर कोई विपत्ति आ पके। 5 सो जो लोग अन्न मोल लेने आए उनके साय इस्राएल के पुत्र भी आए; क्योंकि कनान देश में भी भारी अकाल या। 6 यूसुफ तो मिस्र देश का अधिक्कारनेी या, और उस देश के सब लोगोंके हाथ वही अन्न बेचता या; इसलिथे जब यूसुफ के भाई आए तब भूमि पर मुंह के बल गिरके दण्डवत्‌ किया। 7 उनको देखकर यूसुफ ने पहिचान तो लिया, परन्तु उनके साम्हने भोला बनके कठोरता के साय उन से पूछा, तुम कहां से आते हो? उन्होंने कहा, हम तो कनान देश से अन्न मोल लेने के लिथे आए हैं। 8 यूसुफ ने तो अपके भाइयोंको पहिचान लिया, परन्तु उन्होंने उसको न पहिचाना। 9 तब यूसुफ अपके उन स्वप्नोंको स्मरण करके जो उस ने उनके विषय में देखे थे, उन से कहने लगा, तुम भेदिए हो; इस देश की दुर्दशा को देखने के लिथे आए हो। 10 उन्होंने उस से कहा, नहीं, नहीं, हे प्रभु, तेरे दास भोजनवस्तु मोल लेने के लिथे आए हैं। 11 हम सब एक ही पिता के पुत्र हैं, हम सीधे मनुष्य हैं, तेरे दास भेदिए नहीं। 12 उस ने उन से कहा, नहीं नहीं, तुम इस देश की दुर्दशा देखने ही को आए हो। 13 उन्होंने कहा, हम तेरे दास बारह भाई हैं, और कनान देशवासी एक ही पुरूष के पुत्र हैं, और छोटा इस समय हमारे पिता के पास है, और एक जाता रहा। 14 तब यूसुफ ने उन से कहा, मैं ने तो तुम से कह दिया, कि तुम भेदिए हो; 15 सो इसी रीति से तुम परखे जाओगे, फिरौन के जीवन की शपय, जब तक तुम्हारा छोटा भाई यहां न आए तब तक तुम यहां से न निकलने पाओगे। 16 सो अपके में से एक को भेज दो, कि वह तुम्हारे भाई को ले आए, और तुम लोग बन्धुवाई में रहोगे; इस प्रकार तुम्हारी बातें परखी जाएंगी, कि तुम में सच्चाई है कि नहीं। यदि सच्चे न ठहरे तब तो फिरौन के जीवन की शपय तुम निश्चय ही भेदिए समझे जाओगे। 17 तब उस ने उनको तीन दिन तक बन्दीगृह में रखा। 18 तीसरे दिन यूसुफ ने उन से कहा, एक काम करो तब जीवित रहोगे; क्योंकि मैं परमेश्वर का भय मानता हूं; 19 यदि तुम सीधे मनुष्य हो, तो तुम सब भाइयोंमें से एक जन इस बन्दीगृह में बन्धुआ रहे; और तुम अपके घरवालोंकी भूख बुफाने के लिथे अन्न ले जाओ। 20 और अपके छोटे भाई को मेरे पास ले आओ; इस प्रकार तुम्हारी बातें सच्ची ठहरेंगी, और तुम मार डाले न जाओगे। तब उन्होंने वैसा ही किया। 21 उन्होंने आपस में कहा, निस्न्देह हम अपके भाई के विषय में दोषी हैं, क्योंकि जब उस ने हम से गिड़गिड़ाके बिनती की, तौभी हम ने यह देखकर, कि उसका जीवन केसे संकट में पड़ा है, उसकी न सुनी; इसी कारण हम भी अब इस संकट में पके हैं। 22 रूबेन ने उन से कहा, क्या मैं ने तुम से न कहा या, कि लड़के के अपराधी मत बनो? परन्तु तुम ने न सुना : देखो, अब उसके लोहू का पलटा दिया जाता है। 23 यूसुफ की और उनकी बातचीत जो एक दुभाषिया के द्वारा होती यी; इस से उनको मालूम न हुआ कि वह उनकी बोली समझता है। 24 तब वह उनके पास से हटकर रोने लगा; फिर उनके पास लौटकर और उन से बातचीत करके उन में से शिमोन को छांट निकाला और उसके साम्हने बन्धुआ रखा। 25 तब यूसुफ ने आज्ञा दी, कि उनके बोरे अन्न से भरो और एक एक जन के बोरे में उसके रूपके को भी रख दो, फिर उनको मार्ग के लिथे सीधा दो : सो उनके साय ऐसा ही किया गया। 26 तब वे अपना अन्न अपके गदहोंपर लादकर वहां से चल दिए। 27 सराय में जब एक ने अपके गदहे को चारा देने के लिथे अपना बोरा खोला, तब उसका रूपया बोरे के मोहड़े पर रखा हुआ दिखलाई पड़ा। 28 तब उस ने अपके भाइयोंसे कहा, मेरा रूपया तो फेर दिया गया है, देखो, वह मेरे बोरे में है; तब उनके जी में जी न रहा, और वे एक दूसरे की और भय से ताकने लगे, और बोले, परमेश्वर ने यह हम से क्या किया है ? 29 और वे कनान देश में अपके पिता याकूब के पास आए, और अपना सारा वृत्तान्त उस से इस प्रकार वर्णन किया : 30 कि जो पुरूष उस देश का स्वामी है, उस ने हम से कठोरता के साय बातें कीं, और हम को देश के भेदिए कहा। 31 तब हम ने उस से कहा, हम सीधे लोग हैं, भेदिए नहीं। 32 हम बारह भाई एक ही पिता के पुत्र है, एक तो जाता रहा, परन्तु छोटा इस समय कनान देश में हमारे पिता के पास है। 33 तब उस पुरूष ने, जो उस देश का स्वामी है, हम से कहा, इस से मालूम हो जाएगा कि तुम सीधे मनुष्य हो; तुम अपके में से एक को मेरे पास छोड़के अपके घरवालोंकी भूख बुफाने के लिथे कुछ ले जाओ। 34 और अपके छोटे भाई को मेरे पास ले आओ। तब मुझे विश्वास हो जाएगा कि तुम भेदिए नहीं, सीधे लोग हो। फिर मैं तुम्हारे भाई को तुम्हें सौंप दूंगा, और तुम इस देश में लेन देन कर सकोगे। 35 यह कहकर वे अपके अपके बोरे से अन्न निकालने लगे, तब, क्या देखा, कि एक एक जन के रूपके की यैली उसी के बोरे में रखी है : तब रूपके की यैलियोंको देखकर वे और उनका पिता बहुत डर गए। 36 तब उनके पिता याकूब ने उन से कहा, मुझ को तुम ने निर्वंश कर दिया, देखो, यूसुफ नहीं रहा, और शिमोन भी नहीं आया, और अब तुम बिन्यामीन को भी ले जाना चाहते हो : थे सब विपत्तियां मेरे ऊपर आ पक्की हैं। 37 रूबेन ने अपके पिता से कहा, यदि मैं उसको तेरे पास न लाऊं, तो मेरे दोनोंपुत्रोंको मार डालना; तू उसको मेरे हाथ में सौंप दे, मैं उसे तेरे पास फिर पहुंचा दूंगा। 38 उस ने कहा, मेरा पुत्र तुम्हारे संग न जाएगा; क्योंकि उसका भाई मर गया है, और वह अब अकेला रह गया : इसलिथे जिस मार्ग से तुम जाओगे, उस में यदि उस पर कोई विपत्ति आ पके, तब तो तुम्हारे कारण मैं इस बुढ़ापे की अवस्या में शोक के साय अधोलोक में उतर जाऊंगा।।

उत्पत्ति 43

1 और अकाल देश में और भी भयंकर होता गया। 2 जब वह अन्न जो वे मिस्र से ले आए थे समाप्त हो गया तब उनके पिता ने उन से कहा, फिर जाकर हमारे लिथे योड़ी सी भोजनवस्तु मोल ले आओ। 3 तब यहूदा ने उस से कहा, उस पुरूष ने हम को चितावनी देकर कहा, कि यदि तुम्हारा भाई तुम्हारे संग न आए, तो तुम मेरे सम्मुख न आने पाओगे। 4 इसलिथे यदि तू हमारे भाई को हमारे संग भेजे, तब तो हम जाकर तेरे लिथे भोजनवस्तु मोल ले आएंगे; 5 परन्तु यदि तू उसको न भेजे, तो हम न जाएंगे : क्योंकि उस पुरूष ने हम से कहा, कि यदि तुम्हारा भाई तुम्हारे संग न हो, तो तुम मेरे सम्मुख न आने पाओगे। 6 तब इस्राएल ने कहा, तुम ने उस पुरूष को यह बताकर कि हमारा एक और भाई है, क्योंमुझ से बुरा बर्ताव किया ? 7 उन्होंने कहा, जब उस पुरूष ने हमारी और हमारे कुटुम्बियोंकी दशा को इस रीति पूछा, कि क्या तुम्हारा पिता अब तक जीवित है? क्या तुम्हारे कोई और भाई भी है ? तब हम ने इन प्रश्नोंके अनुसार उस से वर्णन किया; फिर हम क्या जानते थे कि वह कहेगा, कि अपके भाई को यहां ले आओ। 8 फिर यहूदा ने अपके पिता इस्राएल से कहा, उस लड़के को मेरे संग भेज दे, कि हम चले जाएं; इस से हम, और तू, और हमारे बालबच्चे मरने न पाएंगे, वरन जीवित रहेंगे। 9 मैं उसका जामिन होता हूं; मेरे ही हाथ से तू उसको फेर लेना: यदि मैं उसको तेरे पास पहुंचाकर साम्हने न खड़ाकर दूं, तब तो मैं सदा के लिथे तेरा अपराधी ठहरूंगा। 10 यदि हम लोग विलम्ब न करते, तो अब तब दूसरी बार लौट आते। 11 तब उनके पिता इस्राएल ने उन से कहा, यदि सचमुच ऐसी ही बात है, तो यह करो; इस देश की उत्तम उत्तम वस्तुओं में से कुछ कुछ अपके बोरोंमें उस पुरूष के लिथे भेंट ले जाओ : जैसे योड़ा सा बलसान, और योड़ा सा मधु, और कुछ सुगन्ध द्रव्य, और गन्धरस, पिस्ते, और बादाम। 12 फिर अपके अपके साय दूना रूपया ले जाओ; और जो रूपया तुम्हारे बोरोंके मुंह पर रखकर फेर दिया गया या, उसको भी लेते जाओ; कदाचित्‌ यह भूल से हुआ हो। 13 और अपके भाई को भी संग लेकर उस पुरूष के पास फिर जाओ, 14 और सर्वशक्तिमान ईश्वर उस पुरूष को तुम पर दयालु करेगा, जिस से कि वह तुम्हारे दूसरे भाई को और बिन्यामीन को भी आने दे : और यदि मैं निर्वंश हुआ तो होने दो। 15 तब उन मनुष्योंने वह भेंट, और दूना रूपया, और बिन्यामीन को भी संग लिया, और चल दिए और मिस्र में पहुंचकर यूसुफ के साम्हने खड़े हुए। 16 उनके साय बिन्यामीन को देखकर यूसुफ ने अपके घर के अधिक्कारनेी से कहा, उन मनुष्योंको घर में पहुंचा दो, और पशु मारके भोजन तैयार करो; क्योंकि वे लोग दोपहर को मेरे संग भोजन करेंगे। 17 तब वह अधिक्कारनेी पुरूष यूसुफ के कहने के अनुसार उन पुरूषोंको यूसुफ के घर में ले गया। 18 जब वे यूसुफ के घर को पहुंचाए गए तब वे आपस में डरकर कहने लगे, कि जो रूपया पहिली बार हमारे बोरोंमें फेर दिया गया या, उसी के कारण हम भीतर पहुंचाए गए हैं; जिस से कि वह पुरूष हम पर टूट पके, और हमें वंश में करके अपके दास बनाए, और हमारे गदहोंको भी छीन ले। 19 तब वे यूसुफ के घर के अधिक्कारनेी के निकट जाकर घर के द्वार पर इस प्रकार कहने लगे, 20 कि हे हमारे प्रभु, जब हम पहिली बार अन्न मोल लेने को आए थे, 21 तब हम ने सराय में पहुंचकर अपके बोरोंको खोला, तो क्या देखा, कि एक एक जन का पूरा पूरा रूपया उसके बोरे के मुंह में रखा है; इसलिथे हम उसको अपके साय फिर लेते आए हैं। 22 और दूसरा रूपया भी भोजनवस्तु मोल लेने के लिथे लाए हैं; हम नहीं जानते कि हमारा रूपया हमारे बोरोंमें किस ने रख दिया या। 23 उस ने कहा, तुम्हारा कुशल हो, मत डरो: तुम्हारा परमेश्वर, जो तुम्हारे पिता का भी परमेश्वर है, उसी ने तुम को तुम्हारे बोरोंमें धन दिया होगा, तुम्हारा रूपया तो मुझ को मिल गया या: फिर उस ने शिमोन को निकालकर उनके संग कर दिया। 24 तब उस जन ने उन मनुष्योंको यूसुफ के घर में ले जाकर जल दिया, तब उन्होंने अपके पांवोंको धोया; फिर उस ने उनके गदहोंके लिथे चारा दिया। 25 तब यह सुनकर, कि आज हम को यहीं भोजन करना होगा, उन्होंने यूसुफ के आने के समय तक, अर्यात्‌ दोपहर तक, उस भेंट को इकट्ठा कर रखा। 26 जब यूसुफ घर आया तब वे उस भेंट को , जो उनके हाथ में यी, उसके सम्मुख घर में ले गए, और भूमि पर गिरकर उसको दण्डवत्‌ किया। 27 उस ने उनका कुशल पूछा, और कहा, क्या तुम्हारा बूढ़ा पिता, जिसकी तुम ने चर्चा की यी, कुशल से है ? क्या वह अब तक जीवित है ? 28 उन्होंने कहा, हां तेरा दास हमारा पिता कुशल से है और अब तक जीवित है; तब उन्होंने सिर फुकाकर फिर दण्डवत्‌ किया। 29 तब उस ने आंखे उठाकर और अपके सगे भाई बिन्यामीन को देखकर पूछा, क्या तुम्हारा वह छोटा भाई, जिसकी चर्चा तुम ने मुझ से की यी, यही है ? फिर उस ने कहा, हे मेरे पुत्र, परमेश्वर तुझ पर अनुग्रह करे। 30 तब अपके भाई के स्नेह से मन भर आने के कारण और यह सोचकर, कि मैं कहां जाकर रोऊं, यूसुफ फुर्ती से अपक्की कोठरी में गया, और वहां रो पड़ा। 31 फिर अपना मुंह धोकर निकल आया, और अपके को शांत कर कहा, भोजन परोसो। 32 तब उन्होंने उसके लिथे तो अलग, और भाइयोंके लिथे भी अलग, और जो मिस्री उसके संग खाते थे, उनके लिथे भी अलग, भोजन परोसा; इसलिथे कि मिस्री इब्रियोंके साय भोजन नहीं कर सकते, वरन मिस्री ऐसा करना घृणा समझते थे। 33 सो यूसुफ के भाई उसके साम्हने, बड़े बड़े पहिले, और छोटे छोटे पीछे, अपक्की अपक्की अवस्या के अनुसार, क्रम से बैठाए गए: यह देख वे विस्मित्‌ होकर एक दूसरे की ओर देखने लगे। 34 तब यूसुफ अपके साम्हने से भोजन-वस्तुएं उठा उठाके उनके पास भेजने लगा, और बिन्यामीन को अपके भाइयोंसे पचगुणी अधिक भोजनवस्तु मिली। और उन्होंने उसके संग मनमाना खाया पिया।

उत्पत्ति 44

1 तब उस ने अपके घर के अधिक्कारनेी को आज्ञा दी, कि इन मनुष्योंके बोरोंमें जितनी भोजनवस्तु समा सके उतनी भर दे, और एक एक जन के रूपके को उसके बोरे के मुंह पर रख दे। 2 और मेरा चांदी का कटोरा छोटे के बोरे के मुंह पर उसके अन्न के रूपके के साय रख दे। यूसुफ की इस आज्ञा के अनुसार उस ने किया। 3 बिहान को भोर होते ही वे मनुष्य अपके गदहोंसमेत विदा किए गए। 4 वे नगर से निकले ही थे, और दूर न जाने पाए थे, कि यूसुफ ने अपके घर के अधिक्कारनेी से कहा, उन मनुष्योंका पीछा कर, और उनको पाकर उन से कह, कि तुम ने भलाई की सन्ती बुराई क्योंकी है? 5 क्या यह वह वस्तु नहीं जिस में मेरा स्वामी पीता है, और जिस से वह शकुन भी विचारा करता है ? तुम ने यह जो किया है सो बुरा किया। 6 तब उस ने उन्हें जा लिया, और ऐसी ही बातें उन से कहीं। 7 उन्होंने उस से कहा, हे हमारे प्रभु, तू ऐसी बातें क्योंकहता है? ऐसा काम करना तेरे दासोंसे दूर रहे। 8 देख जो रूपया हमारे बोरोंके मुंह पर निकला या, जब हम ने उसको कनान देश से ले आकर तुझे फेर दिया, तब, भला, तेरे स्वामी के घर में से हम कोई चांदी वा सोने की वस्तु क्योंकर चुरा सकते हैं ? 9 तेरे दासोंमें से जिस किसी के पास वह निकले, वह मार डाला जाए, और हम भी अपके उस प्रभु के दास जो जाएं। 10 उस ने कहा तुम्हारा ही कहना सही, जिसके पास वह निकले सो मेरा दास होगा; और तुम लोग निरपराध ठहरोगे। 11 इस पर वे फुर्ती से अपके अपके बोरे को उतार भूमि पर रखकर उन्हें खोलने लगे। 12 तब वह ढूंढ़ने लगा, और बड़े के बोरे से लेकर छोटे के बोरे तक खोज की : और कटोरा बिन्यामीन के बोरे में मिला। 13 तब उन्होंने अपके अपके वस्त्र फाड़े, और अपना अपना गदहा लादकर नगर को लौट गए। 14 जब यहूदा और उसके भाई यूसुफ के घर पर पहुंचे, और यूसुफ वहीं या, तब वे उसके साम्हने भूमि पर गिरे। 15 यूसुफ ने उन से कहा, तुम लोगोंने यह कैसा काम किया है ? क्या तुम न जानते थे, कि मुझ सा मनुष्य शकुन विचार सकता है ? 16 यहूदा ने कहा, हम लोग अपके प्रभु से क्या कहें ? हम क्या कहकर अपके को निर्दोषी ठहराएं ? परमेश्वर ने तेरे दासोंके अधर्म को पकड़ लिया है : हम, और जिसके पास कटोरा निकला वह भी, हम सब के सब अपके प्रभु के दास ही हैं। 17 उस ने कहा, ऐसा करना मुझ से दूर रहे : जिस जन के पास कटोरा निकला है, वही मेरा दास होगा; और तुम लोग अपके पिता के पास कुशल झेम से चले जाओ। 18 तब यहूदा उसके पास जाकर कहने लगा, हे मेरे प्रभु, तेरे दास को अपके प्रभु से एक बात कहने की आज्ञा हो, और तेरा कोप तेरे दास पर न भड़के; तू तो फिरौन के तुल्य है। 19 मेरे प्रभु ने अपके दासोंसे पूछा या, कि क्या तुम्हारे पिता वा भाई हैं ? 20 और हम ने अपके प्रभु से कहा, हां, हमारा बूढ़ा पिता तो है, और उसके बुढ़ापे का एक छोटा सा बालक भी है, परन्तु उसका भाई मर गया है, इसलिथे वह अब अपक्की माता का अकेला ही रह गया है, और उसका पिता उस से स्नेह रखता है। 21 तब तू ने अपके दासोंसे कहा या, कि उसको मेरे पास ले आओ, जिस से मैं उसको देखूं। 22 तब हम ने अपके प्रभु से कहा या, कि वह लड़का अपके पिता को नहीं छोड़ सकता; नहीं तो उसका पिता मर जाएगा। 23 और तू ने अपके दासोंसे कहा, यदि तुम्हारा छोटा भाई तुम्हारे संग न आए, तो तुम मेरे सम्मुख फिर न आने पाओगे। 24 सो जब हम अपके पिता तेरे दास के पास गए, तब हम ने उस से अपके प्रभु की बातें कहीं। 25 तब हमारे पिता ने कहा, फिर जाकर हमारे लिथे योड़ी सी भोजनवस्तु मोल ले आओ। 26 हम ने कहा, हम नहीं जा सकते, हां, यदि हमारा छोटा भाई हमारे संग रहे, तब हम जाएंगे : क्योंकि यदि हमारा छोटा भाई हमारे संग न रहे, तो उस पुरूष के सम्मुख न जाने पाएंगे। 27 तब तेरे दास मेरे पिता ने हम से कहा, तुम तो जानते हो कि मेरी स्त्री से दो पुत्र उत्पन्न हुए। 28 और उन में से एक तो मुझे छोड़ ही गया, और मैं ने निश्चय कर लिया, कि वह फाड़ डाला गया होगा ; और तब से मैं उसका मुंह न देख पाया 29 सो यदि तुम इसको भी मेरी आंख की आड़ में ले जाओ, और कोई विपत्ति इस पर पके, तो तुम्हारे कारण मैं इस पक्के बाल की अवस्या में दु:ख के साय अधोलोक में उतर जाऊंगा। 30 सो जब मैं अपके पिता तेरे दास के पास पहुंचूं, और यह लड़का संग न रहे, तब, उसका प्राण जो इसी पर अटका रहता है, 31 इस कारण, यह देखके कि लड़का नहीं है, वह तुरन्त ही मर जाएगा। तब तेरे दासोंके कारण तेरा दास हमारा पिता, जो पक्के बालोंकी अवस्या का है, शोक के साय अधोलोक में उतर जाएगा। 32 फिर तेरा दास अपके पिता के यहां यह कहके इस लड़के का जामिन हुआ है, कि यदि मैं इसको तेरे पास न पहुंचा दूं, तब तो मैं सदा के लिथे तेरा अपराधी ठहरूंगा। 33 सो अब तेरा दास इस लड़के की सन्ती अपके प्रभु का दास होकर रहने की आज्ञा पाए, और यह लड़का अपके भाइयोंके संग जाने दिया जाए। 34 क्योंकि लड़के के बिना संग रहे मैं कयोंकर अपके पिता के पास जा सकूंगा; ऐसा न हो कि मेरे पिता पर जो दु:ख पकेगा वह मुझे देखना पके।।

उत्पत्ति 45

1 तब यूसुफ उन सब के साम्हने, जो उसके आस पास खड़े थे, अपके को और रोक न सका; और पुकार के कहा, मेरे आस पास से सब लोगोंको बाहर कर दो। भाइयोंके साम्हने अपके को प्रगट करने के समय यूसुफ के संग और कोई न रहा। 2 तब वह चिल्ला चिल्लाकर रोने लगा : और मिस्रियोंने सुना, और फिरौन के घर के लोगोंको भी इसका समाचार मिला। 3 तब यूसुफ अपके भाइयोंसे कहने लगा, मैं यूसुफ हूं, क्या मेरा पिता अब तब जीवित है ? इसका उत्तर उसके भाई न दे सके; क्योंकि वे उसके साम्हने घबरा गए थे। 4 फिर यूसुफ ने अपके भाइयोंसे कहा, मेरे निकट आओ। यह सुनकर वे निकट गए। फिर उस ने कहा, मैं तुम्हारा भाई यूसुफ हूं, जिसको तुम ने मिस्र आनेहारोंके हाथ बेच डाला या। 5 अब तुम लोग मत पछताओ, और तुम ने जो मुझे यहां बेच डाला, इस से उदास मत हो; क्योंकि परमेश्वर ने तुम्हारे प्राणोंको बचाने के लिथे मुझे आगे से भेज दिया है। 6 क्योंकि अब दो वर्ष से इस देश में अकाल है; और अब पांच वर्ष और ऐसे ही होंगे, कि उन में न तो हल चलेगा और न अन्न काटा जाएगा। 7 सो परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे आगे इसी लिथे भेजा, कि तुम पृय्वी पर जीवित रहो, और तुम्हारे प्राणोंके बचने से तुम्हारा वंश बढ़े। 8 इस रीति अब मुझ को यहां पर भेजनेवाले तुम नहीं, परमेश्वर ही ठहरा: और उसी ने मुझे फिरौन का पिता सा, और उसके सारे घर का स्वामी, और सारे मिस्र देश का प्रभु ठहरा दिया है। 9 सो शीघ्र मेरे पिता के पास जाकर कहो, तेरा पुत्र यूसुफ इस प्रकार कहता है, कि परमेश्वर ने मुझे सारे मिस्र का स्वामी ठहराया है; इसलिथे तू मेरे पास बिना विलम्ब किए चला आ। 10 और तेरा निवास गोशेन देश में होगा, और तू, बेटे, पोतों, भेड़-बकरियों, गाय-बैलों, और अपके सब कुछ समेत मेरे निकट रहेगा। 11 और अकाल के जो पांच वर्ष और होंगे, उन में मै वहीं तेरा पालन पोषण करूंगा; ऐसा न हो कि तू, और तेरा घराना, वरन जितने तेरे हैं, सो भूखोंमरें। 12 और तुम अपक्की आंखोंसे देखते हो, और मेरा भाई बिन्यामीन भी अपक्की आंखोंसे देखता है, कि जो हम से बातें कर रहा है सो यूसुफ है। 13 और तुम मेरे सब विभव का, जो मिस्र में है और जो कुछ तुम ने देखा है, उस सब को मेरे पिता से वर्णन करना; और तुरन्त मेरे पिता को यहां ले आना। 14 और वह अपके भाई बिन्यामीन के गले से लिपटकर रोया; और बिन्यामीन भी उसके गले से लिपटकर रोया। 15 तब वह अपके सब भाइयोंको चूमकर उन से मिलकर रोया : और इसके पश्चात्‌ उसके भाई उस से बातें करने लगे।। 16 इस बात की चर्चा, कि यूसुफ के भाई आए हैं, फिरौन के भवन तब पंहुच गई, और इस से फिरौन और उसके कर्मचारी प्रसन्न हुए। 17 सो फिरौन ने यूसुफ से कहा, अपके भाइयोंसे कह, कि एक काम करो, अपके पशुओं को लादकर कनान देश में चले जाओ। 18 और अपके पिता और अपके अपके घर के लोगोंको लेकर मेरे पास आओ; और मिस्र देश में जो कुछ अच्छे से अच्छा है वह मैं तुम्हें दूंगा, और तुम्हें देश के उत्तम से उत्तम पदार्य खाने को मिलेंगे। 19 और तुझे आज्ञा मिली है, तुम एक काम करो, कि मिस्र देश से अपके बालबच्चोंऔर स्त्रियोंके लिथे गाडिय़ोंले जाओ, और अपके पिता को ले आओ। 20 और अपक्की सामग्री का मोह न करना; क्योंकि सारे मिस्र देश में जो कुछ अच्छे से अच्छा है सो तुम्हारा है। 21 और इस्राएल के पुत्रोंने वैसा ही किया। और यूसुफ ने फिरौन की मानके उन्हें गाडिय़ोंदी, और मार्ग के लिथे सीधा भी दिया। 22 उन में से एक एक जन को तो उस ने एक एक जोड़ा वस्त्र भी दिया; और बिन्यामीन को तीन सौ रूपे के टुकड़े और पांच जोड़े वस्त्र दिए। 23 और अपके पिता के पास उस ने जो भेजा वह यह है, अर्यात्‌ मिस्र की अच्छी वस्तुओं से लदे हुए दस गदहे, और अन्न और रोटी और उसके पिता के मार्ग के लिथे भोजनवस्तु से लदी हुई दस गदहियां। 24 और उस ने अपके भाइयोंको विदा किया, और वे चल दिए; और उस ने उन से कहा, मार्ग में कहीं फगड़ा न करना। 25 मिस्र से चलकर वे कनान देश में अपके पिता याकूब के पास पहुचे। 26 और उस से यह वर्णन किया, कि यूसुफ अब तक जीवित है, और सारे मिस्र देश पर प्रभुता वही करता है। पर उस ने उनकी प्रतीति न की, और वह अपके आपे में न रहा। 27 तब उन्होंने अपके पिता याकूब से यूसुफ की सारी बातें, जो उस ने उन से कहीं यी, कह दीं; जब उस ने उन गाडिय़ोंको देखा, जो यूसुफ ने उसके ले आने के लिथे भेजीं यीं, तब उसका चित्त स्यिर हो गया। 28 और इस्राएल ने कहा, बस, मेरा पुत्र यूसुफ अब तक जीवित है : मैं अपक्की मृत्यु से पहिले जाकर उसको देखंूगा।।

उत्पत्ति 46

1 तब इस्राएल अपना सब कुछ लेकर कूच करके बेर्शेबा को गया, और वहां अपके पिता इसहाक के परमेश्वर को बलिदान चढ़ाए। 2 तब परमेश्वर ने इस्राएल से रात को दर्शन में कहा, हे याकूब हे याकूब। उस ने कहा, क्या आज्ञा। 3 उस ने कहा, मैं ईश्वर तेरे पिता का परमेश्वर हूं, तू मिस्र में जाने से मत डर; क्योंकि मैं तुझ से वहां एक बड़ी जाति बनाऊंगा। 4 मैं तेरे संग संग मिस्र को चलता हूं; और मैं तुझे वहां से फिर निश्चय ले आऊंगा; और यूसुफ अपना हाथ तेरी आंखोंपर लगाएगा। 5 तब याकूब बेर्शेबा से चला: और इस्राएल के पुत्र अपके पिता याकूब, और अपके बाल-बच्चों, और स्त्रियोंको उन गाडिय़ोंपर, जो फिरौन ने उनके ले आने को भेजी यी, चढ़ाकर चल पके। 6 और वे अपक्की भेड़-बकरी, गाय-बैल, और कनान देश में अपके इकट्ठा किए हुए सारे धन को लेकर मिस्र में आए। 7 और याकूब अपके बेटे-बेटियों, पोते-पोतियों, निदान अपके वंश भर को अपके संग मिस्र में ले आया।। 8 याकूब के साय जो इस्राएली, अर्यात्‌ उसके बेटे, पोते, आदि मिस्र में आए, उनके नाम थे हैं : याकूब का जेठा तो रूबेन या। 9 और रूबेन के पुत्र, हनोक, पललू, हेस्रोन, और कर्म्मी थे। 10 और शिमोन के पुत्र, यमूएल, यामीन, ओहद, याकीन, सोहर, और एक कनानी स्त्री से जन्मा हुआ शाऊल भी या। 11 और लेवी के पुत्र, गेर्शोन, कहात, और मरारी थे। 12 और यहूदा के एर, ओनान, शेला, पेरेस, और जेरह नाम पुत्र हुए तो थे; पर एर और ओनान कनान देश में मर गए थे। 13 और इस्साकार के पुत्र, तोला, पुब्बा, योब और शिम्रोन थे। 14 और जबूलून के पुत्र, सेरेद, एलोन, और यहलेल थे। 15 लिआ: के पुत्र, जो याकूब से पद्दनराम में उत्पन्न हुए थे, उनके बेटे पोते थे ही थे, और इन से अधिक उस ने उसके साय एक बेटी दीना को भी जन्म दिया : यहां तक तो याकूब के सब वंशवाले तैंतीस प्राणी हुए। 16 फिर गाद के पुत्र, सिय्योन, हाग्गी, शूनी, एसबोन, एरी, अरोदी, और अरेली थे। 17 और आशेर के पुत्र, यिम्ना, यिश्वा, यिस्त्री, और बरीआ थे, और उनकी बहिन सेरह यी। और बरीआ के पुत्र, हेबेर और मल्कीएल थे। 18 जिल्पा, जिसे लाबान ने अपक्की बेटी लिआ� को दिया या, उसके बेटे पोते आदि थे ही थे; सो उसके द्वारा याकूब के सोलह प्राणी उत्पन्न हुए।। 19 फिर याकूब की पत्नी राहेल के पुत्र यूसुफ और बिन्यामीन थे। 20 और मिस्र देश में ओन के याजक पोतीपेरा की बेटी आसनत से यूसुफ के थे पुत्र उत्पन्न हुए, अर्यात्‌ मनश्शे और एप्रैम। 21 और बिन्यामीन के पुत्र, बेला, बेकेर, अश्बेल, गेरा, नामान, एही, रोश, मुप्पीम, हुप्पीम, और आर्द थे। 22 राहेल के पुत्र जो याकूब से उत्पन्न हुए उनके थे ही पुत्र थे; उसके थे सब बेटे पोते चौदह प्राणी हुए। 23 फिर दान का पुत्र हुशीम या। 24 और नप्ताली के पुत्र, यहसेल, गूनी, सेसेर, और शिल्लेम थे। 25 बिल्हा, जिसे लाबान ने अपक्की बेटी राहेल को दिया, उस के बेटे पोते थे ही हैं; उसके द्वारा याकूब के वंश में सात प्राणी हुए। 26 याकूब के निज वंश के जो प्राणी मिस्र में आए, वे उसकी बहुओं को छोड़ सब मिलकर छियासठ प्राणी हुए। 27 और यूसुफ के पुत्र, जो मिस्र में उस से उत्पन्न हुए, वे दो प्राणी थे : इस प्रकार याकूब के घराने के जो प्राणी मिस्र में आए सो सब मिलकर सत्तर हुए।। 28 फिर उस ने यहूदा को अपके आगे यूसुफ के पास भेज दिया, कि वह उसको गोशेन का मार्ग दिखाए; और वे गोशेन देश में आए। 29 तब यूसुफ अपना रय जुतवाकर अपके पिता इस्राएल से भेंट करने के लिथे गोशेन देश को गया, और उस से भेंट करके उसके गले से लिपटा हुआ रोता रहा। 30 तब इस्राएल ने यूसुफ से कहा, मै अब मरने से भी प्रसन्न हूं, क्योंकि तुझे जीवित पाया और तेरा मुंह देख लिया। 31 तब यूसुफ ने अपके भाइयोंसे और अपके पिता के घराने से कहा, मैं जाकर फिरौन को यह समाचार दूंगा, कि मेरे भाई और मेरे पिता के सारे घराने के लोग, जो कनान देश में रहते थे, वे मेरे पास आ गए हैं। 32 और वे लोग चरवाहे हैं, क्योंकि वे पशुओं को पालते आए हैं; इसलिथे वे अपक्की भेड़-बकरी, गाय-बैल, और जो कुछ उनका है, सब ले आए हैं। 33 जब फिरौन तुम को बुलाके पूछे, कि तुम्हारा उद्यम क्या है? 34 तब यह कहना कि तेरे दास लड़कपन से लेकर आज तक पशुओं को पालते आए हैं, वरन हमारे पुरखा भी ऐसा ही करते थे। इस से तुम गोशेन देश में रहने पाओगे; क्योंकि सब चरवाहोंसे मिस्री लोग घृणा करते हैं।।

उत्पत्ति 47

1 तब यूसुफ ने फिरौन के पास जाकर यह समाचार दिया, कि मेरा पिता और मेरे भाई, और उनकी भेड़-बकरियां, गाय-बैल और जो कुछ उनका है, सब कनान देश से आ गया है; और अभी तो वे गोशेन देश में हैं। 2 फिर उस ने अपके भाइयोंमें से पांच जन लेकर फिरौन के साम्हने खड़े कर दिए। 3 फिरौन ने उसके भाइयोंसे पूछा, तुम्हारा उद्यम क्या है ? उन्होंने फिरौन से कहा, तेरे दास चरवाहे हैं, और हमारे पुरखा भी ऐसे ही रहे। 4 फिर उन्होंने फिरौन से कहा, हम इस देश में परदेशी की भांति रहने के लिथे आए हैं; क्योंकि कनान देश में भारी अकाल होने के कारण तेरे दासोंको भेड़-बकरियोंके लिथे चारा न रहा : सो अपके दासोंको गोशेन देश में रहने की आज्ञा दे। 5 तब फिरौन ने यूसुफ से कहा, तेरा पिता और तेरे भाई तेरे पास आ गए हैं, 6 और मिस्र देश तेरे साम्हने पड़ा है; इस देश का जो सब से अच्छा भाग हो, उस में अपके पिता और भाइयोंको बसा दे; अर्यात्‌ वे गोशेन ही देश में रहें : और यदि तू जानता हो, कि उन में से परिश्र्मी पुरूष हैं, तो उन्हें मेरे पशुओं के अधिक्कारनेी ठहरा दे। 7 तब यूसुफ ने अपके पिता याकूब को ले आकर फिरौन के सम्मुख खड़ा किया : और याकूब ने फिरौन को आशीर्वाद दिया। 8 तब फिरौन ने याकूब से पूछा, तेरी अवस्या कितने दिन की हुई है? 9 याकूब ने फिरौन से कहा, मैं तो एक सौ तीस वर्ष परदेशी होकर अपना जीवन बीता चुका हूं; मेरे जीवन के दिन योड़े और दु:ख से भरे हुए भी थे, और मेरे बापदादे परदेशी होकर जितने दिन तक जीवित रहे उतने दिन का मैं अभी नहीं हुआ। 10 और याकूब फिरौन को आशीर्वाद देकर उसके सम्मुख से चला गया। 11 तब यूसुफ ने अपके पिता और भाइयोंको बसा दिया, और फिरौन की आज्ञा के अनुसार मिस्र देश के अच्छे से अच्छे भाग में, अर्यात्‌ रामसेस नाम देश में, भूमि देकर उनको सौंप दिया। 12 और यूसुफ अपके पिता का, और अपके भाइयोंका, और पिता के सारे घराने का, एक एक के बालबच्चोंके घराने की गिनती के अनुसार, भोजन दिला दिलाकर उनका पालन पोषण करने लगा।। 13 और उस सारे देश में खाने को कुछ न रहा; क्योंकि अकाल बहुत भारी या, और अकाल के कारण मिस्र और कनान दोनोंदेश नाश हो गए। 14 और जितना रूपया मिस्र और कनान देश में या, सब को यूसुफ ने उस अन्न की सन्ती जो उनके निवासी मोल लेते थे इकट्ठा करके फिरौन के भवन में पहुंचा दिया। 15 जब मिस्र और कनान देश का रूपया चुक गया, तब सब मिस्री यूसुफ के पास आ आकर कहने लगे, हम को भोजनवस्तु दे, क्या हम रूपके के न रहने से तेरे रहते हुए मर जाएं ? 16 यूसुफ ने कहा, यदि रूपके न होंतो अपके पशु दे दो, और मैं उनकी सन्ती तुम्हें खाने को दूंगा। 17 तब वे अपके पशु यूसुफ के पास ले आए; और यूसुफ उनको घोड़ों, भेड़-बकरियों, गाय-बैलोंऔर गदहोंकी सन्ती खाने को देने लगा: उस वर्ष में वह सब जाति के पशुओं की सन्ती भोजन देकर उनका पालन पोषण करता रहा। 18 वह वर्ष तो योंकट गया; तब अगले वर्ष में उन्होंने उसके पास आकर कहा, हम अपके प्रभु से यह बात छिपा न रखेंगे कि हमारा रूपया चुक गया है, और हमारे सब प्रकार के पशु हमारे प्रभु के पास आ चुके हैं; इसलिथे अब हमारे प्रभु के साम्हने हमारे शरीर और भूमि छोड़कर और कुछ नहीं रहा। 19 हम तेरे देखते क्योंमरें, और हमारी भूमि को भोजन वस्तु की सन्ती मोल ले, कि हम अपक्की भूमि समेत फिरौन के दास हों: और हमको बीज दे, कि हम मरने न पाएं, वरन जीवित रहें, और भूमि न उजड़े। 20 तब यूसुफ ने मिस्र की सारी भूमि को फिरौन के लिथे मोल लिया; क्योंकि उस कठिन अकाल के पड़ने से मिस्रियोंको अपना अपना खेत बेच डालना पड़ा : इस प्रकार सारी भूमि फिरौन की हो गई। 21 और एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक सारे मिस्र देश में जो प्रजा रहती यी, उसको उस ने नगरोंमें लाकर बसा दिया। 22 पर याजकोंकी भूमि तो उस ने न मोल ली : क्योंकि याजकोंके लिथे फिरौन की ओर से नित्य भोजन का बन्दोबस्त या, और नित्य जो भोजन फिरौन उनको देता या वही वे खाते थे; इस कारण उनको अपक्की भूमि बेचक्की न पक्की। 23 तब यूसुफ ने प्रजा के लोगोंसे कहा, सुनो, मैं ने आज के दिन तुम को और तुम्हारी भूमि को भी फिरौन के लिथे मोल लिया है; देखो, तुम्हारे लिथे यहां बीज है, इसे भूमि में बोओ। 24 और जो कुछ उपके उसका पंचमांश फिरौन को देना, बाकी चार अंश तुम्हारे रहेंगे, कि तुम उसे अपके खेतोंमंे बोओ, और अपके अपके बालबच्चोंऔर घर के और लोगोंसमेत खाया करो। 25 उन्होंने कहा, तू ने हमको बचा लिया है : हमारे प्रभु के अनुग्रह की दृष्टि हम पर बनी रहे, और हम फिरौन के दास होकर रहेंगे। 26 सो यूसुफ ने मिस्र की भूमि के विषय में ऐसा नियम ठहराया, जो आज के दिन तक चला आता है, कि पंचमांश फिरौन को मिला करे; केवल याजकोंही की भूमि फिरौन की नहीं हुई। 27 और इस्राएली मिस्र के गोशेन देश में रहने लगे; और वहां की भूमि को अपके वश में कर लिया, और फूले-फले, और अत्यन्त बढ़ गए।। 28 मिस्र देश में याकूब सतरह वर्ष जीवित रहा : इस प्रकार याकूब की सारी आयु एक सौ सैंतालीस वर्ष की हुई। 29 जब इस्राएल के मरने का दिन निकट आ गया, तब उस ने अपके पुत्र यूसुफ को बुलवाकर कहा, यदि तेरा अनुग्रह मुझ पर हो, तो अपना हाथ मेरी जांघ के तले रखकर शपय खा, कि मैं तेरे साय कृपा और सच्चाई का यह काम करूंगा, कि तुझे मिस्र में मिट्टी न दूंगा। 30 जब तू अपके बापदादोंके संग सो जाएगा, तब मैं तुझे मिस्र से उठा ले जाकर उन्हीं के कबरिस्तान में रखूंगा; तब यूसुफ ने कहा, मैं तेरे वचन के अनुसार करूंगा। 31 फिर उस ने कहा, मुझ से शपय खा : सो उस ने उस से शपय खाई। तब इस्राएल ने खाट के सिरहाने की ओर सिर फुकाया।।

उत्पत्ति 48

1 इन बातोंके पश्चात्‌ किसी ने यूसुफ से कहा, सुन, तेरा पिता बीमार है; तब वह मनश्शे और एप्रैम नाम अपके दोनोंपुत्रोंको संग लेकर उसके पास चला। 2 और किसी ने याकूब को बता दिया, कि तेरा पुत्र यूसुफ तेरे पास आ रहा है; तब इस्राएल अपके को सम्भालकर खाट पर बैठ गया। 3 और याकूब ने यूसुफ से कहा, सर्वशक्तिमान ईश्वर ने कनान देश के लूज नगर के पास मुझे दर्शन देकर आशीष दी, 4 और कहा, सुन, मैं तुझे फुला-फलाकर बढ़ाऊंगा, और तुझे राज्य राज्य की मण्डली का मूल बनाऊंगा, और तेरे पश्चात्‌ तेरे वंश को यह देश दे दूंगा, जिस से कि वह सदा तक उनकी निज भूमि बनी रहे। 5 और अब तेरे दोनोंपुत्र, जो मिस्र में मेरे आने से पहिले उत्पन्न हुए हैं, वे मेरे ही ठहरेंगे; अर्यात्‌ जिस रीति से रूबेन और शिमोन मेरे हैं, उसी रीति से एप्रैम और मनश्शे भी मेरे ठहरेंगे। 6 और उनके पश्चात्‌ जो सन्तान उत्पन्न हो, वह तेरे तो ठहरेंगे; परन्तु बंटवारे के समय वे अपके भाइयोंही के वंश में गिने जाएंगे। 7 जब मैं पद्दान से आता या, तब एप्राता पहुंचने से योड़ी ही दूर पहिले राहेल कनान देश में, मार्ग में, मेरे साम्हने मर गई : और मैं ने उसे वहीं, अर्यात्‌ एप्राता जो बेतलेहम भी कहलाता है, उसी के मार्ग में मिट्टी दी। 8 तब इस्राएल को यूसुफ के पुत्र देख पके, और उस ने पूछा, थे कौन हैं ? 9 यूसुफ ने अपके पिता से कहा, थे मेरे पुत्र हैं, जो परमेश्वर ने मुझे यहां दिए हैं : उस ने कहा, उनको मेरे पास ले आ कि मैं उन्हें आशीर्वाद दूं। 10 इस्राएल की आंखे बुढ़ापे के कारण धुन्धली हो गई यीं, यहां तक कि उसे कम सूफता या। तब यूसुफ उन्हें उनके पास ले गया ; और उस ने उन्हें चूमकर गले लगा लिया। 11 तब इस्राएल ने यूसुफ से कहा, मुझे आशा न यी, कि मैं तेरा मुख फिर देखने पाऊंगा : परन्तु देख, परमेश्वर ने मुझे तेरा वंश भी दिखाया है। 12 तब यूसुफ ने उन्हें अपके घुटनोंके बीच से हटाकर और अपके मुंह के बल भूमि पर गिरके दण्डवत्‌ की। 13 तब यूसुफ ने उन दोनोंको लेकर, अर्यात्‌ एप्रैम को अपके दहिने हाथ से, कि वह इस्राएल के बाएं हाथ पके, और मनश्शे को अपके बाएं हाथ से, कि इस्राएल के दहिने हाथ पके, उन्हें उसके पास ले गया। 14 तब इस्राएल ने अपना दहिना हाथ बढ़ाकर एप्रैम के सिर पर जो छोटा या, और अपना बायां हाथ बढ़ाकर मनश्शे के सिर पर रख दिया; उस ने तो जान बूफकर ऐसा किया; नहीं तो जेठा मनश्शे ही या। 15 फिर उस ने यूसुफ को आशीर्वाद देकर कहा, परमेश्वर जिसके सम्मुख मेरे बापदादे इब्राहीम और इसहाक (अपके को जानकर ) चलते थे वही परमेश्वर मेरे जन्म से लेकर आज के दिन तक मेरा चरवाहा बना है ; 16 और वही दूत मुझे सारी बुराई से छुड़ाता आया है, वही अब इन लड़कोंको आशीष दे; और थे मेरे और मेरे बापदादे इब्राहीम और इसहाक के कहलाएं; और पृय्वी में बहुतायत से बढ़ें। 17 जब यूसुफ ने देखा, कि मेरे पिता ने अपना दहिना हाथ एप्रैम के सिर पर रखा है, तब यह बात उसको बुरी लगी : सो उस ने अपके पिता का हाथ इस मनसा से पकड़ लिया, कि एप्रैम के सिर पर से उठाकर मनश्शे के सिर पर रख दे। 18 और यूसुफ ने अपके पिता से कहा, हे पिता, ऐसा नहीं: क्योंकि जेठा यही है; अपना दहिना हाथ इसके सिर पर रख। 19 उसके पिता ने कहा, नहीं, सुन, हे मेरे पुत्र, मैं इस बात को भली भांति जानता हूं : यद्यपि इस से भी मनुष्योंकी एक मण्डली उत्पन्न होगी, और यह भी महान्‌ हो जाएगा, तौभी इसका छोटा भाई इस से अधिक महान हो जाएगा, और उसके वंश से बहुत सी जातियां निकलेंगी। 20 फिर उस ने उसी दिन यह कहकर उनको आशीर्वाद दिया, कि इस्राएली लोग तेरा नाम ले लेकर ऐसा आशीर्वाद दिया करेंगे, कि परमेश्वर तुझे एप्रैम और मनश्शे के समान बना दे : और उस ने मनश्शे से पहिले एप्रैम का नाम लिया। 21 तब इस्राएल ने यूसुफ से कहा, देख, मैं तो मरने पर हूं : परन्तु परमेश्वर तुम लोगोंके संग रहेगा, और तुम को तुम्हारे पितरोंके देश में फिर पहुंचा देगा। 22 और मैं तुझ को तेरे भाइयोंसे अधिक भूमि का एक भाग देता हूं, जिसको मैं ने एमोरियोंके हाथ से अपक्की तलवार और धनुष के बल से ले लिया है।

उत्पत्ति 49

1 फिर याकूब ने अपके पुत्रोंको यह कहकर बुलाया, कि इकट्ठे हो जाओ, मैं तुम को बताऊंगा, कि अन्त के दिनोंमें तुम पर क्या क्या बीतेगा। 2 हे याकूब के पुत्रों, इकट्ठे होकर सुनो, अपके पिता इस्राएल की ओर कान लगाओ। 3 हे रूबेन, तू मेरा जेठा, मेरा बल, और मेरे पौरूष का पहिला फल है; प्रतिष्ठा का उत्तम भाग, और शक्ति का भी उत्तम भाग तू ही है। 4 तू जो जल की नाईं उबलनेवाला है, इसलिथे औरोंसे श्रेष्ट न ठहरेगा; क्योंकि तू अपके पिता की खाट पर चढ़ा, तब तू ने उसको अशुद्ध किया; वह मेरे बिछौने पर चढ़ गया।। 5 शिमोन और लेवी तो भाई भाई हैं, उनकी तलवारें उपद्रव के हयियार हैं। 6 हे मेरे जीव, उनके मर्म में न पड़, हे मेरी महिमा, उनकी सभा में मत मिल; क्योंकि उन्होंने कोप से मनुष्योंको घात किया, और अपक्की ही इच्छा पर चलकर बैलोंकी पूंछें काटी हैं।। 7 धिक्कार उनके कोप को, जो प्रचण्ड या; और उनके रोष को, जो निर्दय या; मैं उन्हें याकूब में अलग अलग और इस्राएल में तित्तर बित्तर कर दूंगा।। 8 हे यहूदा, तेरे भाई तेरा धन्यवाद करेंगे, तेरा हाथ तेरे शत्रुओं की गर्दन पर पकेगा; तेरे पिता के पुत्र तुझे दण्डवत्‌ करेंगे।। 9 यहूदा सिंह का डांवरू है। हे मेरे पुत्र, तू अहेर करके गुफा में गया है : वह सिंह वा सिंहनी की नाई दबकर बैठ गया; फिर कौन उसको छेड़ेगा।। 10 जब तक शीलो न आए तब तक न तो यहूदा से राजदण्ड छूटेगा, न उसके वंश से व्यवस्या देनेवाला अलग होगा; और राज्य राज्य के लोग उसके अधीन हो जाएंगे।। 11 वह अपके जवान गदहे को दाखलता में, और अपक्की गदही के बच्चे को उत्तम जाति की दाखलता में बान्धा करेगा ; उस ने अपके वस्त्र दाखमधु में, और अपना पहिरावा दाखोंके रस में धोया है।। 12 उसकी आंखे दाखमधु से चमकीली और उसके दांत दूध से श्वेत होंगे।। 13 जबूलून समुद्र के तीर पर निवास करेगा, वह जहाजोंके लिथे बन्दरगाह का काम देगा, और उसका परला भाग सीदोन के निकट पहुंचेगा 14 इस्साकार एक बड़ा और बलवन्त गदहा है, जो पशुओं के बाड़ोंके बीच में दबका रहता है।। 15 उस ने एक विश्रमस्यान देखकर, कि अच्छा है, और एक देश, कि मनोहर है, अपके कन्धे को बोफ उठाने के लिथे फुकाया, और बेगारी में दास का सा काम करने लगा।। 16 दान इस्राएल का एक गोत्र होकर अपके जातिभाइयोंका न्याय करेगा।। 17 दान मार्ग में का एक सांप, और रास्ते में का एक नाग होगा, जो घोड़े की नली को डंसता है, जिस से उसका सवार पछाड़ खाकर गिर पड़ता है।। 18 हे यहोवा, मैं तुझी से उद्धार पाने की बाट जोहता आया हूं।। 19 गाद पर एक दल चढ़ाई तो करेगा; पर वह उसी दल के पिछले भाग पर छापा मारेगा।। 20 आशेर से जो अन्न उत्पन्न होगा वह उत्तम होगा, और वह राजा के योग्य स्वादिष्ट भोजन दिया करेगा।। 21 नप्ताली एक छूटी हुई हरिणी है; वह सुन्दर बातें बोलता है।। 22 यूसुफ बलवन्त लता की एक शाखा है, वह सोते के पास लगी हुई फलवन्त लता की एक शाखा है; उसकी डालियां भीत पर से चढ़कर फैल जाती हैं।। 23 धनुर्धारियोंने उसको खेदित किया, और उस पर तीर मारे, और उसके पीछे पके हैं।। 24 पर उसका धनुष दृढ़ रहा, और उसकी बांह और हाथ याकूब के उसी शक्तिमान ईश्वर के हाथोंके द्वारा फुर्तीले हुए, जिसके पास से वह चरवाहा आएगा, जो इस्राएल का पत्यर भी ठहरेगा।। 25 यह तेरे पिता के उस ईश्वर का काम है, जो तेरी सहाथता करेगा, उस सर्वशक्तिमान को जो तुझे ऊपर से आकाश में की आशीषें, और नीचे से गहिरे जल में की आशीषें, और स्तनों, और गर्भ की आशीषें देगा।। 26 तेरे पिता के आशीर्वाद मेरे पितरोंके आशीर्वाद से अधिक बढ़ गए हैं और सनातन पहाडिय़ोंकी मन- चाही वस्तुओं की नाई बने रहेंगे : वे यूसुफ के सिर पर, जो अपके भाइयोंमें से न्यारा हुआ, उसी के सिर के मुकुट पर फूले फलेंगे।। 27 बिन्यामीन फाड़नेहारा हुण्डार है, सवेरे तो वह अहेर भझण करेगा, और सांफ को लूट बांट लेगा।। 28 इस्राएल के बारहोंगोत्र थे ही हैं : और उनके पिता ने जिस जिस वचन से उनको आशीर्वाद दिया, सो थे ही हैं; एक एक को उसके आशीर्वाद के अनुसार उस ने आशीर्वाद दिया। 29 तब उस ने यह कहकर उनको आज्ञा दी, कि मैं अपके लोगोंके साय मिलने पर हूं : इसलिथे मुझे हित्ती एप्रोन की भूमिवाली गुफा में मेरे बापदादोंके साय मिट्टी देना, 30 अर्यात्‌ उसी गुफा में जो कनान देश में मम्रे के साम्हनेवाली मकपेला की भूमि में है; उस भूमि को तो इब्राहीम ने हित्ती एप्रोन के हाथ से इसी निमित्त मोल लिया या, कि वह कबरिस्तान के लिथे उसकी निज भूमि हो। 31 वहां इब्राहीम और उसकी पत्नी सारा को मिट्टी दी गई; और वहीं इसहाक और उसकी पत्नी रिबका को भी मिट्टी दी गई; और वहीं मैं ने लिआ: को भी मिट्टी दी। 32 वह भूमि और उस में की गुफा हित्तियोंके हाथ से मोल ली गई। 33 यह आज्ञा जब याकूब अपके पुत्रोंको दे चुका, तब अपके पांव खाट पर समेट प्राण छोड़े, और अपके लोगोंमें जा मिला।

उत्पत्ति 50

1 तब यूसुफ अपके पिता के मुंह पर गिरकर रोया और उसे चूमा। 2 और यूसुफ ने उन वैद्योंको, जो उसके सेवक थे, आज्ञा दी, कि मेरे पिता की लोय में सुगन्धद्रव्य भरो; तब वैद्योंने इस्राएल की लोय में सुगन्धद्रव्य भर दिए। 3 और उसके चालीस दिन पूरे हुए। क्योंकि जिनकी लोय में सुगन्धद्रव्य भरे जाते हैं, उनको इतने ही दिन पूरे लगते हैं : और मिस्री लोग उसके लिथे सत्तर दिन तक विलाप करते रहे।। 4 जब उसके विलाप के दिन बीत गए, तब यूसुफ फिरौन के घराने के लोगोंसे कहने लगा, यदि तुम्हारी अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर हो तो मेरी यह बिनती फिरौन को सुनाओ, 5 कि मेरे पिता ने यह कहकर, कि देख मैं मरने पर हूं, मुझे यह शपय खिलाई, कि जो कबर तू ने अपके लिथे कनान देश में खुदवाई है उसी में मैं तुझे मिट्टी दूंगा इसलिथे अब मुझे वहां जाकर अपके पिता को मिट्टी देने की आज्ञा दे, तत्पश्चात्‌ मैं लौट आऊंगा। 6 तब फिरौन ने कहा, जाकर अपके पिता की खिलाई हुई शपय के अनुसार उनको मिट्टी दे। 7 सो यूसुफ अपके पिता को मिट्टी देने के लिथे चला, और फिरौन के सब कर्मचारी, अर्यात्‌ उसके भवन के पुरनिथे, और मिस्र देश के सब पुरनिथे उसके संग चले। 8 और यूसुफ के घर के सब लोग, और उसके भाई, और उसके पिता के घर के सब लोग भी संग गए; पर वे अपके बालबच्चों, और भेड़-बकरियों, और गाय-बैलोंको गोशेन देश में छोड़ गए। 9 और उसके संग रय और सवार गए, सो भीड़ बहुत भारी हो गई। 10 जब वे आताद के खलिहान तक, जो यरदन नदी के पार है पहुंचे, तब वहां अत्यन्त भारी विलाप किया, और यूसुफ ने अपके पिता के सात दिन का विलाप कराया। 11 आताद के खलिहान में के विलाप को देखकर उस देश के निवासी कनानियोंने कहा, यह तो मिस्रियोंका कोई भारी विलाप होगा, इसी कारण उस स्यान का नाम आबेलमिस्रैम पड़ा, और वह यरदन के पार है। 12 और इस्राएल के पुत्रोंने उस से वही काम किया जिसकी उस ने उनको आज्ञा दी यी: 13 अर्यात्‌ उन्होंने उसको कनान देश में ले जाकर मकपेला की उस भूमिवाली गुफा में, जो मम्रे के साम्हने हैं, मिट्टी दी; जिसको इब्राहीम ने हित्ती एप्रोन के हाथ से इस निमित्त मोल लिया या, कि वह कबरिस्तान के लिथे उसकी निज भूमि हो।। 14 अपके पिता को मिट्टी देकर यूसुफ अपके भाइयोंऔर उन सब समेत, जो उसके पिता को मिट्टी देने के लिथे उसके संग गए थे, मिस्र में लौट आया। 15 जब यूसुफ के भाइयोंने देखा कि हमारा पिता मर गया है, तब कहने लगे, कदाचित्‌ यूसुफ अब हमारे पीछे पके, और जितनी बुराई हम ने उस से की यी सब का पूरा पलटा हम से ले। 16 इसलिथे उन्होंने यूसुफ के पास यह कहला भेजा, कि तेरे पिता ने मरने से पहिले हमें यह आज्ञा दी यी, 17 कि तुम लोग यूसुफ से इस प्रकार कहना, कि हम बिनती करते हैं, कि तू अपके भाइयोंके अपराध और पाप को झमा कर; हम ने तुझ से बुराई तो की यी, पर अब अपके पिता के परमेश्वर के दासोंका अपराध झमा कर। उनकी थे बातें सुनकर यूसुफ रो पड़ा। 18 और उसके भाई आप भी जाकर उसके साम्हने गिर पके, और कहा, देख, हम तेरे दास हैं। 19 यूसुफ ने उन से कहा, मत डरो, क्या मैं परमेश्वर की जगह पर हूं ? 20 यद्यपि तुम लोगोंने मेरे लिथे बुराई का विचार किया या; परन्तु परमेश्वर ने उसी बात में भलाई का विचार किया, जिस से वह ऐसा करे, जैसा आज के दिन प्रगट है, कि बहुत से लोगोंके प्राण बचे हैं। 21 सो अब मत डरो : मैं तुम्हारा और तुम्हारे बाल-बच्चोंका पालन पोषण करता रहूंगा; इस प्रकार उस ने उनको समझा बुफाकर शान्ति दी।। 22 और यूसुफ अपके पिता के घराने समेत मिस्र में रहता रहा, और यूसुफ एक सौ दस वर्ष जीवित रहा। 23 और यूसुफ एप्रैम के परपोतोंतक देखने पाया : और मनश्शे के पोते, जो माकीर के पुत्र थे, वे उत्पन्न होकर यूसुफ से गोद में लिए गए। 24 और यूसुफ ने अपके भाइयोंसे कहा मैं तो मरने पर हूं; परन्तु परमेश्वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा, और तुम्हें इस देश से निकालकर उस देश में पहुंचा देगा, जिसके देने की उस ने इब्राहीम, इसहाक, और याकूब से शपय खाई यी। 25 फिर यूसुफ ने इस्राएलियोंसे यह कहकर, कि परमेश्वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा, उनको इस विषय की शपय खिलाई, कि हम तेरी हड्डियोंको वहां से उस देश में ले जाएंगे। 26 निदान यूसुफ एक सौ दस वर्ष का होकर मर गया : और उसकी लोय में सुगन्धद्रव्य भरे गए, और वह लोय मिस्र में एक सन्दूक में रखी गई।।

निर्गमन 1

1 इस्राएल के पुत्रोंके नाम, जो अपके अपके घराने को लेकर याकूब के साय मिस्र देश में आए, थे हैं: 2 अर्यात्‌ रूबेन, शिमोन, लेवी, यहूदा, 3 इस्साकार, जबूलून, बिन्यामीन, 4 दान, नप्ताली, गाद और आशेर। 5 और यूसुफ तो मिस्र में पहिले ही आ चुका या। याकूब के निज वंश में जो उत्पन्न हुए वे सब सत्तर प्राणी थे। 6 और यूसुफ, और उसके सब भाई , और उस पीढ़ी के सब लोग मर मिटे। 7 और इस्राएल की सन्तान फूलने फलने लगी; और वे अत्यन्त सामर्यी बनते चले गए; और इतना बढ़ गए कि कुल देश उन से भर गया।। 8 मिस्र में एक नया राजा गद्दी पर बैठा जो यूसुफ को नहीं जानता या। 9 और उस ने अपक्की प्रजा से कहा, देखो, इस्राएली हम से गिनती और सामर्य्य में अधिक बढ़ गए हैं। 10 इसलिथे आओ, हम उनके साय बुद्धिमानी से बर्ताव करें, कहीं ऐसा न हो कि जब वे बहुत बढ़ जाएं, और यदि संग्राम का समय आ पके, तो हमारे बैरियोंसे मिलकर हम से लड़ें और इस देश से निकल जाएं। 11 इसलिथे उन्होंने उन पर बेगारी करानेवालोंको नियुक्त किया कि वे उन पर भार डाल डालकर उनको दु:ख दिया करें; तब उन्होंने फिरौन के लिथे पितोम और रामसेस नाम भण्डारवाले नगरोंको बनाया। 12 पर ज्योंज्योंवे उनको दु:ख देते गए त्योंत्योंवे बढ़ते और फैलते चले गए; इसलिथे वे इस्राएलियोंसे अत्यन्त डर गए। 13 तौभी मिस्रियोंने इस्राएलियोंसे कठोरता के साय सेवकाई करवाई। 14 और उनके जीवन को गारे, ईंट और खेती के भांति भांति के काम की कठिन सेवा से दु:खी कर डाला; जिस किसी काम में वे उन से सेवा करवाते थे उस में वे कठोरता का व्यवहार करते थे। 15 शिप्रा और पूआ नाम दो इब्री धाइयोंको मिस्र के राजा ने आज्ञा दी, 16 कि जब तुम इब्री स्त्रियोंको बच्चा उत्पन्न होने के समय जन्मने के पत्यरोंपर बैठी देखो, तब यदि बेटा हो, तो उसे मार डालना; और बेटी हो, तो जीवित रहने देना। 17 परन्तु वे धाइयां परमेश्वर का भय मानती यीं, इसलिथे मिस्र के राजा की आज्ञा न मानकर लड़कोंको भी जीवित छोड़ देती यीं। 18 तब मिस्र के राजा ने उनको बुलवाकर पूछा, तुम जो लड़कोंको जीवित छोड़ देती हो, तो ऐसा क्योंकरती हो? 19 धाइयोंने फिरौन को उतर दिया, कि इब्री स्त्रियोंमिस्री स्त्रियोंके समान नहीं हैं; वे ऐसी फुर्तीली हैं कि धाइयोंके पहुंचने से पहिले ही उनको बच्चा उत्पन्न हो जाता है। 20 इसलिथे परमेश्वर ने धाइयोंके साय भलाई की; और वे लोग बढ़कर बहुत सामर्यी हो गए। 21 और धाइयां इसलिथे कि वे परमेश्वर का भय मानती यीं उस ने उनके घर बसाए। 22 तब फिरौन ने अपक्की सारी प्रजा के लोगोंको आज्ञा दी, कि इब्रियोंके जितने बेटे उत्पन्न होंउन सभोंको तुम नील नदी में डाल देना, और सब बेटियोंको जीवित रख छोड़ना।।

निर्गमन 2

1 लेवी के घराने के एक पुरूष ने एक लेवी वंश की स्त्री को ब्याह लिया। 2 और वह स्त्री गर्भवती हुई और उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ; और यह देखकर कि यह बालक सुन्दर है, उसे तीन महीने तक छिपा रखा। 3 और जब वह उसे और छिपा न सकी तब उसके लिथे सरकंड़ोंकी एक टोकरी लेकर, उस में बालक को रखकर नील नदी के तीर पर कांसोंके बीच छोड़ आई। 4 उस बालक कि बहिन दूर खड़ी रही, कि देखे इसका क्या हाल होगा। 5 तब फिरौन की बेटी नहाने के लिथे नदी के तीर आई; उसकी सखियां नदी के तीर तीर टहलने लगीं; तब उस ने कांसोंके बीच टोकरी को देखकर अपक्की दासी को उसे ले आने के लिथे भेजा। 6 तब उस ने उसे खोलकर देखा, कि एक रोता हुआ बालक है; तब उसे तरस आया और उस ने कहा, यह तो किसी इब्री का बालक होगा। 7 तब बालक की बहिन ने फिरौन की बेटी से कहा, क्या मैं जाकर इब्री स्त्रियोंमें से किसी धाई को तेरे पास बुला ले आऊं जो तेरे लिथे बालक को दूध पिलाया करे? 8 फिरौन की बेटी ने कहा, जा। तब लड़की जाकर बालक की माता को बुला ले आई। 9 फिरौन की बेटी ने उस से कहा, तू इस बालक को ले जाकर मेरे लिथे दूध पिलाया कर, और मैं तुझे मजदूरी दूंगी। तब वह स्त्री बालक को ले जाकर दूध पिलाने लगी। 10 जब बालक कुछ बड़ा हुआ तब वह उसे फिरौन की बेटी के पास ले गई, और वह उसका बेटा ठहरा; और उस ने यह कहकर उसका नाम मूसा रखा, कि मैं ने इसको जल से निकाल लिया।। 11 उन दिनोंमें ऐसा हुआ कि जब मूसा जवान हुआ, और बाहर अपके भाई बन्धुओं के पास जाकर उनके दु:खोंपर दृष्टि करने लगा; तब उस ने देखा, कि कोई मिस्री जन मेरे एक इब्री भाई को मार रहा है। 12 जब उस ने इधर उधर देखा कि कोई नहीं है, तब उस मिस्री को मार डाला और बालू में छिपा दिया।। 13 फिर दूसरे दिन बाहर जाकर उस ने देखा कि दो इब्री पुरूष आपस में मारपीट कर रहे हैं; उस ने अपराधी से कहा, तू अपके भाई को क्योंमारता है ? 14 उस ने कहा, किस ने तुझे हम लोगोंपर हाकिम और न्यायी ठहराया ? जिस भांति तू ने मिस्री को घात किया क्या उसी भांति तू मुझे भी घात करना चाहता है ? तब मूसा यह सोचकर डर गया, कि निश्चय वह बात खुल गई है। 15 जब फिरौन ने यह बात सुनी तब मूसा को घात करने की युक्ति की। तब मूसा फिरौन के साम्हने से भागा, और मिद्यान देश में जाकर रहने लगा; और वह वहां एक कुएं के पास बैठ गया। 16 मिद्यान के याजक की सात बेटियां यी; और वे वहां आकर जल भरने लगीं, कि कठौतोंमें भरके अपके पिता की भेड़बकरियोंको पिलाएं। 17 तब चरवाहे आकर उनको हटाने लगे; इस पर मूसा ने खड़ा होकर उनकी सहाथता की, और भेड़-बकरियोंको पानी पिलाया। 18 जब वे अपके पिता रूएल के पास फिर आई, तब उस ने उन से पूछा, क्या कारण है कि आज तुम ऐसी फुर्ती से आई हो ? 19 उन्होंने कहा, एक मिस्री पुरूष ने हम को चरवाहोंके हाथ से छुड़ाया, और हमारे लिथे बहुत जल भरके भेड़-बकरियोंको पिलाया। 20 तब उस ने अपक्की बेटियोंसे कहा, वह पुरूष कहां है ? तुम उसको क्योंछोड़ आई हो ? उसको बुला ले आओ कि वह भोजन करे। 21 और मूसा उस पुरूष के साय रहने को प्रसन्न हुआ; उस ने उसे अपक्की बेटी सिप्पोरा को ब्याह दिया। 22 और उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ, तब मूसा ने यह कहकर, कि मैं अन्य देश में परदेशी हूं, उसका नाम गेर्शोम रखा।। 23 बहुत दिनोंके बीतने पर मिस्र का राजा मर गया। और इस्राएली कठिन सेवा के कारण लम्बी लम्बी सांस लेकर आहें भरने लगे, और पुकार उठे, और उनकी दोहाई जो कठिन सेवा के कारण हुई वह परमेश्वर तक पहुंची। 24 और परमेश्वर ने उनका कराहना सुनकर अपक्की वाचा को, जो उस ने इब्राहीम, और इसहाक, और याकूब के साय बान्धी यी, स्मरण किया। 25 और परमेश्वर ने इस्राएलियोंपर दृष्टि करके उन पर चित्त लगाया।।

निर्गमन 3

1 मूसा अपके ससुर यित्रो नाम मिद्यान के याजक की भेड़-बकरियोंको चराता या; और वह उन्हें जंगल की परली ओर होरेब नाम परमेश्वर के पर्वत के पास ले गया। 2 और परमेश्वर के दूत ने एक कटीली फाड़ी के बीच आग की लौ में उसको दर्शन दिया; और उस ने दृष्टि उठाकर देखा कि फाड़ी जल रही है, पर भस्म नहीं होती। 3 तब मूसा ने सोचा, कि मैं उधर फिरके इस बड़े अचम्भे को देखूंगा, कि वह फाड़ी क्योंनहीं जल जाती। 4 जब यहोवा ने देखा कि मूसा देखने को मुड़ा चला आता है, तब परमेश्वर ने फाड़ी के बीच से उसको पुकारा, कि हे मूसा, हे मूसा। मूसा ने कहा, क्या आज्ञा। 5 उस ने कहा इधर पास मत आ, और अपके पांवोंसे जूतियोंको उतार दे, क्योंकि जिस स्यान पर तू खड़ा है वह पवित्र भूमि है। 6 फिर उस ने कहा, मैं तेरे पिता का परमेश्वर, और इब्राहीम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, और याकूब का परमेश्वर हूं। तब मूसा ने जो परमेश्वर की ओर निहारने से डरता या अपना मुंह ढ़ाप लिया। 7 फिर यहोवा ने कहा, मैं ने अपक्की प्रजा के लोग जो मिस्र में हैं उनके दु:ख को निश्चय देखा है, और उनकी जो चिल्लाहट परिश्र्म करानेवालोंके कारण होती है उसको भी मैं ने सुना है, और उनकी पीड़ा पर मैं ने चित्त लगाया है ; 8 इसलिथे अब मैं उतर आया हूं कि उन्हें मिस्रियोंके वश से छुड़ाऊं, और उस देश से निकालकर एक अच्छे और बड़े देश में जिस में दूध और मधु की धारा बहती है, अर्यात्‌ कनानी, हित्ती, एमोरी, परिज्जी, हिव्वी, और यबूसी लोगोंके स्यान में पहुंचाऊं। 9 सो अब सुन, इस्राएलियोंकी चिल्लाहट मुझे सुनाई पक्की है, और मिस्रियोंका उन पर अन्धेर करना भी मुझे दिखाई पड़ा है, 10 इसलिथे आ, मैं तुझे फिरौन के पास भेजता हूं कि तू मेरी इस्राएली प्रजा को मिस्र से निकाल ले आए। 11 तब मूसा ने परमेश्वर से कहा, मै कौन हूं जो फिरौन के पास जाऊं, और इस्राएलियोंको मिस्र से निकाल ले आऊं ? 12 उस ने कहा, निश्चय मैं तेरे संग रहूंगा; और इस बात का कि तेरा भेजनेवाला मैं हूं, तेरे लिथे यह चिन्ह होगा कि जब तू उन लोगोंको मिस्र से निकाल चुके तब तुम इसी पहाड़ पर परमेश्वर की उपासना करोगे। 13 मूसा ने परमेश्वर से कहा, जब मैं इस्राएलियोंके पास जाकर उन से यह कहूं, कि तुम्हारे पितरोंके परमेश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है, तब यदि वे मुझ से पूछें, कि उसका क्या नाम है? तब मैं उनको क्या बताऊं? 14 परमेश्वर ने मूसा से कहा, मैं जो हूं सो हूं। फिर उस ने कहा, तू इस्राएलियोंसे यह कहना, कि जिसका नाम मैं हूं है उसी ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। 15 फिर परमेश्वर ने मूसा से यह भी कहा, कि तू इस्राएलियोंसे यह कहना, कि तुम्हारे पितरोंका परमेश्वर, अर्यात्‌ इब्राहीम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर और याकूब का परमेश्वर, यहोवा उसी ने मुझ को तुम्हारे पास भेजा है। देख सदा तक मेरा नाम यही रहेगा, और पीढ़ी पीढ़ी में मेरा स्मरण इसी से हुआ करेगा। 16 इसलिथे अब जाकर इस्राएली पुरनियोंको इकट्ठा कर, और उन से कह, कि तुम्हारे पितर इब्राहीम, इसहाक, और याकूब के परमेश्वर, यहोवा ने मुझे दर्शन देकर यह कहा है, कि मैं ने तुम पर और तुम से जो बर्ताव मिस्र में किया जाता है उस पर भी चित लगाया है; 17 और मैं ने ठान लिया है कि तुम को मिस्र के दुखोंमें से निकालकर कनानी, हित्ती, एमोरी, परिज्जी हिब्बी, और यबूसी लोगोंके देश में ले चलूंगा, जो ऐसा देश है कि जिस में दूध और मधु की धारा बहती है। 18 तब वे तेरी मानेंगे; और तू इस्राएली पुरनियोंको संग लेकर मिस्र के राजा के पास जाकर उस से योंकहना, कि इब्रियोंके परमेश्वर, यहोवा से हम लोगोंकी भेंट हुई है; इसलिथे अब हम को तीन दिन के मार्ग पर जंगल में जाने दे, कि अपके परमेश्वर यहोवा को बलिदान चढ़ाएं। 19 मैं जानता हूं कि मिस्र का राजा तुम को जाने न देगा वरन बड़े बल से दबाए जाने पर भी जाने न देगा। 20 इसलिथे मैं हाथ बढ़ाकर उन सब आश्चर्यकर्मोंसे जो मिस्र के बीच करूंगा उस देश को मारूंगा; और उसके पश्चात्‌ वह तुम को जाने देगा। 21 तब मैं मिस्रियोंसे अपक्की इस प्रजा पर अनुग्रह करवाऊंगा; और जब तुम निकलोगे तब छूछे हाथ न निकलोगे। 22 वरन तुम्हारी एक एक स्त्री अपक्की अपक्की पड़ोसिन, और अपके अपके घर की पाहुनी से सोने चांदी के गहने, और वस्त्र मांग लेगी, और तुम उन्हें अपके बेटोंऔर बेटियोंको पहिराना; इस प्रकार तुम मिस्रियोंको लूटोगे।।

निर्गमन 4

1 तब मूसा ने उतर दिया, कि वे मेरी प्रतीति न करेंगे और न मेरी सुनेंगे, वरन कहेंगे, कि यहोवा ने तुझ को दर्शन नहीं दिया। 2 यहोवा ने उस से कहा, तेरे हाथ में वह क्या है ? वह बोला, लाठी। 3 उस ने कहा, उसे भूमि पर डाल दे; जब उस ने उसे भूमि पर डाला तब वह सर्प बन गई, और मूसा उसके साम्हने से भागा। 4 तब यहोवा ने मूसा से कहा, हाथ बढ़ाकर उसकी पूंछ पकड़ ले कि वे लोग प्रतीति करें कि तुम्हारे पितरोंके परमेश्वर अर्यात्‌ इब्राहीम के परमेश्वर, इसहाक के परमेश्वर, और याकूब के परमेश्वर, यहोवा ने तुझ को दर्शन दिया है। 5 तब उस ने हाथ बढ़ाकर उसको पकड़ा तब वह उसके हाथ में फिर लाठी बन गई। 6 फिर यहोवा ने उस से यह भी कहा, कि अपना हाथ छाती पर रखकर ढांप। सो उस ने अपना हाथ छाती पर रखकर ढांप लिया; फिर जब उसे निकाला तब क्या देखा, कि उसका हाथ कोढ़ के कारण हिम के समान श्वेत हो गया है। 7 तब उस ने कहा, अपना हाथ छाती पर फिर रखकर ढांप। और उस ने अपना हाथ छाती पर रखकर ढांप लिया; और जब उस ने उसको छाती पर से निकाला तब क्या देखता है, कि वह फिर सारी देह के समान हो गया। 8 तब यहोवा ने कहा, यदि वे तेरी बात की प्रतीति न करें, और पहिले चिन्ह को न मानें, तो दूसरे चिन्ह की प्रतीति करेंगे। 9 और यदि वे इन दोनोंचिन्होंकी प्रतीति न करें और तेरी बात को न मानें, तब तू नील नदी से कुछ जल लेकर सूखी भूमि पर डालना; और जो जल तू नदी से निकालेगा वह सूखी भूमि पर लोहू बन जाथेगा। 10 मूसा ने यहोवा से कहा, हे मेरे प्रभु, मैं बोलने में निपुण नहीं, न तो पहिले या, और न जब से तू अपके दास से बातें करने लगा; मैं तो मुंह और जीभ का भद्दा हूं। 11 यहोवा ने उस से कहा, मनुष्य का मुंह किस ने बनाया है ? और मनुष्य को गूंगा, वा बहिरा, वा देखनेवाला, वा अन्धा, मुझ यहोवा को छोड़ कौन बनाता है ? 12 अब जा, मैं तेरे मुख के संग होकर जो तुझे कहना होगा वह तुझे सिखलाता जाऊंगा। 13 उस ने कहा, हे मेरे प्रभु, जिसको तू चाहे उसी के हाथ से भेज। 14 तब यहोवा का कोप मूसा पर भड़का और उस ने कहा, क्या तेरा भाई लेवीय हारून नहीं है ? मुझे तो निश्चय है कि वह बोलने में निपुण है, और वह तेरी भेंट के लिथे निकला भी आता है, और तुझे देखकर मन में आनन्दित होगा। 15 इसलिथे तू उसे थे बातें सिखाना; और मैं उसके मुख के संग और तेरे मुख के संग होकर जो कुछ तुम्हे करना होगा वह तुम को सिखलाता जाऊंगा। 16 और वह तेरी ओर से लोगोंसे बातें किया करेगा; वह तेरे लिथे मुंह और तू उसके लिथे परमेश्वर ठहरेगा। 17 और तू इस लाठी को हाथ में लिए जा, और इसी से इन चिन्होंको दिखाना।। 18 तब मूसा अपके ससुर यित्रो के पास लौटा और उस से कहा, मुझे विदा कर, कि मैं मिस्र में रहनेवाले अपके भाइयोंके पास जाकर देखूं कि वे अब तक जीवित हैं वा नहीं। यित्रो ने कहा, कुशल से जा। 19 और यहोवा ने मिद्यान देश में मूसा से कहा, मिस्र को लौट जा; क्योंकि जो मनुष्य तेरे प्राण के प्यासे थे वे सब मर गए हैं 20 तब मूसा अपक्की पत्नी और बेटोंको गदहे पर चढ़ाकर मिस्र देश की ओर परमेश्वर की उस लाठी को हाथ में लिथे हुए लौटा। 21 और यहोवा ने मूसा से कहा, जब तू मिस्र में पहुंचे तब सावधान हो जाना, और जो चमत्कार मैं ने तेरे वश में किए हैं उन सभोंको फिरौन को दिखलाना; परन्तु मै उसके मन को हठीला करूंगा, और वह मेरी प्रजा को जाने न देगा। 22 और तू फिरौन से कहना, कि यहोवा योंकहता है, कि इस्राएल मेरा पुत्र वरन मेरा जेठा है, 23 और मैं जो तुझ से कह चुका हूं, कि मेरे पुत्र को जाने दे कि वह मेरी सेवा करे; और तू ने अब तक उसे जाने नहीं दिया, इस कारण मैं अब तेरे पुत्र वरन तेरे जेठे को घात करूंगा। 24 और ऐसा हुआ कि मार्ग पर सराय में यहोवा ने मूसा से भेंट करके उसे मार डालना चाहा। 25 तब सिप्पोरा ने एक तेज चकमक पत्यर लेकर अपके बेटे की खलड़ी को काट डाला, और मूसा के पावोंपर यह कहकर फेंक दिया, कि निश्चय तू लोहू बहानेवाला मेरा पति है। 26 तब उस ने उसको छोड़ दिया। और उसी समय खतने के कारण वह बोली, तू लोहू बहानेवाला पति है। 27 तब यहोवा ने हारून से कहा, मूसा से भेंट करने को जंगल में जा। और वह गया, और परमेश्वर के पर्वत पर उस से मिला और उसको चूमा। 28 तब मूसा ने हारून को यह बतलाया कि यहोवा ने क्या क्या बातें कहकर उसको भेजा है, और कौन कौन से चिन्ह दिखलाने की आज्ञा उसे दी है। 29 तब मूसा और हारून ने जाकर इस्राएलियोंके सब पुरनियोंको इकट्ठा किया। 30 और जितनी बातें यहोवा ने मूसा से कही यी वह सब हारून ने उन्हें सुनाई, और लोगोंके साम्हने वे चिन्ह भी दिखलाए। 31 और लोगोंने उनकी प्रतीति की; और यह सुनकर, कि यहोवा ने इस्राएलियोंकी सुधि ली और उनके दु:खोंपर दृष्टि की है, उन्होंने सिर फुकाकर दण्डवत की।।

निर्गमन 5

1 इसके पश्चात्‌ मूसा और हारून ने जाकर फिरौन से कहा, इस्राएल का परमेश्वर यहोवा योंकहता है, कि मेरी प्रजा के लोगोंको जाने दे, कि वे जंगल में मेरे लिथे पर्व्व करें। 2 फिरौन ने कहा, यहोवा कौन है, कि मैं उसका वचन मानकर इस्राएलियोंको जाने दूं ? मैं यहोवा को नहीं जानता, और मैं इस्राएलियोंको नहीं जाने दूंगा। 3 उन्होंने कहा, इब्रियोंके परमेश्वर ने हम से भेंट की है; सो हमें जंगल में तीन दिन के मार्ग पर जाने दे, कि अपके परमेश्वर यहोवा के लिथे बलिदान करें, ऐसा न हो कि वह हम में मरी फैलाए वा तलवार चलवाए। 4 मिस्र के राजा ने उन से कहा, हे मूसा, हे हारून, तुम क्योंलोगोंसे काम छुड़वाने चाहते हो? तुम जाकर अपके अपके बोफ को उठाओ। 5 और फिरोन ने कहा, सुनो, इस देश में वे लोग बहुत हो गए हैं, फिर तुम उनको परिश्र्म से विश्रम दिलाना चाहते हो ! 6 और फिरौन ने उसी दिन उन परिश्र्म करवानेवालोंको जो उन लोगोंके ऊपर थे, और उनके सरदारोंको यह आज्ञा दी, 7 कि तुम जो अब तक ईटें बनाने के लिथे लोगोंको पुआल दिया करते थे सो आगे को न देना; वे आप ही जाकर अपके लिथे पुआल इकट्ठा करें। 8 तौभी जितनी ईंटें अब तक उन्हें बनानी पड़ती यीं उतनी ही आगे को भी उन से बनवाना, ईंटोंकी गिनती कुछ भी न घटाना; क्योंकि वे आलसी हैं; इस कारण यह कहकर चिल्लाते हैं, कि हम जाकर अपके परमेश्वर के लिथे बलिदान करें। 9 उन मनुष्योंसे और भी कठिन सेवा करवाई जाए कि वे उस में परिश्र्म करते रहें और फूठी बातोंपर ध्यान न लगाएं। 10 तब लोगोंके परिश्र्म करानेवालोंने और सरदारोंने बाहर जाकर उन से कहा, फिरौन इस प्रकार कहता है, कि मैं तुम्हें पुआल नहीं दूंगा। 11 तुम ही जाकर जहां कहीं पुआल मिले वहां से उसको बटोर कर ले आओ; परन्तु तुम्हारा काम कुछ भी नहीं घटाया जाएगा। 12 सो वे लोग सारे मिस्र देश में तित्तर-बित्तर हुए कि पुआल की सन्ती खूंटी बटोरें। 13 और परिश्र्म करनेवाले यह कह कहकर उन से जल्दी करते रहे, कि जिस प्रकार तुम पुआल पाकर किया करते थे उसी प्रकार अपना प्रतिदिन का काम अब भी पूरा करो। 14 और इस्राएलियोंमें से जिन सरदारोंको फिरौन के परिश्र्म करानेवालोंने उनका अधिक्कारनेी ठहराया या, उन्होंने मार खाई, और उन से पूछा गया, कि क्या कारण है कि तुम ने अपक्की ठहराई हुई ईंटोंकी गिनती के अनुसार पहिले की नाई कल और आज पूरी नहीं कराई ? 15 तब इस्राएलियोंके सरदारोंने जाकर फिरौन की दोहाई यह कहकर दी, कि तू अपके दासोंसे ऐसा बर्ताव क्योंकरता है? 16 तेरे दासोंको पुआल तो दिया ही नहीं जाता और वे हम से कहते रहते हैं, ईंटे बनाओ, ईंटें बनाओ, और तेरे दासोंने भी मार खाई हैं; परन्तु दोष तेरे ही लोगोंका है। 17 फिरौन ने कहा, तुम आलसी हो, आलसी; इसी कारण कहते हो कि हमे यहोवा के लिथे बलिदान करने को जाने दे। 18 और जब आकर अपना काम करो; और पुआल तुम को नहीं दिया जाएगा, परन्तु ईटोंकी गिनती पूरी करनी पकेगी। 19 जब इस्राएलियोंके सरदारोंने यह बात सुनी कि उनकी ईंटोंकी गिनती न घटेगी, और प्रतिदिन उतना ही काम पूरा करना पकेगा, तब वे जान गए कि उनके दुर्भाग्य के दिन आ गए हैं। 20 जब वे फिरौन के सम्मुख से बाहर निकल आए तब मूसा और हारून, जो उन से भेंट करने के लिथे खड़े थे, उन्हें मिले। 21 और उन्होंने मूसा और हारून से कहा, यहोवा तुम पर दृष्टि करके न्याय करे, क्योंकि तुम ने हम को फिरौन और उसके कर्मचारियोंकी दृष्टि में घृणित ठहरवाकर हमें घात करने के लिथे उनके हाथ में तलवार दे दी है। 22 तब मूसा ने यहोवा के पास लौट कर कहा, हे प्रभु, तू ने इस प्रजा के साय ऐसी बुराई क्योंकी? और तू ने मुझे यहां क्योंभेजा ? 23 जब से मैं तेरे नाम से फिरौन के पास बातें करने के लिथे गया तब से उसने इस प्रजा के साय बुरा ही व्यवहार किया है, और तू ने अपक्की प्रजा का कुछ भी छुटकारा नहीं किया।

निर्गमन 6

1 तब यहोवा ने मूसा से कहा, अब तू देखेगा कि मैं फिरौन ने क्या करूंगा; जिस से वह उनको बरबस निकालेगा, वह तो उन्हें अपके देश से बरबस निकाल देगा।। 2 और परमेश्वर ने मूसा से कहा, कि मैं यहोवा हूं। 3 मैं सर्वशक्तिमान ईश्वर के नाम से इब्राहीम, इसहाक, और याकूब को दर्शन देता या, परन्तु यहोवा के नाम से मैं उन पर प्रगट न हुआ। 4 और मैं ने उनके साय अपक्की वाचा दृढ़ की है, अर्यात्‌ कनान देश जिस में वे परदेशी होकर रहते थे, उसे उन्हें दे दूं। 5 और इस्राएली जिन्हें मिस्री लोग दासत्व में रखते हैं उनका कराहना भी सुनकर मैं ने अपक्की वाचा को स्मरण किया है। 6 इस कारण तू इस्राएलियोंसे कह, कि मैं यहोवा हूं, और तुम को मिस्रियोंके बोफोंके नीचे से निकालूंगा, और उनके दासत्व से तुम को छुड़ाऊंगा, और अपक्की भुजा बढ़ाकर और भारी दण्ड देकर तुम्हें छुड़ा लूंगा, 7 और मैं तुम को अपक्की प्रजा बनाने के लिथे अपना लूंगा, और मैं तुम्हारा परमेश्वर ठहरूंगा; और तुम जान लोगे कि मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं जो तुम्हें मिस्रियोंके बोफोंके नीचे से निकाल ले आया। 8 और जिस देश के देने की शपय मैं ने इब्राहीम, इसहाक, और याकूब से खाई यी उसी में मैं तुम्हें पहुंचाकर उसे तुम्हारा भाग कर दूंगा। मैं तो यहोवा हूं। 9 और थे बातें मूसा ने इस्राएलियोंको सुनाई; परन्तु उन्होंने मन की बेचैनी और दासत्व की क्रूरता के कारण उसकी न सुनी।। 10 तब यहोवा ने मूसा से कहा, 11 तू जाकर मिस्र के राजा फिरौन से कह, कि इस्राएलियोंको अपके देश में से निकल जाने दे। 12 और मूसा ने यहोवा से कहा, देख, इस्राएलियोंने मेरी नहीं सुनी; फिर फिरौन मुझ भद्दे बोलनेवाले की क्योंकर सुनेगा ? 13 और यहोवा ने मूसा और हारून को इस्राएलियोंऔर मिस्र के राजा फिरौन के लिथे आज्ञा इस अभिप्राय से दी कि वे इस्राएलियोंको मिस्र देश से निकाल ले जाएं। 14 उनके पितरोंके घरानोंके मुख्य पुरूष थे हैं : इस्राएल के जेठा रूबेन के पुत्र : हनोक, पल्लू, हेस्रोन और कर्म्मी थे; 15 और शिमोन के पुत्र : यमूएल, यामीन, ओहद, याकिन, और सोहर थे, और एक कनानी स्त्री का बेटा शाउल भी या; इन्हीं से शिमोन के कुल निकले। 16 और लेवी के पुत्र जिन से उनकी वंशावली चक्की है, उनके नाम थे हैं : अर्यात्‌ गेर्शोन, कहात और मरारी, और लेवी को पूरी अवस्या एक सौ सैंतीस वर्ष की हुई। 17 गेर्शोन के पुत्र जिन से उनका कुल चला : लिबनी और शिमी थे। 18 और कहात के पुत्र : अम्राम, यिसहार, हेब्रोन और उज्जीएल थे, और कहात की पूरी अवस्या एक सौ सैंतीस वर्ष की हुई। 19 और मरारी के पुत्र : महली और मूशी थे। लेवियोंके कुल जिन से उनकी वंशावली चक्की थे ही हैं। 20 अम्राम ने अपक्की फूफी योकेबेद को ब्याह लिया और उस से हारून और मूसा उत्पन्न हुए, और अम्राम की पूरी अवस्या एक सौ सैंतीस वर्ष की हुई। 21 और यिसहार के पुत्र कोरह, नेपेग और जिक्री थे। 22 और उज्जीएल के पुत्र: मीशाएल, एलसापन और सित्री थे। 23 और हारून ने अम्मीनादाब की बेटी, और नहशोन की बहिन एलीशेबा को ब्याह लिया; और उस से नादाब, अबीहू, ऐलाजार और ईतामार उत्पन्न हुए। 24 और कोरह के पुत्र : अस्सीर, एलकाना और अबीआसाप थे; और इन्हीं से कोरहियोंके कुल निकले। 25 और हारून के पुत्र एलाजार ने पूतीएल की एक बेटी को ब्याह लिया; और उस से पीनहास उत्पन्न हुआ जिन से उनका कुल चला। लेवियोंके पितरोंके घरानोंके मुख्य पुरूष थे ही हैं। 26 हारून और मूसा वे ही हैं जिनको यहोवा ने यह आज्ञा दी, कि इस्राएलियोंको दल दल करके उनके जत्योंके अनुसार मिस्र देश से निकाल ले आओ। 27 थे वही मूसा और हारून हैं जिन्होंने मिस्र के राजा फिरौन से कहा, कि हम इस्राएलियोंको मिस्र से निकाल ले जाएंगे।। 28 जब यहोवा ने मिस्र देश में मूसा से यह बात कही, 29 कि मैं तो यहोवा हूं; इसलिथे जो कुछ मैं तुम से कहूंगा वह सब मिस्र के राजा फिरौन से कहना। 30 और मूसा ने यहोवा को उत्तर दिया, कि मैं तो बोलने में भद्दा हूं; और फिरोन क्योंकर मेरी सुनेगा ?

निर्गमन 7

1 तब यहोवा ने मूसा से कहा, सुन, मैं तुझे फिरौन के लिथे परमेश्वर सा ठहराता हूं; और तेरा भाई हारून तेरा नबी ठहरेगा। 2 जो जो आज्ञा मैं तुझे दूं वही तू कहना, और हारून उसे फिरौन से कहेगा जिस से वह इस्राएलियोंको अपके देश से निकल जाने दे। 3 और मैं फिरौन के मन को कठोर कर दूंगा, और अपके चिन्ह और चमत्कार मिस्र देश में बहुत से दिखलाऊंगा। 4 तौभी फिरौन तुम्हारी न सुनेगा; और मैं मिस्र देश पर अपना हाथ बढ़ाकर मिस्रियोंको भारी दण्ड देकर अपक्की सेना अर्यात्‌ अपक्की इस्राएली प्रजा को मिस्र देश से निकाल लूंगा। 5 और जब मैं मिस्र पर हाथ बढ़ा कर इस्राएलियोंको उनके बीच से निकालूंगा तब मिस्री जान लेंगे, कि मैं यहोवा हूं। 6 तब मूसा और हारून ने यहोवा की आज्ञा के अनुसार ही किया। 7 और जब मूसा और हारून फिरौन से बात करने लगे तब मूसा तो अस्सी वर्ष का या, और हारून तिरासी वर्ष का या।। 8 फिर यहोवा ने, मूसा और हारून से इस प्रकार कहा, 9 कि जब फिरौन तुम से कहे, कि अपके प्रमाण का कोई चमत्कार दिखाओ, तब तू हारून से कहना, कि अपक्की लाठी को लेकर फिरौन के साम्हने डाल दे, कि वह अजगर बन जाए। 10 तब मूसा और हारून ने फिरौन के पास जाकर यहोवा की आज्ञा के अनुसार किया; और जब हारून ने अपक्की लाठी को फिरौन और उसके कर्मचारियोंके साम्हने डाल दिया, तब वह अजगर बन गया। 11 तब फिरौन ने पण्डितोंऔर टोनहा करनेवालोंको बुलवाया; और मिस्र के जादूगरोंने आकर अपके अपके तंत्र मंत्र से वैसा ही किया। 12 उन्होंने भी अपक्की अपक्की लाठी को डाल दिया, और वे भी अजगर बन गए। पर हारून की लाठी उनकी लाठियोंको निगल गई। 13 परन्तु फिरौन का मन और हठीला हो गया, और यहोवा के वचन के अनुसार उस ने मूसा और हारून की बातोंको नहीं माना।। 14 तब यहोवा ने मूसा से कहा, फिरोन का मन कठोर हो गया है और वह इस प्रजा को जाने नहीं देता। 15 इसलिथे बिहान को फिरौन के पास जा, वह तो जल की ओर बाहर आएगा; और जो लाठी सर्प बन गई यी, उसको हाथ में लिए हुए नील नदी के तट पर उस से भेंट करने के लिथे खड़ा रहना। 16 और उस से इस प्रकार कहना, कि इब्रियोंके परमेश्वर यहोवा ने मुझे यह कहने के लिथे तेरे पास भेजा है, कि मेरी प्रजा के लोगोंको जाने दे कि जिस से वे जंगल में मेरी उपासना करें; और अब तक तू ने मेरा कहना नहीं माना। 17 यहोवा योंकहता है, इस से तू जान लेगा कि मैं ही परमेश्वर हूं; देख, मै अपके हाथ की लाठी को नील नदी के जल पर मारूंगा, और जल लोहू बन जाएगा, 18 और जो मछलियां नील नदी में हैं वे मर जाएंगी, और नील नदी बसाने लगेगी, और नदी का पानी पीने के लिथे मिस्रियोंका जी न चाहेगा। 19 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, हारून से कह, कि अपक्की लाठी लेकर मिस्र देश में जितना जल है, अर्यात्‌ उसकी नदियां, नहरें, फीलें, और पोखरे, सब के ऊपर अपना हाथ बढ़ा कि उनका जल लोहू बन जाए; और सारे मिस्र देश में काठ और पत्यर दोनोंभांति के जलपात्रोंमें लोहू ही लोहू हो जाएगा। 20 तब मूसा और हारून ने यहोवा की आज्ञा ही के अनुसार किया, अर्यात्‌ उस ने लाठी को उठाकर फिरौन और उसके कर्मचारियोंके देखते नील नदी के जल पर मारा, और नदी का सब जल लोहू बन गया। 21 और नील नदी में जो मछलियां यीं वे मर गई; और नदी से दुर्गन्ध आने लगी, और मिस्री लोग नदी का पानी न पी सके; और सारे मिस्र देश में लोहू हो गया। 22 तब मिस्र के जादूगरोंने भी अपके तंत्र-मंत्रो से वैसा ही किया; तौभी फिरौन का मन हठीला हो गया, और यहोवा के कहने के अनुसार उस ने मूसा और हारून की न मानी। 23 फिरौन ने इस पर भी ध्यान नहीं दिया, और मुंह फेर के अपके घर में चला गया। 24 और सब मिस्री लोग पीने के जल के लिथे नील नदी के आस पास खोदने लगे, क्योंकि वे नदी का जल नहीं पी सकते थे। 25 और जब यहोवा ने नील नदी को मारा या तब से सात दिन हो चुके थे।।

निर्गमन 8

1 और तब यहोवा ने फिर मूसा से कहा, फिरौन के पास जाकर कह, यहोवा तुझ से इस प्रकार कहता है, कि मेरी प्रजा के लोगोंको जाने दे जिस से वे मेरी उपासना करें। 2 और यदि उन्हें जाने न देगा तो सुन, मैं मेंढ़क भेजकर तेरे सारे देश को हानि पहुंचानेवाला हूं। 3 और नील नदी मेंढ़कोंसे भर जाएगी, और वे तेरे भवन में, और तेरे बिछौने पर, और तेरे कर्मचारियोंके घरोंमें, और तेरी प्रजा पर, वरन तेरे तन्दूरोंऔर कठौतियोंमें भी चढ़ जाएंगे। 4 और तुझ पर, और तेरी प्रजा, और तेरे कर्मचारियों, सभोंपर मेंढ़क चढ़ जाएंगे। 5 फिर यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी, कि हारून से कह दे, कि नदियों, नहरों, और फीलोंके ऊपर लाठी के साय अपना हाथ बढ़ाकर मेंढकोंको मिस्र देश पर चढ़ा ले आए। 6 तब हारून ने मिस्र के जलाशयोंके ऊपर अपना हाथ बढ़ाया; और मेंढ़कोंने मिस्र देश पर चढ़कर उसे छा लिया। 7 और जादूगर भी अपके तंत्र-मंत्रोंसे उसी प्रकार मिस्र देश पर मेंढक चढ़ा ले आए। 8 तक फिरौन ने मूसा और हारून को बुलवाकर कहा, यहोवा से बिनती करो कि वह मेंढ़कोंको मुझ से और मेरी प्रजा से दूर करे; और मैं इस्राएली लोगोंको जाने दूंगा जिस से वे यहोवा के लिथे बलिदान करें। 9 तब मूसा ने फिरौन से कहा, इतनी बात पर तो मुझ पर तेरा घमंड रहे, अब मैं तेरे, और तेरे कर्मचारियों, और प्रजा के निमित्त कब बिनती करूं, कि यहोवा तेरे पास से और तेरे घरोंमें से मेंढकोंको दूर करे, और वे केवल नील नदी में पाए जाएं ? 10 उस ने कहा, कल। उस ने कहा, तेरे वचन के अनुसार होगा, जिस से तुझे यह ज्ञात हो जाए कि हमारे परमेश्वर यहोवा के तुल्य कोई दूसरा नहीं है। 11 और मेंढक तेरे पास से, और तेरे घरोंमें से, और तेरे कर्मचारियोंऔर प्रजा के पास से दूर होकर केवल नील नदी में रहेंगे। 12 तब मूसा और हारून फिरौन के पास से निकल गए; और मूसा ने उन मेंढकोंके विषय यहोवा की दोहाई दी जो उस ने फिरौन पर भेजे थे। 13 और यहोवा ने मूसा के कहने के अनुसार किया; और मेंढक घरों, आंगनों, और खेतोंमें मर गए। 14 और लोगोंने इकट्ठे करके उनके ढेर लगा दिए, और सारा देश दुर्गन्ध से भर गया। 15 परन्तु जब फिरोन ने देखा कि अब आराम मिला है तक यहोवा के कहने के अनुसार उस ने फिर अपके मन को कठोर किया, और उनकी न सुनी।। 16 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, हारून को आज्ञा दे, कि तू अपक्की लाठी बढ़ाकर भूमि की धूल पर मार, जिस से वह मिस्र देश भर में कुटकियां बन जाएं। 17 और उन्होंने वैसा ही किया; अर्यात्‌ हारून ने लाठी को ले हाथ बढ़ाकर भूमि की धूल पर मारा, तब मनुष्य और पशु दोनोंपर कुटकियां हो गई वरन सारे मिस्र देश में भूमि की धूल कुटकियां बन गई। 18 तब जादूगरोंने चाहा कि अपके तंत्र मंत्रोंके बल से हम भी कुटकियां ले आएं, परन्तु यह उन से न हो सका। और मनुष्योंऔर पशुओं दोनोंपर कुटकियां बनी ही रहीं। 19 तब जादूगरोंने फिरौन से कहा, यह तो परमेश्वर के हाथ का काम है। तौभी यहोवा के कहने के अनुसार फिरौन का मन कठोर होता गया, और उस ने मूसा और हारून की बात न मानी।। 20 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, बिहान को तड़के उठकर फिरौन के साम्हने खड़ा होना, वह तो जल की ओर आएगा, और उस से कहना, कि यहोवा तुझ से यह कहता है, कि मेरी प्रजा के लोगोंको जाने दे, कि वे मेरी उपासना करें। 21 यदि तू मेरी प्रजा को न जाने देगा तो सुन, मैं तुझ पर, और तेरे कर्मचारियोंऔर तेरी प्रजा पर, और तेरे घरोंमें फुंड के फुंड डांस भेजूंगा; और मिस्रियोंके घर और उनके रहने की भूमि भी डांसोंसे भर जाएगी। 22 उस दिन मैं गोशेन देश को जिस में मेरी प्रजा रहती है अलग करूंगा, और उस में डांसोंके फुंड न होंगे; जिस से तू जान ले कि पृय्वी के बीच मैं ही यहोवा हूं। 23 और मैं अपक्की प्रजा और तेरी प्रजा में अन्तर ठहराऊंगा। यह चिन्ह कल होगा। 24 और यहोवा ने वैसा ही किया, और फिरौन के भवन, और उसके कर्मचारियोंके घरोंमें, और सारे मिस्र देश में डांसोंके फुंड के फुंड भर गए, और डांसोंके मारे वह देश नाश हुआ। 25 तब फिरौन ने मूसा और हारून को बुलवाकर कहा, तुम जाकर अपके परमेश्वर के लिथे इसी देश में बलिदान करो। 26 मूसा ने कहा, ऐसा करना उचित नहीं; क्योंकि हम अपके परमेश्वर यहोवा के लिथे मिस्रियोंकी घृणित वस्तु बलिदान करेंगें; और यदि हम मिस्रियोंके देखते उनकी घृणित वस्तु बलिदान करें तो क्या वे हम को पत्यरवाह न करेंगे ? 27 हम जंगल में तीन दिन के मार्ग पर जाकर अपके परमेश्वर यहोवा के लिथे जैसा वह हम से कहेगा वैसा ही बलिदान करेंगे। 28 फिरौन ने कहा, मैं तुम को जंगल में जाने दूंगा कि तुम अपके परमेश्वर यहोवा के लिथे जंगल में बलिदान करो; केवल बहुत दूर न जाना, और मेरे लिथे बिनती करो। 29 तब मूसा ने कहा, सुन, मैं तेरे पास से बाहर जाकर यहोवा से बिनती करूंगा कि डांसोंके फुंड तेरे, और तेरे कर्मचारियों, और प्रजा के पास से कल ही दूर हों; पर फिरौन आगे को कपट करके हमें यहोवा के लिथे बलिदान करने को जाने देने के लिथे नाहीं न करे। 30 सो मूसा ने फिरौन के पास से बाहर जाकर यहोवा से बिनती की। 31 और यहोवा ने मूसा के कहे के अनुसार डांसोंके फुण्डोंको फिरौन, और उसके कर्मचारियों, और उसकी प्रजा से दूर किया; यहां तक कि एक भी न रहा। 32 तक फिरौन ने इस बार भी अपके मन को सुन्न किया, और उन लोगोंको जाने न दिया।।

निर्गमन 9

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, फिरोन के पास जाकर कह, कि इब्रियोंका परमेश्वर यहोवा तुझ से इस प्रकार कहता है, कि मेरी प्रजा के लोगोंको जाने दे, कि मेरी उपासना करें। 2 और यदि तू उन्हें जाने न दे और अब भी पकड़े रहे, 3 तो सुन, तेरे जो घोड़े, गदहे, ऊंट, गाय-बैल, भेड़-बकरी आदि पशु मैदान में हैं, उन पर यहोवा का हाथ ऐसा पकेगा कि बहुत भारी मरी होगी। 4 और यहोवा इस्राएलियोंके पशुओं में और मिस्रियोंके पशुओं में ऐसा अन्तर करेगा, कि जो इस्राएलियोंके हैं उन में से कोई भी न मरेगा। 5 फिर यहोवा ने यह कहकर एक समय ठहराया, कि मैं यह काम इस देश में कल करूंगा। 6 दूसरे दिन यहोवा ने ऐसा ही किया; और मिस्र के तो सब पशु मर गए, परन्तु इस्राएलियोंका एक भी पशु न मरा। 7 और फिरौन ने लोगोंको भेजा, पर इस्राएलियोंके पशुओं में से एक भी नहीं मरा या। तौभी फिरौन का मन सुन्न हो गया, और उस ने उन लोगोंको जाने न दिया। 8 फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, कि तुम दोनोंभट्टी में से एक एक मुट्ठी राख ले लो, और मूसा उसे फिरौन के साम्हने आकाश की ओर उड़ा दे। 9 तब वह सूझ्म धूल होकर सारे मिस्र देश में मनुष्योंऔर पशुओं दोनोंपर फफोले और फोड़े बन जाएगी। 10 सो वे भट्टी में की राख लेकर फिरौन के साम्हने खड़े हुए, और मूसा ने उसे आकाश की ओर उड़ा दिया, और वह मनुष्योंऔर पशुओं दोनोंपर फफोले और फोड़े बन गई। 11 और उन फोड़ोंके कारण जादूगर मूसा के साम्हने खड़े न रह सके, क्योंकि वे फोड़े जैसे सब मिस्रियोंके वैसे ही जादूगरोंके भी निकले थे। 12 तब यहोवा ने फिरौन के मन को कठोर कर दिया, और जैसा यहोवा ने मूसा से कहा या, उस ने उसकी न सुनी।। 13 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, बिहान को तड़के उठकर फिरौन के साम्हने खड़ा हो, और उस से कह इब्रियोंका परमेश्वर यहोवा इस प्रकार कहता है, कि मेरी प्रजा के लोगोंको जाने दे, कि वे मेरी उपासना करें। 14 नहीं तो अब की बार मैं तुझ पर, और तेरे कर्मचारियोंऔर तेरी प्रजा पर सब प्रकार की विपत्तियां डालूंगा, जिससे तू जान ले कि सारी पृय्वी पर मेरे तुल्य कोई दूसरा नहीं है। 15 मैं ने तो अभी हाथ बढ़ाकर तुझे और तेरी प्रजा को मरी से मारा होता, और तू पृय्वी पर से सत्यनाश हो गया होता; 16 परन्तु सचमुच मैं ने इसी कारण तुझे बनाए रखा है, कि तुझे अपना सामर्य्य दिखाऊं, और अपना नाम सारी पृय्वी पर प्रसिद्ध करूं। 17 क्या तू अब भी मेरी प्रजा के साम्हने अपके आप को बड़ा समझता है, और उन्हें जाने नहीं देता ? 18 सुन, कल मैं इसी समय ऐसे भारी भारी ओले बरसाऊंगा, कि जिन के तुल्य मिस्र की नेव पड़ने के दिन से लेकर अब तक कभी नहीं पके। 19 सो अब लोगोंको भेजकर अपके पशुओं को अपके मैदान में जो कुछ तेरा है सब को फुर्ती से आड़ में छिपा ले; नहीं तो जितने मनुष्य वा पशु मैदान में रहें और घर में इकट्ठे न किए जाएं उन पर ओले गिरेंगे, और वे मर जाएंगे। 20 इसलिथे फिरौन के कर्मचारियोंमें से जो लोग यहोवा के वचन का भय मानते थे उन्होंने तो अपके अपके सेवकोंऔर पशुओं को घर में हाँक दिया। 21 पर जिन्होंने यहोवा के वचन पर मन न लगाया उन्होंने अपके सेवकोंऔर पशुओं को मैदान में रहने दिया।। 22 तक यहोवा ने मूसा से कहा, अपना हाथ आकाश की ओर बढ़ा, कि सारे मिस्र देश के मनुष्योंपशुओं और खेतोंकी सारी उपज पर ओले गिरें। 23 तब मूसा ने अपक्की लाठी को आकाश की ओर उठाया; और यहोवा मेघ गरजाने और ओले बरसाने लगा, और आग पृय्वी तक आती रही। इस प्रकार यहोवा ने मिस्र देश पर ओले बरसाए। 24 जो ओले गिरते थे उनके साय आग भी मिली हुई यी, और वे ओले इतने भारी थे कि जब से मिस्र देश बसा या तब से मिस्र भर में ऐसे ओले कभी न गिरे थे। 25 इसलिथे मिस्र भर के खेतोंमें क्या मनुष्य, क्या पशु, जितने थे सब ओलोंसे मारे गए, और ओलोंसे खेत की सारी उपज नष्ट हो गई, और मैदान के सब वृझ टूट गए। 26 केवल गोशेन देश में जहां इस्राएली बसते थे ओले नहीं गिरे। 27 तब फिरौन ने मूसा और हारून को बुलवा भेजा और उन से कहा, कि इस बार मैं ने पाप किया है; यहोवा धर्मी है, और मैं और मेरी प्रजा अधर्मी हैं। 28 मेघोंका गरजना और ओलोंका बरसना तो बहुत हो गया; अब भविष्य में यहोवा से बिनती करो; तब मैं तुम लोगोंको जाने दूंगा, और तुम न रोके जाओगे। 29 मूसा ने उस से कहा, नगर से निकलते ही मैं यहोवा की ओर हाथ फैलाऊंगा, तब बादल का गरजना बन्द हो जाएगा, और ओले फिर न गिरेंगे, इस से तू जान लेगा कि पृय्वी यहोवा ही की है। 30 तौभी मैं जानता हूं, कि न तो तू और न तेरे कर्मचारी यहोवा परमेश्वर का भय मानेंगे। 31 सन और जव तो ओलोंसे मारे गए, क्योंकि जव की बालें निकल चुकी यीं और सन में फूल लगे हुए थे। 32 पर गेहूं और कठिया गेहूं जो बढ़े न थे, इस कारण वे मारे न गए। 33 जब मूसा ने फिरौन के पास से नगर के बाहर निकलकर यहोवा की ओर हाथ फैलाए, तब बादल का गरजना और ओलोंका बरसना बन्द हुआ, और फिर बहुत मेंह भूमि पर न पड़ा। 34 यह देखकर कि मेंह और ओलोंऔर बादल का गरजना बन्द हो गया फिरौन ने अपके कर्मचारियोंसमेत फिर अपके मन को कठोर करके पाप किया। 35 और फिरौन का मन हठीला होता गया, और उस ने इस्राएलियोंको जाने न दिया; जैसा कि यहोवा ने मूसा के द्वारा कहलवाया या।।

निर्गमन 10

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, फिरोन के पास जा; क्योंकि मैं ही ने उसके और उसके कर्मचारियोंके मन को इसलिथे कठोर कर दिया है, कि अपके चिन्ह उनके बीच में दिखलाऊं। 2 और तुम लोग अपके बेटोंऔर पोतोंसे इसका वर्णन करो कि यहोवा ने मिस्रियोंको कैसे ठट्ठोंमें उड़ाया और अपके क्या क्या चिन्ह उनके बीच प्रगट किए हैं; जिस से तुम यह जान लोगे कि मैं यहोवा हूं। 3 तब मूसा और हारून ने फिरौन के पास जाकर कहा, कि इब्रियोंका परमेश्वर यहोवा तुझ से इस प्रकार कहता है, कि तू कब तक मेरे साम्हने दीन होने से संकोच करता रहेगा ? मेरी प्रजा के लोगोंको जाने दे, कि वे मेरी उपासना करें। 4 यदि तू मेरी प्रजा को जाने न दे तो सुन, कल मैं तेरे देश में टिड्डियां ले आऊंगा। 5 और वे धरती को ऐसा छा लेंगी, कि वह देख न पकेगी; और तुम्हारा जो कुछ ओलोंसे बच रहा है उसको वे चट कर जाएंगी, और तुम्हारे जितने वृझ मैदान में लगे हैं उनको भी वे चट कर जाएंगी, 6 और वे तेरे और तेरे सारे कर्मचारियों, निदान सारे मिस्रियोंके घरोंमें भर जाएंगी; इतनी टिड्डियां तेरे बापदादोंने वा उनके पुरखाओं ने जब से पृय्वी पर जन्मे तब से आज तक कभी न देखीं। और वह मुंह फेरकर फिरौन के पास से बाहर गया। 7 तब फिरौन के कर्मचारी उस से कहने लगे, वह जन कब तक हमारे लिथे फन्दा बना रहेगा ? उन मनुष्योंको जाने दे, कि वे अपके परमेश्वर यहोवा की उपासना करें; क्या तू अब तक नहीं जानता, कि सारा मिस्र नाश हो गया है ? 8 तब मूसा और हारून फिरौन के पास फिर बुलवाए गए, और उस ने उन से कहा, चले जाओ, अपके परमेश्वर यहोवा की उपासना करो; परन्तु वे जो जानेवाले हैं, कौन कौन हैं ? 9 मूसा ने कहा, हम तो बेटोंबेटियों, भेड़-बकरियों, गाय-बैलोंसमेत वरन बच्चोंसे बूढ़ोंतक सब के सब जाएंगे, क्योंकि हमें यहोवा के लिथे पर्ब्ब करना है। 10 उस ने इस प्रकार उन से कहा, यहोवा तुम्हारे संग रहे जब कि मैं तुम्हें बच्चोंसमेत जाने देता हूं; देखो, तुम्हारे आगे को बुराई है। 11 नहीं, ऐसा नहीं होने पाएगा; तुम पुरूष ही जाकर यहोवा की उपासना करो, तुम यही तो चाहते थे। और वे फिरौन के सम्मुख से निकाल दिए गए।। 12 तब यहोवा ने मूसा से कहा, मिस्र देश के ऊपर अपना हाथ बढ़ा, कि टिड्डियां मिस्र देश पर चढ़के भूमि का जितना अन्न आदि ओलोंसे बचा है सब को चट कर जाएं। 13 और मूसा ने अपक्की लाट्ठी को मिस्र देश के ऊपर बढ़ाया, तब यहोवा ने दिन भर और रात भर देश पर पुरवाई बहाई; और जब भोर हुआ तब उस पुरवाई में टिड्डियां आईं। 14 और टिडि्‌डयोंने चढ़के मिस्र देश के सारे स्यानोंमे बसेरा किया, उनका दल बहुत भारी या, वरन न तो उनसे पहले ऐसी टिड्डियां आई यी, और न उनके पीछे ऐसी फिर आएंगी। 15 वे तो सारी धरती पर छा गई, यहां तक कि देश अन्धेरा हो गया, और उसका सारा अन्न आदि और वृझोंके सब फल, निदान जो कुछ ओलोंसे बचा या, सब को उन्होंने चट कर लिया; यहां तक कि मिस्र देश भर में न तो किसी वृझ पर कुछ हरियाली रह गई और न खेत में अनाज रह गया। 16 तब फिरौन ने फुर्ती से मूसा और हारून को बुलवाके कहा, मैं ने तो तुम्हारे परमेश्वर यहोवा का और तुम्हारा भी अपराध किया है। 17 इसलिथे अब की बार मेरा अपराध झमा करो, और अपके परमेश्वर यहोवा से बिनती करो, कि वह केवल मेरे ऊपर से इस मृत्यु को दूर करे। 18 तब मूसा ने फिरोन के पास से निकल कर यहोवा से बिनती की। 19 तब यहोवा ने बहुत प्रचण्ड पछुवा बहाकर टिड्डियोंको उड़ाकर लाल समुन्द्र में डाल दिया, और मिस्र के किसी स्यान में एक भी टिड्डी न रह गई। 20 तौभी यहोवा ने फिरौन के मन को कठोर कर दिया, जिस से उस ने इस्राएलियोंको जाने न दिया। 21 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, अपना हाथ आकाश की ओर बढ़ा कि मिस्र देश के ऊपर अन्धकार छा जाए, ऐसा अन्धकार कि टटोला जा सके। 22 तब मूसा ने अपना हाथ आकाश की ओर बढ़ाया, और सारे मिस्र देश में तीन दिन तक घोर अन्धकार छाया रहा। 23 तीन दिन तक न तो किसी ने किसी को देखा, और न कोई अपके स्यान से उठा; परन्तु सारे इस्राएलियोंके घरोंमें उजियाला रहा। 24 तब फिरौन ने मूसा को बुलवाकर कहा, तुम लोग जाओ, यहोवा की उपासना करो; अपके बालकोंको भी संग ले जाओ; केवल अपक्की भेड़-बकरी और गाय-बैल को छोड़ जाओ। 25 मूसा ने कहा, तुझ को हमारे हाथ मेलबलि और होमबलि के पशु भी देने पकेंगे, जिन्हें हम अपके परमेश्वर यहोवा के लिथे चढ़ाएं। 26 इसलिथे हमारे पशु भी हमारे संग जाएंगे, उनका एक खुर तक न रह जाएगा, क्योंकि उन्हीं में से हम को अपके परमेश्वर यहोवा की उपासना का सामान लेना होगा, और हम जब तक वहां न पहुंचें तब तक नहीं जानते कि क्या क्या लेकर यहोवा की उपासना करनी होगी। 27 पर यहोवा ने फिरौन का मन हठीला कर दिया, जिस से उस ने उन्हें जाने न दिया। 28 तब फिरौन ने उस से कहा, मेरे साम्हने से चला जा; और सचेत रह; मुझे अपना मुख फिर न दिखाना; क्योंकि जिस दिन तू मुझे मुंह दिखलाए उसी दिन तू मारा जाएगा। 29 मूसा ने कहा, कि तू ने ठीक कहा है; मैं तेरे मुंह को फिर कभी न देखूंगा।।

निर्गमन 11

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, एक और विपत्ति मैं फिरौन और मिस्र देश पर डालता हूं, उसके पश्चात्‌ वह तुम लोगोंको वहां से जाने देगा; और जब वह जाने देगा तब तुम सभोंको निश्चय निकाल देगा। 2 मेरी प्रजा को मेरी यह आज्ञा सुना, कि एक एक पुरूष अपके अपके पड़ोसी, और एक एक स्त्री अपक्की अपक्की पड़ोसिन से सोने चांदी के गहने मांग ले। 3 तब यहोवा ने मिस्रियोंको अपक्की प्रजा पर दयालु किया। और इससे अधिक वह पुरूष मूसा मिस्र देश में फिरौन के कर्मचारियोंऔर साधारण लोगोंकी दृष्टि में अति महान या।। 4 फिर मूसा ने कहा, यहोवा इस प्रकार कहता है, कि आधी रात के लगभग मैं मिस्र देश के बीच में होकर चलूंगा। 5 तब मिस्र में सिंहासन पर विराजने वाले फिरौन से लेकर चक्की पीसनेवाली दासी तक के पहिलौठे; वरन पशुओं तक के सब पहिलौठे मर जाएंगे। 6 और सारे मिस्र देश में बड़ा हाहाकार मचेगा, यहां तक कि उसके समान न तो कभी हुआ और न होगा। 7 पर इस्राएलियोंके विरूद्ध, क्या मनुष्य क्या पशु, किसी पर कोई कुत्ता भी न भोंकेगा; जिस से तुम जान लो कि मिस्रियोंऔर इस्राएलियोंमें मैं यहोवा अन्तर करता हूं। 8 तब तेरे थे सब कर्मचारी मेरे पास आ मुझे दण्डवत्‌ करके यह कहेंगे, कि अपके सब अनुचरोंसमेत निकल जा। और उसके पश्चात्‌ मैं निकल जाऊंगा। यह कह कर मूसा बड़े क्रोध में फिरौन के पास से निकल गया।। 9 यहोवा ने मूसा से कह दिया या, कि फिरौन तुम्हारी न सुनेगा; क्योंकि मेरी इच्छा है कि मिस्र देश में बहुत से चमत्कार करूं। 10 मूसा और हारून ने फिरौन के साम्हने थे सब चमत्कार किए; पर यहोवा ने फिरौन का मन और कठोर कर दिया, सो उसने इस्राएलियोंको अपके देश से जाने न दिया।।

निर्गमन 12

1 फिर यहोवा ने मिस्र देश में मूसा और हारून से कहा, 2 कि यह महीना तुम लोगोंके लिथे आरम्भ का ठहरे; अर्यात्‌ वर्ष का पहिला महीना यही ठहरे। 3 इस्राएल की सारी मण्डली से इस प्रकार कहो, कि इसी महीने के दसवें दिन को तुम अपके अपके पितरोंके घरानोंके अनुसार, घराने पीछे एक एक मेम्ना ले रखो। 4 और यदि किसी के घराने में एक मेम्ने के खाने के लिथे मनुष्य कम हों, तो वह अपके सब से निकट रहनेवाले पड़ोसी के साय प्राणियोंकी गिनती के अनुसार एक मेम्ना ले रखे; और तुम हर एक के खाने के अनुसार मेम्ने का हिसाब करना। 5 तुम्हारा मेम्ना निर्दौष और पहिले वर्ष का नर हो, और उसे चाहे भेड़ोंमें से लेना चाहे बकरियोंमें से। 6 और इस महीने के चौदहवें दिन तक उसे रख छोड़ना, और उस दिन गोधूलि के समय इस्राएल की सारी मण्डली के लोग उसे बलि करें। 7 तब वे उसके लोहू में से कुछ लेकर जिन घरोंमें मेम्ने को खाएंगे उनके द्वार के दोनोंअलंगोंऔर चौखट के सिक्के पर लगाएं। 8 और वे उसके मांस को उसी रात आग में भूंजकर अखमीरी रोटी और कड़वे सागपात के साय खाएं। 9 उसको सिर, पैर, और अतडिय़ोंसमेत आग में भूंजकर खाना, कच्चा वा जल में कुछ भी पकाकर न खाना। 10 और उस में से कुछ बिहान तक न रहने देना, और यदि कुछ बिहान तक रह भी जाए, तो उसे आग में जला देना। 11 और उसके खाने की यह विधि है; कि कमर बान्धे, पांव में जूती पहिने, और हाथ में लाठी लिए हुए उसे फुर्ती से खाना; वह तो यहोवा का पर्ब्ब होगा। 12 क्योंकि उस रात को मैं मिस्र देश के बीच में से होकर जाऊंगा, और मिस्र देश के क्या मनुष्य क्या पशु, सब के पहिलौठोंको मारूंगा; और मिस्र के सारे देवताओं को भी मैं दण्ड दूंगा; मैं तो यहोवा हूं। 13 और जिन घरोंमें तुम रहोगे उन पर वह लोहू तुम्हारे निमित्त चिन्ह ठहरेगा; अर्यात्‌ मैं उस लोहू को देखकर तुम को छोड़ जाऊंगा, और जब मैं मिस्र देश के लोगोंको मारूंगा, तब वह विपत्ति तुम पर न पकेगी और तुम नाश न होगे। 14 और वह दिन तुम को स्मरण दिलानेवाला ठहरेगा, और तुम उसको यहोवा के लिथे पर्ब्ब करके मानना; वह दिन तुम्हारी पीढिय़ोंमें सदा की विधि जानकर पर्ब्ब माना जाए। 15 सात दिन तक अखमीरी रोटी खाया करना, उन में से पहिले ही दिन अपके अपके घर में से खमीर उठा डालना, वरन जो पहिले दिन से लेकर सातवें दिन तक कोई खमीरी वस्तु खाए, वह प्राणी इस्राएलियोंमें से नाश किया जाए। 16 और पहिले दिन एक पवित्र सभा, और सातवें दिन भी एक पवित्र सभा करना; उन दोनोंदिनोंमे कोई काम न किया जाए; केवल जिस प्राणी का जो खाना हो उसके काम करने की आज्ञा है। 17 इसलिथे तुम बिना खमीर की रोटी का पर्ब्ब मानना, क्योंकि उसी दिन मानो मैं ने तुम को दल दल करके मिस्र देश से निकाला है; इस कारण वह दिन तुम्हारी पीढिय़ोंमें सदा की विधि जानकर माना जाए। 18 पहिले महीने के चौदहवें दिन की सांफ से लेकर इक्कीसवें दिन की सांफ तक तुम अखमीरी रोटी खाया करना। 19 सात दिन तक तुम्हारे घरोंमें कुछ भी खमीर न रहे, वरन जो कोई किसी खमीरी वस्तु को खाए, चाहे वह देशी हो चाहे परदेशी, वह प्राणी इस्राएलियोंकी मण्डली से नाश किया जाए। 20 कोई खमीरी वस्तु न खाना; अपके सब घरोंमें बिना खमीर की रोटी खाया करना।। 21 तब मूसा ने इस्राएल के सब पुरनियोंको बुलाकर कहा, तुम अपके अपके कुल के अनुसार एक एक मेम्ना अलग कर रखो, और फसह का पशु बलि करना। 22 और उसका लोहू जो तसले में होगा उस में जूफा का एक गुच्छा डुबाकर उसी तसले में के लोहू से द्वार के चौखट के सिक्के और दोनोंअलंगोंपर कुछ लगाना; और भोर तक तुम में से कोई घर से बाहर न निकले। 23 क्योंकि यहोवा देश के बीच होकर मिस्रियोंको मारता जाएगा; इसलिथे जहां जहां वह चौखट के सिक्के, और दोनोंअलंगोंपर उस लोहू को देखेगा, वहां वहां वह उस द्वार को छोड़ जाएगा, और नाश करनेवाले को तुम्हारे घरोंमें मारने के लिथे न जाने देगा। 24 फिर तुम इस विधि को अपके और अपके वंश के लिथे सदा की विधि जानकर माना करो। 25 जब तुम उस देश में जिसे यहोवा अपके कहने के अनुसार तुम को देगा प्रवेश करो, तब वह काम किया करना। 26 और जब तुम्हारे लड़केबाले तुम से पूछें, कि इस काम से तुम्हारा क्या मतलब है ? 27 तब तुम उनको यह उत्तर देना, कि यहोवा ने जो मिस्रियोंके मारने के समय मिस्र में रहने वाले हम इस्राएलियोंके घरोंको छोड़कर हमारे घरोंको बचाया, इसी कारण उसके फसह का यह बलिदान किया जाता है। तब लोगोंने सिर फुकाकर दण्डवत्‌ की। 28 और इस्राएलियोंने जाकर, जो आज्ञा यहोवा ने मूसा और हारून को दी यी, उसी के अनुसार किया।। 29 और ऐसा हुआ कि आधी रात को यहोवा ने मिस्र देश में सिंहासन पर विराजनेवाले फिरौन से लेकर गड़हे में पके हुए बन्धुए तक सब के पहिलौठोंको, वरन पशुओं तक के सब पहिलौठोंको मार डाला। 30 और फिरौन रात ही को उठ बैठा, और उसके सब कर्मचारी, वरन सारे मिस्री उठे; और मिस्र में बड़ा हाहाकार मचा, क्योंकि एक भी ऐसा घर न या जिसमें कोई मरा न हो। 31 तब फिरौन ने रात ही रात में मूसा और हारून को बुलवाकर कहा, तुम इस्राएलियोंसमेत मेरी प्रजा के बीच से निकल जाओ; और अपके कहने के अनुसार जाकर यहोवा की उपासना करो। 32 अपके कहने के अनुसार अपक्की भेड़-बकरियोंऔर गाय-बैलोंको साय ले जाओ; और मुझे आशीर्वाद दे जाओ। 33 और मिस्री जो कहते थे, कि हम तो सब मर मिटे हैं, उन्होंने इस्राएली लोगोंपर दबाव डालकर कहा, कि देश से फटपट निकल जाओ। 34 तब उन्होंने अपके गून्धे गुन्धाए आटे को बिना खमीर दिए ही कठौतियोंसमेत कपड़ोंमें बान्धके अपके अपके कन्धे पर डाल लिया। 35 और इस्राएलियोंने मूसा के कहने के अनुसार मिस्रियोंसे सोने चांदी के गहने और वस्त्र मांग लिथे। 36 और यहोवा ने मिस्रियोंको अपक्की प्रजा के लोगोंपर ऐसा दयालु किया, कि उन्होंने जो जो मांगा वह सब उनको दिया। इस प्रकार इस्राएलियोंने मिस्रियोंको लूट लिया।। 37 तब इस्राएली रामसेस से कूच करके सुक्कोत को चले, और बालबच्चोंको छोड़ वे कोई छ: लाख पुरूष प्यादे थे। 38 और उनके साय मिली जुली हुई एक भीड़ गई, और भेड़-बकरी, गाय-बैल, बहुत से पशु भी साय गए। 39 और जो गून्धा आटा वे मिस्र से साय ले गए उसकी उन्होंने बिना खमीर दिए रोटियां बनाई; क्योंकि वे मिस्र से ऐसे बरबस निकाले गए, कि उन्हें अवसर भी न मिला की मार्ग में खाने के लिथे कुछ पका सकें, इसी कारण वह गून्धा हुआ आटा बिना खमीर का या। 40 मिस्र में बसे हुए इस्राएलियोंको चार सौ तीस वर्ष बीत गए थे। 41 और उन चार सौ तीस वर्षोंके बीतने पर, ठीक उसी दिन, यहोवा की सारी सेना मिस्र देश से निकल गई। 42 यहोवा इस्राएलियोंको मिस्र देश से निकाल लाया, इस कारण वह रात उसके निमित्त मानने के अति योग्य है; यह यहोवा की वही रात है जिसका पीढ़ी पीढ़ी में मानना इस्राएलियोंके लिथे अति अवश्य है।। 43 फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, पर्ब्ब की विधि यह है; कि कोई परदेशी उस में से न खाए; 44 पर जो किसी का मोल लिया हुआ दास हो, और तुम लोगोंने उसका खतना किया हो, वह तो उस में से खा सकेगा। 45 पर परदेशी और मजदूर उस में से न खाएं। 46 उसका खाना एक ही घर में हो; अर्यात्‌ तुम उसके मांस में से कुछ घर से बाहर न ले जाना; और बलिपशु की कोई हड्डी न तोड़ना। 47 पर्ब्ब को मानना इस्राएल की सारी मण्डली का कर्तव्य कर्म है। 48 और यदि कोई परदेशी तुम लोगोंके संग रहकर यहोवा के लिथे पर्ब्ब को मानना चाहे, तो वह अपके यहां के सब पुरूषोंका खतना कराए, तब वह समीप आकर उसको माने; और वह देशी मनुष्य के तुल्य ठहरेगा। पर कोई खतनारहित पुरूष उस में से न खाने पाए। 49 उसकी व्यवस्या देशी और तुम्हारे बीच में रहनेवाले परदेशी दोनोंके लिथे एक ही हो। 50 यह आज्ञा जो यहोवा ने मूसा और हारून को दी उसके अनुसार सारे इस्राएलियोंने किया। 51 और ठीक उसी दिन यहोवा इस्राएलियोंको मिस्र देश से दल दल करके निकाल ले गया।।

निर्गमन 13

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 2 कि क्या मनुष्य के क्या पशु के, इस्राएलियोंमें जितने अपक्की अपक्की मां के जेठे हों, उन्हें मेरे लिथे पवित्र मानना; वह तो मेरा ही है।। 3 फिर मूसा ने लोगोंसे कहा, इस दिन को स्मरण रखो, जिस में तुम लोग दासत्व के घर, अर्यात्‌ मिस्र से निकल आए हो; यहोवा तो तुम को वहां से अपके हाथ के बल से निकाल लाया; इस में खमीरी रोटी न खाई जाए। 4 आबीब के महीने में आज के दिन तुम निकले हो। 5 इसलिथे जब यहोवा तुम को कनानी, हित्ती, एमोरी, हिब्बी, और यबूसी लोगोंके देश में पहुचाएगा, जिसे देने की उस ने तुम्हारे पुरखाओं से शपय खाई यी, और जिस में दूध और मधु की धारा बहती है, तब तुम इसी महीने में पर्ब्ब करना। 6 सात दिन तक अखमीरी रोटी खाया करना, और सातवें दिन यहोवा के लिथे पर्ब्ब मानना। 7 इन सातोंदिनोंमें अखमीरी रोटी खाई जाए; वरन तुम्हारे देश भर में न खमीरी रोटी, न खमीर तुम्हारे पास देखने में आए। 8 और उस दिन तुम अपके अपके पुत्रोंको यह कहके समझा देना, कि यह तो हम उसी काम के कारण करते हैं, जो यहोवा ने हमारे मिस्र से निकल आने के समय हमारे लिथे किया या। 9 फिर यह तुम्हारे लिथे तुम्हारे हाथ में एक चिन्ह होगा, और तुम्हारी आंखोंके साम्हने स्मरण करानेवाली वस्तु ठहरे; जिस से यहोवा की व्यवस्या तुम्हारे मुंह पर रहे : क्योंकि यहोवा ने तुम्हें अपके बलवन्त हाथोंसे मिस्र से निकाला है। 10 इस कारण तुम इस विधि को प्रति वर्ष नियत समय पर माना करना।। 11 फिर जब यहोवा उस शपय के अनुसार, जो उस ने तुम्हारे पुरखाओं से और तुम से भी खाई है, तुम्हे कनानियोंके देश में पहुंचाकर उसको तुम्हें दे देगा, 12 तब तुम में से जितने अपक्की अपक्की मां के जेठे होंउनको, और तुम्हारे पशुओं में जो ऐसे होंउनको भी यहोवा के लिथे अर्पण करना; सब नर बच्चे तो यहोवा के हैं। 13 और गदही के हर एक पहिलौठे की सन्ती मेम्ना देकर उसको छुड़ा लेना, और यदि तुम उसे छुड़ाना न चाहो तो उसका गला तोड़ देना। पर अपके सब पहिलौठे पुत्रोंको बदला देकर छुड़ा लेना। 14 और आगे के दिनोंमें जब तुम्हारे पुत्र तुम से पूछें, कि यह क्या है ? तो उन से कहना, कि यहोवा हम लोगोंको दासत्व के घर से, अर्यात्‌ मिस्र देश से अपके हाथोंके बल से निकाल लाया है। 15 उस समय जब फिरौन ने कठोर होकर हम को जाने देना न चाहा, तब यहोवा ने मिस्र देश में मनुष्य से लेकर पशु तक सब के पहिलौठोंको मार डाला। इसी कारण पशुओं में से तो जितने अपक्की अपक्की मां के पहिलौठे नर हैं, उन्हें हम यहोवा के लिथे बलि करते हैं; पर अपके सब जेठे पुत्रोंको हम बदला देकर छुड़ा लेते हैं। 16 और यह तुम्हारे हाथोंपर एक चिन्ह सा और तुम्हारी भौहोंके बीच टीका सा ठहरे; क्योंकि यहोवा हम लोगोंको मिस्र से अपके हाथोंके बल से निकाल लाया है।। 17 जब फिरौन ने लोगोंको जाने की आज्ञा दे दी, तब यद्यपि पलिश्तियोंके देश में होकर जो मार्ग जाता है वह छोटा या; तौभी परमेश्वर यह सोच कर उनको उस मार्ग से नहीं ले गया, कि कहीं ऐसा न हो कि जब थे लोग लड़ाई देखें तब पछताकर मिस्र को लौट आएं। 18 इसलिथे परमेश्वर उनको चक्कर खिलाकर लाल समुद्र के जंगल के मार्ग से ले चला। और इस्राएली पांति बान्धे हुए मिस्र से निकल गए। 19 और मूसा यूसुफ की हड्डियोंको साय लेता गया; क्योंकि यूसुफ ने इस्राएलियोंसे यह कहके, कि परमेश्वर निश्चय तुम्हारी सुधि लेगा, उनको इस विषय की दृढ़ शपय खिलाई यी, कि वे उसकी हड्डियोंको अपके साय यहां से ले जाएंगे। 20 फिर उन्होंने सुक्कोत से कूच करके जंगल की छोर पर एताम में डेरा किया। 21 और यहोवा उन्हें दिन को मार्ग दिखाने के लिथे मेघ के खम्भे में, और रात को उजियाला देने के लिथे आग के खम्भे में होकर उनके आगे आगे चला करता या, जिससे वे रात और दिन दोनोंमें चल सकें। 22 उस ने न तो बादल के खम्भे को दिन में और न आग के खम्भे को रात में लोगोंके आगे से हटाया।।

निर्गमन 14

1 यहोवा ने मूसा से कहा, 2 इस्राएलियोंको आज्ञा दे, कि वे लौटकर मिगदोल और समुद्र के बीच पीहहीरोत के सम्मुख, बालसपोन के साम्हने अपके डेरे खड़े करें, उसी के साम्हने समुद्र के तट पर डेरे खड़े करें। 3 तब फिरौन इस्राएलियोंके विषय में सोचेगा, कि वे देश के उलफनोंमें बफे हैं और जंगल में घिर गए हैं। 4 तब मैं फिरौन के मन को कठोर कर दूंगा, और वह उनका पीछा करेगा, तब फिरौन और उसकी सारी सेना के द्वारा मेरी महिमा होगी; और मिस्री जान लेंगे कि मैं यहोवा हूं। और उन्होंने वैसा ही किया। 5 जब मिस्र के राजा को यह समाचार मिला कि वे लोग भाग गए, तब फिरौन और उसके कर्मचारियोंका मन उनके विरूद्ध पलट गया, और वे कहने लगे, हम ने यह क्या किया, कि इस्राएलियोंको अपक्की सेवकाई से छुटकारा देकर जाने दिया ? 6 तब उस ने अपना रय जुतवाया और अपक्की सेना को संग लिया। 7 उस ने छ: सौ अच्दे से अच्छे रय वरन मिस्र के सब रय लिए और उन सभोंपर सरदार बैठाए। 8 और यहोवा ने मिस्र के राजा फिरौन के मन को कठोर कर दिया। सो उस ने इस्राएलियोंका पीछा किया; परन्तु इस्राएली तो बेखटके निकले चले जाते थे। 9 पर फिरौन के सब घोड़ों, और रयों, और सवारोंसमेत मिस्री सेना ने उनका पीछा करके उन्हें, जो पीहहीरोत के पास, बालसपोन के साम्हने, समुद्र के तीर पर डेरे डाले पके थे, जा लिया।। 10 जब फिरौन निकट आया, तब इस्राएलियोंने आंखे उठाकर क्या देखा, कि मिस्री हमारा पीछा किए चले आ रहे हैं; और इस्राएली अत्यन्त डर गए, और चिल्लाकर यहोवा की दोहाई दी। 11 और वे मूसा से कहने लगे, क्या मिस्र में कबरें न यीं जो तू हम को वहां से मरने के लिथे जंगल में ले आया है ? तू ने हम से यह क्या किया, कि हम को मिस्र से निकाल लाया ? 12 क्या हम तुझ से मिस्र में यही बात न कहते रहे, कि हमें रहने दे कि हम मिस्रियोंकी सेवा करें ? हमारे लिथे जंगल में मरने से मिस्रियोंकि सेवा करनी अच्छी यी। 13 मूसा ने लोगोंसे कहा, डरो मत, खड़े खड़े वह उद्धार का काम देखो, जो यहोवा आज तुम्हारे लिथे करेगा; क्योंकि जिन मिस्रियोंको तुम आज देखते हो, उनको फिर कभी न देखोगे। 14 यहोवा आप ही तुम्हारे लिथे लड़ेगा, इसलिथे तुम चुपचाप रहो।। 15 तब यहोवा ने मूसा से कहा, तू क्योंमेरी दोहाई दे रहा है? इस्राएलियोंको आज्ञा दे कि यहां से कूच करें। 16 और तू अपक्की लाठी उठाकर अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ा, और वह दो भाग हो जाएगा; तब इस्राएली समुद्र के बीच होकर स्यल ही स्यल पर चले जाएंगे। 17 और सुन, मैं आप मिस्रियोंके मन को कठोर करता हूं, और वे उनका पीछा करके समुद्र में घुस पकेंगे, तब फिरौन और उसकी सेना, और रयों, और सवारोंके द्वारा मेरी महिमा होगी, तब मिस्री जान लेंगे कि मैं यहोवा हूं। 18 और जब फिरौन, और उसके रयों, और सवारोंके द्वारा मेरी महिमा होगी, तब मिस्री जान लेंगे कि मैं यहोवा हूं। 19 तब परमेश्वर का दूत जो इस्राएली सेना के आगे आगे चला करता या जाकर उनके पीछे हो गया; और बादल का खम्भा उनके आगे से हटकर उनके पीछे जा ठहरा। 20 इस प्रकार वह मिस्रियोंकी सेना और इस्राएलियोंकी सेना के बीच में आ गया; और बादल और अन्धकार तो हुआ, तौभी उससे रात को उन्हें प्रकाश मिलता रहा; और वे रात भर एक दूसरे के पास न आए। 21 और मूसा ने अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ाया; और यहोवा ने रात भर प्रचण्ड पुरवाई चलाई, और समुद्र को दो भाग करके जल ऐसा हटा दिया, जिससे कि उसके बीच सूखी भूमि हो गई। 22 तब इस्राएली समुद्र के बीच स्यल ही स्यल पर होकर चले, और जल उनकी दाहिनी और बाईं ओर दीवार का काम देता या। 23 तब मिस्री, अर्यात्‌ फिरौन के सब घोड़े, रय, और सवार उनका पीछा किए हुए समुद्र के बीच में चले गए। 24 और रात के पिछले पहर में यहोवा ने बादल और आग के खम्भे में से मिस्रियोंकी सेना पर दृष्टि करके उन्हें घबरा दिया। 25 और उस ने उनके रयोंके पहियोंको निकाल डाला, जिससे उनका चलना कठिन हो गया; तब मिस्री आपस में कहने लगे, आओ, हम इस्राएलियोंके साम्हने से भागें; क्योंकि यहोवा उनकी ओर से मिस्रियोंके विरूद्ध युद्ध कर रहा है।। 26 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ा, कि जल मिस्रियों, और उनके रयों, और सवारोंपर फिर बहने लगे। 27 तब मूसा ने अपना हाथ समुद्र के ऊपर बढ़ाया, और भोर होते होते क्या हुआ, कि समुद्र फिर ज्योंका त्योंअपके बल पर आ गया; और मिस्री उलटे भागने लगे, परन्तु यहोवा ने उनको समुद्र के बीच ही में फटक दिया। 28 और जल के पलटने से, जितने रय और सवार इस्राएलियोंके पीछे समुद्र में आए थे, सो सब वरन फिरौन की सारी सेना उस में डूब गई, और उस में से एक भी न बचा। 29 परन्तु इस्राएली समुद्र के बीच स्यल ही स्यल पर होकर चले गए, और जल उनकी दाहिनी और बाईं दोनोंओर दीवार का काम देता या। 30 और यहोवा ने उस दिन इस्राएलियोंको मिस्रियोंके वश से इस प्रकार छुड़ाया; और इस्राएलियोंने मिस्रियोंको समुद्र के तट पर मरे पके हुए देखा। 31 और यहोवा ने मिस्रियोंपर जो अपना पराक्रम दिखलाता या, उसको देखकर इस्राएलियोंने यहोवा का भय माना और यहोवा की और उसके दास मूसा की भी प्रतीति की।।

निर्गमन 15

1 तब मूसा और इस्राएलियोंने यहोवा के लिथे यह गीत गाया। उन्होंने कहा, मैं यहोवा का गीत गाऊंगा, क्योंकि वह महाप्रतापी ठहरा है; घोड़ोंसमेत सवारोंको उस ने समुद्र में डाल दिया है।। 2 यहोवा मेरा बल और भजन का विषय है, और वही मेरा उद्धार भी ठहरा है; मेरा ईश्वर वही है, मैं उसी की स्तुति करूंगा, (मैं उसके लिथे निवासस्यान बनाऊंगा ), मेरे पूर्वजोंका परमेश्वर वही है, मैं उसको सराहूंगा।। 3 यहोवा योद्धा है; उसका नाम यहोवा है।। 4 फिरौन के रयोंऔर सेना को उस ने समुद्र में डाल दिया; और उसके उत्तम से उत्तम रयी लाल समुद्र में डूब गए।। 5 गहिरे जल ने उन्हें ढांप लिया; वे पत्यर की नाईं गहिरे स्यानोंमें डूब गए।। 6 हे यहोवा, तेरा दहिना हाथ शक्ति में महाप्रतापी हुआ हे यहोवा, तेरा दहिना हाथ शत्रु को चकनाचूर कर देता है।। 7 और तू अपके विरोधियोंको अपके महाप्रताप से गिरा देता है; तू अपना कोप भड़काता, और वे भूसे की नाईं भस्म हो जाते हैं।। 8 और तेरे नयनोंकी सांस से जल एकत्र हो गया, धाराएं ढेर की नाईं यम गईं; समुद्र के मध्य में गहिरा जल जम गया।। 9 शत्रु ने कहा या, मैं पीछा करूंगा, मैं जा पकडूंगा, मैं लूट के माल को बांट लूंगा, उन से मेरा जी भर जाएगा। मै अपक्की तलवार खींचते ही अपके हाथ से उनको नाश कर डालूंगा।। 10 तू ने अपके श्वास का पवन चलाया, तब समुद्र ने उनको ढांप लिया; वे महाजलराशि में सीसे की नाई डूब गए।। 11 हे यहोवा, देवताओं में तेरे तुल्य कौन है? तू तो पवित्रता के कारण महाप्रतापी, और अपक्की स्तुति करने वालोंके भय के योग्य, और आश्चर्य कर्म का कर्त्ता है।। 12 तू ने अपना दहिना हाथ बढ़ाया, और पृय्वी ने उनको निगल लिया है।। 13 अपक्की करूणा से तू ने अपक्की छुड़ाई हुई प्रजा की अगुवाई की है, अपके बल से तू उसे अपके पवित्र निवासस्यान को ले चला है।। 14 देश देश के लोग सुनकर कांप उठेंगे; पलिश्तियोंके प्राण के लाले पड़ जाएंगे।। 15 एदोम के अधिपति व्याकुल होंगे; मोआब के पहलवान यरयरा उठेंगे; सब कनान निवासियोंके मन पिघल जाएंगें।। 16 उन में डर और घबराहट समा जाएगा; तेरी बांह के प्रताप से वे पत्यर की नाई अबोल होंगे, जब तक, हे यहोवा, तेरी प्रजा के लोग निकल न जाएं, जब तक तेरी प्रजा के लोग जिनको तू ने मोल लिया है पार न निकल जाएं।। 17 तू उन्हें पहुचाकर अपके निज भागवाले पहाड़ पर बसाएगा, यह वही स्यान है, हे यहोवा जिसे तू ने अपके निवास के लिथे बनाया, और वही पवित्रस्यान है जिसे, हे प्रभु, तू ने आप स्यिर किया है।। 18 यहोवा सदा सर्वदा राज्य करता रहेगा।। 19 यह गीत गाने का कारण यह है, कि फिरौन के घोड़े रयोंऔर सवारोंसमेत समुद्र के बीच में चले गए, और यहोवा उनके ऊपर समुद्र का जल लौटा ले आया; परन्तु इस्राएली समुद्र के बीच स्यल ही स्यल पर होकर चले गए। 20 और हारून की बहिन मरियम नाम नबिया ने हाथ में डफ लिया; और सब स्त्रियां डफ लिए नाचक्की हुई उसके पीछे हो लीं। 21 और मरियम उनके साय यह टेक गाती गई कि :- यहोवा का गीत गाओ, क्योंकि वह महाप्रतापी ठहरा है; घोड़ोंसमेत सवारोंको उस ने समुद्र में डाल दिया है।। 22 तब मूसा इस्राएलियोंको लाल समुद्र से आगे ले गया, और वे शूर नाम जंगल में आए; और जंगल में जाते हुए तीन दिन तक पानी का सोता न मिला। 23 फिर मारा नाम एक स्यान पर पहुंचे, वहां का पानी खारा या, उसे वे न पी सके; इस कारण उस स्यान का नाम मारा पड़ा। 24 तब वे यह कहकर मूसा के विरूद्ध बकफक करने लगे, कि हम क्या पीएं ? 25 तब मूसा ने यहोवा की दोहाई दी, और यहोवा ने उसे एक पौधा बतला दिया, जिसे जब उस ने पानी में डाला, तब वह पानी मीठा हो गया। वहीं यहोवा ने उनके लिथे एक विधि और नियम बनाया, और वहीं उस ने यह कहकर उनकी पक्कीझा की, 26 कि यदि तू अपके परमेश्वर यहोवा का वचन तन मन से सुने, और जो उसकी दृष्टि में ठीक है वही करे, और उसकी सब विधियोंको माने, तो जितने रोग मैं ने मिस्रियोंपर भेजा है उन में से एक भी तुझ पर न भेजूंगा; क्योंकि मैं तुम्हारा चंगा करनेवाला यहोवा हूं।। 27 तब वे एलीम को आए, जहां पानी के बारह सोते और सत्तर खजूर के पेड़ थे; और वहां उन्होंने जल के पास डेरे खड़े किए।।

निर्गमन 16

1 फिर एलीम से कूच करके इस्राएलियोंकी सारी मण्डली, मिस्र देश से निकलने के महीने के दूसरे महीने के पंद्रहवे दिन को, सीन नाम जंगल में, जो एलीम और सीनै पर्वत के बीच में है, आ पहुंची। 2 जंगल में इस्राएलियोंकी सारी मण्डली मूसा और हारून के विरूद्ध बकफक करने लगी। 3 और इस्राएली उन से कहने लगे, कि जब हम मिस्र देश में मांस की हांडियोंके पास बैठकर मनमाना भोजन खाते थे, तब यदि हम यहोवा के हाथ से मार डाले भी जाते तो उत्तम वही या; पर तुम हम को इस जंगल में इसलिथे निकाल ले आए हो कि इस सारे समाज को भूखोंमार डालो। 4 तब यहोवा ने मूसा से कहा, देखो, मैं तुम लोगोंके लिथे आकाश से भोजन वस्तु बरसाऊंगा; और थे लोग प्रतिदिन बाहर जाकर प्रतिदिन का भोजन इकट्ठा करेंगे, इस से मैं उनकी पक्कीझा करूंगा, कि थे मेरी व्यवस्या पर चलेंगे कि नहीं। 5 और ऐसा होगा कि छठवें दिन वह भोजन और दिनोंसे दूना होगा, इसलिथे जो कुछ वे उस दिन बटोरें उसे तैयार कर रखें। 6 तब मूसा और हारून ने सारे इस्राएलियोंसे कहा, सांफ को तुम जान लोगे कि जो तुम को मिस्र देश से निकाल ले आया है वह यहोवा है। 7 और भोर को तुम्हें यहोवा का तेज देख पकेगा, क्योंकि तुम जो यहोवा पर बुड़बुड़ाते हो उसे वह सुनता है। और हम क्या हैं, कि तुम हम पर बुड़बुड़ाते हो ? 8 फिर मूसा ने कहा, यह तब होगा जब यहोवा सांफ को तुम्हें खाने के लिथे मांस और भोर को रोटी मनमाने देगा; क्योंकि तुम जो उस पर बुड़बुड़ाते हो उसे वह सुनता है। और हम क्या हैं ? तुम्हारा बुड़बुड़ाना हम पर नहीं यहोवा ही पर होता है। 9 फिर मूसा ने हारून से कहा, इस्राएलियोंकी सारी मण्डली को आज्ञा दे, कि यहोवा के साम्हने वरन उसके समीप आवे, क्योंकि उस ने उनका बुड़बुड़ाना सुना है। 10 और ऐसा हुआ कि जब हारून इस्राएलियोंकी सारी मण्डली से ऐसी ही बातें कर रहा या, कि उन्होंने जंगल की ओर दृष्टि करके देखा, और उनको यहोवा का तेज बादल में दिखलाई दिया। 11 तब यहोवा ने मूसा से कहा, 12 इस्राएलियोंका बुड़बुड़ाना मैं ने सुना है; उन से कह दे, कि गोधूलि के समय तुम मांस खाओगे और भोर को तुम रोटी से तृप्त हो जाओगे; और तुम यह जान लोगे कि मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं। 13 और ऐसा हुआ कि सांफ को बटेरें आकर सारी छावनी पर बैठ गईं; और भोर को छावनी के चारोंओर ओस पक्की। 14 और जब ओस सूख गई तो वे क्या देखते हैं, कि जंगल की भूमि पर छोटे छोटे छिलके छोटाई में पाले के किनकोंके समान पके हैं। 15 यह देखकर इस्राएली, जो न जानते थे कि यह क्या वस्तु है, सो आपस में कहने लगे यह तो मन्ना है। तब मूसा ने उन से कहा, यह तो वही भोजन वस्तु है जिसे यहोवा तुम्हें खाने के लिथे देता है। 16 जो आज्ञा यहोवा ने दी है वह यह है, कि तुम उस में से अपके अपके खाने के योग्य बटोरा करना, अर्यात्‌ अपके अपके प्राणियोंकी गिनती के अनुसार, प्रति मनुष्य के पीछे एक एक ओमेर बटोरना; जिसके डेरे में जितने होंवह उन्हीं भर के लिथे बटोरा करे। 17 और इस्राएलियोंने वैसा ही किया; और किसी ने अधिक, और किसी ने योड़ा बटोर लिया। 18 और जब उन्होंने उसको ओमेर से नापा, तब जिसके पास अधिक या उसके कुछ अधिक न रह गया, ओर जिसके पास योड़ा या उसको कुछ घटी न हुई; क्योंकि एक एक मनुष्य ने अपके खाने के योग्य ही बटोर लिया या। 19 फिर मूसा ने उन से कहा, कोई इस में से कुछ बिहान तक न रख छोड़े। 20 तौभी उन्होंने मूसा की बात न मानी; इसलिथे जब किसी किसी मनुष्य ने उस में से कुछ बिहान तक रख छोड़ा, तो उस में कीड़े पड़ गए और वह बसाने लगा; तब मूसा उन पर क्रोधित हुआ। 21 और वे भोर को प्रतिदिन अपके अपके खाने के योग्य बटोर लेते थे, ओर जब धूप कड़ी होती यी, तब वह गल जाता या। 22 और ऐसा हुआ कि छठवें दिन उन्होंने दूना, अर्यात्‌ प्रति मनुष्य के पीछे दो दो ओमेर बटोर लिया, और मण्डली के सब प्रधानोंने आकर मूसा को बता दिया। 23 उस ने उन से कहा, यह तो वही बात है जो यहोवा ने कही, क्यांेकि कल परमविश्रम, अर्यात्‌ यहोवा के लिथे पवित्र विश्रम होगा; इसलिथे तुम्हें जो तन्दूर में पकाना हो उसे पकाओ, और जो सिफाना हो उसे सिफाओ, और इस में से जितना बचे उसे बिहान के लिथे रख छोड़ो। 24 जब उन्होंने उसको मूसा की इस आज्ञा के अनुसार बिहान तक रख छोड़ा, तब न तो वह बसाया, और न उस में कीड़े पके। 25 तब मूसा ने कहा, आज उसी को खाओ, क्योंकि आज यहोवा का विश्रमदिन है; इसलिथे आज तुम को मैदान में न मिलेगा। 26 छ: दिन तो तुम उसे बटोरा करोगे; परन्तु सातवां दिन तो विश्रम का दिन है, उस में वह न मिलेगा। 27 तौभी लोगोंमें से कोई कोई सातवें दिन भी बटोरने के लिथे बाहर गए, परन्तु उनको कुछ न मिला। 28 तब यहोवा ने मूसा से कहा, तुम लोग मेरी आज्ञाओं और व्यवस्या को कब तक नहीं मानोगे ? 29 देखो, यहोवा ने जो तुम को विश्रम का दिन दिया है, इसी कारण वह छठवें दिन को दो दिन का भोजन तुम्हें देता है; इसलिथे तुम अपके अपके यहां बैठे रहना, सातवें दिन कोई अपके स्यान से बाहर न जाना। 30 लोगोंने सातवें दिन विश्रम किया। 31 और इस्राएल के घरानेवालोंने उस वस्तु का नाम मन्ना रखा; और वह धनिया के समान श्वेत या, और उसका स्वाद मधु के बने हुए पुए का सा या। 32 फिर मूसा ने कहा, यहोवा ने जो आज्ञा दी वह यह है, कि इस में से ओमेर भर अपके वंश की पीढ़ी पीढ़ी के लिथे रख छोड़ो, जिससे वे जानें कि यहोवा हमको मिस्र देश से निकालकर जंगल में कैसी रोटी खिलाता या। 33 तब मूसा ने हारून से कहा, एक पात्र लेकर उस में ओमेर भर लेकर उसे यहोवा के आगे धर दे, कि वह तुम्हारी पीढिय़ोंके लिथे रखा रहे। 34 जैसी आज्ञा यहोवा ने मूसा को दी यी, उसी के अनुसार हारून ने उसको साझी के सन्दूक के आगे धर दिया, कि वह वहीं रखा रहे। 35 इस्राएली जब तक बसे हुए देश में न पहुंचे तब तक, अर्यात्‌ चालीस वर्ष तक मन्ना को खाते रहे; वे जब तक कनान देश के सिवाने पर नहीं पहुंचे तब तक मन्ना को खाते रहे। 36 एक ओमेर तो एपा का दसवां भाग है।

निर्गमन 17

1 फिर इस्राएलियोंकी सारी मण्डली सीन नाम जंगल से निकल चक्की, और यहोवा के आज्ञानुसार कूच करके रपीदीम में अपके डेरे खड़े किए; और वहां उन लोगोंको पीने का पानी न मिला। 2 इसलिथे वे मूसा से वादविवाद करके कहने लगे, कि हमें पीने का पानी दे। मूसा ने उन से कहा, तुम मुझ से क्योंवादविवाद करते हो? और यहोवा की पक्कीझा क्योंकरते हो? 3 फिर वहां लोगोंको पानी की प्यास लगी तब वे यह कहकर मूसा पर बुड़बुड़ाने लगे, कि तू हमें लड़केबालोंऔर पशुओं समेत प्यासोंमार डालने के लिथे मिस्र से क्योंले आया है ? 4 तब मूसा ने यहोवा की दोहाई दी, और कहा, इन लोगोंसे मैं क्या करूं? थे सब मुझे पत्यरवाह करने को तैयार हैं। 5 यहोवा ने मूसा से कहा, इस्राएल के वृद्ध लोगोंमें से कुछ को अपके साय ले ले; और जिस लाठी से तू ने नील नदी पर मारा या, उसे अपके हाथ में लेकर लोगोंके आगे बढ़ चल। 6 देख मैं तेरे आगे चलकर होरेब पहाड़ की एक चट्टान पर खड़ा रहूंगा; और तू उस चट्टान पर मारना, तब उस में से पानी निकलेगा जिससे थे लोग पीएं। तब मूसा ने इस्राएल के वृद्ध लोगोंके देखते वैसा ही किया। 7 और मूसा ने उस स्यान का नाम मस्सा और मरीबा रखा, कयोंकि इस्राएलियोंने वहां वादविवाद किया या, और यहोवा की पक्कीझा यह कहकर की, कि क्या यहोवा हमारे बीच है वा नहीं ? 8 तब अमालेकी आकर रपीदीम में इस्राएलियोंसे लड़ने लगे। 9 तब मूसा ने यहोशू से कहा, हमारे लिथे कई एक पुरूषोंको चुनकर छांट ले, ओर बाहर जाकर अमालेकियोंसे लड़; और मैं कल परमेश्वर की लाठी हाथ में लिथे हुए पहाड़ी की चोटी पर खड़ा रहूंगा। 10 मूसा की इस आज्ञा के अनुसार यहोशू अमालेकियोंसे लड़ने लगा; और मूसा, हारून, और हूर पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गए। 11 और जब तक मूसा अपना हाथ उठाए रहता या तब तक तो इस्राएल प्रबल होता या; परन्तु जब जब वह उसे नीचे करता तब तब अमालेक प्रबल होता या। 12 और जब मूसा के हाथ भर गए, तब उन्होंने एक पत्यर लेकर मूसा के नीचे रख दिया, और वह उस पर बैठ गया, और हारून और हूर एक एक अलंग में उसके हाथोंको सम्भाले रहें; और उसके हाथ सूर्यास्त तक स्यिर रहे। 13 और यहोशू ने अनुचरोंसमेत अमालेकियोंको तलवार के बल से हरा दिया। 14 तब यहोवा ने मूसा से कहा, स्मरणार्य इस बात को पुस्तक में लिख ले और यहोशू को सुना दे, कि मैं आकाश के नीचे से अमालेक का स्मरण भी पूरी रीति से मिटा डालूंगा। 15 तब मूसा ने एक वेदी बनाकर उसका नाम यहोवानिस्सी रखा ; 16 और कहा, यहोवा ने शपय खाई है, कि यहोवा अमालेकियोंसे पीढिय़ोंतक लड़ाई करता रहेगा।।

निर्गमन 18

1 और मूसा के ससुर मिद्दान के याजक यित्रो ने यह सुना, कि परमेश्वर ने मूसा और अपक्की प्रजा इस्त्राएल के लिथे क्या क्या किया है, अर्यात्‌ यह कि किस रीति से यहोवा इस्त्राएलियोंको मिस्र से निकाल ले आया। 2 तब मूसा के ससुर यित्रो मूसा की पत्नी सिप्पोरा को, जो पहिले नैहर भेज दी गई यी, 3 और उसके दोनोंबेटोंको भी ले आया; इन में से एक का नाम मूसा ने यह कहकर गेर्शोम रखा या, कि मै अन्य देश में परदेशी हुआ हूं। 4 और दूसरे का नाम उस ने यह कहकर एलीएजेर रखा, कि मेरे पिता के परमेश्वर ने मेरा सहाथक होकर मुझे फिरौन की तलवार से बचाया। 5 मूसा की पत्नी और पुत्रोंको उसका ससुर यित्रो संग लिए मूसा के पास जंगल के उस स्थान में आया, जहां परमेश्वर के पर्वत के पास उसका डेरा पड़ा या। 6 और आकर उस ने मूसा के पास यह कहला भेजा, कि मैं तेरा ससुर यित्रो हूं, और दोनो बेटोंसमेत तेरी पत्नी को तेरे पास ले आया हूं। 7 तब मूसा अपके ससुर से भेंट करने के लिथे निकला, और उसको दण्डवत्‌ करके चूमा; और वे परस्पर कुशल झेम पूछते हुए डेरे पर आ गए। 8 वहां मूसा ने अपके ससुर से वर्णन किया, कि यहोवा ने इस्त्राएलियोंके निमित्त फिरौन और मिस्रियोंसे क्या क्या किया, और इस्त्राएलियोंने मार्ग में क्या क्या कष्ट उठाया, फिर यहोवा उन्हें कैसे कैसे छुड़ाता आया है। 9 तब यित्रो ने उस समस्त भलाई के कारण जो यहोवा ने इस्त्राएलियोंके साय की यी, कि उन्हें मिस्रियोंके वश से छुड़ाया या, मग्न होकर कहा, 10 धन्य है यहोवा, जिस ने तुम को फिरौन और मिस्रियोंके वश से छुड़ाया, जिस ने तुम लोगोंको मिस्रियोंकी मुट्ठी में से छुड़ाया है। 11 अब मैं ने जान लिया है कि यहोवा सब देवताओं से बड़ा है; वरन उस विषय में भी जिस में उन्होंने इस्त्राएलियोंसे अभिमान किया या। 12 तब मूसा के ससुर यित्रो ने परमेश्वर के लिथे होमबलि और मेलबलि चढ़ाए, और हारून इस्त्राएलियोंके सब पुरनियोंसमेत मूसा के ससुर यित्रो के संग परमेश्वर के आगे भोजन करने को आया। 13 दूसरे दिन मूसा लोगोंका न्याय करने को बैठा, और भोर से सांफ तक लोग मूसा के आसपास खड़े रहे। 14 यह देखकर कि मूसा लोगोंके लिथे क्या क्या करता है, उसके ससुर ने कहा, यह क्या काम है जो तू लोगोंके लिथे करता है? क्या कारण है कि तू अकेला बैठा रहता है, और लोग भोर से सांफ तक तेरे आसपास खड़े रहते हैं? 15 मूसा ने अपके ससुर से कहा, इसका कारण यह है कि लोग मेरे पास परमेश्वर से पूछने आते है। 16 जब जब उनका कोई मुकद्दमा होता है तब तब वे मेरे पास आते हैं और मैं उनके बीच न्याय करता, और परमेश्वर की विधि और व्यवस्या उन्हें जताता हूं। 17 मूसा के ससुर ने उस से कहा, जो काम तू करता है वह अच्छा नहीं। 18 और इस से तू क्या, वरन थे लोग भी जो तेरे संग हैं निश्चय हार जाएंगे, क्योंकि यह काम तेरे लिथे बहुत भारी है; तू इसे अकेला नहीं कर सकता। 19 इसलिथे अब मेरी सुन ले, मैं तुझ को सम्मति देता हूं, और परमेश्वर तेरे संग रहे। तू तो इन लोगोंके लिथे परमेश्वर के सम्मुख जाया कर, और इनके मुकद्दमोंको परमेश्वर के पास तू पहुंचा दिया कर। 20 इन्हें विधि और व्यवस्या प्रगट कर करके, जिस मार्ग पर इन्हें चलना, और जो जो काम इन्हें करना हो, वह इनको जता दिया कर। 21 फिर तू इन सब लोगोंमें से ऐसे पुरूषोंको छांट ले, जो गुणी, और परमेश्वर का भय मानने वाले, सच्चे, और अन्याय के लाभ से घृणा करने वाले हों; और उनको हजारफार, सौ-सौ, पचास-पचास, और दस-दस मनुष्योंपर प्रधान नियुक्त कर दे। 22 और वे सब समय इन लोगोंका न्याय किया करें; और सब बड़े बड़े मुकद्दमोंको तो तेरे पास ले आया करें, और छोटे छोटे मुकद्दमोंका न्याय आप ही किया करें; तब तेरा बोफ हलका होगा, क्योंकि इस बोफ को वे भी तेरे साय उठाएंगे। 23 यदि तू यह उपाय करे, और परमेश्वर तुझ को ऐसी आज्ञा दे, तो तू ठहर सकेगा, और थे सब लोग अपके स्यान को कुशल से पहुंच सकेंगें। 24 अपके ससुर की यह बात मान कर मूसा ने उसके सब वचनोंके अनुसार किया। 25 सो उस ने सब इस्त्राएलियोंमें से गुणी-गुणी पुरूष चुनकर उन्हें हजारफार, सौ-सौ, पचास-पचास, दस-दस, लोगोंके ऊपर प्रधान ठहराया। 26 और वे सब लोगोंका न्याय करने लगे; जो मुकद्दमा कठिन होता उसे तो वे मूसा के पास ले आते थे, और सब छोटे मुकद्दमोंका न्याय वे आप ही किया करते थे। 27 और मूसा ने अपके ससुर को विदा किया, और उस ने अपके देश का मार्ग लिया।।

निर्गमन 19

1 इस्त्राएलियोंको मिस्र देश से निकले हुए जिस दिन तीन महीने बीत चुके, उसी दिन वे सीनै के जंगल में आए। 2 और जब वे रपीदीम से कूच करके सीनै के जंगल में आए, तब उन्होंने जंगल में डेरे खड़े किए; और वहीं पर्वत के आगे इस्त्राएलियोंने छावनी डाली। 3 तब मूसा पर्वत पर परमेश्वर के पास चढ़ गया, और यहोवा ने पर्वत पर से उसको पुकारकर कहा, याकूब के घराने से ऐसा कह, और इस्त्राएलियोंको मेरा यह वचन सुना, 4 कि तुम ने देखा है कि मै ने मिस्रियोंसे क्या क्या किया; तुम को मानो उकाब पक्की के पंखोंपर चढ़ाकर अपके पास ले आया हूं। 5 इसलिथे अब यदि तुम निश्चय मेरी मानोगे, और मेरी वाचा का पालन करोगे, तो सब लोगोंमें से तुम ही मेरा निज धन ठहरोगे; समस्त पृय्वी तो मेरी है। 6 और तुम मेरी दृष्टि में याजकोंका राज्य और पवित्र जाति ठहरोगे। जो बातें तुझे इस्त्राएलियोंसे कहनी हैं वे थे ही है। 7 तब मूसा ने आकर लोगोंके पुरनियोंको बुलवाया, और थे सब बातें, जिनके कहने की आज्ञा यहोवा ने उसे दी यी, उनको समझा दीं। 8 और सब लोग मिलकर बोल उठे, जो कुछ यहोवा ने कहा है वह सब हम नित करेंगे। लोगोंकी यह बातें मूसा ने यहोवा को सुनाईं। 9 तब यहोवा ने मूसा से कहा, सुन, मैं बादल के अंधिक्कारने में होकर तेरे पास आता हूं, इसलिथे कि जब मैं तुझ से बातें करूं तब वे लोग सुनें, और सदा तेरी प्रतीति करें। और मूसा ने यहोवा से लोगोंकी बातोंका वर्णन किया। 10 तब यहोवा ने मूसा से कहा, लोगोंके पास जा और उन्हें आज और कल पवित्र करना, और वे अपके वस्त्र धो लें, 11 और वे तीसरे दिन तक तैयार हो रहें; क्योंकि तीसरे दिन यहोवा सब लोगोंके देखते सीनै पर्वत पर उतर आएगा। 12 और तू लोगोंके लिथे चारोंओर बाड़ा बान्ध देना, और उन से कहना, कि तुम सचेत रहोंकि पर्वत पर न चढ़ो और उसके सिवाने को भी न छूओ; और जो कोई पहाड़ को छूए वह निश्चय मार डाला जाए। 13 उसको कोई हाथ से तो न छूए, परन्तु वह निश्चय पत्यरवाह किया जाए, वा तीर से छेदा जाए; चाहे पशु हो चाहे मनुष्य, वह जीवित न बचे। जब महाशब्द वाले नरसिंगे का शब्द देर तक सुनाई दे, तब लोग पर्वत के पास आएं। 14 तब मूसा ने पर्वत पर से उतरकर लोगोंके पास आकर उनको पवित्र कराया; और उन्होंने अपके वस्त्र धो लिए। 15 और उस ने लोगोंसे कहा, तीसरे दिन तक तैयार हो रहो; स्त्री के पास न जाना। 16 जब तीसरा दिन आया तब भोर होते बादल गरजने और बिजली चमकने लगी, और पर्वत पर काली घटा छा गई, फिर नरसिंगे का शब्द बड़ा भरी हुआ, और छावनी में जितने लोग थे सब कांप उठे। 17 तब मूसा लोगोंको परमेश्वर से भेंट करने के लिथे छावनी से निकाल ले गया; और वे पर्वत के नीचे खड़े हुए। 18 और यहोवा जो आग में होकर सीनै पर्वत पर उतरा या, इस कारण समस्त पर्वत धुएं से भर गया; और उसका धुआं भट्टे का सा उठ रहा या, और समस्त पर्वत बहुत कांप रहा या 19 फिर जब नरसिंगे का शब्द बढ़ता और बहुत भारी होता गया, तब मूसा बोला, और परमेश्वर ने वाणी सुनाकर उसको उत्तर दिया। 20 और यहोवा सीनै पर्वत की चोटी पर उतरा; और मूसा को पर्वत की चोटी पर बुलाया और मूसा ऊपर चढ़ गया। 21 तब यहोवा ने मूसा से कहा, नीचे उतरके लोगोंको चितावनी दे, कहीं ऐसा न हो कि वे बाड़ा तोड़के यहोवा के पास देखने को घुसें, और उन में से बहुत नाश होंजाएं। 22 और याजक जो यहोवा के समीप आया करते हैं वे भी अपके को पवित्र करें, कहीं ऐसा न हो कि यहोवा उन पर टूट पके। 23 मूसा ने यहोवा से कहा, वे लोग सीनै पर्वत पर नहीं चढ़ सकते; तू ने तो आप हम को यह कहकर चिताया, कि पर्वत के चारोंऔर बाड़ा बान्धकर उसे पवित्र रखो। 24 यहोवा ने उस से कहा, उतर तो जा, और हारून समेत ऊपर आ; परन्तु याजक और साधारण लोग कहीं यहोवा के पास बाड़ा तोड़के न चढ़ आएं, कहीं ऐसा न हो कि वह उन पर टूट पके। 25 थे ही बातें मूसा ने लोगोंके पास उतरके उनको सुनाईं।।

निर्गमन 20

1 तब परमेश्वर ने थे सब वचन कहे, 2 कि मै तेरा परमेश्वर यहोवा हूं, जो तुझे दासत्व के घर अर्यात्‌ मिस्र देश से निकाल लाया है।। 3 तू मुझे छोड़ दूसरोंको ईश्वर करके न मानना।। 4 तू अपके लिथे कोई मूतिर् खोदकर न बनाना, न किसी कि प्रतिमा बनाना, जो आकाश में, वा पृय्वी पर, वा पृय्वी के जल में है। 5 तू उनको दण्डवत्‌ न करना, और न उनकी उपासना करना; क्योंकि मै तेरा परमेश्वर यहोवा जलन रखने वाला ईश्वर हूं, और जो मुझ से बैर रखते है, उनके बेटों, पोतों, और परपोतोंको भी पितरोंका दण्ड दिया करता हूं, 6 और जो मुझ से प्रेम रखते और मेरी आज्ञाओं को मानते हैं, उन हजारोंपर करूणा किया करता हूं।। 7 तू अपके परमेश्वर का नाम व्यर्य न लेना; क्योंकि जो यहोवा का नाम व्यर्य ले वह उसको निर्दोष न ठहराएगा।। 8 तू विश्रमदिन को पवित्र मानने के लिथे स्मरण रखना। 9 छ: दिन तो तू परिश्र्म करके अपना सब काम काज करना; 10 परन्तु सातवां दिन तेरे परमेश्वर यहोवा के लिथे विश्रमदिन है। उस में न तो तू किसी भांति का काम काज करना, और न तेरा बेटा, न तेरी बेटी, न तेरा दास, न तेरी दासी, न तेरे पशु, न कोई परदेशी जो तेरे फाटकोंके भीतर हो। 11 क्योंकि छ: दिन में यहोवा ने आकाश, और पृय्वी, और समुद्र, और जो कुछ उन में है, सब को बनाया, और सातवें दिन विश्रम किया; इस कारण यहोवा ने विश्रमदिन को आशीष दी और उसको पवित्र ठहराया।। 12 तू अपके पिता और अपक्की माता का आदर करना, जिस से जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उस में तू बहुत दिन तक रहने पाए।। 13 तू खून न करना।। 14 तू व्यभिचार न करना।। 15 तू चोरी न करना।। 16 तू किसी के विरूद्ध फूठी साझी न देना।। 17 तू किसी के घर का लालच न करना; न तो किसी की स्त्री का लालच करना, और न किसी के दास-दासी, वा बैल गदहे का, न किसी की किसी वस्तु का लालच करना।। 18 और सब लोग गरजने और बिजली और नरसिंगे के शब्द सुनते, और धुआं उठते हुए पर्वत को देखते रहे, और देखके, कांपकर दूर खड़े हो गए; 19 और वे मूसा से कहने लगे, तू ही हम से बातें कर, तब तो हम सुन सकेंगे; परन्तु परमेश्वर हम से बातें न करे, ऐसा न हो कि हम मर जाएं। 20 मूसा ने लोगोंसे कहा, डरो मत; क्योंकि परमेश्वर इस निमित्त आया है कि तुम्हारी पक्कीझा करे, और उसका भय तुम्हारे मन में बना रहे, कि तुम पाप न करो। 21 और वे लोग तो दूर ही खड़े रहे, परन्तु मूसा उस घोर अन्धकार के समीप गया जहां परमेश्वर या।। 22 तब यहोवा ने मूसा से कहा, तू इस्त्राएलियोंको मेरे थे वचन सुना, कि तुम लोगोंने तो आप ही देखा है कि मै ने तुम्हारे साय आकाश से बातें की हैं। 23 तुम मेरे साय किसी को सम्मिलित न करना, अर्यात्‌ अपके लिथे चान्दी वा सोने से देवताओं को न गढ़ लेना। 24 मेरे लिथे मिट्टी की एक वेदी बनाना, और अपक्की भेड़-बकरियोंऔर गाय-बैलोंके होमबलि और मेलबलि को उस पर चढ़ाना; जहां जहां मैं अपके नाम का स्मरण कराऊं वहां वहां मैं आकर तुम्हें आशीष दूंगा। 25 और यदि तुम मेरे लिथे पत्यरोंकी वेदी बनाओ, तो तराशे हुए पत्यरोंसे न बनाना; क्योंकि जहां तुम ने उस पर अपना हयियार लगाया वहां तू उसे अशुद्ध कर देगा। 26 और मेरी वेदी पर सीढ़ी से कभी न चढ़ना, कहीं ऐसा न हो कि तेरा तन उस पर नंगा देख पके।।

निर्गमन 21

1 फिर जो नियम तुझे उनको समझाने हैं वे थे हैं।। 2 जब तुम कोई इब्री दास मोल लो, तब वह छ: वर्ष तक सेवा करता रहे, और सातवें वर्ष स्वतंत्र होकर सेंतमेंत चला जाए। 3 यदि वह अकेला आया हो, तो अकेला ही चला जाए; और यदि पत्नी सहित आया हो, तो उसके साय उसकी पत्नी भी चक्की जाए। 4 यदि उसके स्वामी ने उसको पत्नी दी हो और उस से उसके बेटे वा बेटियां उत्पन्न हुई हों, तो उसकी पत्नी और बालक उसके स्वामी के ही रहें, और वह अकेला चला जाए। 5 परन्तु यदि वह दास दृढ़ता से कहे, कि मैं अपके स्वामी, और अपक्की पत्नी, और बालकोंसे प्रेम रखता हूं; इसलिथे मैं स्वतंत्र होकर न चला जाऊंगा; 6 तो उसका स्वामी उसको परमेश्वर के पास ले चले; फिर उसको द्वार के किवाड़ वा बाजू के पास ले जाकर उसके कान में सुतारी से छेद करें; तब वह सदा उसकी सेवा करता रहे।। 7 यदि कोई अपक्की बेटी को दासी होने के लिथे बेच डाले, तो वह दासी की नाई बाहर न जाए। 8 यदि उसका स्वामी उसको अपक्की पत्नी बनाए, और फिर उस से प्रसन्न न रहे, तो वह उसे दाम से छुड़ाई जाने दे; उसका विश्वासघात करने के बाद उसे ऊपक्की लोगोंके हाथ बेचने का उसको अधिक्कारने न होगा। 9 और यदि उस ने उसे अपके बेटे को ब्याह दिया हो, तो उस से बेटी का सा व्यवहार करे। 10 चाहे वह दूसरी पत्नी कर ले, तौभी वह उसका भोजन, वस्त्र, और संगति न घटाए। 11 और यदि वह इन तीन बातोंमें घटी करे, तो वह स्त्री सेंतमेंत बिना दाम चुकाए ही चक्की जाए।। 12 जो किसी मनुष्य को ऐसा मारे कि वह मर जाए, तो वह भी निश्चय मार डाला जाए। 13 यदि वह उसकी घात में न बैठा हो, और परमेश्वर की इच्छा ही से वह उसके हाथ में पड़ गया हो, तो ऐसे मारनेवाले के भागने के निमित्त मैं एक स्यान ठहराऊंगा जहां वह भाग जाए। 14 परन्तु यदि कोई ढिठाई से किसी पर चढ़ाई करके उसे छल से घात करे, तो उसको मार ढालने के लिथे मेरी वेदी के पास से भी अलग ले जाना।। 15 जो अपके पिता वा माता को मारे-पीटे वह निश्चय मार डाला जाए।। 16 जो किसी मनुष्य को चुराए, चाहे उसे ले जाकर बेच डाले, चाहे वह उसके पास पाया जाए, तो वह भी निश्चय मार डाला जाए।। 17 जो अपके पिता वा माता को श्रप दे वह भी निश्चय मार डाला जाए।। 18 यदि मनुष्य फगड़ते हों, और एक दूसरे को पत्यर वा मुक्के से ऐसा मारे कि वह मरे नहीं परन्तु बिछौने पर पड़ा रहे, 19 तो जब वह उठकर लाठी के सहारे से बाहर चलने फिरने लगे, तब वह मारनेवाला निर्दोष ठहरे; उस दशा में वह उसके पके रहने के समय की हानि तो भर दे, ओर उसको भला चंगा भी करा दे।। 20 यदि कोई अपके दास वा दासी को सोंटे से ऐसा मारे कि वह उसके मारने से मर जाए, तब तो उसको निश्चय दण्ड दिया जाए। 21 परन्तु यदि वह दो एक दिन जीवित रहे, तो उसके स्वामी को दण्ड न दिया जाए; क्योंकि वह दास उसका धन है।। 22 यदि मनुष्य आपस में मारपीट करके किसी गभिर्णी स्त्री को ऐसी चोट पहुचाए, कि उसका गर्भ गिर जाए, परन्तु और कुछ हानि न हो, तो मारनेवाले से उतना दण्ड लिया जाए जितना उस स्त्री का पति पंच की सम्मति से ठहराए। 23 परन्तु यदि उसको और कुछ हानि पहुंचे, तो प्राण की सन्ती प्राण का, 24 और आंख की सन्ती आंख का, और दांत की सन्ती दांत का, और हाथ की सन्ती हाथ का, और पांव की सन्ती पांव का, 25 और दाग की सन्ती दाग का, और घाव की सन्ती घाव का, और मार की सन्ती मार का दण्ड हो।। 26 जब कोई अपके दास वा दासी की आंख पर ऐसा मारे कि फूट जाए, तो वह उसकी आंख की सन्ती उसे स्वतंत्र करके जाने दे। 27 और यदि वह अपके दास वा दासी को मारके उसका दांत तोड़ डाले, तो वह उसके दांत की सन्ती उसे स्वतंत्र करके जाने दे।। 28 यदि बैल किसी पुरूष वा स्त्री को ऐसा सींग मारे कि वह मर जाए, तो वह बैल तो निश्चय पत्यरवाह करके मार डाला जाए, और उसका मांस खाया न जाए; परन्तु बैल का स्वामी निर्दोष ठहरे। 29 परन्तु यदि उस बैल की पहिले से सींग मारने की बान पक्की हो, और उसके स्वामी ने जताए जाने पर भी उसको न बान्ध रखा हो, और वह किसी पुरूष वा स्त्री को मार डाले, तब तो वह बैल पत्यरवाह किया जाए, और उसका स्वामी भी मार डाला जाए। 30 यदि उस पर छुड़ौती ठहराई जाए, तो प्राण छुड़ाने को जो कुछ उसके लिथे ठहराया जाए उसे उतना ही देना पकेगा। 31 चाहे बैल ने किसी बेटे को, चाहे बेटी को मारा हो, तौभी इसी नियम के अनुसार उसके स्वामी के साय व्यवहार किया जाए। 32 यदि बैल ने किसी दास वा दासी को सींग मारा हो, तो बैल का स्वामी उस दास के स्वामी को तीस शेकेल रूपा दे, और वह बैल पत्यरवाह किया जाए।। 33 यदि कोई मनुष्य गड़हा खोलकर वा खोदकर उसको न ढांपे, और उस में किसी का बैल वा गदहा गिर पके 34 तो जिसका वह गड़हा हो वह उस हानि को भर दे; वह पशु के स्वामी को उसका मोल दे, और लोय गड़हेवाले की ठहरे।। 35 यदि किसी का बैल किसी दूसरे के बैल को ऐसी चोट लगाए, कि वह मर जाए, तो वे दोनो मनुष्य जीते बैल को बेचकर उसका मोल आपस में आधा आधा बांट ले; और लोय को भी वैसा ही बांटें। 36 यदि यह प्रगट हो कि उस बैल की पहिले से सींग मारने की बान पक्की यी, पर उसके स्वामी ने उसे बान्ध नहीं रखा, तो निश्चय यह बैल की सन्ती बैल भर दे, पर लोय उसी की ठहरे।।

निर्गमन 22

1 यदि कोई मनुष्य बैल, वा भेड़, वा बकरी चुराकर उसका घात करे वा बेच डाले, तो वह बैल की सन्ती पाँच बैल, और भेड़-बकरी की सन्ती चार भेड़-बकरी भर दे। 2 यदि चोर सेंध लगाते हुए पकड़ा जाए, और उस पर ऐसी मार पके कि वह मर जाए, तो उसके खून का दोष न लगे; 3 यदि सूर्य निकल चुके, तो उसके खून का दोष लगे; अवश्य है कि वह हानि को भर दे, और यदि उसके पास कुछ न हो, तो वह चोरी के कारण बेच दिया जाए। 4 यदि चुराया हुआ बैल, वा गदहा, वा भेड़ वा बकरी उसके हाथ में जीवित पाई जाए, तो वह उसका दूना भर दे।। 5 यदि कोई अपके पशु से किसी का खेत वा दाख की बारी चराए, अर्यात्‌ अपके पशु को ऐसा छोड़ दे कि वह पराए खेत को चर ले, तो वह अपके खेत की और अपक्की दाख की बारी की उत्तम से उत्तम उपज में से उस हानि को भर दे।। 6 यदि कोई आग जलाए, और वह कांटोंमें लग जाए और फूलोंके ढेर वा अनाज वा खड़ा खेत जल जाए, तो जिस ने आग जलाई हो वह हानि को निश्चय भर दे।। 7 यदि कोई दूसरे को रूपए वा सामग्री की धरोहर धरे, और वह उसके घर से चुराई जाए, तो यदि चोर पकड़ा जाए, तो दूना उसी को भर देना पकेगा। 8 और यदि चोर न पकड़ा जाए, तो घर का स्वामी परमेश्वर के पास लाया जाए, कि निश्चय हो जाय कि उस ने अपके भाई बन्धु की सम्पत्ति पर हाथ लगाया है वा नहीं। 9 चाहे बैल, चाहे गदहे, चाहे भेड़ वा बकरी, चाहे वस्त्र, चाहे किसी प्रकार की ऐसी खोई हुई वस्तु के विषय अपराध क्योंन लगाया जाय, जिसे दो जन अपक्की अपक्की कहते हों, तो दोनोंका मुकद्दमा परमेश्वर के पास आए; और जिसको परमेश्वर दोषी ठहराए वह दूसरे को दूना भर दे।। 10 यदि कोई दूसरे को गदहा वा बैल वा भेड़-बकरी वा कोई और पशु रखने के लिथे सौपें, और किसी के बिना देखे वह मर जाए, वा चोट खाए, वा हांक दिया जाए, 11 तो उन दोनो के बीच यहोवा की शपय खिलाई जाए कि मैं ने इसकी सम्पत्ति पर हाथ नहीं लगाया; तब सम्पत्ति का स्वामी इसको सच माने, और दूसरे को उसे कुछ भी भर देना न होगा। 12 यदि वह सचमुच उसके यहां से चुराया गया हो, तो वह उसके स्वामी को उसे भर दे। 13 और यदि वह फाड़ डाला गया हो, तो वह फाड़े हुए को प्रमाण के लिथे ले आए, तब उसे उसको भी भर देना न पकेगा।। 14 फिर यदि कोई दूसरे से पशु मांग लाए, और उसके स्वामी के संग न रहते उसको चोट लगे वा वह मर जाए, तो वह निश्चय उसकी हानि भर दे। 15 यदि उसका स्वामी संग हो, तो दूसरे को उसकी हानि भरना न पके; और यदि वह भाड़े का हो तो उसकी हानि उसके भाड़े में आ गई।। 16 यदि कोई पुरूष किसी कन्या को जिसके ब्याह की बात न लगी हो फुसलाकर उसके संग कुकर्म करे, तो वह निश्चय उसका मोल देके उसे ब्याह ले। 17 परन्तु यदि उसका पिता उसे देने को बिल्कुल इनकार करे, तो कुकर्म करनेवाला कन्याओं के मोल की रीति के अनुसार रूपके तौल दे।। 18 तू डाइन को जीवित रहने न देना।। 19 जो कोई पशुगमन करे वह निश्चय मार डाला जाए।। 20 जो कोई यहोवा को छोड़ किसी और देवता के लिथे बलि करे वह सत्यनाश किया जाए। 21 और परदेशी को न सताना और न उस पर अन्धेर करना क्योंकि मिस्र देश में तुम भी परदेशी थे। 22 किसी विधवा वा अनाय बालक को दु:ख न देना। 23 यदि तुम ऐसोंको किसी प्रकार का दु:ख दो, और वे कुछ भी मेरी दोहाई दें, तो मैं निश्चय उनकी दोहाई सुनूंगा; 24 तब मेरा क्रोध भड़केगा, और मैं तुम को तलवार से मरवाऊंगा, और तुम्हारी पत्नियां विधवा और तुम्हारे बालक अनाय हो जाएंगे।। 25 यदि तू मेरी प्रजा में से किसी दीन को जो तेरे पास रहता हो रूपए का ऋण दे, तो उस से महाजन की नाई ब्याज न लेना। 26 यदि तू कभी अपके भाईबन्धु के वस्त्र को बन्धक करके रख भी ले, तो सूर्य के अस्त होने तक उसको लौटा देना; 27 क्योंकि वह उसका एक ही ओढ़ना है, उसकी देह का वही अकेला वस्त्र होगा फिर वह किसे ओढ़कर सोएगा? तोभी जब वह मेरी दोहाई देगा तब मैं उसकी सुनूंगा, क्योंकि मैं तो करूणामय हूं।। 28 परमेश्वर को श्रप न देना, और न अपके लोगोंके प्रधान को श्रप देना। 29 अपके खेतोंकी उपज और फलोंके रस में से कुछ मुझे देने में विलम्ब न करना। अपके बेटोंमें से पहिलौठे को मुझे देना। 30 वैसे ही अपक्की गायोंऔर भेड़-बकरियोंके पहिलौठे भी देना; सात दिन तक तो बच्चा अपक्की माता के संग रहे, और आठवें दिन तू उसे मुझे दे देना। 31 और तुम मेरे लिथे पवित्र मनुष्य बनना; इस कारण जो पशु मैदान में फाड़ा हुआ पड़ा मिले उसका मांस न खाना, उसको कुत्तोंके आगे फेंक देना।।

निर्गमन 23

1 फूठी बात न फैलाना। अन्यायी साझी होकर दुष्ट का साय न देना। 2 बुराई करने के लिथे न तो बहुतोंके पीछे हो लेना; और न उनके पीछे फिरके मुकद्दमें में न्याय बिगाड़ने को साझी देना; 3 और कंगाल के मुकद्दमें में उसका भी पझ न करना।। 4 यदि तेरे शत्रु का बैल वा गदहा भटकता हुआ तुझे मिले, तो उसे उसके पास अवश्य फेर ले आना। 5 फिर यदि तू अपके बैरी के गदहे को बोफ के मारे दबा हुआ देखे, तो चाहे उसको उसके स्वामी के लिथे छुड़ाने के लिथे तेरा मन न चाहे, तौभी अवश्य स्वामी का साय देकर उसे छुड़ा लेना।। 6 तेरे लोगोंमें से जो दरिद्र होंउसके मुकद्दमे में न्याय न बिगाड़ना। 7 फूठे मुकद्दमे से दूर रहना, और निर्दोष और धर्मी को घात न करना, क्योंकि मैं दुष्ट को निर्दोष न ठहराऊंगा। 8 घूस न लेना, क्योंकि घूस देखने वालोंको भी अन्धा कर देता, और धमिर्योंकी बातें पलट देता है। 9 परदेशी पर अन्धेर न करना; तुम तो परदेशी के मन की बातें जानते हो, क्योंकि तुम भी मिस्र देश में परदेशी थे।। 10 छ: वर्ष तो अपक्की भूमि में बोना और उसकी उपज इकट्ठी करना; 11 परन्तु सातवें वर्ष में उसको पड़ती रहने देना और वैसा ही छोड़ देना, तो तेरे भाई बन्धुओं में के दरिद्र लोग उस से खाने पाएं, और जो कुछ उन से भी बचे वह बनैले पशुओं के खाने के काम में आए। और अपक्की दाख और जलपाई की बारियोंको भी ऐसे ही करना। 12 छ: दिन तक तो अपना काम काज करना, और सातवें दिन विश्रम करना; कि तेरे बैल और गदहे सुस्ताएं, और तेरी दासियोंके बेटे और परदेशी भी अपना जी ठंडा कर सकें। 13 और जो कुछ मैं ने तुम से कहा है उस में सावधान रहना; और दूसरे देवताओं के नाम की चर्चा न करना, वरन वे तुम्हारे मुंह से सुनाई भी न दें। 14 प्रति वर्ष तीन बार मेरे लिथे पर्ब्ब मानना। 15 अखमीरी रोटी का पर्ब्ब मानना; उस में मेरी आज्ञा के अनुसार अबीब महीने के नियत समय पर सात दिन तक अखमीरी रोटी खाया करना, क्योंकि उसी महीने में तुम मिस्र से निकल आए। और मुझ को कोई छूछे हाथ अपना मुंह न दिखाए। 16 और जब तेरी बोई हुई खेती की पहिली उपज तैयार हो, तब कटनी का पर्ब्ब मानना। और वर्ष के अन्त में जब तू परिश्र्म के फल बटोर के ढेर लगाए, तब बटोरन का पर्ब्ब मानना। 17 प्रति वर्ष तीनोंबार तेरे सब पुरूष प्रभु यहोवा को अपना मुंह दिखाएं।। 18 मेरे बलिपशु का लोहू खमीरी रोटी के संग न चढ़ाना, और न मेरे पर्ब्ब के उत्तम बलिदान में से कुछ बिहान तक रहने देना। 19 अपक्की भूमि की पहिली उपज का पहिला भाग अपके परमेश्वर यहोवा के भवन में ले आना। बकरी का बच्चा उसकी माता के दूध में न पकाना।। 20 सुन, मैं एक दूत तेरे आगे आगे भेजता हूं जो मार्ग में तेरी रझा करेगा, और जिस स्यान को मै ने तैयार किया है उस में तुझे पहुंचाएगा। 21 उसके साम्हने सावधान रहना, और उसकी मानना, उसका विरोध न करना, क्योंकि वह तुम्हारा अपराध झमा न करेगा; इसलिथे कि उस में मेरा नाम रहता है। 22 और यदि तू सचमुच उसकी माने और जो कुछ मैं कहूं वह करे, तो मै तेरे शत्रुओं का शत्रु और तेरे द्रोहियोंका द्रोही बनूंगा। 23 इस रीति मेरा दूत तेरे आगे आगे चलकर तुझे एमोरी, हित्ती, परज्जी, कनानी, हिब्बी, और यबूसी लोगोंके यहां पहुंचाएगा, और मैं उनको सत्यनाश कर डालूंगा। 24 उनके देवताओं को दण्डवत्‌ न करना, और न उनकी उपासना करना, और न उनके से काम करना, वरन उन मूरतोंको पूरी रीति से सत्यानाश कर डालना, और उन लोगोंकी लाटोंके टुकड़े टुकड़े कर देना। 25 और तुम अपके परमेश्वर यहोवा की उपासना करना, तब वह तेरे अन्न जल पर आशीष देगा, और तेरे बीच में से रोग दूर करेगा। 26 तेरे देश में न तो किसी का गर्भ गिरेगा और न कोई बांफ होगी; और तेरी आयु मैं पूरी करूंगा। 27 जितने लोगोंके बीच तू जाथेगा उन सभोंके मन में मै अपना भय पहिले से ऐसा समवा दूंगा कि उनको व्याकुल कर दूंगा, और मैं तुझे सब शत्रुओं की पीठ दिखाऊंगा। 28 और मैं तुझ से पहिले बर्रोंको भेजूंगा जो हिब्बी, कनानी, और हित्ती लोगोंको तेरे साम्हने से भगा के दूर कर देंगी। 29 मैं उनको तेरे आगे से एक ही वर्ष में तो न निकाल दूंगा, ऐसा न हो कि देश उजाड़ हो जाए, और बनैले पशु बढ़कर तुझे दु:ख देने लगें। 30 जब तक तू फूल फलकर देश को अपके अधिक्कारने में न कर ले तब तक मैं उन्हें तेरे आगे से योड़ा योड़ा करके निकालता रहूंगा। 31 मैं लाल समुद्र से लेकर पलिश्तियोंके समुद्र तक और जंगल से लेकर महानद तक के देश को तेरे वश में कर दूंगा; मैं उस देश के निवासिक्कों भी तेरे वश में कर दूंगा, और तू उन्हें अपके साम्हने से बरबस निकालेगा। 32 तू न तो उन से वाचा बान्धना और न उनके देवताओं से। 33 वे तेरे देश में रहने न पाएं, ऐसा न हो कि वे तुझ से मेरे विरूद्ध पाप कराएं; क्योंकि यदि तू उनके देवताओं की उपासना करे, तो यह तेरे लिथे फंदा बनेगा।।

निर्गमन 24

1 फिर उस ने मूसा से कहा, तू, हारून, नादाब, अबीहू, और इस्त्राएलियोंके सत्तर पुरनियोंसमेत यहोवा के पास ऊपर आकर दूर से दण्डवत्‌ करना। 2 और केवल मूसा यहोवा के समीप आए; परन्तु वे समीप न आएं, और दूसरे लोग उसके संग ऊपर न आएं। 3 तब मूसा ने लोगोंके पास जाकर यहोवा की सब बातें और सब नियम सुना दिए; तब सब लोग एक स्वर से बोल उठे, कि जितनी बातें यहोवा ने कही हैं उन सब बातोंको हम मानेंगे। 4 तब मूसा ने यहोवा के सब वचन लिख दिए। और बिहान को सवेरे उठकर पर्वत के नीचे एक वेदी और इस्त्राएल के बारहोंगोत्रोंके अनुसार बारह खम्भे भी बनवाए। 5 तब उस ने कई इस्त्राएली जवानोंको भेजा, जिन्होंने यहोवा के लिथे होमबलि और बैलोंके मेलबलि चढ़ाए। 6 और मूसा ने आधा लोहू तो लेकर कटारोंमें रखा, और आधा वेदी पर छिड़क दिया। 7 तब वाचा की पुस्तक को लेकर लोगोंको पढ़ सुनाया; उसे सुनकर उन्होंने कहा, जो कुछ यहोवा ने कहा है उस सब को हम करेंगे, और उसकी आज्ञा मानेंगे। 8 तब मूसा ने लोहू को लेकर लोगोंपर छिड़क दिया, और उन से कहा, देखो, यह उस वाचा का लोहू है जिसे यहोवा ने इन सब वचनोंपर तुम्हारे साय बान्धी है। 9 तब मूसा, हारून, नादाब, अबीहू और इस्त्राएलियोंके सत्तर पुरनिए ऊपर गए, 10 और इस्त्राएल के परमेश्वर का दर्शन किया; और उसके चरणोंके तले नीलमणि का चबूतरा सा कुछ या, जो आकाश के तुल्य ही स्वच्छ या। 11 और उस ने इस्त्राएलियोंके प्रधानोंपर हाथ न बढ़ाया; तब उन्होंने परमेश्वर का दर्शन किया, और खाया पिया।। 12 तब यहोवा ने मूसा से कहा, पहाड़ पर मेरे पास चढ़, और वहां रह; और मै तुझे पत्यर की पटियाएं, और अपक्की लिखी हुई व्यवस्या और आज्ञा दूंगा, कि तू उनको सिखाए। 13 तब मूसा यहोशू नाम अपके टहलुए समेत परमेश्वर के पर्वत पर चढ़ गया। 14 कि जब तक हम तुम्हारे पास फिर न आएं तब तक तुम यहीं हमारी बाट जोहते रहो; और सुनो, हारून और हूर तुम्हारे संग हैं; तो यदि किसी का मुकद्दमा हो तो उन्हीं के पास जाए। 15 तब मूसा पर्वत पर चढ़ गया, और बादल ने पर्वत को छा लिया। 16 तब यहोवा के तेज ने सीनै पर्वत पर निवास किया, और वह बादल उस पर छ: दिन तक छाया रहा; और सातवें दिन उस ने मूसा को बादल के बीच में से पुकारा। 17 और इस्त्राएलियोंकी दृष्टि में यहोवा का तेज पर्वत की चोटी पर प्रचण्ड आग सा देख पड़ता या। 18 तब मूसा बादल के बीच में प्रवेश करके पर्वत पर चढ़ गया। और मूसा पर्वत पर चालीस दिन और चालीस रात रहा।।

निर्गमन 25

1 यहोवा ने मूसा से कहा, 2 इस्त्राएलियोंसे यह कहना, कि मेरे लिथे भेंट लाएं; जितने अपक्की इच्छा से देना चाहें उन्हीं सभोंसे मेरी भेंट लेना। 3 और जिन वस्तुओं की भेंट उन से लेनी हैं वे थे हैं; अर्यात्‌ सोना, चांदी, पीतल, 4 नीले, बैंजनी और लाल रंग का कपड़ा, सूझ्म सनी का कपड़ा, बकरी का बाल, 5 लाल रंग से रंगी हुई मेढ़ोंकी खालें, सुइसोंकी खालें, बबूल की लकड़ी, 6 उजियाले के लिथे तेल, अभिषेक के तेल के लिथे और सुगन्धित धूप के लिथे सुगन्ध द्रव्य, 7 एपोद और चपरास के लिथे सुलैमानी पत्यर, और जड़ने के लिथे मणि। 8 और वे मेरे लिथे एक पवित्रस्यान बनाए, कि मैं उनके बीच निवास करूं। 9 जो कुछ मैं तुझे दिखाता हूं, अर्यात्‌ निवासस्यान और उसके सब सामान का नमूना, उसी के अनुसार तुम लोग उसे बनाना।। 10 बबूल की लकड़ी का एक सन्दूक बनाया जाए; उसकी लम्बाई अढ़ाई हाथ, और चौड़ाई और ऊंचाई डेढ़ डेढ़ हाथ की हों। 11 और उसको चोखे सोने से भीतर और बाहर मढ़वाना, और सन्दूक के ऊपर चारोंओर सोने की बाड़ बनवाना। 12 और सोने के चार कड़े ढलवाकर उसके चारोंपायोंपर, एक अलंग दो कड़े और दूसरी अलंग भी दो कड़े लगवाना। 13 फिर बबूल की लकड़ी के डण्डे बनवाना, और उन्हे भी सोने से मढ़वाना। 14 और डण्डोंको सन्दूक की दोनोंअलंगोंके कड़ोंमें डालना जिस से उनके बल सन्दूक उठाया जाए। 15 वे डण्डे सन्दूक के कड़ोंमें लगे रहें; और उस से अलग न किए जाएं। 16 और जो साझीपत्र मैं तुझे दूंगा उसे उसी सन्दूक में रखना। 17 फिर चोखे सोने का एक प्रायश्चित्त का ढकना बनवाना; उसकी लम्बाई अढ़ाई हाथ, और चौड़ाई डेढ़ हाथ की हो। 18 और सोना ढालकर दो करूब बनवाकर प्रायश्चित्त के ढकने के दोनोंसिरोंपर लगवाना। 19 एक करूब तो एक सिक्के पर और दूसरा करूब दूसरे सिक्के पर लगवाना; और करूबोंको और प्रायश्चित्त के ढकने को उसके ही टुकड़े से बनाकर उसके दोनो सिरोंपर लगवाना। 20 और उन करूबोंके पंख ऊपर से ऐसे फैले हुए बनें कि प्रायश्चित्त का ढकना उन से ढंपा रहे, और उनके मुख आम्हने-साम्हने और प्रायश्चित्त के ढकने की ओर रहें। 21 और प्रायश्चित्त के ढकने को सन्दूक के ऊपर लगवाना; और जो साझीपत्र मैं तुझे दूंगा उसे सन्दूक के भीतर रखना। 22 और मैं उसके ऊपर रहकर तुझ से मिला करूंगा; और इस्त्राएलियोंके लिथे जितनी आज्ञाएं मुझ को तुझे देनी होंगी, उन सभोंके विषय मैं प्रायश्चित्त के ढकने के ऊपर से और उन करूबोंके बीच में से, जो साझीपत्र के सन्दूक पर होंगे, तुझ से वार्तालाप किया करूंगा।। 23 फिर बबूल की लकड़ी की एक मेज बनवाना; उसकी लम्बाई दो हाथ, चौड़ाई एक हाथ, और ऊंचाई डेढ़ हाथ की हो। 24 उसे चोखे सोने से मढ़वाना, और उसके चारोंओर सोने की एक बाड़ बनवाना। 25 और उसके चारोंओर चार अंगुल चौड़ी एक पटरी बनवाना, और इस पटरी के चारोंओर सोने की एक बाड़ बनवाना। 26 और सोने के चार कड़े बनवाकर मेज के उन चारोंकोनोंमें लगवाना जो उसके चारोंपायोंमें होंगे। 27 वे कड़े पटरी के पास ही हों, और डण्डोंके घरोंका काम दें कि मेज़ उन्हीं के बल उठाई जाए। 28 और डण्डोंको बबूल की लकड़ी के बनवाकर सोने से मढ़वाना, और मेज़ उन्हीं से उठाई जाए। 29 और उसके परात और धूपदान, और चमचे और उंडेलने के कटोरे, सब चोखे सोने के बनवाना। 30 और मेज़ पर मेरे आगे भेंट की रोटियां नित्य रखा करना।। 31 फिर चोखे सोने की एक दीवट बनवाना। सोना ढलवाकर वह दीवट, पाथे और डण्डी सहित बनाया जाए; उसके पुष्पकोष, गांठ और फूल, सब एक ही टुकड़े के बनें; 32 और उसकी अलंगोंसे छ: डालियां निकलें, तीन डालियां तो दीवट की एक अलंग से और तीन डालियां उसकी दूसरी अलंग से निकली हुई हों; 33 एक एक डाली में बादाम के फूल के समान तीन तीन पुष्पकोष, एक एक गांठ, और एक एक फूल हों; दीवट से निकली हुई छहोंडालियोंका यही आकार या रूप हो; 34 और दीवट की डण्डी में बादाम के फूल के समान चार पुष्पकोष अपक्की अपक्की गांठ और फूल समेत हों; 35 और दीवट से निकली हुई छहोंडालियोंमें से दो दो डालियोंके नीचे एक एक गांठ हो, वे दीवट समेत एक ही टुकड़े के बने हुए हों। 36 उनकी गांठे और डालियां, सब दीवट समेत एक ही टुकड़े की हों, चोखा सोना ढलवाकर पूरा दीवट एक ही टुकड़े का बनवाना। 37 और सात दीपक बनवाना; और दीपक जलाए जाएं कि वे दीवट के साम्हने प्रकाश दें। 38 और उसके गुलतराश और गुलदान सब चोखे सोने के हों। 39 वह सब इन समस्त सामान समेत किक्कार भर चोखे सोने का बने। 40 और सावधान रहकर इन सब वस्तुओं को उस नमूने के समान बनवाना, जो तुझे इस पर्वत पर दिखाया गया है।।

निर्गमन 26

1 फिर निवासस्यान के लिथे दस परदे बनवाना; इनको बटी हुई सनीवाले और नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपके का कढ़ाई के काम किए हुए करूबोंके साय बनवाना। 2 एक एक परदे की लम्बाई अट्ठाईस हाथ और चौड़ाई चार हाथ की हो; सब परदे एक ही नाप के हों। 3 पांच परदे एक दूसरे से जुड़े हुए हों; और फिर जो पांच परदे रहेंगे वे भी एक दूसरे से जुड़े हुए हों। 4 और जहां थे दोनोंपरदे जोड़े जाएं वहां की दोनोंछोरोंपर नीली नीली फलियां लगवाना। 5 दोनोंछोरोंमें पचास पचास फलियां ऐसे लगवाना कि वे आम्हने साम्हने हों। 6 और सोने के पचास अंकड़े बनवाना; और परदोंके पंचो को अंकड़ोंके द्वारा एक दूसरे से ऐसा जुड़वाना कि निवासस्यान मिलकर एक ही हो जाए। 7 फिर निवास के ऊपर तम्बू का काम देने के लिथे बकरी के बाल के ग्यारह परदे बनवाना। 8 एक एक परदे की लम्बाई तीस हाथ और चौड़ाई चार हाथ की हो; ग्यारहोंपरदे एक ही नाप के हों। 9 और पांच परदे अलग और फिर छ: परदे अलग जुड़वाना, और छटवें परदे को तम्बू के साम्हने मोड़ कर दुहरा कर देना। 10 और तू पचास अंकड़े उस परदे की छोर में जो बाहर से मिलाया जाएगा और पचास ही अंकड़े दूसरी ओर के परदे की छोर में जो बाहर से मिलाया जाएगा बनवाना। 11 और पीतल के पचास अंकड़े बनाना, और अंकड़ोंको फलियोंमें लगाकर तम्बू को ऐसा जुड़वाना कि वह मिलकर एक ही हो जाए। 12 और तम्बू के परदोंका लटका हुआ भाग, अर्यात्‌ जो आधा पट रहेगा, वह निवास की पिछली ओर लटका रहे। 13 और तम्बू के परदोंकी लम्बाई मे से हाथ भर इधर, और हाथ भर उधर निवास के ढांकने के लिथे उसकी दोनोंअलंगोंपर लटका हुआ रहे। 14 फिर तम्बू के लिथे लाल रंग से रंगी हुई मेढोंकी खालोंका एक ओढ़ना और उसके ऊपर सूइसोंकी खालोंका भी एक ओढ़ना बनवाना।। 15 फिर निवास को खड़ा करने के लिथे बबूल की लकड़ी के तख्ते बनवाना। 16 एक एक तख्ते की लम्बाई दस हाथ और चौड़ाई डेढ़ हाथ की हो। 17 एक एक तख्ते में एक दूसरे से जोड़ी हुई दो दो चूलें हों; निवास के सब तख्तोंको इसी भांति से बनवाना। 18 और निवास के लिथे जो तख्ते तू बनवाएगा उन में से बीस तख्ते तो दक्खिन की ओर के लिथे हों; 19 और बीसोंतख्तोंके नीचे चांदी की चालीस कुसिर्यां बनवाना, अर्यात्‌ एक एक तख्ते के नीचे उसके चूलोंके लिथे दो दो कुसिर्यां। 20 और निवास की दूसरी अलंग, अर्यात्‌ उत्तर की ओर बीस तख्ते बनवाना। 21 और उनके लिथे चांदी की चालीस कुसिर्यां बनवाना, अर्यात्‌ एक एक तख्ते के नीचे दो दो कुसिर्यां हों। 22 और निवास की पिछली अलंग, अर्यात्‌ एक एक तख्ते के नीचे दो दो कुसिर्यां हों। 23 और पिछले अलंग में निवास के कोनोंके लिथे दो तख्ते बनवाना; 24 और थे नीचे से दो दो भाग के होंऔर दोनोंभाग ऊपर के सिक्के तक एक एक कड़े में मिलाथे जाएं; दोनोंतख्तोंका यही रूप हो; थे तो दोनोंकोनोंके लिथे हों। 25 और आठ तख्तें हों, और उनकी चांदी की सोलह कुसिर्यां हों; अर्यात्‌ एक एक तख्ते के नीचे दो दो कुसिर्यां हों। 26 फिर बबूल की लकड़ी के बेंड़े बनवाना, अर्यात्‌ निवास की एक अलंग के तख्तोंके लिथे पांच, 27 और निवास की दूसरी अलंग के तख्तोंके लिथे पांच बेंडे, और निवास की जो अलंग पश्चिम की ओर पिछले भाग में होगी, उसके लिथे पांच बेंड़े बनवाना। 28 और बीचवाला बेंड़ा जो तख्तोंके मध्य में होगा वह तम्बू के एक सिक्के से दूसरे सिक्के तक पहुंचे। 29 फिर तख्तोंको सोने से मढ़वाना, और उनके कड़े जो बेंड़ोंके घरोंका काम देंगे उन्हें भी सोने के बनवाना; और बेड़ोंको भी सोने से मढ़वाना। 30 और निवास को इस रीति खड़ा करना जैसा इस पर्वत पर तुझे दिखाया गया है।। 31 फिर नीले, बैजनी और लाल रंग के और बटी हुई सूझ्म सनीवाले कपके का एक बीचवाला पर्दा बनवाना; वह कढ़ाई के काम किथे हुए करूबोंके साय बने। 32 और उसको सोने से मढ़े हुए बबूल के चार ख्म्भोंपर लटकाना, इनकी अंकडिय़ां सोने की हों, और थे चांदी की चार कुसिर्योंपर खड़ी रहें। 33 और बीचवाले पर्दे को अंकडिय़ोंके नीचे लटकाकर, उसकी आड़ में साझीपत्र का सन्दूक भीतर लिवा ले जाना; सो वह बीचवाला पर्दा तुम्हारे लिथे पवित्रस्यान को परमपवित्रस्यान से अलग किथे रहे। 34 फिर परमपवित्र स्यान में साझीपत्र के सन्दूक के ऊपर प्रायश्चित्त के ढकने को रखना। 35 और उस पर्दे के बाहर निवास की उत्तर अलग मेज़ रखना; और उसकी दक्खिन अलंग मेज़ के साम्हने दीवट को रखना। 36 फिर तम्बू के द्वार के लिथे नीले, बैंजनी और लाल रंग के और बटी हुई सूझ्म सनीवाले कपके का कढ़ाई का काम किया हुआ एक पर्दा बनवाना। 37 और इस पर्दे के लिथे बबूल के पांच खम्भे बनवाना, और उनको सोने से मढ़वाना; उनकी कडियां सोने की हो, और उनके लिथे पीतल की पांच कुसिर्यां ढलवा कर बनवाना।।

निर्गमन 27

1 फिर वेदी को बबूल की लकड़ी की, पांच हाथ लम्बी और पांच हाथ चौड़ी बनवाना; वेदी चौकोर हो, और उसकी ऊंचाई तीन हाथ की हो। 2 और उसके चारोंकोनोंपर चार सींग बनवाना; वे उस समेत एक ही टुकड़े के हों, और उसे पीतल से मढ़वाना। 3 और उसकी राख उठाने के पात्र, और फावडिय़ां, और कटोरे, और कांटे, और अंगीठियां बनवाना; उसका कुल सामान पीतल का बनवाना। 4 और उसके पीतल की जाली एक फंफरी बनवाना; और उसके चारोंसिरोंमें पीतल के चार कड़े लगवाना। 5 और उस फंफरी को वेदी के चारोंओर की कंगनी के नीचे ऐसे लगवाना, कि वह वेदी की ऊंचाई के मध्य तक पहुंचे। 6 और वेदी के लिथे बबूल की लकड़ी के डण्डे बनवाना, और उन्हें पीतल से मढ़वाना। 7 और डंडे कड़ोंमें डाले जाएं, कि जब जब वेदी उठाई जाए तब वे उसकी दोनोंअलंगोंपर रहें। 8 वेदी को तख्तोंसे खोखली बनवाना; जैसी वह इस पर्वत पर तुझे दिखाई गई है वैसी ही बनाई जाए।। 9 फिर निवास के आंगन को बनवाना। उसकी दक्खिन अलंग के लिथे तो बटी हुई सूझ्म सनी के कपके के सब पर्दोंको मिलाए कि उसकी लम्बाई सौ हाथ की हो; एक अलंग पर तो इतना ही हो। 10 और उनके बीस खम्भे बनें, और इनके लिथे पीतल की बीस कुसिर्यां बनें, और खम्भोंके कुन्डे और उनकी पट्टियां चांदी की हों। 11 और उसी भांति आंगन की उत्तर अलंग की लम्बाई में भी सौ हाथ लम्बे पर्दे हों, और उनके भी बीस खम्भे और इनके लिथे भी पीतल के बीस खाने हों; और उन खम्भोंके कुन्डे और पट्टियां चांदी की हों। 12 फिर आंगन की चौड़ाई में पच्छिम की ओर पचास हाथ के पर्दे हों, उनके खम्भे दस और खाने भी दस हों। 13 और पूरब अलंग पर आंगन की चौड़ाई पचास हाथ की हो। 14 और आंगन के द्वार की एक ओर पन्द्रह हाथ के पर्दे हों, और उनके खम्भे तीन और खाने तीन हों। 15 और दूसरी ओर भी पन्द्रह हाथ के पर्दे हों, उनके भी खम्भे तीन और खाने तीन हों। 16 और आंगन के द्वार के लिथे एक पर्दा बनवाना, जो नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपके और बटी हुई सूझ्म सनी के कपके का कामदार बना हुआ बीस हाथ का हो, उसके खम्भे चार और खाने भी चार हों। 17 आंगन की चारोंओर के सब खम्भे चांदी की पट्टियोंसे जुड़े हुए हों, उनके कुन्डे चांदी के और खाने पीतल के हों। 18 आंगन की लम्बाई सौ हाथ की, और उसकी चौड़ाई बराबर पचास हाथ की और उसकी कनात की ऊंचाई पांच हाथ की हो, उसकी कनात बटी हुई सुझ्म सनी के कपके की बने, और खम्भोंके खाने पीतल के हों। 19 निवास के भांति भांति के बर्तन और सब सामान और उसके सब खूंटें और आंगन के भी सब खूंटे पीतल ही के हों।। 20 फिर तू इस्त्राएलियोंको आज्ञा देना, कि मेरे पास दीवट के लिथे कूट के निकाला हुआ जलपाई का निर्मल तेल ले आना, जिस से दीपक नित्य जलता रहे। 21 मिलाप के तम्बू में, उस बीचवाले पर्दे से बाहर जो साझीपत्र के आगे होगा, हारून और उसके पुत्र दीवट सांफ से भोर तक यहोवा के साम्हने सजा कर रखें। यह विधि इस्त्राएलियोंकी पीढिय़ोंके लिथे सदैव बनी रहेगी।।

निर्गमन 28

1 फिर तू इस्त्राएलियोंमें से अपके भाई हारून, और नादाब, अबीहू, एलीआज़ार और ईतामार नाम उसके पुत्रोंको अपके समीप ले आना कि वे मेरे लिथे याजक का काम करें। 2 और तू अपके भाई हारून के लिथे विभव और शोभा के निमित्त पवित्र वस्त्र बनवाना। 3 और जितनोंके ह्रृदय में बुद्धि है, जिनको मैं ने बुद्धि देनेवाली आत्मा से परिपूर्ण किया है, उनको तू हारून के वस्त्र बनाने की आज्ञा दे कि वह मेरे निमित्त याजक का काम करने के लिथे पवित्र बनें। 4 और जो वस्त्र उन्हें बनाने होंगे वे थे हैं, अर्यात्‌ सीनाबन्द; और एपोद, और जामा, चार खाने का अंगरखा, पुरोहित का टोप, और कमरबन्द; थे ही पवित्र वस्त्र तेरे भाई हारून और उसके पुत्रोंके लिथे बनाए जाएं कि वे मेरे लिथे याजक का काम करें। 5 और वे सोने और नीले और बैंजनी और लाल रंग का और सूझ्म सनी का कपड़ा लें।। 6 और वे एपोद को सोने, और नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपके का और बटी हुई सूझ्म सनी के कपके का बनाएं, जो कि निपुण कढ़ाई के काम करनेवाले के हाथ का काम हो। 7 और वह इस तरह से जोड़ा जाए कि उसके दोनो कन्धोंके सिक्के आपस में मिले रहें। 8 और एपोद पर जो काढ़ा हुआ पटुका होगा उसकी बनावट उसी के समान हो, और वे दोनोंबिना जोड़ के हों, और सोने और नीले, बैंजनी और लाल रंगवाले और बटी हुई सूझ्म सनीवाले कपके के हों। 9 फिर दो सुलैमानी मणि लेकर उन पर इस्त्राएल के पुत्रोंके नाम खुदवाना, 10 उनके नामोंमें से छ: तो एक मणि पर, और शेष छ: नाम दूसरे मणि पर, इस्त्राएल के पुत्रोंकी उत्पत्ति के अनुसार खुदवाना। 11 मणि खोदनेवाले के काम से जैसे छापा खोदा जाता है, वैसे ही उन दो मणियोंपर इस्त्राएल के पुत्रोंके नाम खुदवाना; और उनको सोने के खानोंमें जड़वा देना। 12 और दोनोंमणियोंको एपोद के कन्धोंपर लगवाना, वे इस्त्राएलियोंके निमित्त स्मरण दिलवाने वाले मणि ठहरेंगे; अर्यात्‌ हारून उनके नाम यहोवा के आगे अपके दोनोंकन्धोंपर स्मरण के लिथे लगाए रहे।। 13 फिर सोने के खाने बनवाना, 14 और डोरियोंकी नाईं गूंथे हुए दो जंजीर चोखे सोने के बनवाना; और गूंथे हुए जंजीरोंको उन खानोंमें जड़वाना। 15 फिर न्याय की चपरास को भी कढ़ाई के काम का बनवाना; एपोद की नाईं सोने, और नीले, बैंजनी और लाल रंग के और बटी हुई सूझ्म सनी के कपके की उसे बनवाना। 16 वह चौकोर और दोहरी हो, और उसकी लम्बाई और चौड़ाई एक एक बित्ते की हों। 17 और उस में चार पांति मणि जड़ाना। पहिली पांति में तो माणिक्य, पद्क़राग और लालड़ी हों; 18 दूसरी पांति में मरकत, नीलमणि और हीरा; 19 तीसरी पांति में लशम, सूर्यकांत और नीलम; 20 और चौयी पांति में फीरोजा, सुलैमानी मणि और यशब हों; थे सब सोने के खानोंमें जड़े जाएं। 21 और इस्त्राएल के पुत्रोंके जितने नाम हैं उतने मणि हों, अर्यात्‌ उनके नामोंकी गिनती के अनुसार बारह नाम खुदें, बारहोंगोत्रोंमें से एक एक का नाम एक एक मणि पर ऐसे खुदे जेसे छापा खोदा जाता है। 22 फिर चपरास पर डोरियोंकी नाई। गूंथे हुए चोखे सोने की जंजीर लगवाना; 23 और चपरास में सोने की दो कडिय़ां लगवाना, और दोनोंकडिय़ोंको चपरास के दोनो सिरोंपर लगवाना। 24 और सोने के दोनोंगूंथे जंजीरोंको उन दोनोंकडिय़ोंमें जो चपरास के सिरोंपर होंगी लगवाना; 25 और गूंथे हुए दोनो जंजीरोंके दोनोंबाकी सिक्कों दोनोंखानोंमें जड़वा के एपोद के दोनोंकन्धोंके बंधनोंपर उसके साम्हने लगवाना। 26 फिर सोने की दो और कडिय़ां बनवाकर चपरास के दोनोंसिरोंपर, उसकी उस कोर पर जो एपोद की भीतर की ओर होगी लगवाना। 27 फिर उनके सिवाय सोने की दो और कडिय़ां बनवाकर एपोद के दोनोंकन्धोंके बंधनोंपर, नीचे से उनके साम्हने और उसके जोड़ के पास एपोद के काढ़े हुए पटुके के ऊपर लगवाना। 28 और चपरास अपक्की कडिय़ोंके द्वारा एपोद की कडिय़ोंमें नीले फीते से बांधी जाए, इस रीति वह एपोद के काढ़े हुए पटुके पर बनी रहे, और चपरास एपोद पर से अलग न होने पाए। 29 और जब जब हारून पवित्रस्यान में प्रवेश करे, तब तब वह न्याय की चपरास पर अपके ह्रृदय के ऊपर इस्त्राएलियोंके नामोंको लगाए रहे, जिस से यहोवा के साम्हने उनका स्मरण नित्य रहे। 30 और तू न्याय की चपरास में ऊरीम और तुम्मीम को रखना, और जब जब हारून यहोवा के साम्हने प्रवेश करे, तब तब वे उसके ह्रृदय के ऊपर हों; इस प्रकार हारून इस्त्राएलियोंके न्याय पदार्य को अपके ह्रृदय के ऊपर यहोवा के साम्हने नित्य लगाए रहे।। 31 फिर एपोद के बागे को सम्पूर्ण नीले रंग का बनवाना। 32 और उसकी बनावट ऐसी हो कि उसके बीच में सिर डालने के लिथे छेद हो, और उस छेद की चारोंओर बखतर के छेद की सी एक बुनी हुई कोर हो, कि वह फटने न पाए। 33 और उसके नीचेवाले घेरे में चारोंओर नीेले, बैंजनी और लाल रंग के कपके के अनार बनवाना, और उनके बीच बीच चारोंओर सोने की घंटीयां लगवाना, 34 अर्यात्‌ एक सोने की घंटी और एक अनार, फिर एक सोने की घंटी और एक अनार, इसी रीति बागे के नीचेवाले घेरे में चारोंओर ऐसा ही हो। 35 और हारून एक बागे को सेवा टहल करने के समय पहिना करे, कि जब जब वह पवित्रस्यान के भीतर यहोवा के साम्हने जाए, वा बाहर निकले, तब तब उसका शब्द सुनाई दे, नहीं तो वह मर जाएगा। 36 फिर चोखे सोने का एक टीका बनवाना, और जैसे छापे में वैसे ही उस में थे अझर खोदें जाएं, अर्यात्‌ यहोवा के लिथे पवित्र। 37 और उसे नीले फीते से बांधना; और वह पगड़ी के साम्हने के हिस्से पर रहे। 38 और हारून के माथे पर रहे, इसलिथे कि इस्त्राएली जो कुछ पवित्र ठहराएं, अर्यात्‌ जितनी पवित्र वस्तुएं भेंट में चढ़ावें उन पवित्र वस्तुओं का दोष हारून उठाए रहे, और वह नित्य उसके माथे पर रहे, जिस से यहोवा उन से प्रसन्न रहे।। 39 और अंगरखे को सूझ्म सनी के कपके का चारखाना बुनवाना, और एक पगड़ी भी सूझ्म सनी के कपके की बनवाना, और कारचोबी काम किया हुआ एक कमरबन्द भी बनवाना।। 40 फिर हारून के पुत्रोंके लिथे भी अंगरखे और कमरबन्द और टोपियां बनवाना; थे वस्त्र भी विभव और शोभा के लिथे बनें। 41 अपके भाई हारून और उसके पुत्रोंको थे ही सब वस्त्र पहिनाकर उनका अभिषेक और संस्कार करना, और उन्हें पवित्र करना, कि वे मेरे लिथे याजक का काम करें। 42 और उनके लिथे सनी के कपके की जांघिया बनवाना जिन से उनका तन ढपा रहे; वे कमर से जांघ तक की हों; 43 और जब जब हारून वा उसके पुत्र मिलापवाले तम्बू में प्रवेश करें, वा पवित्र स्यान में सेवा टहल करने को वेदी के पास जाएं तब तब वे उन जांघियोंको पहिने रहें, न हो कि वे पापी ठहरें और मर जाएं। यह हारून के लिथे और उसके बाद उसके वंश के लिथे भी सदा की विधि ठहरें।।

निर्गमन 29

1 और उन्हें पवित्र करने को जो काम तुझे उन से करना है, कि वे मेरे लिथे याजक का काम करें वह यह है। एक निर्दोष बछड़ा और दो निर्दोष मेंढ़े लेना, 2 और अखमीरी रोटी, और तेल से सने हुए मैदे के अखमीरी फुलके, और तेल से चुपक्की हुई अखमीरी पपडिय़ां भी लेना। थे सब गेहूं के मैदे के बनवाना। 3 इनको एक टोकरी में रखकर उस टोकरी को उस बछड़े और उन दोनोंमेंढ़ो समेत समीप ले आना। 4 फिर हारून और उसके पुत्रोंको मिलापवाले तम्बू के द्वार के समीप ले आकर जल से नहलाना। 5 तब उन वोंको लेकर हारून को अंगरखा ओर एपोद का बागा पहिनाना, और एपोद और चपरास बान्धना, और एपोद का काढ़ा हुआ पटुका भी बान्धना; 6 और उसके सिर पर पगड़ी को रखना, और पगड़ी पर पवित्र मुकुट को रखना। 7 तब अभिषेक का तेल ले उसके सिर पर डालकर उसका अभिषेक करना। 8 फिर उसके पुत्रोंको समीप ले आकर उनको अंगरखे पहिनाना, 9 और उसके अर्यात्‌ हारून और उसके पुत्रोंके कमर बान्धना और उनके सिर पर टोपियां रखना; जिस से याजक के पद पर सदा उनका हक रहे। इसी प्रकार हारून और उसके पुत्रोंका संस्कार करना। 10 और बछड़े को मिलापवाले तम्बू के साम्हने समीप ले आना। और हारून और उसके पुत्र बछड़े के सिर पर अपके अपके हाथ रखें, 11 तब उस बछड़े को यहोवा के सम्मुख मिलापवाले तम्बू के द्वार पर बलिदान करना, 12 और बछड़े के लोहू में से कुछ लेकर अपक्की उंगली से वेदी के सींगोंपर लगाना, और शेष सब लोहू को वेदी के पाए पर उंडेल देना 13 और जिस चरबी से अंतडिय़ां ढपी रहती हैं, और जो फिल्ली कलेजे के ऊपर होती है, उनको और दोनो गुर्दोंको उनके ऊपर की चरबी समेत लेकर सब को वेदी पर जलाना। 14 और बछड़े का मांस, और खाल, और गोबर, छावनी से बाहर आग में जला देना; क्योंकि यह पापबलि होगा। 15 फिर एक मेढ़ा लेना, और हारून और उसके पुत्र उसके सिर पर अपके अपके हाथ रखें, 16 तब उस मेढ़ें को बलि करना, और उसका लोहू लेकर वेदी पर चारोंओर छिड़कना। 17 और उस मेढ़े को टुकड़े टुकड़े काटना, और उसकी अंतडिय़ोंऔर पैरोंको धोकर उसके टुकड़ोंऔर सिर के ऊपर रखना, 18 तब उस पूरे मेढ़े को वेदी पर जलाना; वह तो यहोवा के लिथे होमबलि होगा; वह सुखदायक सुगन्ध और यहोवा के लिथे हवन होगा। 19 फिर दूसरे मेढ़े को लेना; और हारून और उसके पुत्र उसके सिर पर अपके अपके हाथ रखें, 20 तब उस मेंड़े को बलि करना, और उसके लोहू में से कुछ लेकर हारून और उसके पुत्रोंके दहिने कान के सिक्के पर, और उनके दहिने हाथ और दहिने पांव के अंगूठोंपर लगाना, और लोहू को वेदी पर चारोंओर छिड़क देना। 21 फिर वेदी पर के लोहू, और अभिषेक के तेल, इन दोनो में से कुछ कुछ लेकर हारून और उसके वोंपर, और उसके पुत्रोंऔर उनके वोंपर भी छिड़क देना; तब वह अपके वोंसमेत और उसके पुत्र भी अपके अपके वोंसमेत पवित्र हो जाएंगे। 22 तब मेढ़े को संस्कारवाला जानकर उस में से चरबी और मोटी पूंछ को, और जिस चरबी से अंतडिय़ां ढपी रहती हैं उसको, और कलेजे पर की फिल्ली को, और चरबी समेत दोनोंगुर्दोंको, और दहिने पुट्ठे को लेना, 23 और अखमीरी रोटी की टोकरी जो यहोवा के आगे धरी होगी उस में से भी एक रोटी, और तेल से सने हुए मैदे का एक फुलका, और एक पपक्की लेकर, 24 इन सब को हारून और उसके पुत्रोंके हाथोंमें रखकर हिलाए जाने की भेंट ठहराके यहोवा के आगे हिलाया जाए। 25 तब उन वस्तुओं को उनके हाथोंसे लेकर होमबलि की वेदी पर जला देना, जिस से वह यहोवा के साम्हने सुखदायक सुगन्ध ठहरे; वह तो यहोवा के लिथे हवन होगा। 26 फिर हारून के संस्कार को जो मेंढ़ा होगा उसकी छाती को लेकर हिलाए जाने की भेंट के लिथे यहोवा के आगे हिलाना; और वह तेरा भाग ठहरेगा। 27 और हारून और उसके पुत्रोंके संस्कार का जो मेढ़ा होगा, उस में से हिलाए जाने की भेंटवाली छाती जो हिलाई जाएगी, और उठाए जाने का भेंटवाला पुट्ठा जो उठाया जाएगा, इन दोनोंको पवित्र ठहराना। 28 और थे सदा की विधि की रीति पर इस्त्राएलियोंकी ओर से उसका और उसके पुत्रोंका भाग ठहरे, कयोंकि थे उठाए जाने की भेंटें ठहरी हैं; और यह इस्त्राएलियोंकी ओर से उनके मेलबलियोंमें से यहोवा के लिथे उठाऐ जाने की भेंट होगी। 29 और हारून के जो पवित्र वस्त्र होंगे वह उसके बाद उसके बेटे पोते आदि को मिलते रहें, जिस से उन्हीं को पहिने हुए उनका अभिषेक और संस्कार किया जाए। 30 उसके पुत्रोंके जो उसके स्यान पर याजक होगा, वह जब पवित्रस्यान में सेवा टहल करने को मिलाप वाले तम्बू में पहिले आए, तब उन वोंको सात दिन तक पहिने रहें। 31 फिर याजक के संस्कार का जो मेढ़ा होगा उसे लेकर उसका मांस किसी पवित्र स्यान में पकाना; 32 तब हारून अपके पुत्रोंसमेत उस मेढे का मांस और टोकरी की रोटी, दोनोंको मिलापवाले तम्बू के द्वार पर खाए। 33 और जिन पदार्योंसे उनका संस्कार और उन्हें पवित्र करने के लिथे प्रायश्चित्त किया जाएगा उनको तो वे खाएं, परन्तु पराए कुल का कोई उन्हें न खाने पाए, क्योंकि वे पवित्र होंगे। 34 और यदि संस्कारवाले मांस वा रोटी में से कुछ बिहान तक बचा रहे, तो उस बचे हुए को आग में जलाना, वह खाया न जाए; क्योंकि वह पवित्र होगा। 35 और मैं ने तुझे जो जो आज्ञा दी हैं, उन सभोंके अनुसार तू हारून और उसके पुत्रोंसे करना; और सात दिन तक उनका संस्कार करते रहना, 36 अर्यात्‌ पापबलि का एक बछड़ा प्रायश्चित्त के लिथे प्रतिदिन चढ़ाना। और वेदी को भी प्रायश्चित्त करने के समय शुद्ध करना, और उसे पवित्र करने के लिथे उसका अभिषेक करना। 37 सात दिन तक वेदी के लिथे प्रायश्चित्त करके उसे पवित्र करना, और वेदी परम पवित्र ठहरेगी; और जो कुछ उस से छू जाएगा वह भी पवित्र हो जाएगा।। 38 जो तुझे वेदी पर नित्य चढ़ाना होगा वह यह है; अर्यात्‌ प्रतिदिन एक एक वर्ष के दो भेड़ी के बच्चे। 39 एक भेड़ के बच्चे को तो भोर के समय, और दूसरे भेड़ के बच्चे को गोधूलि के समय चढ़ाना। 40 और एक भेड़ के बच्चे के संग हीन की चौयाई कूटके निकाले हुए तेल से सना हुआ एपा का दसवां भाग मैदा, और अर्घ के लिथे ही की चौयाई दाखमधु देना। 41 और दूसरे भेड़ के बच्चे को गोधूलि के समय चढ़ाना, और उसके साय भोर की रीति अनुसार अन्नबलि और अर्घ दोनोंदेना, जिस से वह सुखदायक सुगन्ध और यहोवा के लिथे हवन ठहरे। 42 तुम्हारी पीढ़ी पीढ़ी में यहोवा के आगे मिलापवाले तम्बू के द्वार पर नित्य ऐसा ही होमबलि हुआ करे; यह वह स्यान है जिस में मैं तुम लोगोंसे इसलिथे मिला करूंगा, कि तुझ से बातें करूं। 43 और मैं इस्त्राएलियोंसे वहीं मिला करूंगा, और वह तम्बू मेरे तेज से पवित्र किया जाएगा। 44 और मैं मिलापवाले तम्बू और वेदी को पवित्र करूंगा, और हारून और उसके पुत्रोंको भी पवित्र करूंगा, कि वे मेरे लिथे याजक का काम करें। 45 और मैं इस्त्राएलियोंके मध्य निवास करूंगा, और उनका परमेश्वर ठहरूंगा। 46 तब वे जान लेंगे कि मैं यहोवा उनका परमेश्वर हूं, जो उनको मिस्र देश से इसलिथे निकाल ले आया, कि उनके मध्य निवास करूं; मैं ही उनका परमेश्वर यहोवा हूं।।

निर्गमन 30

1 फिर धूप जलाने के लिथे बबूल की लकड़ी की वेदी बनाना। 2 उसकी लम्बाई एक हाथ और चौड़ाई एक हाथ की हो, वह चौकोर हो, और उसकी ऊंचाई दो हाथ की हो, और उसके सींग उसी टुकड़े से बनाए जाएं। 3 और वेदी के ऊपरवाले पल्ले और चारोंओर की अलंगोंऔर सींगोंको चोखे सोने से मढ़ना, और इसकी चारोंओर सोने की एक बाड़ बनाना। 4 और इसकी बाड़ के नीचे इसके दानोंपल्ले पर सोने के दो दो कड़े बनाकर इसके दोनोंओर लगाना, वे इसके उठाने के डण्डोंके खानोंका काम देंगे। 5 और डण्डोंको बबूल की लकड़ी के बनाकर उनको सोने से मढ़ना। 6 और तू उसको उस पर्दे के आगे रखना जो साझीपत्र के सन्दूक के साम्हने है, अर्यात्‌ प्रायश्चित्त वाले ढकने के आगे जो साझीपत्र के ऊपर है, वहीं मैं तुझ से मिला करूंगा। 7 और उसी वेदी पर हारून सुगन्धित धूप जलाया करे; प्रतिदिन भोर को जब वह दीपक को ठीक करे तब वह धूप को जलाए, 8 तब गोधूलि के समय जब हारून दीपकोंको जलाए तब धूप जलाया करे, यह धूप यहोवा के साम्हने तुम्हारी पीढ़ी पीढ़ी में नित्य जलाया जाए। 9 और उस वेदी पर तुम और प्रकार का धूप न जलाना, और न उस पर होमबलि और न अन्नबलि चढ़ाना; और न इस पर अर्घ देना। 10 और हारून वर्ष में एक बार इसके सींगोंपर प्रायश्चित्त करे; और तुम्हारी पीढ़ी पीढ़ी में वर्ष में एक बार प्रायश्चित्त लिया जाए; यह यहोवा के लिथे परमपवित्र है।। 11 और तब यहोवा ने मूसा से कहा, 12 जब तू इस्त्राएलियोंकि गिनती लेने लगे, तब वे गिनने के समय जिनकी गिनती हुई हो अपके अपके प्राणोंके लिथे यहोवा को प्रायश्चित्त दें, जिस से जब तू उनकी गिनती कर रहा हो उस समय कोई विपत्ति उन पर न आ पके। 13 जितने लोग गिने जाएं वे पवित्रस्यान के शेकेल के लिथे आधा शेकेल दें, यह शेकेल बीस गेरा का होता है, यहोवा की भेंट आधा शेकेल हो। 14 बीस वर्ष के वा उस से अधिक अवस्या के जितने गिने जाएं उन में से एक एक जन यहोवा की भेंट दे। 15 जब तुम्हारे प्राणोंके प्रायश्चित्त के निमित्त यहोवा की भेंट दी जाए, तब न तो धनी लोग आधे शेकेल से अधिक दें, और न कंगाल लोग उस से कम दें। 16 और तू इस्त्राएलियोंसे प्रायश्चित्त का रूपया लेकर मिलापवाले तम्बू के काम में लगाना; जिस से वह यहोवा के सम्मुख इस्त्राएलियोंके स्मरणार्य चिन्ह ठहरे, और उनके प्राणोंका प्रायश्चित्त भी हो।। 17 और यहोवा ने मूसा से कहा, 18 धोने के लिथे पीतल की एक हौदी और उसका पाया पीतल का बनाना। और उसके मिलापवाले तम्बू और वेदी के बीच में रखकर उस में जल भर देना; 19 और उस में हारून और उसके पुत्र अपके अपके हाथ पांव धोया करें। 20 जब जब वे मिलापवाले तम्बू में प्रवेश करें तब तब वे हाथ पांव जल से धोएं, नहीं तो मर जाएंगे; और जब जब वे वेदी के पास सेवा टहल करने, अर्यात्‌ यहोवा के लिथे हव्य जलाने को आएं तब तब वे हाथ पांव धोएं, न हो कि मर जाएं। 21 यह हारून और उसके पीढ़ी पीढ़ी के वंश के लिथे सदा की विधि ठहरे।। 22 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 23 तू मुख्य मुख्य सुगन्ध द्रव्य, अर्यात्‌ पवित्रस्यान के शेकेल के अनुसार पांच सौ शेकेल अपके आप निकला हुआ गन्धरस, और उसका आधा, अर्यात्‌ अढ़ाई सौ शेकेल सुगन्धित अगर, 24 और पांच सौ शेकेल तज, और एक हीन जलपाई का तेल लेकर 25 उन से अभिषेक का पवित्र तेल, अर्यात्‌ गन्धी की रीति से तैयार किया हुआ सुगन्धित तेल बनवाना; यह अभिषेक का पवित्र तेल ठहरे। 26 और उस से मिलापवाले तम्बू का, और साझीपत्र के सन्दूक का, 27 और सारे सामान समेत मेज़ का, और सामान समेत दीवट का, और धूपकेदी का, 28 और सारे सामान समेत होमवेदी का, और पाए समेत हौदी का अभिषेक करना। 29 और उनको पवित्र करना, जिस से वे परमपवित्र ठहरें; और जो कुछ उन से छू जाएगा वह पवित्र हो जाएगा। 30 फिर हारून का उसके पुत्रोंके साय अभिषेक करना, और इस प्रकार उन्हें मेरे लिथे याजक का काम करने के लिथे पवित्र करना। 31 और इस्त्राएलियोंको मेरी यह आज्ञा सुनाना, कि वह तेल तुम्हारी पीढ़ी पीढ़ी में मेरे लिथे पवित्र अभिषेक का तेल होगा। 32 वह किसी मनुष्य की देह पर न डाला जाए, और मिलावट में उसके समान और कुछ न बनाना; वह तो पवित्र होगा, वह तुम्हारे लिथे पवित्र होगा। 33 जो कोई उसके समान कुछ बनाए, वा जो कोई उस में से कुछ पराए कुलवाले पर लगाए, वह अपके लोगोंमें से नाश किया जाए।। 34 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, बोल, नखी और कुन्दरू, थे सुगन्ध द्रव्य निर्मल लोबान समेत ले लेना, थे सब एक तौल के हों, 35 और इनका धूप अर्यात्‌ लोन मिलाकर गन्धी की रीति के अनुसार चोखा और पवित्र सुगन्ध द्रव्य बनवाना; 36 फिर उस में से कुछ पीसकर बुकनी कर डालना, तब उस में से कुछ मिलापवाले तम्बू में साझीपत्र के आगे, जहां पर मैं तुझ से मिला करूंगा वहां रखना; वह तुम्हारे लिथे परमपवित्र होगा। 37 और जो धूप तू बनवाएगा, मिलावट में उसके समान तुम लोग अपके लिथे और कुछ न बनवाना; वह तुम्हारे आगे यहोवा के लिथे पवित्र होगा। 38 जो कोई सूंघने के लिथे उसके समान कुछ बनाए वह अपके लोगोंमें से नाश किया जाए।।

निर्गमन 31

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 2 सुन, मैं ऊरी के पुत्र बसलेल को, जो हूर का पोता और यहूदा के गोत्र का है, नाम लेकर बुलाता हूं। 3 और मैं उसको परमेश्वर की आत्मा से जो बुद्धि, प्रवीणता, ज्ञान, और सब प्रकार के कार्योंकी समझ देनेवाली आत्मा है परिपूर्ण करता हूं, 4 जिस से वह कारीगरी के कार्य बुद्धि से निकाल निकालकर सब भांति की बनावट में, अर्यात्‌ सोने, चांदी, और पीतल में, 5 और जड़ने के लिथे मणि काटने में, और लकड़ी के खोदने में काम करे। 6 और सुन, मैं दान के गोत्रवाले अहीसामाक के पुत्र ओहोलीआब को उसके संग कर देता हूं; वरन जितने बुद्धिमान है उन सभोंके ह्रृदय में मैं बुद्धि देता हूं, जिस से जितनी वस्तुओं की आज्ञा मैं ने तुझे दी है उन सभोंको वे बनाएं; 7 अर्यात्‌ मिलापवाला तम्बू, और साझीपत्र का सन्दूक, और उस पर का प्रायश्चित्तवाला ढकना, और तम्बू का सारा सामान, 8 और सामान सहित मेज़, और सारे सामान समेत चोखे सोने की दीवट, और धूपकेदी, 9 और सारे सामान सहित होमवेदी, और पाए समेत हौदी, 10 और काढ़े हुए वस्त्र, और हारून याजक के याजकवाले काम के पवित्र वस्त्र, और उसके पुत्रोंके वस्त्र, 11 और अभिषेक का तेल, और पवित्र स्यान के लिथे सुगन्धित धूप, इन सभोंको वे उन सब आज्ञाओं के अनुसार बनाएं जो मैं ने तुझे दी हैं।। 12 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 13 तू इस्त्राएलियोंसे यह भी कहना, कि निश्चय तुम मेरे विश्रमदिनोंको मानना, क्योंकि तुम्हारी पीढ़ी पीढ़ी में मेरे और तुम लोगोंके बीच यह एक चिन्ह ठहरा है, जिस से तुम यह बात जान रखो कि यहोवा हमारा पवित्र करनेहारा है। 14 इस कारण तुम विश्रमदिन को मानना, क्योंकि वह तुम्हारे लिथे पवित्र ठहरा है; जो उसको अपवित्र करे वह निश्चय मार डाला जाए; जो कोई उस दिन में से कुछ कामकाज करे वह प्राणी अपके लोगोंके बीच से नाश किया जाए। 15 छ: दिन तो काम काज किया जाए, पर सातवां दिन परमविश्रम का दिन और यहोवा के लिथे पवित्र है; इसलिथे जो कोई विश्रम के दिन में कुछ काम काज करे वह निश्चय मार डाला जाए। 16 सो इस्त्राएली विश्रमदिन को माना करें, वरन पीढ़ी पीढ़ी में उसको सदा की वाचा का विषय जानकर माना करें। 17 वह मेरे और इस्त्राएलियोंके बीच सदा एक चिन्ह रहेगा, क्योंकि छ: दिन में यहोवा ने आकाश और पृय्वी को बनाया, और सातवें दिन विश्रम करके अपना जी ठण्डा किया।। 18 जब परमेश्वर मूसा से सीनै पर्वत पर ऐसी बातें कर चुका, तब उस ने उसको अपक्की उंगली से लिखी हुई साझी देनेवाली पत्यर की दोनोंतख्तियां दी।।

निर्गमन 32

1 जब लोगोंने देखा कि मूसा को पर्वत से उतरने में विलम्ब हो रहा है, तब वे हारून के पास इकट्ठे होकर कहने लगे, अब हमारे लिथे देवता बना, जो हमारे आगे आगे चले; क्योंकि उस पुरूष मूसा को जो हमें मिस्र देश से निकाल ले आया है, हम नहीं जानते कि उसे क्या हुआ? 2 हारून ने उन से कहा, तुम्हारी स्त्रियोंऔर बेटे बेटियोंके कानोंमें सोने की जो बालियां है उन्हें तोड़कर उतारो, और मेरे पास ले आओ। 3 तब सब लोगोंने उनके कानोंसे सोने की बालियोंको तोड़कर उतारा, और हारून के पास ले आए। 4 और हारून ने उन्हें उनके हाथ से लिया, और एक बछड़ा ढालकर बनाया, और टांकी से गढ़ा; तब वे कहने लगे, कि हे इस्त्राएल तेरा परमेश्वर जो तुझे मिस्र देश से छुड़ा लाया है वह यही है। 5 यह देखके हारून ने उसके आगे एक वेदी बनवाई; और यह प्रचार किया, कि कल यहोवा के लिथे पर्ब्ब होगा। 6 और दूसरे दिन लोगोंने तड़के उठकर होमबलि चढ़ाए, और मेलबलि ले आए; फिर बैठकर खाया पिया, और उठकर खेलने लगे।। 7 तब यहोवा ने मूसा से कहा, नीचे उतर जा, क्योंकि तेरी प्रजा के लोग, जिन्हें तू मिस्र देश से निकाल ले आया है, सो बिगड़ गए हैं; 8 और जिस मार्ग पर चलने की आज्ञा मैं ने उनको दी यी उसको फटपट छोड़कर उन्होंने एक बछड़ा ढालकर बना लिया, फिर उसको दण्डवत्‌ किया, और उसके लिथे बलिदान भी चढ़ाया, और यह कहा है, कि हे इस्त्राएलियोंतुम्हारा परमेश्वर जो तुम्हें मिस्र देश से छुड़ा ले आया है वह यही है। 9 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, मैं ने इन लोगोंको देखा, और सुन, वे हठीले हैं। 10 अब मुझे मत रोक, मेरा कोप उन पर भड़क उठा है जिस से मैं उन्हें भस्म करूं; परन्तु तुझ से एक बड़ी जाति उपजाऊंगा। 11 तब मूसा अपके परमेश्वर यहोवा को यह कहके मनाने लगा, कि हे यहोवा, तेरा कोप अपक्की प्रजा पर क्योंभड़का है, जिसे तू बड़े सामर्य्य और बलवन्त हाथ के द्वारा मिस्र देश से निकाल लाया है? 12 मिस्री लोग यह क्योंकहने पाए, कि वह उनको बुरे अभिप्राय से, अर्यात्‌ पहाड़ोंमें घात करके धरती पर से मिटा डालने की मनसा से निकाल ले गया? तू अपके भड़के हुए कोप को शांत कर, और अपक्की प्रजा को ऐसी हानि पहुचाने से फिर जा। 13 अपके दास इब्राहीम, इसहाक, और याकूब को स्मरण कर, जिन से तू ने अपक्की ही किरिया खाकर यह कहा या, कि मै तुम्हारे वंश को आकाश के तारोंके तुल्य बहुत करूंगा, और यह सारा देश जिसकी मैं ने चर्चा की है तुम्हारे वंश को दूंगा, कि वह उसके अधिक्कारनेी सदैव बने रहें। 14 तब यहोवा अपक्की प्रजा की हानि करने से जो उन ने कहा या पछताया।। 15 तब मूसा फिरकर साझी की दानोंतख्तियोंको हाथ में लिथे हुए पहाड़ से उतर गया, उन तख्तियोंके तो इधर और उधर दोनोंअलंगोंपर कुछ लिखा हुआ या। 16 और वे तख्तियां परमेश्वर की बनाई हुई यीं, और उन पर जो खोदकर लिखा हुआ या वह परमेश्वर का लिखा हुआ या।। 17 जब यहोशू को लोगोंके कोलाहल का शब्द सुनाई पड़ा, तब उस ने मूसा से कहा, छावनी से लड़ाई का सा शब्द सुनाई देता है। 18 उस ने कहा, वह जो शब्द है वह न तो जीतनेवालोंका है, और न हारनेवालोंका, मुझे तो गाने का शब्द सुन पड़ता है। 19 छावनी के पास आते ही मूसा को वह बछड़ा और नाचना देख पड़ा, तब मूसा का कोप भड़क उठा, और उस ने तख्तियोंको अपके हाथोंसे पर्वत के नीचे पटककर तोड़ डाला। 20 तब उस ने उनके बनाए हुए बछड़े को लेकर आग में डालके फूंक दिया। और पीसकर चूर चूर कर डाला, और जल के ऊपर फेंक दिया, और इस्त्राएलियोंको उसे पिलवा दिया। 21 तब मूसा हारून से कहने लगा, उन लोगोंने तुझ से क्या किया कि तू ने उनको इतने बड़े पाप में फंसाया? 22 हारून ने उत्तर दिया, मेरे प्रभु का कोप न भड़के; तू तो उन लोगोंको जानता ही है कि वे बुराई में मन लगाए रहते हैं। 23 और उन्होंने मुझ से कहा, कि हमारे लिथे देवता बनवा जो हमारे आगे आगे चले; क्योंकि उस पुरूष मूसा को, जो हमें मिस्र देश से छुड़ा लाया है, हम नहीं जानते कि उसे क्या हुआ? 24 तब मैं ने उन से कहा, जिस जिसके पास सोने के गहनें हों, वे उनको तोड़कर उतार लाएं; और जब उन्होंने मुझ को दिया, मैं ने उन्हें आग में डाल दिया, तब यह बछड़ा निकल पड़ा 25 हारून ने उन लोगोंको ऐसा निरंकुश कर दिया या कि वे अपके विरोधियोंके बीच उपहास के योग्य हुए, 26 उनको निरंकुश देखकर मूसा ने छावनी के निकास पर खड़े होकर कहा, जो कोई यहोवा की ओर का हो वह मेरे पास आए; तब सारे लेवीय उस के पास इकट्ठे हुए। 27 उस ने उन से कहा, इस्त्राएल का परमेश्वर यहोवा योंकहता है, कि अपक्की अपक्की जांघ पर तलवार लटका कर छावनी से एक निकास से दूसरे निकास तक घूम घूमकर अपके अपके भाइयों, संगियों, और पड़ोसिक्कों घात करो। 28 मूसा के इस वचन के अनुसार लेवियोंने किया और उस दिन तीन हजार के अटकल लोग मारे गए। 29 फिर मूसा ने कहा, आज के दिन यहोवा के लिथे अपना याजकपद का संस्कार करो, वरन अपके अपके बेटोंऔर भाइयोंके भी विरूद्ध होकर ऐसा करो जिस से वह आज तुम को आशीष दे। 30 दूसरे दिन मूसा ने लोगोंसे कहा, तुम ने बड़ा ही पाप किया है। अब मैं यहोवा के पास चढ़ जाऊंगा; सम्भव है कि मैं तुम्हारे पाप का प्रायश्चित्त कर सकूं। 31 तब मूसा यहोवा के पास जाकर कहने लगा, कि हाथ, हाथ, उन लोगोंने सोने का देवता बनवाकर बड़ा ही पाप किया है। 32 तौभी अब तू उनका पाप झमा कर नहीं तो अपक्की लिखी हुई पुस्तक में से मेरे नाम को काट दे। 33 यहोवा ने मूसा से कहा, जिस ने मेरे विरूद्ध पाप किया है उसी का नाम मैं अपक्की पुस्तक में से काट दूंगा। 34 अब तो तू जाकर उन लोगोंको उस स्यान में ले चल जिसकी चर्चा मैं ने तुझ से की यी; देख मेरा दूत तेरे आगे आगे चलेगा। परन्तु जिस दिन मैं दण्ड देने लगूंगा उस दिन उनको इस पाप का भी दण्ड दूंगा। 35 और यहोवा ने उन लोगोंपर विपत्ति डाली, क्योंकि हारून के बनाए हुए बछड़े को उन्हीं ने बनवाया या।

निर्गमन 33

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, तू उन लोगोंको जिन्हें मिस्र देश से छुड़ा लाया है संग लेकर उस देश को जा, जिसके विषय मैं ने इब्राहीम, इसहाक, और याकूब से शपय खाकर कहा या, कि मैं उसे तुम्हारे वंश को दूंगा। 2 और मैं तेरे आगे आगे एक दूत को भेजूंगा, और कनानी, एमोरी, हित्ती, परिज्जी, हिब्बी, और यबूसी लोगोंको बरबस निकाल दूंगा। 3 तुम लोग उस देश को जाओ जिस में दूध और मधु की धारा बहती है; परन्तु तुम हठीले हो, इस कारण मैं तुम्हारे बीच में होके न चलूंगा, ऐसा न हो कि मैं मार्ग में तुम्हारा अन्त कर डालूं। 4 यह बुरा समाचार सुनकर वे लोग विलाप करने लगे; और कोई अपके गहने पहिने हुए न रहा। 5 क्योंकि यहोवा ने मूसा से कह दिया या, कि इस्त्राएलियोंको मेरा यह वचन सुना, कि तुम लोग तो हठीले हो; जो मै पल भर के लिथे तुम्हारे बीच होकर चलूं, तो तुम्हारा अन्त कर डालूंगा। इसलिथे अब अपके अपके गहने अपके अंगोंसे उतार दो, कि मैं जानूं कि तुम्हारे साय क्या करना चाहिए। 6 तब इस्त्राएली होरेब पर्वत से लेकर आगे को अपके गहने उतारे रहे।। 7 मूसा तम्बू को छावनी से बाहर वरन दूर खड़ा कराया करता या, और उसको मिलापवाला तम्बू कहता या। और जो कोई यहोवा को ढूंढ़ता वह उस मिलापवाले तम्बू के पास जो छावनी के बाहर या निकल जाता या। 8 और जब जब मूसा तम्बू के पास जाता, तब तब सब लोग उठकर अपके अपके डेरे के द्वार पर खड़े हो जाते, और जब तक मूसा उस तम्बू में प्रवेश न करता या तब तक उसकी ओर ताकते रहते थे। 9 और जब मूसा उस तम्बू में प्रवेश करता या, तब बादल का खम्भा उतर के तम्बू के द्वार पर ठहर जाता या, और यहोवा मूसा से बातें करने लगता या। 10 और सब लोग जब बादल के खम्भे को तम्बू के द्वार पर ठहरा देखते थे, तब उठकर अपके अपके डेरे के द्वार पर से दण्डवत्‌ करते थे। 11 और यहोवा मूसा से इस प्रकार आम्हने-साम्हने बातें करता या, जिस प्रकार कोई अपके भाई से बातें करे। और मूसा तो छावनी में फिर आता या, पर यहोशू नाम एक जवान, जो नून का पुत्र और मूसा का टहलुआ या, वह तम्बू में से न निकलता या।। 12 और मूसा ने यहोवा से कहा, सुन तू मुझ से कहता है, कि इन लोगोंको ले चल; परन्तु यह नहीं बताया कि तू मेरे संग किसको भेजेगा। तौभी तू ने कहा है, कि तेरा नाम मेरे चित्त में बसा है, और तुझ पर मेरे अनुग्रह की दृष्टि है। 13 और अब यदि मुझ पर तेरे अनुग्रह की दृष्टि हो, तो मुझे अपक्की गति समझा दे, जिस से जब मैं तेरा ज्ञान पाऊं तब तेरे अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर बनी रहे। फिर इसकी भी सुधि कर कि यह जाति तेरी प्रजा है। 14 यहोवा ने कहा, मैं आप चलूंगा और तुझे विश्रम दूंगा। 15 उस ने उस से कहा, यदि तू आप न चले, तो हमें यहां से आगे न ले जा। 16 यह कैसे जाना जाए कि तेरे अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर और अपक्की प्रजा पर है? क्या इस से नहीं कि तू हमारे संग संग चले, जिस से मैं और तेरी प्रजा के लोग पृय्वी भर के सब लोगोंसे अलग ठहरें? 17 यहोवा ने मूसा से कहा, मैं यह काम भी जिसकी चर्चा तू ने की है करूंगा; कयोंकि मेरे अनुग्रह की दृष्टि तुझ पर है, और तेरा नाम मेरे चित्त में बसा है। 18 उस ने कहा मुझे अपना तेज दिखा दे। 19 उस ने कहा, मैं तेरे सम्मुख होकर चलते हुए तुझे अपक्की सारी भलाई दिखाऊंगा, और तेरे सम्मुख यहोवा नाम का प्रचार करूंगा, और जिस पर मैं अनुग्रह करना चाहूं उसी पर अनुग्रह करूंगा, और जिस पर दया करना चांहू उसी पर दया करूंगा। 20 फिर उस ने कहा, तू मेरे मुख का दर्शन नहीं कर सकता; क्योंकि मनुष्य मेरे मुख का दर्शन करके जीवित नहीं रह सकता। 21 फिर यहोवा ने कहा, सुन, मेरे पास एक स्यान है, तू उस चट्टान पर खड़ा हो; 22 और जब तक मेरा तेज तेरे साम्हने होके चलता रहे तब तक मै तुझे चट्टान के दरार में रखूंगा, और जब तक मैं तेरे साम्हने होकर न निकल जाऊं तब तक अपके हाथ से तुझे ढांपे रहूंगा; 23 फिर मैं अपना हाथ उठा लूंगा, तब तू मेरी पीठ का तो दर्शन पाएगा, परन्तु मेरे मुख का दर्शन नहीं मिलेगा।।

निर्गमन 34

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, पहिली तख्तियोंके समान पत्यर की दो और तख्तियां गढ़ ले; तब जो वचन उन पहिली तख्तियोंपर लिखे थे, जिन्हें तू ने तोड़ डाला, वे ही वचन मैं उन तख्तियोंपर भी लिखूंगा। 2 और बिहान को तैयार रहना, और भोर को सीनै पर्वत पर चढ़कर उसकी चोटी पर मेरे साम्हने खड़ा होना। 3 और तेरे संग कोई न चढ़ पाए, वरन पर्वत भर पर कोई मनुष्य कहीं दिखाई न दे; और न भेड़-बकरी और गाय-बैल भी पर्वत के आगे चरते पाएं। 4 तब मूसा ने पहिली तख्तियोंके समान दो और तख्तियां गढ़ी; और बिहान को सवेरे उठकर अपके हाथ में पत्यर की वे दोनोंतख्तियां लेकर यहोवा की आज्ञा के अनुसार पर्वत पर चढ़ गया। 5 तब यहोवा ने बादल में उतरके उसके संग वहां खड़ा होकर यहोवा नाम का प्रचार किया। 6 और यहोवा उसके साम्हने होकर योंप्रचार करता हुआ चला, कि यहोवा, यहोवा, ईश्वर दयालु और अनुग्रहकारी, कोप करने में धीरजवन्त, और अति करूणामय और सत्य, 7 हजारोंपीढिय़ोंतब निरन्तर करूणा करनेवाला, अधर्म और अपराध और पाप का झमा करनेवाला है, परन्तु दोषी को वह किसी प्रकार निर्दोष न ठहराएगा, वह पितरोंके अधर्म का दण्ड उनके बेटोंवरन पोतोंऔर परपोतोंको भी देनेवाला है। 8 तब मूसा ने फुर्ती कर पृय्वी की ओर फुककर दण्डवत्‌ की। 9 और उस ने कहा, हे प्रभु, यदि तेरे अनुग्रह की दृष्टि मुझ पर हो तो प्रभु, हम लोगोंके बीच में होकर चले, थे लोग हठीले तो हैं, तौभी हमारे अधर्म और पाप को झमा कर, और हमें अपना निज भाग मानके ग्रहण कर। 10 उस ने कहा, सुन, मैं एक वाचा बान्धता हूं। तेरे सब लोगोंके साम्हने मैं ऐसे आश्चर्य कर्म करूंगा जैसा पृय्वी पर और सब जातियोंमें कभी नहीं हुए; और वे सारे लोग जिनके बीच तू रहता है यहोवा के कार्य को देखेंगे; क्योंकि जो मैं तुम लोगोंसे करने पर हूं वह भय योग्य काम है। 11 जो आज्ञा मैं आज तुम्हें देता हूं उसे तुम लोग मानना। देखो, मैं तुम्हारे आगे से एमोरी, कनानी, हित्ती, परिज्जी, हिब्बी, और यबूसी लोगोंको निकालता हूं। 12 इसलिथे सावधान रहना कि जिस देश में तू जानेवाला है उसके निवासिक्कों वाचा न बान्धना; कहीं ऐसा न हो कि वह तेरे लिथे फंदा ठहरे। 13 वरन उनकी वेदियोंको गिरा देना, उनकी लाठोंको तोड़ डालना, और उनकी अशेरा नाम मूतिर्योंको काट डालना; 14 क्योंकि तुम्हें किसी दूसरे को ईश्वर करके दण्डवत्‌ करने की आज्ञा नहीं, क्योंकि यहोवा जिसका नाम जलनशील है, वह जल उठनेवाला ईश्वर है ही, 15 ऐसा न हो कि तू उस देश के निवासिक्कों वाचा बान्धे, और वे अपके देवताओं के पीछे होने का व्यभिचार करें, और उनके लिथे बलिदान भी करें, और कोई तुझे नेवता दे और तू भी उसके बलिपशु का प्रसाद खाए, 16 और तू उनकी बेटियोंको अपके बेटोंके लिथे लावे, और उनकी बेटियां जो आप अपके देवताओं के पीछे होने का व्यभिचार करती है तेरे बेटोंसे भी अपके देवताओं के पीछे होने को व्यभिचार करवाएं। 17 तुम देवताओं की मूत्तियां ढालकर न बना लेना। 18 अखमीरी रोटी का पर्ब्ब मानना। उस में मेरी आज्ञा के अनुसार आबीब महीने के नियत समय पर सात दिन तक अखमीरी रोटी खाया करना; क्योंकि तू मिस्र से आबीब महीने में निकल आया। 19 हर एक पहिलौठा मेरा है; और क्या बछड़ा, क्या मेम्ना, तेरे पशुओं में से जो नर पहिलौठे होंवे सब मेरे ही हैं। 20 और गदही के पहिलौठे की सन्ती मेम्ना देकर उसको छुड़ाना, यदि तू उसे छुड़ाना न चाहे तो उसकी गर्दन तोड़ देना। परन्तु अपके सब पहिलौठे बेटोंको बदला देकर छुड़ाना। मुझे कोई छूछे हाथ अपना मुंह न दिखाए। 21 छ: दिन तो परिश्र्म करना, परन्तु सातवें दिन विश्रम करना; वरन हल जोतने और लवने के समय में भी विश्रम करना। 22 और तू अठवारोंका पर्ब्ब मानना जो पहिले लवे हुए गेहूं का पर्ब्ब कहलाता है, और वर्ष के अन्त में बटोरन का भी पर्ब्ब मानना। 23 वर्ष में तीन बार तेरे सब पुरूष इस्त्राएल के परमेश्वर प्रभु यहोवा को अपके मुंह दिखाएं। 24 मैं तो अन्यजातियोंको तेरे आगे से निकालकर तेरे सिवानोंको बढ़ाऊंगा; और जब तू अपके परमेश्वर यहोवा को अपना मुंह दिखाने के लिथे वर्ष में तीन बार आया करे, तब कोई तेरी भूमि का लालच न करेगा। 25 मेरे बलिदान के लोहू को खमीर सहित न चढ़ाना, और न फसह के पर्ब्ब के बलिदान में से कुछ बिहान तक रहने देना। 26 अपक्की भूमि की पहिली उपज का पहिला भाग अपके परमेश्वर यहोवा के भवन में ले आना। बकरी के बच्चे को उसकी मां के दूध में ने सिफाना। 27 और यहोवा ने मूसा से कहा, थे वचन लिख ले; क्योंकि इन्हीं वचनोंके अनुसार मैं तेरे और इस्त्राएल के साय वाचा बान्धता हूं। 28 मूसा तो वहां यहोवा के संग चालीस दिन और रात रहा; और तब तक न तो उस ने रोटी खाई और न पानी पिया। और उस ने उन तख्तियोंपर वाचा के वचन अर्यात्‌ दस आज्ञाएं लिख दीं।। 29 जब मूसा साझी की दोनोंतख्तियां हाथ में लिथे हुए सीनै पर्वत से उतरा आता या तब यहोवा के साय बातें करने के कारण उसके चेहरे से किरणें निकल रही यी।, परन्तु वह यह नहीं जानता या कि उसके चेहरे से किरणें निकल रही हैं। 30 जब हारून और सब इस्त्राएलियोंने मूसा को देखा कि उसके चेहरे से किरणें निकलती हैं, तब वे उसके पास जाने से डर गए। 31 तब मूसा ने उनको बुलाया; और हारून मण्डली के सारे प्रधानोंसमेत उसके पास आया, और मूसा उन से बातें करने लगा। 32 इसके बाद सब इस्त्राएली पास आए, और जितनी आज्ञाएं यहोवा ने सीनै पर्वत पर उसके साय बात करने के समय दी यीं, वे सब उस ने उन्हें बताईं। 33 जब तक मूसा उन से बात न कर चुका तब तक अपके मुंह पर ओढ़ना डाले रहा। 34 और जब जब मूसा भीतर यहोवा से बात करने को उसके साम्हने जाता तब तब वह उस ओढ़नी को निकलते समय तक उतारे हुए रहता या; फिर बाहर आकर जो जो आज्ञा उसे मिलती उन्हें इस्त्राएलियोंसे कह देता या। 35 सो इस्त्राएली मूसा का चेहरा देखते थे कि उस से किरणें निकलती हैं; और जब तक वह यहोवा से बात करने को भीतर न जाता तब तक वह उस ओढ़नी को डाले रहता या।।

निर्गमन 35

1 मूसा ने इस्त्राएलियोंकी सारी मण्डली इकट्ठी करके उन से कहा, जिन कामोंके करने की आज्ञा यहोवा ने दी है वे थे हैं। 2 छ: दिन तो काम काज किया जाए, परन्तु सातवां दिन तुम्हारे लिथे पवित्र और यहोवा के लिथे परमविश्रम का दिन ठहरे; उस में जो कोई काम काज करे वह मार डाला जाए; 3 वरन विश्रम के दिन तुम अपके अपके घरोंमें आग तक न जलाना।। 4 फिर मूसा ने इस्त्राएलियोंकी सारी मण्डली से कहा, जिस बात की आज्ञा यहोवा ने दी है वह यह है। 5 तुम्हारे पास से यहोवा के लिथे भेंट ली जाए, अर्यात्‌ जितने अपक्की इच्छा से देना चाहें वे यहोवा की भेंट करके थे वस्तुएं ले आएं; अर्यात्‌ सोना, रूपा, पीतल; 6 नीले, बैंजनी और लाल रंग का कपड़ा, सूझ्म सनी का कपड़ा; बकरी का बाल, 7 लाल रंग से रंगी हुई मेढ़ोंकी खालें, सुइसोंकी खालें; बबूल की लकड़ी, 8 उजियाला देने के लिथे तेल, अभिषेक का तेल, और धूप के लिथे सुगन्धद्रव्य, 9 फिर एपोद और चपरास के लिथे सुलैमानी मणि और जड़ने के लिथे मणि। 10 और तुम में से जितनोंके ह्रृदय में बुद्धि का प्रकाश है वे सब आकर जिस जिस वस्तु की आज्ञा यहोवा ने दी है वे सब बनाएं। 11 अर्यात्‌ तम्बू, और ओहार समेत निवास, और उसकी घुंडी, तख्ते, बेंड़े, खम्भे और कुसिर्यां; 12 फिर डण्डोंसमेत सन्दूक, और प्रायश्चित्त का ढकना, और बीचवाला पर्दा; 13 डण्डोंऔर सब सामान समेत मेज़, और भेंट की रोटियां; 14 सामान और दीपकोंसमेत उजियाला देनेवाला दीवट, और उजियाला देने के लिथे तेल; 15 डण्डोंसमेत धूपकेदी, अभिषेक का तेल, सुगन्धित धूप, और निवास के द्वार का पर्दा; 16 पीतल की फंफरी, डण्डोंआदि सारे सामान समेत होमवेदी, पाए समेत होदी; 17 खम्भोंऔर उनकी कुसिर्योंसमेत आंगन के पर्दे, और आंगन के द्वार के पर्दे; 18 निवास और आंगन दोनोंके खूंटे, और डोरियां; 19 पवित्रस्यान में सेवा टहल करने के लिथे काढ़े हुए वस्त्र, और याजक का काम करने के लिथे हारून याजक के पवित्र वस्त्र, और उसके पुत्रोंके वस्त्र भी।। 20 तब इस्त्राएलियोंकी सारी मण्डली मूसा के साम्हने से लौट गई। 21 और जितनोंको उत्साह हुआ, और जितनोंके मन में ऐसी इच्छा उत्पन्न हुई यी, वे मिलापवाले तम्बू के काम करने और उसकी सारी सेवकाई और पवित्र वोंके बनाने के लिथे यहोवा की भेंट ले आने लगे। 22 क्या स्त्री, क्या पुरूष, जितनोंके मन में ऐसी इच्छा उत्पन्न हुई भी वे सब जुगनू, नयुनी, मुंदरी, और कंगन आदि सोने के गहने ले आने लगे, इस भंाति जितने मनुष्य यहोवा के लिथे सोने की भेंट के देनेवाले थे वे सब उनको ले आए। 23 और जिस जिस पुरूष के पास नीले, बैंजनी वा लाल रंग का कपड़ा वा सूझ्म सनी का कपड़ा, वा बकरी का बाल, वा लाल रंग से रंगी हुई मेढ़ोंकी खालें, वा सूइसोंकी खालें यी वे उन्हें ले आए। 24 फिर जितने चांदी, वा पीतल की भेंट के देनेवाले थे वे यहोवा के लिथे वैसी भेंट ले आए; और जिस जिसके पास सेवकाई के किसी काम के लिथे बबूल की लकड़ी यी वे उसे ले आए। 25 और जितनी स्त्रियोंके ह्रृदय में बुद्धि का प्रकाश या वे अपके हाथोंसे सूत कात कातकर नीले, बैंजनी और लाल रंग के, और सूझ्म सनी के काते हुए सूत को ले आई। 26 और जितनी स्त्रियोंके मन में ऐसी बुद्धि का प्रकाश या उन्हो ने बकरी के बाल भी काते। 27 और प्रधान लोग एपोद और चपरास के लिथे सुलैमानी मणि, और जड़ने के लिथे मणि, 28 और उजियाला देने और अभिषेक और धूप के सुगन्धद्रव्य और तेल ले आथे। 29 जिस जिस वस्तु के बनाने की आज्ञा यहोवा ने मूसा के द्वारा दी यी उसके लिथे जो कुछ आवश्यक या, उसे वे सब पुरूष और स्त्रियां ले आई, जिनके ह्रृदय में ऐसी इच्छा उत्पन्न हुई यी। इस प्रकार इस्त्राएली यहोवा के लिथे अपक्की ही इच्छा से भेंट ले आए।। 30 तब मूसा ने इस्त्राएलियोंसे कहा सुनो, यहोवा ने यहूदा के गोत्रवाले बसलेल को, जो ऊरी का पुत्र और हूर का पोता है, नाम लेकर बुलाया है। 31 और उस ने उसको परमेश्वर के आत्मा से ऐसा परिपूर्ण किया हे कि सब प्रकार की बनावट के लिथे उसको ऐसी बुद्धि, समझ, और ज्ञान मिला है, 32 कि वह कारीगरी की युक्तियां निकालकर सोने, चांदी, और पीतल में, 33 और जड़ने के लिथे मणि काटने में और लकड़ी के खोदने में, वरन बुद्धि से सब भांति की निकाली हुई बनावट में काम कर सके। 34 फिर यहोवा ने उसके मन में और दान के गोत्रवाले अहीसामाक के पुत्र ओहोलीआब के मन में भी शिझा देने की शक्ति दी है। 35 इन दोनोंके ह्रृदय को यहोवा ने ऐसी बुद्धि से परिपूर्ण किया है, कि वे खोदने और गढ़ने और नीले, बैजनी और लाल रंग के कपके, और सूझ्म सनी के कपके में काढ़ने और बुनने, वरन सब प्रकार की बनावट में, और बुद्धि से काम निकालने में सब भांति के काम करें।।

निर्गमन 36

1 और बसलेल और ओहोलीआब और सब बुद्धिमान जिनको यहोवा ने ऐसी बुद्धि और समझ दी हो, कि वे यहोवा की सारी आज्ञाओं के अनुसार पवित्रस्यान की सेवकाई के लिथे सब प्रकार का काम करना जानें, वे सब यह काम करें।। 2 तब मूसा ने बसलेल और ओहोलीआब और सब बुद्धिमानोंको जिनके ह्रृदय में यहोवा ने बुद्धि का प्रकाश दिया या, अर्यात्‌ जिस जिसको पास आकर काम करने का उत्साह हुआ या उन सभोंको बुलवाया। 3 और इस्त्राएली जो जो भेंट पवित्रस्यान की सेवकाई के काम और उसके बनाने के लिथे ले आए थे, उन्हें उन पुरूषोंने मूसा के हाथ से ले लिया। तब भी लोग प्रति भोर को उसके पास भेंट अपक्की इच्छा से लाते रहें; 4 और जितने बुद्धिमान पवित्रस्यान का काम करते थे वे सब अपना अपना काम छोड़कर मूसा के पास आए, 5 और कहने लगे, जिस काम के करने की आज्ञा यहोवा ने दी है उसके लिथे जितना चाहिथे उससे अधिक वे ले आए हैं। 6 तब मूसा ने सारी छावनी में इस आज्ञा का प्रचार करवाया, कि क्या पुरूष, क्या स्त्री, कोई पवित्रस्यान के लिथे और भेंट न लाए, इस प्रकार लोग और भेंट लाने से रोके गए। 7 क्योंकि सब काम बनाने के लिथे जितना सामान आवश्यक या उतना वरन उससे अधिक बनाने वालोंके पास आ चुका या।। 8 और काम करनेवाले जितने बुद्धिमान थे उन्होंने निवास के लिथे बटी हुई सूझ्म सनी के कपके के, और नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपके के दस पटोंको काढ़े हुए करूबोंसहित बनाया। 9 एक एक पट की लम्बाई अट्ठाईस हाथ और चौड़ाई चार हाथ की हुई; सब पट एक ही नाप के बने। 10 उस ने पांच पट एक दूसरे से जोड़ दिए, और फिर दूसरे पांच पट भी एक दूसरे से जोड़ दिए। 11 और जहां थे पट जोड़े गए वहां की दोनोंछोरोंपर उस ने पीली नीली फलियां लगाईं। 12 उस ने दोनोंछोरोंमें पचास पचास फलियां इस प्रकार लगाई कि वे आम्हने-साम्हने हुई। 13 और उस ने सोने की पचास घुंडियां बनाई, और उनके द्वारा पटोंको एक दूसरे से ऐसा जोड़ा कि निवास मिलकर एक हो गया। 14 फिर निवास के ऊपर के तम्बू के लिथे उस ने बकरी के बाल के ग्यारह पट बनाए। 15 एक एक पट की लम्बाई तीस हाथ और चौड़ाई चार हाथ की हुई; और ग्यारहोंपट एक ही नाप के थे। 16 इन में से उस ने पांच पट अलग और छ: पट अलग जोड़ दिए। 17 और जहां दोनोंजोड़े गए वहां की छोरोंमें उस ने पचास पचास फलियां लगाईं। 18 और उस ने तम्बू के जोड़ने के लिथे पीतल की पचास घुंडियां भी बनाई जिस से वह एक हो जाए। 19 और उस ने तम्बू के लिथे लाल रंग से रंगी हुई मेंढ़ोंकी खालोंका एक ओढ़ना और उसके ऊपर के लिथे सूइसोंकी खालोंका भी एक ओढ़ना बनाया। 20 फिर उस ने निवास के लिथे बबूल की लकड़ी के तख्तोंको खड़े रहने के लिथे बनाया। 21 एक एक तख्ते की लम्बाई दस हाथ और चौड़ाई डेढ़ हाथ की हुई। 22 एक एक तख्ते में एक दूसरी से जोड़ी हुई दो दो चूलें बनीं, निवास के सब तख्तोंके लिथें उस ने इसी भंाति बनाईं। 23 और उस ने निवास के लिथे तख्तोंको इस रीति से बनाया, कि दक्खिन की ओर बीस तख्ते लगे। 24 और इन बीसोंतख्तोंके नीचे चांदी की चालीस कुसिर्यां, अर्यात्‌ एक एक तख्ते के नीचे उसकी दो चूलोंके लिथे उस ने दो कुसिर्यां बनाईं। 25 और निवास की दूसरी अलंग, अर्यात्‌ उत्तर की ओर के लिथे भी उस ने बीस तख्ते बनाए। 26 और इनके लिथे भी उस ने चांदी की चालीस कुसिर्यां, अर्यात्‌ एक एक तख्ते के नीचे दो दो कुसिर्यां बनाईं। 27 और निवास की पिछली अलंग, अर्यात्‌ पश्चिम ओर के लिथे उस ने छ: तख्ते बनाए। 28 और पिछली अलंग में निवास के कोनोंके लिथे उस ने दो तख्ते बनाए। 29 और वे नीचे से दो दो भाग के बने, और दोनोंभाग ऊपर से सिक्के तक उन दोनोंतख्तोंका ढब ऐसा ही बनाया। 30 इस प्रकार आठ तख्ते हुए, और उनकी चांदी की सोलह कुसिर्यां हुईं, अर्यात्‌ एक एक तख्ते के नीचे दो दो कुसिर्यां हुईं। 31 फिर उस ने बबूल की लकड़ी के बेंड़े बनाए, अर्यात्‌ निवास की एक अलंग के तख्तोंके लिथे पांच बेंड़े, 32 और निवास की दूसरी अलंग के तख्तोंके लिथे पांच बेंड़े, और निवास की जो अलंग पश्चिम ओर पिछले भाग में यी उसके लिथे भी पांच बेंड़े, बनाए। 33 और उस ने बीचवाले बेंड़े को तख्तोंके मध्य में तम्बू के एक सिक्के से दूसरे सिक्के तक पहुंचने के लिथे बनाया। 34 और तख्तोंको उस ने सोने से मढ़ा, और बेंड़ोंके घर को काम देनेवाले कड़ोंको सोने के बनाया, और बेंड़ोंको भी सोने से मढ़ा।। 35 फिर उस ने नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपके का, और बटी हुई सूझ्म सनीवाले कपके का बीचवाला पर्दा बनाया; वह कढ़ाई के काम किथे हुए करूबोंके साय बना। 36 और उस ने उसके लिथे बबूल के चार खम्भे बनाए, और उनको सोने से मढ़ा; उनकी घुंडियां सोने की बनी, और उस ने उनके लिथे चांदी की चार कुसिर्यां ढालीं। 37 और उस ने तम्बू के द्वार के लिथे नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपके का, और बटी हुई सूझ्म सनी के कपके का कढ़ाई का काम किया हुआ पर्दा बनाया। 38 और उस ने घुंडियोंसमेत उसके पांच खम्भे भी बनाए, और उनके सिरोंऔर जोड़ने की छड़ोंको सोने से मढ़ा, और उनकी पांच कुसिर्यां पीतल की बनाईं।।

निर्गमन 37

1 फिर बसलेल ने बबूल की लकड़ी का सन्दूक बनाया; उसकी लम्बाई अढ़ाई हाथ, चौड़ाई डेढ़ हाथ, और ऊंचाई डेढ़ हाथ की यी। 2 और उस ने उसको भीतर बाहर चोखे सोने से मढ़ा, और उसके चारोंओर सोने की बाड़ बनाई। 3 और उसके चारोंपायोंपर लगाने को उस ने सोने के चार कड़े ढ़ाले, दो कड़े एक अलंग और दो कड़े दूसरी अलंग पर लगे। 4 फिर उस ने बबूल के डण्डे बनाए, और उन्हें सोने से मढ़ा, 5 और उनको सन्दूक की दोनो अलंगोंके कड़ोंमें डाला कि उनके बल सन्दूक उठाया जाए। 6 फिर उस ने चोखे सोने के प्रायश्चित्तवाले ढकने को बनाया; उसकी लम्बाई अढ़ाई हाथ और चौड़ाई डेढ़ हाथ की यी। 7 और उस ने सोना गढ़कर दो करूब प्रायश्चित्त के ढकने के दानोंसिरोंपर बनाए; 8 एक करूब तो एक सिक्के पर, और दूसरा करूब दूसरे सिक्के पर बना; उस ने उनको प्रायश्चित्त के ढकने के साय एक ही टुकड़े के दोनोंसिरोंपर बनाया। 9 और करूबोंके पंख ऊपर से फैले हुए बने, और उन पंखोंसे प्रायश्चित्त का ढकना ढपा हुआ बना, और उनके मुख आम्हने-साम्हने और प्रायश्चित्त के ढकने की ओर किए हुए बने।। 10 फिर उस ने बबूल की लकड़ी की मेज़ को बनाया; उसकी लम्बाई दो हाथ, चौड़ाई एक हाथ, और ऊंचाई डेढ़ हाथ की यी; 11 और उस ने उसको चोखे सोने से मढ़ा, और उस में चारोंओर सोने की एक बाड़ बनाई। 12 और उस ने उसके लिथे चार अंगुल चौड़ी एक पटरी, और इस पटरी के लिथे चारोंओर सोने की एक बाड़ बनाई। 13 और उस ने मेज़ के लिथे सोने के चार कड़े ढालकर उन चारोंकोनोंमें लगाया, जो उसके चारोंपायोंपर थे। 14 वे कड़े पटरी के पास मेज़ उठाने के डण्डोंके खानोंका काम देने को बने। 15 और उस ने मेज़ उठाने के लिथे डण्डोंको बबूल की लकड़ी के बनाया, और सोने से मढ़ा। 16 और उस ने मेज़ पर का सामान अर्यात्‌ परात, धूपदान, कटोरे, और उंडेलने के बर्तन सब चोखे सोने के बनाए।। 17 फिर उस ने चोखा सोना गढ़के पाए और डण्डी समेत दीवट को बनाया; उसके पुष्पकोष, गांठ, और फूल सब एक ही टुकड़े के बने। 18 और दीवट से निकली हुई छ: डालियां बनीं; तीन डालियां तो उसकी एक अलंग से और तीन डालियां उसकी दूसरी अलंग से निकली हुई बनीं। 19 एक एक डाली में बादाम के फूल के सरीखे तीन तीन पुष्पकोष, एक एक गांठ, और एक एक फूल बना; दीवट से निकली हुई, उन छहोंडालियोंका यही ढब हुआ। 20 और दीवट की डण्डी में बादाम के फूल के सामान अपक्की अपक्की गांठ और फूल समेत चार पुष्पकोष बने। 21 और दीवट से निकली हुई छहोंडालियोंमें से दो दो डालियोंके नीचे एक एक गांठ दीवट के साय एक ही टुकड़े की बनी। 22 गांठे और डालियां सब दीवट के साय एक ही टुकड़े की बनीं; सारा दीवट गढ़े हुए चोखे सोने का और एक ही टुकड़े का बना। 23 और उस ने दीवट के सातोंदीपक, और गुलतराश, और गुलदान, चोखे सोने के बनाए। 24 उस ने सारे सामान समेत दीवट को किक्कार भर सोने का बनाया।। 25 फिर उस ने बबूल की लकड़ी की धूपकेदी भी बनाई; उसकी लम्बाई एक हाथ और चौड़ाई एक हाथ ही यी; वह चौकोर बनी, और उसकी ऊंचाई एक हाथ की यी; वह चौकोर बनी, और उसकी ऊंचाई दो हाथ की यी; और उसके सींग उसके साय बिना जोड़ के बने थे 26 और ऊपरवाले पल्लों, और चारोंओर की अलंगों, और सींगो समेत उस ने उस वेदी को चोखे सोने से मढ़ा; और उसकी चारोंओर सोने की एक बाड़ बनाई, 27 और उस बाड़ के नीचे उसके दोनोंपल्लोंपर उस ने सोने के दो कड़े बनाए, जो उसके उठाने के डण्डोंके खानोंका काम दें। 28 और डण्डोंको उस ने बबूल की लकड़ी का बनाया, और सोने से मढ़ा। 29 और उस ने अभिषेक का पवित्र तेल, और सुगन्धद्रव्य का धूप, गन्धी की रीति के अनुसार बनाया।।

निर्गमन 38

1 फिर उस ने बबूल की लकड़ी की होमबलि भी बनाई; उसकी लम्बाई पांच हाथ और चौड़ाई पांच हाथ की यी; इस प्रकार से वह चौकोर बनी, और ऊंचाई तीन हाथ की यी। 2 और उस ने उसके चारोंकोनोंपर उसके चार सींग बनाए, वे उसके साय बिना जोड़ के बने; और उस ने उसको पीतल से मढ़ा। 3 और उस ने वेदी का सारा सामान, अर्यात्‌ उसकी हांडिय़ों, फावडिय़ों, कटोरों, कांटों, और करछोंको बनाया। उसका सारा सामान उस ने पीतल का बनाया। 4 और वेदी के लिथे उसके चारोंओर की कंगनी के तले उस ने पीतल की जाली की एक फंफरी बनाई, वह नीचे से वेदी की ऊंचाई के मध्य तक पहुंची। 5 और उस ने पीतल की फंफरी के चारोंकोनोंके लिथे चार कड़े ढाले, जो डण्डोंके खानोंका काम दें। 6 फिर उस ने डण्डोंको बबूल की लकड़ी का बनाया, और पीतल से मढ़ा। 7 तब उस ने डण्डोंको वेदी की अलंगोंके कड़ोंमें वेदी के उठाने के लिथे डाल दिया। वेदी को उस ने तख्तोंसे खोखली बनाया।। 8 और उसे ने हौदी और उसका पाया दोनोंपीतल के बनाए, यह मिलापवाले तम्बू के द्वार पर सेवा करनेवाली महिलाओं के दर्पणोंके लिथे पीतल के बनाए गए।। 9 फिर उस ने आंगन बनाया; और दक्खिन अलंग के लिथे आंगन के पर्दे बटी हुई सूझ्म सनी के कपके के थे, और सब मिलाकर सौ हाथ लम्बे थे; 10 उनके लिथे बीस खम्भे, और इनकी पीतल की बीस कुसिर्यां बनी; और खम्भोंकी घुंडियां और जोड़ने की छड़ें चांदी की बनीं। 11 और उत्तर अलग के लिथे बीस खम्भे, और इनकी पीतल की बीस ही कुसिर्यां बनीं, और खम्भोंकी घुंडियां और जोड़ने की छड़ें चांदी की बनी। 12 और पश्चिम अलंग के लिथे सब पर्दे मिलाकर पचास हाथ के थे; उनके लिथे दस खम्भे, और दस ही उनकी कुसिर्यां यीं, और खम्भोंकी घंुडियां और जोड़ने की छड़ें चांदी की यीं। 13 और पूरब अलंग में भी वह पचास हाथ के थे। 14 आंगन के द्वार के एक ओर के लिथे पंद्रह हाथ के पर्दे बने; और उनके लिथे तीन खम्भे और तीन कुसिर्यां यी। 15 और आंगन के द्वार की दूसरी ओर भी वैसा ही बना या; और आंगन के दरवाजे के इधर और उधर पंद्रह पंद्रह हाथ के पर्दे बने थे; और उनके लिथे तीन हीे खम्भे, और तीन ही तीन इनकी कुसिर्यां भी यीं। 16 आंगन की चारोंओर सब पर्दे सूझ्म बटी हुई सनी के कपके के बने हुए थे। 17 और खम्भोंकी कुसिर्यां पीतल की, और घुंडियां और छड़े चांदी की बनी, और उनके सिक्के चांदी से मढ़े गए, और आंगन के सब खम्भे चांदी के छड़ोंसे जोड़े गए थे। 18 आंगन के द्वार के पर्दे पर बेल बूटे का काम किया हुआ या, और वह नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपके का; और सूझ्म बटी हुई सनी के कपके के बने थे; और उसकी लम्बाई बीस हाथ की यी, और उसकी ऊंचाई आंगन की कनात की चौड़ाई के सामान पांच हाथ की बनी। 19 और उनके लिथे चार खम्भे, और खम्भोंकी चार ही कुसिर्यां पीतल की बनीं, उनकी घुंडियां चांदी की बनीं, और उनके सिक्के चांदी से मढ़े गए, और उनकी छड़ें चांदी की बनीं। 20 और निवास और आंगन की चारोंओर के सब खूंटे पीतल के बने थे।। 21 साझीपत्र के निवास का सामान जो लेवियोंकी सेवकाई के लिथे बना; और जिसकी गिनती हारून याजक के पुत्र ईतामार के द्वारा मूसा के कहने से हुई यी, उसका वर्णन यह है। 22 जिस जिस वस्तु के बनाने की आज्ञा यहोवा ने मूसा को दी यी उसको यहूदा के गोत्रवाले बसलेल ने, जो हूर का पोता और ऊरी का पुत्र या, बना दिया। 23 और उसके संग दान के गोत्रवाले, अहीसामाक के पुत्र, ओहोलीआब या, जो खोदने और काढ़नेवाला और नीले, बैंजनी और लाल रंग के और सूझ्म सनी के कपके में कारचोब करनेवाला निपुण कारीगर या।। 24 पवित्रस्यान के सारे काम में जो भेंट का सोना लगा वह उनतीस किक्कार, और पवित्रस्यान के शेकेल के हिसाब से सात सौ तीन शेकेल या। 25 और मण्डली के गिने हुए लोगोंकी भेंट की चांदी सौ किक्कार, और पवित्रस्यान के शेकेल के हिसाब से सत्तरह सौ पचहत्तर शेकेल यी। 26 अर्यात्‌ जितने बीस बरस के और उससे अधिक अवस्या के गिने गए थे, वे छ: लाख तीन हज़ार साढ़े पांच सौ पुरूष थे, और एक एक जन की ओर से पवित्रस्यान के शेकेल के अनुसार आधा शेकेल, जो एक बेका होता है मिला। 27 और वह सौ किक्कार चांदी पवित्रस्यान और बीचवाले पर्दे दोनोंकी कुसिर्योंके ढालने में लग गई; सौ किक्कार से सौ कुसिर्यां बनीं, एक एक कुर्सी एक किक्कार की बनी। 28 और सत्तरह सौ पचहत्तर शेकेल जो बच गए उन से खम्भोंकी चोटियां मढ़ी गईं, और उनकी छड़ें भी बनाई गई। 29 और भेंट का पीतल सत्तर किक्कार और दो हज़ार चार सौ शेकेल या; 30 उससे मिलापवाले तम्बू के द्वार की कुसिर्यां, और पीतल की वेदी, पीतल की फंफरी, और वेदी का सारा सामान; 31 और आंगन के चारोंओर की कुसिर्यां, और आंगन की चारोंओर के खूंटे भी बनाए गए।।

निर्गमन 39

1 फिर उन्होंने नीले, बैंजनी और लाल रंग के काढ़े हुए कपके पवित्र स्यान की सेवकाई के लिथे, और हारून के लिथे भी पवित्र वस्त्र बनाए; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी।। 2 और उस ने एपोद को सोने, और नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपके का और सूझ्म बटी हुई सनी के कपके का बनाया। 3 और उन्होंने सोना पीट-पीटकर उसके पत्तर बनाए, फिर पत्तरोंको काट-काटकर तार बनाए, और तारोंको नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपके में, और सूझ्म सनी के कपके में कढ़ाई की बनावट से मिला दिया। 4 एपोद के जोड़ने को उन्होंने उसके कन्धोंपर के बन्धन बनाए, वह तो अपके दोनोंसिक्कों जोड़ा गया। 5 और उसके कसने के लिथे जो काढ़ा हुआ पटुका उस पर बना, वह उसके साय बिना जोड़ का, और उसी की बनावट के अनुसार, अर्यात्‌ सोने और नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपके का, और सूझ्म बटी हुई सनी के कपके का बना; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी।। 6 और उन्होंने सुलैमानी मणि काटकर उनमें इस्त्राएल के पुत्रोंके नाम जैसा छापा खोदा जाता है वैसे ही खोदे, और सोने के खानोंमें जड़ दिए। 7 और उस ने उनको एपोद के कन्धे के बन्धनोंपर लगाया, जिस से इस्त्राएलियोंके लिथे स्मरण कराने वाले मणि ठहरें; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी।। 8 और उस ने चपरास को एपोद की नाई सोने की, और नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपके की, और सूझ्म बटी हुई सनी के कपके में बेल बूटे का काम किया हुआ बनाया। 9 चपरास तो चौकोर बनी; और उन्हो ने उसको दोहरा बनाया, और वह दोहरा होकर एक बित्ता लम्बा और एक बित्ता चौड़ा बना। 10 और उन्होंने उस में चार पांति मणि जड़े। पहिली पांति में तो माणिक्य, पद्य्क़राग, और लालड़ी जडे गए; 11 और दूसरी पांति में मरकत, नीलमणि, और हीरा, 12 और तीसरी पांति में लशम, सूर्यकान्त, और नीलम; 13 और चौयी पांति में फीरोजा, सुलैमानी मणि, और यशब जड़े; थे सब अलग अलग सोने के खानोंमें जड़े गए। 14 और थे मणि इस्त्राएल के पुत्रोंके नाम की गिनती के अनुसार बारह थे; बारहोंगोत्रोंमें से एक एक का नाम जैसा छापा खोदा जाता है वैसा ही खोदा गया। 15 और उन्होंने चपरास पर डोरियोंकी नाई गूंथे हुए चोखे सोने की जंजीर बनाकर लगाई; 16 फिर उन्होंने सोने के दो खाने, और सोने की दो कडिय़ां बनाकर दोनोंकडिय़ोंको चपरास के दोनोंसिरोंपर लगाया; 17 तब उन्होंने सोने की दोनोंगूंयी हुई जंजीरो को चपरास के सिरोंपर की दोनोंकडिय़ोंमें लगाया। 18 और गूंयी हुई दोनोंजंजीरोंके दोनोंबाकी सिक्कों उन्होंने दोनोंखानोंमें जड़के, एपोद के साम्हने दोनोंकन्धोंके बन्धनोंपर लगाया। 19 और उन्होंने सोने की और दो कडिय़ां बनाकर चपरास के दोनोंसिरोंपर उसकी उस कोर पर, जो एपोद की भीतरी भाग में यी, लगाईं। 20 और उन्होंने सोने की दो और कडिय़ां भी बनाकर एपोद के दोनोंकन्धोंके बन्धनोंपर नीचे से उसके साम्हने, और जोड़ के पास, एपोद के काढ़े हुए पटुके के ऊपर लगाईं। 21 तब उन्होंने चपरास को उसकी कडिय़ोंके द्वारा एपोद की कडिय़ोंमें नीले फीते से ऐसा बान्धा, कि वह एपोद के काढ़े हुए पटुके के ऊपर रहे, और चपरास एपोद से अलग न होने पाए; जैसे यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी।। 22 फिर एपोद का बागा सम्पूर्ण नीले रंग का बनाया गया। 23 और उसकी बनावट ऐसी हुई कि उसके बीच बखतर के छेद के समान एक छेद बना, और छेद के चारोंओर एक कोर बनी, कि वह फटने न पाए। 24 और उन्होंने उसके नीचेवाले घेरे में नीले, बैंजनी और लाल रंग के कपके के अनार बनाए। 25 और उन्होंने चोखे सोने की घंटियां भी बनाकर बागे के नीचे वाले घेरे के चारोंओर अनारोंके बीचोंबीच लगाईं; 26 अर्यात्‌ बागे के नीचेवाले घेरे की चारोंओर एक सोने की घंटी, और एक अनार लगाया गया कि उन्हें पहिने हुए सेवा टहल करें; जैसे यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी।। 27 फिर उन्होंने हारून, और उसके पुत्रोंके लिथे बुनी हुई सूझ्म सनी के कपके के अंगरखे, 28 और सूझ्म सनी के कपके की पगड़ी, और सूझ्म सनी के कपके की सुन्दर टोपियां, और सूझ्म बटी हुई सनी के कपके की जांघिया, 29 और सूझ्म बटी हुई सनी के कपके की और नीले, बैंजनी और लाल रंग की कारचोबी काम की हुई पगड़ी; इन सभोंको जिस तरह यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी वैसा ही बनाया।। 30 फिर उन्होंने पवित्र मुकुट की पटरी चोखे सोने की बनाई; और जैसे छापे में वैसे ही उस में थे अझर खोदे गए, अर्यात्‌ यहोवा के लिथे पवित्र। 31 और उन्होंने उस में नीला फीता लगाया, जिस से वह ऊपर पगड़ी पर रहे, जिस तरह यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी।। 32 इस प्रकार मिलापवाले तम्बू के निवास का सब काम समाप्त हुआ, और जिस जिस काम की आज्ञा यहोवा ने मूसा को दी यी, इस्त्राएलियोंने उसी के अनुसार किया।। 33 तब वे निवास को मूसा के पास ले आए, अर्यात्‌ घंुडियां, तख्ते, बेंड़े, खम्भे, कुसिर्यां आदि सारे सामान समेत तम्बू; 34 और लाल रंग से रंगी हुई मेढ़ोंकी खालोंका ओढ़ना, और सूइसोंकी खालोंका ओढ़ना, और बीच का पर्दा; 35 डण्डोंसहित साझीपत्र का सन्दूक, और प्रायश्चित्त का ढकना; 36 सारे सामान समेत मेज़, और भेंट की रोटी; 37 सारे सामान सहित दीवट, और उसकी सजावट के दीपक और उजियाला देने के लिथे तेल; 38 सोने की वेदी, और अभिषेक का तेल, और सुगन्धित धूप, और तम्बू के द्वार का पर्दा; 39 पीतल की फंफरी, डण्डों, और सारे सामान समेत पीतल की वेदी; और पाए समेत हौदी; 40 खम्भों, और कुसिर्योंसमेत आंगन के पर्दे, और आंगन के द्वार का पर्दा, और डोरियां, और खूंटे, और मिलापवाले तम्बू के निवास की सेवकाई का सारा सामान; 41 पवित्रस्यान में सेवा टहल करने के लिथे बेल बूटा काढ़े हुए वस्त्र, और हारून याजक के पवित्र वस्त्र, और उसके पुत्रोंके वस्त्र जिन्हें पहिनकर उन्हें याजक का काम करना या। 42 अर्यात्‌ जो जो आज्ञा यहोवा ने मूसा को दी यीं उन्हीं के अनुसार इस्त्राएलियोंने सब काम किया। 43 तब मूसा ने सारे काम का निरीझण करके देखा, कि उन्होंने यहोवा की आज्ञा के अनुसार सब कुछ किया है। और मूसा ने उनको आशीर्वाद दिया।।

निर्गमन 40

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 2 पहिले महीने के पहिले दिन को तू मिलापवाले तम्बू के निवास को खड़ा करा देना। 3 और उस में साझीपत्र के सन्दूक को रखकर बीचवाले पर्दे की ओट में करा देना। 4 और मेज़ को भीतर ले जाकर जो कुछ उस पर सजाना है उसे सजवा देना; 5 और साझीपत्र के सन्दूक के साम्हने सोने की वेदी को जो धूप के लिथे है उसे रखना, और निवास के द्वार के पर्दे को लगा देना। 6 और मिलापवाले तम्बू के निवास के द्वार के साम्हने होमवेदी को रखना। 7 और मिलापवाले तम्बू और वेदी के बीच होदी को रखके उस में जल भरना। 8 और चारोंओर के आंगन की कनात को खड़ा करना, और उस आंगन के द्वार पर पर्दे को लटका देना। 9 और अभिषेक का तेल लेकर निवास को और जो कुछ उस में होगा सब कुछ का अभिषेक करना, और सारे सामान समेत उसको पवित्र करना; तब वह पवित्र ठहरेगा। 10 और सब सामान समेत होमवेदी का अभिषेक करके उसको पवित्र करना; तब वह परमपवित्र ठहरेगी। 11 और पाए समेत हौदी का भी अभिषेक करके उसे पवित्र करना। 12 और हारून और उसके पुत्रोंको मिलापवाले तम्बू के द्वार पर ले जाकर जल से नहलाना, 13 और हारून को पवित्र वस्त्र पहिनाना, और उसका अभिषेक करके उसको पवित्र करना, कि वह मेरे लिथे याजक का काम करे। 14 और उसके पुत्रोंको ले जाकर अंगरखे पहिनाना, 15 और जैसे तू उनके पिता का अभिषेक करे वैसे ही उनका भी अभिषेक करना, कि वे मेरे लिथे याजक का काम करें; और उनका अभिषेक उनकी पीढ़ी पीढ़ी के लिथे उनके सदा के याजकपद का चिन्ह ठहरेगा। 16 और मूसा ने जो जो आज्ञा यहोवा ने उसको दी यी उसी के अनुसार किया।। 17 और दूसरे बरस के पहिले महीने के पहिले दिन को निवास खड़ा किया गया। 18 और मूसा ने निवास को खड़ा करवाया, और उसकी कुसिर्यां धर उसके तख्ते लगाके उन में बेंड़े डाले, और उसके खम्भोंको खड़ा किया; 19 और उस ने निवास के ऊपर तम्बू को फैलाया, और तम्बू के ऊपर उस ने ओढ़ने को लगाया; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी। 20 और उस ने साझीपत्र को लेकर सन्दूक में रखा, और सन्दूक में डण्डोंको लगाके उसके ऊपर प्रायश्चित्त के ढकने को धर दिया; 21 और उस ने सन्दूक को निवास में पहुंचवाया, और बीचवाले पर्दे को लटकवाके साझीपत्र के सन्दूक को उसके अन्दर किया; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी। 22 और उस ने मिलापवाले तम्बू में निवास की उत्तर अलंग पर बीच के पर्दे से बाहर मेज़ को लगवाया, 23 और उस पर उन ने यहोवा के सम्मुख रोटी सजाकर रखी; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी। 24 और उस ने मिलापवाले तम्बू में मेज़ के साम्हने निवास की दक्खिन अलंग पर दीवट को रखा, 25 और उस ने दीपकोंको यहोवा के सम्मुख जला दिया; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी। 26 और उस ने मिलापवाले तम्बू में बीच के पर्दे के साम्हने सोने की वेदी को रखा, 27 और उस ने उस पर सुगन्धित धूप जलाया; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी। 28 और उस ने निवास के द्वार पर पर्दे को लगाया। 29 और मिलापवाले तम्बू के निवास के द्वार पर होमबलि और अन्नबलि को चढ़ाया; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी। 30 और उस ने मिलापवाले तम्बू और वेदी के बीच हौदी को रखकर उस में धोने के लिथे जल डाला, 31 और मूसा और हारून और उसके पुत्रोंने उस में अपके अपके हाथ पांव धोए; 32 और जब जब वे मिलापवाले तम्बू में वा वेदी के पास जाते थे तब तब वे हाथ पांव धोते थे; जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी। 33 और उस ने निवास की चारोंओर और वेदी के आसपास आंगन की कनात को खड़ा करवाया, और आंगन के द्वार के पर्दे को लटका दिया। इस प्रकार मूसा ने सब काम को पूरा कर समाप्त किया।। 34 तब बादल मिलापवाले तम्बू पर छा गया, और यहोवा का तेज निवासस्यान में भर गया। 35 और बादल जो मिलापवाले तम्बू पर ठहर गया, और यहोवा का तेज जो निवासस्यान में भर गया, इस कारण मूसा उस मे प्रवेश न कर सका। 36 और इस्त्राएलियोंकी सारी यात्रा में ऐसा होता या, कि जब जब वह बादल निवास के ऊपर उठ जाता तब तब वे कूच करते थे। 37 और यदि वह न उठता, तो जिस दिन तक वह न उठता या उस दिन तक वे कूच नहीं करते थे। 38 इस्त्राएल के घराने की सारी यात्रा में दिन को तो यहोवा का बादल निवास पर, और रात को उसी बादल में आग उन सभोंको दिखाई दिया करती यी।।

लैव्यवस्था 1

1 यहोवा ने मिलापवाले तम्बू में से मूसा को बुलाकर उस से कहा, 2 इस्त्राएलियोंसे कह, कि तुम में से यदि कोई मनुष्य यहोवा के लिथे पशु का चढ़ावा चढ़ाए, तो उसका बलिपशु गाय-बैलोंवा भेड़-बकरियोंमें से एक का हो। 3 यदि वह गाय बैलोंमें से होमबलि करे, तो निर्दोष नर मिलापवाले तम्बू के द्वार पर चढ़ाए, कि यहोवा उसे ग्रहण करे। 4 और वह अपना हाथ होमबलिपशु के सिर पर रखे, और वह उनके लिथे प्रायश्चित्त करने को ग्रहण किया जाएगा। 5 तब वह उस बछड़े को यहोवा के साम्हने बलि करे; और हारून के पुत्र जो याजक हैं वे लोहू को समीप ले जाकर उस वेदी की चारोंअलंगोंपर छिड़के जो मिलापवाले तम्बू के द्वार पर है। 6 फिर वह होमबलिपशु की खाल निकालकर उस पशु को टुकड़े टुकड़े करे; 7 तब हारून याजक के पुत्र वेदी पर आग रखें, और आग पर लकड़ी सजाकर धरें; 8 और हारून के पुत्र जो याजक हैं वे सिर और चरबी समेत पशु के टुकड़ोंको उस लकड़ी पर जो वेदी की आग पर होगी सजाकर धरें; 9 और वह उसकी अंतडिय़ोंऔर पैरोंको जल से धोए। तब याजक सब को वेदी पर जलाए, कि वह होमबलि यहोवा के लिथे सुखदायक सुगन्धवाला हवन ठहरे।। 10 और यदि वह भेड़ोंवा बकरोंका होमबलि चढ़ाए, तो निर्दोष नर को चढ़ाए। 11 और वह उसको यहोवा के आगे वेदी की उत्तरवाली अलंग पर बलि करे; और हारून के पुत्र जो याजक हैं वे उसके लोहू को वेदी की चारोंअलंगोंपर छिड़कें। 12 और वह उसको टुकड़े टुकड़े करे, और सिर और चरबी को अलग करे, और याजक इन सब को उस लकड़ी पर सजाकर धरे जो वेदी की आग पर होगी; 13 और वह उसकी अंतडिय़ोंऔर पैरोंको जल से धोए। और याजक सब को समीप ले जाकर वेदी पर जलाए, कि वह होमबलि और यहोवा के लिथे सुगन्धदायक सुगन्धवाला हवन ठहरे।। 14 और यदि वह यहोवा के लिथे पझियोंका होमबलि चढ़ाए, तो पंडुको वा कबूतरोंको चढ़ावा चढ़ाए। 15 याजक उसको वेदी के समीप ले जाकर उसका गला मरोड़ के सिर को धड़ से अलग करे, और वेदी पर जलाए; और उसका सारा लोहू उस वेदी की अलंग पर गिराया जाए; 16 और वह उसका ओफर मल सहित निकालकर वेदी की पूरब की ओर से राख डालने के स्यान पर फेंक दे; 17 और वह उसको पंखोंके बीच से फाड़े, पर अलग अलग न करे। तब याजक उसको वेदी पर उस लकड़ी के ऊपर रखकर जो आग पर होगी जलाए, कि वह होमबलि और यहोवा के लिथे सुखदायक सुगन्धवाला हवन ठहरे।।

लैव्यवस्था 2

1 और जब कोई यहोवा के लिथे अन्नबलि का चढ़ावा चढ़ाना चाहे, तो वह मैदा चढ़ाए; और उस पर तेल डालकर उसके ऊपर लोबान रखे; 2 और वह उसको हारून के पुत्रोंके पास जो याजक हैं लाए। और अन्नबलि के तेल मिले हुए मैदे में से इस तरह अपक्की मुट्ठी भरकर निकाले कि सब लोबान उस में आ जाए; और याजक उन्हें स्मरण दिलानेवाले भाग के लिथे वेदी पर जलाए, कि यह यहोवा के लिथे सुखदायक सुगन्धित हवन ठहरे। 3 और अन्नबलि में से जो बचा रहे सो हारून और उसके पुत्रोंका ठहरे; यह यहोवा के हवनोंमें से परमपवित्र वस्तु होगी।। 4 और जब तू अन्नबलि के लिथे तन्दूर में पकाया हुआ चढ़ावा चढ़ाए, तो वह तेल से सने हुए अखमीरी मैदे के फुलकों, वा तेल से चुपक्की हुई अखमीरी चपातियोंका हो। 5 और यदि तेरा चढ़ावा तवे पर पकाया हुआ अन्नबलि हो, तो वह तेल से सने हुए अखमीरी मैदे का हो; 6 उसको टुकड़े टुकड़े करके उस पर तेल डालना, तब वह अन्नबलि हो जाएगा। 7 और यदि तेरा चढ़ावा कढ़ाही में तला हुआ अन्नबलि हो, तो वह मैदे से तेल में बनाया जाए। 8 और जो अन्नबलि इन वस्तुओं में से किसी का बना हो उसे यहोवा के समीप ले जाना; और जब वह याजक के पास लाया जाए, तब याजक उसे वेदी के समीप ले जाए। 9 और याजक अन्नबलि में से स्मरण दिलानेवाला भाग निकालकर वेदी पर जलाए, कि वह यहोवा के लिथे सुखदायक सुगन्धवाला हवन ठहरे; 10 और अन्नबलि में से जो बचा रहे वह हारून और उसके पुत्रोंका ठहरे; वह यहोवा के हवनोंमें परमपवित्र वस्तु होगी। 11 कोई अन्नबलि जिसे तुम यहोवा के लिथे चढ़ाओ खमीर मिलाकर बनाया न जाए; तुम कभी हवन में यहोवा के लिथे खमीर और मधु न जलाना। 12 तुम इनको पहिली उपज का चढ़ावा करके यहोवा के लिथे चढ़ाना, पर वे सुखदायक सुगन्ध के लिथे वेदी पर चढ़ाए न जाएं। 13 फिर अपके सब अन्नबलियोंको नमकीन बनाना; और अपना कोई अन्नबलि अपके परमेश्वर के साय बन्धी हुई वाचा के नमक से रहित होने न देना; अपके सब चढ़ावोंके साय नमक भी चढ़ाना।। 14 और यदि तू यहोवा के लिथे पहिली उपज का अन्नबलि चढ़ाए, तो अपक्की पहिली उपज के अन्नबलि के लिथे आग से फुलसाई हुई हरी हरी बालें, अर्यात्‌ हरी हरी बालोंको मींजके निकाल लेना, तब अन्न को चढ़ाना। 15 और उस में तेल डालना, और उसके ऊपर लोबान रखना; तब वह अन्नबलि हो जाएगा। 16 और याजक सींजकर निकाले हुए अन्न को, और तेल को, और सारे लोबान को स्मरण दिलानेवाला भाग करके जला दे; वह यहोवा के लिथे हवन ठहरे।।

लैव्यवस्था 3

1 और यदि उसका चढ़ावा मेंलबलि का हो, और यदि वह गाय-बैलोंमे से किसी को चढ़ाए, तो चाहे वह पशु नर हो या मादा, पर जो निर्दोष हो उसी को वह यहोवा के आगे चढ़ाए। 2 और वह अपना हाथ अपके चढ़ावे के पशु के सिर पर रखे और उसको मिलापवाले तम्बू के द्वार पर बलि करे; और हारून के पुत्र जो याजक है वे उसके लोहू को वेदी की चारोंअलंगोंपर छिड़कें। 3 और वह मेलबलि में से यहोवा के लिथे हवन करे, अर्यात्‌ जिस चरबी से अंतडिय़ां ढपी रहती हैं, और जो चरबी उन में लिपक्की रहती है वह भी, 4 और दोनोंगुर्दे और उनके ऊपर की चरबी जो कमर के पास रहती है, और गुर्दोंसमेत कलेजे के ऊपर की फिल्ली, इन सभोंको वह अलग करे। 5 और हारून के पुत्र इनको वेदी पर उस होमबलि के ऊपर जलाएं, जो उन लकडिय़ोंपर होगी जो आग के ऊपर हैं, कि यह यहोवा के लिथे सुखदायक सुगन्धवाला हवन ठहरे।। 6 और यदि यहोवा के मेलबलि के लिथे उसका चढ़ावा भेड़-बकरियोंमें से हो, तो चाहे वह नर हो या मादा, पर जो निर्दोष हो उसी को वह चढ़ाए। 7 यदि वह भेड़ का बच्चा चढ़ाता हो, तो उसको यहोवा के साम्हने चढ़ाए, 8 और वह अपके चढ़ावे के पशु के सिर पर हाथ रखे और उसको मिलापवाले तम्बू के आगे बलि करे; और हारून के पुत्र उसके लोहू को वेदी की चारोंअलंगोंपर छिड़कें। 9 और मेलबलि में से चरबी को यहोवा के लिथे हवन करे, अर्यात्‌ उसकी चरबी भरी मोटी पूंछ को वह रीढ़ के पास से अलग करे, और जो चरबी उन में लिपक्की रहती है, 10 और दोनोंगुर्दे, और जो चरबी उनके ऊपर कमर के पास रहती है, और गुर्दोंसमेत कलेजे के ऊपर की फिल्ली, इन सभोंको वह अलग करे। 11 और याजक इन्हें वेदी पर जलाए; यह यहोवा के लिथे हवन रूपी भोजन ठहरे।। 12 और यदि वह बकरा वा बकरी चढ़ाए, तो उसे यहोवा के साम्हने चढ़ाए। 13 और वह अपना हाथ उसके सिर पर रखे, और उसको मिलापवाले तम्बू के आगे बलि करे; और हारून के पुत्र उसके लोहू को वेदी की चारोंअलंगोंपर छिड़के। 14 और वह उस में से अपना चढ़ावा यहोवा के लिथे हवन करके चढ़ाए, अर्यात्‌ जिस चरबी से अंतडिय़ां ढपी रहती हैं, और जो चरबी उन में लिपक्की रहती है वह भी, 15 और दोनोंगुर्दे और जो चरबी उनके ऊपर कमर के पास रहती है, और गुर्दोंसमेत कलेजे के ऊपर की फिल्ली, इन सभोंको वह अलग करे। 16 और याजक इन्हें वेदी पर जलाए; यह तो हवन रूपी भोजन है जो सुखदायक सुगन्ध के लिथे होता है; क्योंकि सारी चरबी यहोवा की हैं। 17 यह तुम्हारे निवासोंमें तुम्हारी पीढ़ी पीढ़ी के लिथे सदा की विधि ठहरेगी कि तुम चरबी और लोहू कभी न खाओ।।

लैव्यवस्था 4

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा 2 कि इस्त्राएलियोंसे यह कह, कि यदि कोई मनुष्य उन कामोंमें से जिनको यहोवा ने मना किया है किसी काम को भूल से करके पापी हो जाए; 3 और यदि अभिषिक्त याजक ऐसा पाप करे, जिस से प्रजा दोषी ठहरे, तो अपके पाप के कारण वह एक निर्दोष बछड़ा यहोवा को पापबलि करके चढ़ाए। 4 और वह उस बछड़े को मिलापवाले तम्बू के द्वार पर यहोवा के आगे ले जाकर उसके सिर पर हाथ रखे, और उस बछड़े को यहोवा के साम्हने बलि करे। 5 और अभिषिक्त याजक बछड़े के लोहू में से कुछ लेकर मिलापवाले तम्बू में ले जाए; 6 और याजक अपक्की उंगली लोहू मे डुबो डुबोकर और उस में से कुछ लेकर पवित्रस्यान के बीचवाले पर्दे के आगे यहोवा के साम्हने सात बार छिड़के। 7 और याजक उस लोहू में से कुछ और लेकर सुगन्धित धूप की वेदी के सींगो पर जो मिलापवाले तम्बू में है यहोवा के साम्हने लगाए; फिर बछड़े के सब लोहू को वेदी के पाए पर जो मिलापवाले तम्बू के द्वार पर है उंडेल दे। 8 फिर वह पापबलि के बछड़े की सब चरबी को उस से अलग करे, अर्यात्‌ जिस चरबी से अंतडिय़ां ढपी रहती हैं, और जितनी चरबी उन में लिपक्की रहती है, 9 और दोनोंगुर्दे और उनके ऊपर की चरबी जो कमर के पास रहती है, और गुर्दोंसमेत कलेजे के ऊपर की फिल्ली, इन सभोंको वह ऐसे अलग करे, 10 जैसे मेलबलिवाले चढ़ावे के बछड़े से अलग किए जाते हैं, और याजक इनको होमबलि की वेदी पर जलाए। 11 और उस बछड़े की खाल, पांव, सिर, अंतडिय़ां, गोबर, 12 और सारा मांस, निदान समूचा बछड़ा छावनी से बाहर शुद्ध स्यान में, जहां राख डाली जाएगी, ले जाकर लकड़ी पर रखकर आग से जलाए; जहां राख डाली जाती है वह वहीं जलाया जाए।। 13 और इन बातोंमें से किसी भी बात के विषय में जो कोई पाप करे, याजक उसका प्रायश्चित्त करे, और तब वह पाप झमा किया जाएगा। और इस पापबलि का शेष अन्नबलि के शेष की नाई याजक का ठहरेगा।। 14 तो जब उनका किया हुआ पाप प्रगट हो जाए तब मण्डली एक बछड़े को पापबलि करके चढ़ाए। वह उसे मिलापवाले तम्बू के आगे ले जाए, 15 और मण्डली के वृद्ध लोग अपके अपके हाथोंको यहोवा के आगे बछड़े के सिर पर रखें, और वह बछड़ा यहोवा के साम्हने बलि किया जाए। 16 और अभिषिक्त याजक बछड़े के लोहू में से कुछ मिलापवाले तम्बू में ले जाए; 17 और याजक अपक्की उंगली लोहू में डुबो डुबोकर उसे बीचवाले पर्दे के आगे सात बार यहोवा के साम्हने छिड़के। 18 और उसी लोहू में से वेदी के सींगोंपर जो यहोवा के आगे मिलापवाले तम्बू में है लगाए; और बचा हुआ सब लोहू होमबलि की वेदी के पाए पर जो मिलापवाले तम्बू के द्वार पर है उंडेल दे। 19 और वह बछड़े की कुल चरबी निकालकर वेदी पर जलाए। 20 और जैसे पापबलि के बछड़े से किया या वैसे ही इस से भी करे; इस भांति याजक इस्त्राएलियोंके लिथे प्रायश्चित्त करे, तब उनका पाप झमा किया जाएगा। 21 और वह बछड़े को छावनी से बाहर ले जाकर उसी भांति जलाए जैसे पहिले बछड़े को जलाया या; यह तो मण्डली के निमित्त पापबलि ठहरेगा।। 22 जब कोई प्रधान पुरूष पाप करके, अर्यात्‌ अपके परमेश्वर यहोवा कि किसी आज्ञा के विरूद्ध भूल से कुछ करके दोषी हो जाए, 23 और उसका पाप उस पर प्रगट हो जाए, तो वह एक निर्दोष बकरा बलिदान करने के लिथे ले आए; 24 और बकरे के सिर पर अपना हाथ धरे, और बकरे को उस स्यान पर बलि करे जहां होमबलि पशु यहोवा के आगे बलि किथे जाते हैं; यह तो पापबलि ठहरेगा। 25 और याजक अपक्की उंगली से पापबलि पशु के लोहू में से कुछ लेकर होमबलि की वेदी के सींगोंपर लगाए, और उसका लोहू होमबलि की वेदी के पाए पर उंडेल दे। 26 और वह उसकी कुल चरबी को मेलबलि की चरबी की नाई वेदी पर जलाए; और याजक उसके पाप के विषय में प्रायश्चित्त करे, तब वह झमा किया जाएगा।। 27 और यदि साधारण लोगोंमें से कोई अज्ञानता से पाप करे, अर्यात्‌ कोई ऐसा काम जिसे यहोवा ने माना किया हो करके दोषी हो, और उसका वह पाप उस पर प्रगट हो जाए, 28 तो वह उस पाप के कारण एक निर्दोष बकरी बलिदान के लिथे ले आए; 29 और वह अपना हाथ पापबलि पशु के सिर पर रखे, और होमबलि के स्यान पर पापबलि पशु का बलिदान करे। 30 और याजक उसके लोहू में से अपक्की उंगली से कुछ लेकर होमबलि की वेदी के सींगोंपर लगाए, और उसके सब लोहू को उसी वेदी के पाए पर उंडेल दे। 31 और वह उसकी सब चरबी को मेलबलिपशु की चरबी की नाईं अलग करे, तब याजक उसको वेदी पर यहोवा के निमित्त सुखदायक सुगन्ध के लिथे जलाए; और इस प्रकार याजक उसके लिथे प्रायश्चित्त करे, तब उसे झमा मिलेगी।। 32 और यदि वह पापबलि के लिथे एक भेड़ी का बच्चा ले आए, तो वह निर्दोष मादा हो, 33 और वह अपना हाथ पापबलि पशु के सिर पर रखे, और उसको पापबलि के लिथे वहीं बलिदान करे जहां होमबलिपशु बलि किया जाता है। 34 और याजक अपक्की उंगली से पापबलि के लोहू में से कुछ लेकर होमबलि की वेदी के सींगोंपर लगाए, और उसके सब लोहू को वेदी के पाए पर उंडेल दे। 35 और वह उसकी सब चरबी को मेलबलिवाले भेड़ के बच्चे की चरबी की नाई अलग करे, और याजक उसे वेदी पर यहोवा के हवनोंके ऊपर जलाए; और इस प्रकार याजक उसके पाप के लिथे प्रायश्चित्त करे, और वह झमा किया जाएगा।।

लैव्यवस्था 5

1 और यदि कोई साझी होकर ऐसा पाप करे कि शपय खिलाकर पूछने पर भी, कि क्या तू ने यह सुना अयवा जानता है, और वह बात प्रगट न करे, तो उसको अपके अधर्म का भार उठाना पकेगा। 2 और यदि कोई किसी अशुद्ध वस्तु को अज्ञानता से छू ले, तो चाहे वह अशुद्ध बनैले पशु की, चाहे अशुद्ध रेंगनेवाले जीव-जन्तु की लोय हो, तो वह अशुद्ध होकर दोषी ठहरेगा। 3 और यदि कोई मनुष्य किसी अशुद्ध वस्तु को अज्ञानता से छू ले, चाहे वह अशुद्ध वस्तु किसी भी प्रकार की क्योंन हो जिस से लोग अशुद्ध हो जाते हैं तो जब वह उस बात को जान लेगा तब वह दोषी ठहरेगा। 4 और यदि कोई बुरा वा भला करने को बिना सोचे समझे शपय खाए, चाहे किसी प्रकार की बात वह बिना सोचे विचारे शपय खाकर कहे, तो ऐसी बात में वह दोषी उस समय ठहरेगा जब उसे मालूम हो जाएगा। 5 और जब वह इन बातोंमें से किसी भी बात में दोषी हो, तब जिस विषय में उस ने पाप किया हो वह उसको मान ले, 6 और वह यहोवा के साम्हने अपना दोषबलि ले आए, अर्यात्‌ उस पाप के कारण वह एक भेड़ वा बकरी पापबलि करने के लिथे ले आए; तब याजक उस पाप के विषय उसके लिथे प्रायश्चित्त करे। 7 और यदि उसे भेड़ वा बकरी देने की सामर्य्य न हो, तो अपके पाप के कारण दो पंडुकी वा कबूतरी के दो बच्चे दोषबलि चढ़ाने के लिथे यहोवा के पास ले आए, उन में से एक तो पापबलि के लिथे और दूसरा होमबलि के लिथे। 8 और वह उनको याजक के पास ले आए, और याजक पापबलिवाले को पहिले चढ़ाए, और उसका सिर गले से मरोड़ डाले, पर अलग न करे, 9 और वह पापबलिपशु के लोहू में से कुछ वेदी की अलंग पर छिड़के, और जो लोहू शेष रहे वह वेदी के पाए पर गिराया जाए; वह तो पापबलि ठहरेगा। 10 और दूसरे पक्की को वह विधी के अनुसार होमबलि करे, और याजक उसके पाप का प्रायश्चित्त करे, और तब वह झमा किया जाएगा।। 11 और यदि वह दो पंडुकी वा कबूतरी के दो बच्चे भी न दे सके, तो वह अपके पाप के कारण अपना चढ़ावा एपा का दसवां भाग मैदा पापबलि करके ले आए; 12 वह उसको याजक के पास ले जाए, और याजक उस में से अपक्की मुट्ठी भर स्मरण दिलानेवाला भाग जानकर वेदी पर यहोवा के हवनोंके ऊपर जलाए; वह तो पापबलि ठहरेगा। 13 और इन बातोंमें से किसी भी बात के विषय में जो कोई पाप करे, याजक उसका प्रायश्चित्त करे, और तब वह पाप झमा किया जाएगा। और इस पापबलि का शेष अन्नबलि के शेष की नाई याजक का ठहरेगा।। 14 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 15 यदि कोई यहोवा की पवित्र की हुई वस्तुओं के विषय में भूल से विश्वासघात करे और पापी ठहरे, तो वह यहोवा के पास एक निर्दोष मेढ़ा दोषबलि के लिथे ले आए; उसका दाम पवित्रस्यान के शेकेल के अनुसार उतने ही शेकेल रूपके का हो जितना याजक ठहराए। 16 और जिस पवित्र वस्तु के विषय उस ने पाप किया हो, उस में वह पांचवां भाग और बढ़ाकर याजक को दे; और याजक दोषबलि का मेढ़ा चढ़ाकर उसके लिथे प्रायश्चित्त करे, तब उसका पाप झमा किया जाएगा।। 17 और यदि कोई ऐसा पाप करे, कि उन कामोंमें से जिन्हें यहोवा ने मना किया है किसी काम को करे, तो चाहे वह उसके अनजाने में हुआ हो, तौभी वह दोषी ठहरेगा, और उसको अपके अधर्म का भार उठाना पकेगा। 18 इसलिथे वह एक निर्दोष मेढ़ा दोषबलि करके याजक के पास ले आए, वह उतने दाम का हो जितना याजक ठहराए, और याजक उसके लिथे उसकी उस भूल का जो उस ने अनजाने में की हो प्रायश्चित्त करे, और वह झमा किया जाएगा। 19 यह दोषबलि ठहरे; क्योंकि वह मनुष्य नि:सन्देह यहोवा के सम्मुख दोषी ठहरेगा।।

लैव्यवस्था 6

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 2 यदि कोई यहोवा का विश्वासघात करके पापी ठहरे, जैसा कि धरोहर, वा लेनदेन, वा लूट के विषय में अपके भाई से छल करे, वा उस पर अन्धेर करे, 3 वा पक्की हुई वस्तु को पाकर उसके विषय फूठ बोले और फूठी शपय भी खाए; ऐसी कोई भी बात क्योंन हो जिसे करके मनुष्य पापी ठहरते हैं, 4 तो जब वह ऐसा काम करके दोषी हो जाए, तब जो भी वस्तु उस ने लूट, वा अन्धेर करके, वा धरोहर, वा पक्की पाई हो; 5 चाहे कोई वस्तु क्योंन हो जिसके विषय में उस ने फूठी शपय खाई हो; तो वह उसको पूरा पूरा लौटा दे, और पांचवां भाग भी बढ़ाकर भर दे, जिस दिन यह मालूम हो कि वह दोषी है, उसी दिन वह उस वस्तु को उसके स्वामी को लौटा दे। 6 और वह यहोवा के सम्मुख अपना दोषबलि भी ले आए, अर्यात्‌ एक निर्दोष मेढ़ा दोषबलि के लिथे याजक के पास ले आए, वह उतने ही दाम का हो जितना याजक ठहराए। 7 इस प्रकार याजक उसके लिथे यहोवा के साम्हने प्रायश्चित्त करे, और जिस काम को करके वह दोषी हो गया है उसकी झमा उसे मिलेगी।। 8 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 9 हारून और उसके पुत्रोंको आज्ञा देकर यह कह, कि होमबलि की व्यवस्या यह है; अर्यात्‌ होमबलि ईधन के ऊपर रात भर भोर तब वेदी पर पड़ा रहे, और वेदी की अग्नि वेदी पर जलती रहे। 10 और याजक अपके सनी के वस्त्र और अपके तन पर अपक्की सनी की जांघिया पहिनकर होमबलि की राख, जो आग के भस्म करने से वेदी पर रह जाए, उसे उठाकर वेदी के पास रखे। 11 तब वह अपके वस्त्र उतारकर दूसरे वस्त्र पहिनकर राख को छावनी से बाहर किसी शुद्ध स्यान पर ले जाए। 12 और वेदी पर अग्नि जलती रहे, और कभी बुफने न पाए; और याजक भोर भोर उस पर लकडिय़ां जलाकर होमबलि के टुकड़ोंको उसके ऊपर सजाकर धर दे, और उसके ऊपर मेलबलियोंकी चरबी को जलाया करे। 13 वेदी पर आग लगातार जलती रहे; वह कभी बुफने न पाए।। 14 अन्नबलि की व्यवस्या इस प्रकार है, कि हारून के पुत्र उसको वेदी के आगे यहोवा के समीप ले आएं। 15 और वह अन्नबलि के तेल मिले हुए मैदे में से मुट्ठी भर और उस पर का सब लोबान उठाकर अन्नबलि के स्मरणार्य के इस भाग को यहोवा के सम्मुख सुखदायक सुगन्ध के लिथे वेदी पर जलाए। 16 और उस में से जो शेष रह जाए उसे हारून और उसके पुत्र खा जाएं; वह बिना खमीर पवित्र स्यान में खाया जाए, अर्यात्‌ वे मिलापवाले तम्बू के आंगन में उसे खाएं। 17 वह खमीर के साय पकाया न जाए; क्योंकि मैं ने अपके हव्य में से उसको उनका निज भाग होने के लिथे उन्हें दिया है; इसलिथे जैसा पापबलि और दोषबलि परमपवित्र है वैसा ही वह भी है। 18 हारून के वंश के सब पुरूष उस में से खा सकते हैं तुम्हारी पीढ़ी-पीढ़ी में यहोवा के हवनोंमें से यह उनका भाग सदैव बना रहेगा; जो कोई उन हवनोंको छूए वह पवित्र ठहरेगा।। 19 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 20 जिस दिन हारून का अभिषेक हो उस दिन वह अपके पुत्रोंके साय यहोवा को यह चढ़ावा चढ़ाए; अर्यात्‌ एपा का दसवां भाग मैदा नित्य अन्नबलि में चढ़ाए, उस में से आधा भोर को और आधा सन्ध्या के समय चढ़ाए। 21 वह तवे पर तेल के साय पकाया जाए; जब वह तेल से तर हो जाए तब उसे ले आना, इस अन्नबलि के पके हुए टुकड़े यहोवा के सुखदायक सुगन्ध के लिथे चढ़ाना। 22 और उसके पुत्रोंमें से जो भी उस याजकपद पर अभिषिक्त होगा, वह भी उसी प्रकार का चढ़ावा चढ़ाया करे; यह विधी सदा के लिथे है, कि यहोवा के सम्मुख वह सम्पूर्ण चढ़ावा जलाया जाथे। 23 याजक के सम्पूर्ण अन्नबलि भी सब जलाए जाएं; वह कभी न खाया जाए।। 24 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 25 हारून और उसके पुत्रोंसे यह कह, कि पापबलि की व्यवस्या यह है; अर्यात्‌ जिस स्यान में होमबलिपशु वध किया जाता है उसी में पापबलिपशु भी यहोवा के सम्मुख बलि किया जाए; वह परमपवित्र है। 26 और जो याजक पापबलि चढ़ावे वह उसे खाए; वह पवित्र स्यान में, अर्यात्‌ मिलापवाले तम्बू के आँगन में खाया जाए। 27 जो कुछ उसके मांस से छू जाए, वह पवित्र ठहरेगा; और यदि उसके लोहू के छींटे किसी वस्त्र पर पड़ जाएं, तो उसे किसी पवित्रस्यान में धो देना। 28 और वह मिट्टी का पात्र जिस में वह पकाया गया हो तोड़ दिया जाए; यदि वह पीतल के पात्र में सिफाया गया हो, तो वह मांजा जाए, और जल से धो लिया जाए। 29 और याजकोंमें से सब पुरूष उसे खा सकते हैं; 30 पर जिस पापबलिपशु के लोहू में से कुछ भी खून मिलापवाले तम्बू के भीतर पवित्रस्यान में प्रायश्चित्त करने को पहुंचाया जाए तब तो उसका मांस कभी न खाया जाए; वह आग में जला दिया जाए।।

लैव्यवस्था 7

1 फिर दोषबलि की व्यवस्या यह है। वह परमपवित्र है; 2 जिस स्यान पर होमबलिपशु का वध करते हैं उसी स्यान पर दोषबलिपशु का भी बलि करें, और उसके लोहू को याजक वेदी पर चारोंओर छिड़के। 3 और वह उस में की सब चरबी को चढ़ाए, अर्यात्‌ उसकी मोटी पूंछ को, और जिस चरबी से अंतडिय़ां ढपी रहती हैं वह भी, 4 और दोनोंगुर्दे और जो चरबी उनके ऊपर और कमर के पास रहती है, और गुर्दोंसमेत कलेजे के ऊपर की फिल्ली; इन सभोंको वह अलग करे; 5 और याजक इन्हें वेदी पर यहोवा के लिथे हवन करे; तब वह दोषबलि होगा। 6 याजकोंमें के सब पुरूष उस में से खा सकते हैं; वह किसी पवित्रस्यान में खाया जाए; क्योंकि वह परमपवित्र है। 7 जैसा पापबलि है वैसा ही दोषबलि भी है, उन दोनोंकी एक ही व्यवस्या है; जो याजक उन बलियोंको चढ़ा के प्रायश्चित्त करे वही उन वस्तुओं को ले ले। 8 और जो याजक किसी के लिथे होमबलि को चढ़ाए उस होमबलिपशु की खाल को वही याजक ले ले। 9 और तंदूर में, वा कढ़ाही में, वा तवे पर पके हुए सब अन्नबलि उसी याजक की होंगी जो उन्हें चढ़ाता है। 10 और सब अन्नबलि, जो चाहे तेल से सने हुए होंचाहे रूखे हों, वे हारून के सब पुत्रोंको एक समान मिले।। 11 और मेलबलि की जिसे कोई यहोवा के लिथे चढ़ाए व्यवस्या यह है। 12 यदि वह उसे धन्यवाद के लिथे चढ़ाए, तो धन्यवाद-बलि के साय तेल से सने हुए अखमीरी फुलके, और तेल से चुपक्की हुई अखमीरी फुलके, और तेल से चुपक्की हुई अखमीरी रोटियां, और तेल से सने हुए मैदे के फुलके तेल से तर चढ़ाए। 13 और वह अपके धन्यवादवाले मेलबलि के साय अखमीरी रोटियां, और तेल से सने हुए मैदे के फुलके तेल से तर चढ़ाए। 14 और ऐसे एक एक चढ़ावे में से वह एक एक रोटी यहोवा को उठाने की भेंट करके चढ़ाए; वह मेलबलि के लोहू के छिड़कनेवाले याजक की होगी। 15 और उस धन्यवादवाले मेलबलि का मांस बलिदान चढ़ाने के दिन ही खाया जाए; उस में से कुछ भी भोर तक शेष न रह जाए। 16 पर यदि उसके बलिदान का चढ़ावा मन्नत का वा स्वेच्छा का हो, तो उस बलिदान को जिस दिन वह चढ़ाया जाए उसी दिन वह खाया जाए, और उस में से जो शेष रह जाए वह दूसरे दिन भी खाया जाए। 17 परन्तु जो कुछ बलिदान के मांस में से तीसरे दिन तक रह जाए वह आग में जला दिया जाए। 18 और उसके मेलबलि के मांस में से यदि कुछ भी तीसरे दिन खाया जाए, तो वह ग्रहण न किया जाएगा, और न पुन में गिना जाएगा; वह घृणित कर्म समझा जाएगा, और जो कोई उस में से खाए उसका अधर्म उसी के सिर पर पकेगा। 19 फिर जो मांस किसी अशुद्ध वस्तु से छू जाए वह न खाया जाए; वह आग में जला दिया जाए। फिर मेलबलि का मांस जितने शुद्ध होंवे ही खाएं, 20 परन्तु जो अशुद्ध होकर यहोवा के मेलबलि के मांस में से कुछ खाए वह अपके लोगोंमें से नाश किया जाए। 21 और यदि कोई किसी अशुद्ध वस्तु को छूकर यहोवा के मेलबलिपशु के मांस में से खाए, तो वह भी अपके लोगोंमें से नाश किया जाए, चाहे वह मनुष्य की कोई अशुद्ध वस्तु वा अशुद्ध पशु वा कोई भी अशुद्ध और घृणित वस्तु हो।। 22 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 23 इस्त्राएलियोंसे इस प्रकार कह, कि तुम लोग न तो बैल की कुछ चरबी खाना और न भेड़ वा बकरी की। 24 और जो पशु स्वयं मर जाए, और जो दूसरे पशु से फाड़ा जाए, उसकी चरबी और और काम में लाना, परन्तु उसे किसी प्रकार से खाना नहीं। 25 जो कोई ऐसे पशु की चरबी खाएगा जिस में से लोग कुछ यहोवा के लिथे हवन करके चढ़ाया करते हैं वह खानेवाला अपके लोगोंमें से नाश किया जाएगा। 26 ओर तुम अपके घर में किसी भांति का लोहू, चाहे पक्की का चाहे पशु का हो, न खाना। 27 हर एक प्राणी जो किसी भांति का लोहू खाएगा वह अपके लोगोंमें से नाश किया जाएगा।। 28 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 29 इस्त्राएलियोंसे इस प्रकार कह, कि जो यहोवा के लिथे मेलबलि चढ़ाए वह उसी मेलबलि में से यहोवा के पास भेंट ले आए; 30 वह अपके ही हाथोंसे यहोवा के हव्य को, अर्यात्‌ छाती हिलाने की भेंट करके यहोवा के साम्हने हिलाई जाए। 31 और याजक चरबी को तो वेदी पर जलाए, परन्तु छाती हारून और उसके पुत्रोंकी होगी। 32 फिर तुम अपके मेलबलियोंमें से दहिनी जांघ को भी उठाने की भेंट करके याजक को देना; 33 हारून के पुत्रोंमें से जो मेलबलि के लोहू और चरबी को चढ़ाए दहिनी जांघ उसी को भाग होगा। 34 क्योंकि इस्त्राएलियोंके मेलबलियोंमें से हिलाने की भेंट की छाती और उठाने की भेंट की जांघ को लेकर मैं ने याजक हारून और उसके पुत्रोंको दिया है, कि यह सर्वदा इस्त्राएलियोंकी ओर से उनका हक बना रहे।। 35 जिस दिन हारून और उसके पुत्र यहोवा के समीप याजक पद के लिथे आए गए उसी दिन यहोवा के हव्योंमें से उनका यही अभिषिक्त भाग ठहराया गया; 36 अर्यात्‌ जिस दिन यहोवा ने उसका अभिषेक किया उसी दिन उस ने आज्ञा दी कि उनको इस्त्राएलियोंकी ओर से थे ही भाग नित मिला करें; उनकी पीढ़ी पीढ़ी के लिथे उनका यही हक ठहराया गया। 37 होमबलि, अन्नबलि, पापबलि, दोषबलि, याजकोंके संस्कार बलि, और मेलबलि की व्यवस्या यही है; 38 जब यहोवा ने सीनै पर्वत के पास के जंगल में मूसा को आज्ञा दी कि इस्त्राएली मेरे लिथे क्या क्या चढ़ावे चढ़ाएं, तब उस ने उनको यही व्यवस्या दी यी।।

लैव्यवस्था 8

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 2 तू हारून और उसके पुत्रोंके वों, और अभिषेक के तेल, और पापबलि के बछड़े, और दोनोंमेढ़ों, और अखमीरी रोटी की टोकरी को 3 मिलापवाले तम्बू के द्वार पर ले आ, और वहीं सारी मण्डली को इकट्ठा कर। 4 यहोवा की इस आज्ञा के अनुसार मूसा ने किया; और मण्डली मिलापवाले तम्बू के द्वार पर इकट्ठी हुई। 5 तब मूसा ने मण्डली से कहा, जो काम करने की आज्ञा यहोवा ने दी है वह यह है। 6 फिर मूसा ने हारून और उसके पुत्रोंको समीप ले जाकर जल से नहलाया। 7 तब उस ने उनको अंगरखा पहिनाया, और कटिबन्द लपेटकर बागा पहिना दिया, और एपोद लगाकर एपोद के काढ़े हुए पटुके से एपोद को बान्धकर कस दिया। 8 और उस ने उनके चपरास लगाकर चमरास में ऊरीम और तुम्मीम रख दिए। 9 तब उस ने उसके सिर पर पगड़ी बान्धकर पगड़ी के साम्हने पर सोने के टीके को, अर्यात्‌ पवित्र मुकुट को लगाया, जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी। 10 तब मूसा ने अभिषेक का तेल लेकर निवास का और जो कुछ उस में या उन सब को भी अभिषेक करके उन्हें पवित्र किया। 11 और उस तेल में से कुछ उस ने वेदी पर सात बार छिड़का, और कुल सामान समेत वेदी का और पाए समेत हौदी का अभिषेक करके उन्हें पवित्र किया। 12 और उस ने अभिषेक के तेल में से कुछ हारून के सिर पर डालकर उसका अभिषेक करके उसे पवित्र किया। 13 फिर मूसा ने हारून के पुत्रोंको समीप ले आकर, अंगरखे पहिनाकर, फेटे बान्ध के उनके सिर पर टोपी रख दी, जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी। 14 तब वह पापबलि के बछड़े को समीप ले गया; और हारून और उसके पुत्रोंने अपके अपके हाथ पापबलि के बछड़े के सिर पर रखें 15 तब वह बलि किया गया, और मूसा ने लोहू को लेकर उंगली से वेदी के चारोंसींगोंपर लगाकर पवित्र किया, और लोहू को वेदी के पाए पर उंडेल दिया, और उसके लिथे प्रायश्चित्त करके उसको पवित्र किया। 16 और मूसा ने अंतडिय़ोंपर की सब चरबी, और कलेजे पर की फिल्ली, और चरबी समेत दोनोंगुर्दोंको लेकर वेदी पर जलाया। 17 ओर बछड़े में से जो कुछ शेष रह गया उसको, अर्यात्‌ गोबर समेत उसकी खाल और मांस को उस ने छावनी से बाहर आग में जलाया, जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी। 18 फिर वह होमबलि के मेढ़े को समीप ले गया, और हारून और उसके पुत्रोंने अपके अपके हाथ मेंढ़े के सिर पर रखे। 19 तब वह बलि किया गया, और मूसा ने उसका लोहू वेदी पर चारोंओर छिड़का। 20 किया गया, और मूसा ने सिर ओर चरबी समेत टुकड़ोंको जलाया। 21 तब अंतडिय़ां और पांव जल से धोथे गए, और मूसा ने पूरे मेढ़े को वेदी पर जलाया, और वह सुखदायक सुगन्ध देने के लिथे होमबलि और यहोवा के लिथे हव्य हो गया, जिस प्रकार यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी। 22 फिर वह दूसरे मेढ़े को जो संस्कार का मेढ़ा या समीप ले गया, और हारून और उसके पुत्रोंने अपके अपके हाथ मेढ़े के सिर पर रखे। 23 तब वह बलि किया गया, और मूसा ने उसके लोहू में से कुछ लेकर हारून के दहिने कान के सिक्के पर और उसके दहिने हाथ और दहिने पांव के अंगूठोंपर लगाया। 24 और वह हारून के पुत्रोंको समीप ले गया, और लोहू में से कुछ एक एक के दहिने कान के सिक्के पर और दहिने हाथ ओर दहिने पांव के अंगूठोंपर लगाया; और मूसा ने लोहू को वेदी पर चारोंओर छिड़का। 25 और उस ने चरबी, और मोटी पूंछ, ओर अंतडिय़ोंपर की सब चरबी, और कलेजे पर की फिल्ली समेत दोनोंगुर्दे, और दहिनी जांघ, थे सब लेकर अलग रखे; 26 ओर अखमीरी रोटी की टोकरी जो यहोवा के आगे रखी गई यी उस में से एक रोटी, और तेल से सने हुए मैदे का एक फुलका, और एक रोटी लेकर चरबी और दहिनी जांघ पर रख दी; 27 और थे सब वस्तुएं हारून और उसके पुत्रोंके हाथोंपर धर दी गई, और हिलाने की भेंट के लिथे यहोवा के साम्हने हिलाई गई। 28 और मूसा ने उन्हें फिर उनके हाथोंपर से लेकर उन्हें वेदी पर होमबलि के ऊपर जलाया, यह सुखदायक सुगन्ध देने के लिथे संस्कार की भेंट और यहोवा के लिथे हव्य या। 29 तब मूसा ने छाती को लेकर हिलाने की भेंट के लिथे यहोवा के आगे हिलाया; और संस्कार के मेढ़ें में से मूसा का भाग यही हुआ जैसा यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी। 30 और मूसा ने अभिषेक के तेल ओर वेदी पर के लोहू, दोनोंमें से कुछ लेकर हारून और उसके वोंपर, और उसके पुत्रोंऔर उनके वोंपर भी छिड़का; और उस ने वोंसमेत हारून को ओर वोंसमेत उसके पुत्रोंको भी पवित्र किया। 31 और मूसा ने हारून और उसके पुत्रोंसे कहा, मांस को मिलापवाले तम्बू के द्वार पर पकाओ, और उस रोटी को जो संस्कार की टोकरी में है वहीं खाओ, जैसा मैं ने आज्ञा दी है, कि हारून और उसके पुत्र उसे खाएं। 32 और मांस और रोटी में से जो शेष रह जाए उसे आग में जला देना। 33 और जब तक तुम्हारे संस्कार के दिन पूरे न होंतब तक, अर्यात्‌ सात दिन तक मिलापवाले तम्बू के द्वार के बाहर न जाना, क्योंकि वह सात दिन तक तुम्हारा संस्कार करता रहेगा। 34 जिस प्रकार आज किया गया है वैसा ही करने की आज्ञा यहोवा ने दी है, जिस से तुम्हारा प्रायश्चित्त किया जाए। 35 इसलिथे तुम मिलापवाले तम्बू के द्वार पर सात दिन तक दिन रात ठहरे रहना, और यहोवा की आज्ञा को मानना, ताकि तुम मर न जाओ; क्योंकि ऐसी की आज्ञा मुझे दी गई है। 36 तब यहोवा की इन्हीं सब आज्ञाओं के अनुसार जो उस ने मूसा के द्वारा दी यीं हारून ओर उसके पुत्रोंने उनका पालन किया।।

लैव्यवस्था 9

1 आठवें दिन मूसा ने हारून और उसके पुत्रोंको और इस्त्राएली पुरनियोंको बुलवाकर हारून से कहा, 2 पापबलि के लिथे एक निर्दोष बछड़ा, और होमबलि के लिथे एक निर्दोष मेढ़ा लेकर यहोवा के साम्हने भेंट चढ़ा। 3 और इस्त्राएलियोंसे यह कह, कि तुम पापबलि के लिथे एक बकरा, और होमबलि के लिथे एक बछड़ा और एक भेड़ को बच्चा लो, जो एक वर्ष के होंऔर निर्दोष हों, 4 और मेलबलि के लिथे यहोवा के सम्मुख चढ़ाने के लिथे एक बैल और एक मेढ़ा, और तेल से सने हुए मैदे का एक अन्नबलि भी ले लो; क्योंकि आज यहोवा तुम को दर्शन देगा। 5 और जिस जिस वस्तु की आज्ञा मूसा ने दी उन सब को वे मिलापवाले तम्बू के आगे ले आए; और सारी मण्डली समीप जाकर यहोवा के साम्हने खड़ी हुई। 6 तब मूसा ने कहा, यह वह काम है जिसके करने के लिथे यहोवा ने आज्ञा दी है कि तुम उसे करो; और यहोवा की महिमा का तेज तुम को दिखाई पकेगा। 7 और मूसा ने हारून से कहा, यहोवा की आज्ञा के अनुसार वेदी के समीप जाकर अपके पापबलि और होमबलि को चढ़ाकर उनके लिथे प्रायश्चित्त कर। 8 इसलिथे हारून ने वेदी के समीप जाकर अपके पापबलि के बछड़े को बलिदान किया। 9 और हारून के पुत्र लोहू को उसके पास ले गए, तब उस ने अपक्की उंगली को लोहू में डुबाकर वेदी के सींगोंपर लोहू को लगाया, और शेष लोहू को वेदी के पाए पर उंडेल दिया; 10 और पापबलि में की चरबी और गुर्दोंऔर कलेजे पर की फिल्ली को उस ने वेदी पर जलाया, जैसा यहोवा ने मूसा को आज्ञा दी यी। 11 और मांस और खाल को उस ने छावनी से बाहर आग में जलाया। 12 तब होमबलिपशु को बलिदान किया; और हारून के पुत्रोंने लोहू को उसके हाथ में दिया, और उस ने उसको वेदी पर चारोंओर छिड़क दिया। 13 तब उन्होंने होमबलिपशु का टुकड़ा टुकड़ा करके सिर सहित उसके हाथ में दे दिया और उस ने उनको वेदी पर जला दिया। 14 और उस ने अंतडिय़ोंऔर पांवोंको धोकर वेदी पर होमबलि के ऊपर जलाया। 15 और उस ने लोगोंके चढ़ावे को आगे लेकर और उस पापबलि के बकरे को जो उनके लिथे या लेकर उसका बलिदान किया, और पहिले के समान उसे भी पापबलि करके चढ़ाया। 16 और उस ने होमबलि को भी समीप ले जाकर विधि के अनुसार चढ़ाया। 17 और अन्नबलि को भी समीप ले जाकर उस में से मुट्ठी भर वेदी पर जलाया, यह भोर के होमबलि के अलावा चढ़ाया गया। 18 और बैल और मेढ़ा, अर्यात्‌ जो मेलबलिपशु जनता के लिथे थे वे भी बलि किथे गए; और हारून के पुत्रोंने लोहू को उसके हाथ में दिया, और उस ने उसको वेदी पर चारोंओर छिड़क दिया; 19 और उन्होंने बैल की चरबी को, और मेढ़े में से मोटी पूंछ को, और जिस चरबी से अतडिय़ां ढपी रहती हैं उसको, ओर गुर्दोंसहित कलेजे पर की फिल्ली को भी उसके हाथ में दिया; 20 और उन्होंने चरबी को छातियोंपर रखा; और उस ने वह चरबी वेदी पर जलाई, 21 परन्तु छातियोंऔर दहिनी जांघ को हारून ने मूसा की आज्ञा के अनुसार हिलाने की भेंट के लिथे यहोवा के साम्हने हिलाया। 22 तब हारून ने लोगोंकी ओर हाथ बढ़ाकर उनहें आशीर्वाद दिया; और पापबलि, होमबलि, और मेलबलियोंको चढ़ाकर वह नीचे उतर आया। 23 तब मूसा और हारून मिलापवाले तम्बू में गए, और निकलकर लोगोंको आशीर्वाद दिया; तब यहोवा का तेज सारी जनता को दिखाई दिया। 24 और यहोवा के साम्हने से आग निकलकर चरबी सहित होमबलि को वेदी पर भस्म कर दिया; इसे देखकर जनता ने जय जयकार का नारा मारा, और अपके अपके मुंह के बल गिरकर दण्डवत किया।।

लैव्यवस्था 10

1 तब नादाब और अबीहू नामक हारून के दो पुत्रोंने अपना अपना धूपदान लिया, और उन में आग भरी, और उस में धूप डालकर उस ऊपक्की आग की जिसकी आज्ञा यहोवा ने नहीं दी यी यहोवा के सम्मुख आरती दी। 2 तब यहोवा के सम्मुख से आग निकलकर उन दोनोंको भस्म कर दिया, और वे यहोवा के साम्हने मर गए। 3 तब मूसा ने हारून से कहा, यह वही बात है जिसे यहोवा ने कहा या, कि जो मेरे समीप आए अवश्य है कि वह मुझे पवित्र जाने, और सारी जनता के साम्हने मेरी महिमा करे। और हारून चुप रहा। 4 तब मूसा ने मीशाएल और एलसाफान को जो हारून के चाचा उज्जीएल के पुत्र थे बुलाकर कहा, निकट आओ, और अपके भतीजोंको पवित्रस्यान के आगे से उठाकर छावनी के बाहर ले जाओ। 5 मूसा की इस आज्ञा के अनुसार वे निकट जाकर उनको अंगरखोंसहित उठाकर छावनी के बाहर ले गए। 6 तब मूसा ने हारून से और उसके पुत्र एलीआजर और ईतामार से कहा, तुम लोग अपके सिरोंके बाल मत बिखराओ, और न अपके वोंको फाड़ो, ऐसा न हो कि तुम भी मर जाओ, और सारी मण्डली पर उसका क्रोध भड़क उठे; परन्तु वह इस्त्राएल के कुल घराने के लोग जो तुम्हारे भाईबन्धु हैं यहोवा की लगाई हुई आग पर विलाप करें। 7 और तुम लोग मिलापवाले तम्बू के द्वार के बाहर न जाना, ऐसा न हो कि तुम मर जाओ; क्योंकि यहोवा के अभिषेक का तेल तुम पर लगा हुआ है। मूसा के इस वचन के अनुसार उन्होंने किया।। 8 फिर यहोवा ने हारून से कहा, 9 कि जब जब तू वा तेरे पुत्र मिलापवाले तम्बू में आएं तब तब तुम में से कोई न तो दाखमधु पिए हो न और किसी प्रकार का मद्य, कहीं ऐसा न हो कि तुम मर जाओ; तुम्हारी पीढ़ी पीढ़ी में यह विधि प्रचलित रहे, 10 जिस से तुम पवित्र और अपवित्र में, और शुद्ध और अशुद्ध में अन्तर कर सको; 11 और इस्त्राएलियोंको उन सब विधियोंको सिखा सको जिसे यहोवा ने मूसा के द्वारा उनको सुनवा दी हैं।। 12 फिर मूसा ने हारून से और उसके बचे हुए दोनोंपुत्र ईतामार और एलीआजर से भी कहा, यहोवा के हव्य में से जो अन्नबलि बचा है उसे लेकर वेदी के पास बिना खमीर खाओ, क्योंकि वह परमपवित्र है; 13 और तुम उसे किसी पवित्रस्यान में खाओ, वह तो यहोवा के हव्य में से तेरा और तेरे पुत्रोंका हक है; क्योंकि मै ने ऐसी ही आज्ञा पाई है। 14 और हिलाई हुई भेंट की छाती और उठाई हुई भेंट की जांघ को तुम लोग, अर्यात्‌ तू और बेटे-बेटियां सब किसी शुद्ध स्यान में खाओ; क्योंकि वे इस्त्राएलियोंके मेलबलियोंमें से तुझे और तेरे लड़केबालोंकी हक ठहरा दी गई हैं। 15 चरबी के हव्योंसमेत जो उठाई हुई जांघ और हिलाई हुई छाती यहोवा के साम्हने हिलाने के लिथे आया करेंगी, थे भाग यहोवा की आज्ञा के अनुसार सर्वदा की विधी की व्यवस्या से तेरे और तेरे लड़केबालोंके लिथे हैं।। 16 फिर मूसा ने पापबलि के बकरे की जो ढूंढ़-ढांढ़ की, तो क्या पाया, कि वह जलाया गया है, सो एलीआज़र और ईतामार जो हारून के पुत्र बचे थे उन से वह क्रोध में आकर करने लगा, 17 कि पापबलि जो परमपवित्र है और जिसे यहोवा ने तुम्हे इसलिथे दिया है कि तुम मण्डली के अधर्म का भार अपके पर उठाकर उनके लिथे यहोवा के साम्हने प्रायश्चित्त करो, तुम ने उसका मांस पवित्रस्यान में क्योंनहीं खाया? 18 देखो, उसका लोहू पवित्रस्यान के भीतर तो लाया ही नहीं गया, नि:सन्देह उचित या कि तुम मेरी आज्ञा के अनुसार उसके मांस को पवित्रस्यान में खाते। 19 इसका उत्तर हारून ने मूसा को इस प्रकार दिया, कि देख, आज ही उन्होंने अपके पापबलि और होमबलि को यहोवा के साम्हने चढ़ाया; फिर मुझ पर ऐसी विपत्तियां आ पक्की हैं ! इसलिथे यदि मैं आज पापबलि का मांस खाता तो क्या यह बात यहोवा के सम्मुख भली होती? 20 जब मूसा ने यह सुना तब उसे संतोष हुआ।।

लैव्यवस्था 11

1 फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, 2 इस्त्राएलियोंसे कहो, कि जितने पशु पृय्वी पर हैं उन सभोंमें से तुम इन जीवधारियोंका मांस खा सकते हो। 3 पशुओं में से जितने चिरे वा फटे खुर के होते हैं और पागुर करते हैं उन्हें खा सकते हो। 4 परन्तु पागुर करनेवाले वा फटे खुरवालोंमें से इन पशुओं को न खाना, अर्यात्‌ ऊंट, जो पागुर तो करता है परन्तु चिरे खुर का नहीं होता, इसलिथे वह तुम्हारे लिथे अशुद्ध ठहरा है। 5 और शापान, जो पागुर तो करता है परन्तु चिरे खुर का नहीं होता, वह भी तुम्हारे लिथे अशुद्ध है। 6 और खरहा, जो पागुर तो करता है परन्तु चिरे खुर का नहीं होता, इसलिथे वह भी तुम्हारे लिथे अशुद्ध है। 7 और सूअर, जो चिरे अर्यात्‌ फटे खुर का होता तो है परन्तु पागुर नहीं करता, इसलिथे वह तुम्हारे लिथे अशुद्ध है। 8 इनके मांस में से कुछ न खाना, और इनकी लोय को छूना भी नहीं; थे तो तुम्हारे लिथे अशुद्ध है।। 9 फिर जितने जलजन्तु हैं उन में से तुम इन्हें खा सकते हों, अर्यात्‌ समुद्र वा नदियोंके जलजन्तुओं में से जितनोंके पंख और चोंथेटे होते हैं उन्हें खा सकते हो। 10 और जलचक्की प्राणियोंमें से जितने जीवधारी बिना पंख और चोंथेटे के समुद्र वा नदियोंमें रहते हैं वे सब तुम्हारे लिथे घृणित हैं। 11 वे तुम्हारे लिथे घृणित ठहरें; तुम उनके मांस में से कुछ न खाना, और उनकी लोयोंको अशुद्ध जानना। 12 जल में जिस किसी जन्तु के पंख और चोंथेटे नहीं होते वह तुम्हारे लिथे अशुद्ध है।। 13 फिर पझियोंमें से इनको अशुद्ध जानना, थे अशुद्ध होने के कारण खाए न जाएं, अर्यात्‌ उकाब, हड़फोड़, कुरर, 14 शाही, और भांति भांति की चील, 15 और भांति भांति के सब काग, 16 शुतुर्मुर्ग, तखमास, जलकुक्कुट, और भांति भांति के बाज, 17 हवासिल, हाड़गील, उल्लू, 18 राजहँस, धनेश, गिद्ध, 19 लगलग, भांति भांति के बगुले, टिटीहरी और चमगीदड़।। 20 जितने पंखवाले चार पांवोंके बल चरते हैं वे सब तुम्हारे लिथे अशुद्ध हैं। 21 पर रेंगनेवाले और पंखवाले जो चार पांवोंके बल चलते हैं, जिनके भूमि पर कूदने फांदने को टांगे होती हैं उनको तो खा सकते हो। 22 वे थे हैं, अर्यात्‌ भांति भांति की टिड्डी, भांति भांति के फनगे, भांति भांति के हर्गोल, और भांति भांति के हागाब। 23 परन्तु और सब रेंगनेवाले पंखवाले जो चार पांववाले होते हैं वे तुम्हारे लिथे अशुद्ध हैं।। 24 और इनके कारण तुम अशुद्ध ठहरोगे; जिस किसी से इनकी लोय छू जाए वह सांफ तक अशुद्ध ठहरे। 25 और जो कोई इनकी लोय में का कुछ भी उठाए वह अपके वस्त्र धोए और सांफ तक अशुद्ध रहे। 26 फिर जितने पशु चिरे खुर के होते है। परन्तु न तो बिलकुल फटे खुर और पागुर करनेवाले हैं वे तुम्हारे लिथे अशुद्ध हैं; जो कोई उन्हें छूए वह अशुद्ध हैं; जो कोई उन्हें छूए वह अशुद्ध ठहरेगा। 27 और चार पांव के बल चलनेवालोंमें से जितने पंजोंके बल चलते हैं वे सब तुम्हारे लिथे अशुद्ध हैं; जो कोई उनकी लोय छूए वह सांफ तक अशुद्ध रहे। 28 और जो कोई उनकी लोय उठाए वह अपके वस्त्र धोए और सांफ तक अशुद्ध रहे; क्योंकि वे तुम्हारे लिथे अशुद्ध हैं।। 29 और जो पृय्वी पर रेंगते हैं उन में से थे रेंगनेवाले तुम्हारे लिथे अशुद्ध हैं, अर्यात्‌ नेवला, चूहा, और भांति भांति के गोह, 30 और छिपकली, मगर, टिकटिक, सांडा, और गिरगिटान। 31 सब रेंगनेवालोंमें से थे ही तुम्हारे लिथे अशुद्ध हैं; जो कोई इनकी लोय छूए वह सांफ तक अशुद्ध रहे। 32 और इन में से किसी की लोय जिस किसी वस्तु पर पड़ जाए वह भी अशुद्ध ठहरे, चाहे वह काठ का कोई पात्र हो, चाहे वस्त्र, चाहे खाल, चाहे बोरा, चाहे किसी काम का कैसा ही पात्रादि क्योंन हो; वह जल में डाला जाए, और सांफ तक अशुद्ध रहे, तब शुद्ध समझा जाए। 33 और यदि मिट्टी का कोई पात्र हो जिस में इन जन्तुओं में से कोई पके, तो उस पात्र में जो कुछ हो वह अशुद्ध ठहरे, और पात्र को तुम तोड़ डालना। 34 उस में जो खाने के योग्य भोजन हो, जिस में पानी का छुआव होंवह सब अशुद्ध ठहरे; फिर यदि ऐसे पात्र में पीने के लिथे कुछ हो तो वह भी अशुद्ध ठहरे। 35 और यदि इनकी लोय में का कुछ तंदूर वा चूल्हे पर पके तो वह भी अशुद्ध ठहरे, और तोड़ डाला जाए; क्योंकि वह अशुद्ध हो जाएगा, वह तुम्हारे लिथे भी अशुद्ध ठहरे। 36 परन्तु सोता वा तालाब जिस में जल इकट्ठा हो वह तो शुद्ध ही रहे; परन्तु जो कोई इनकी लोय को छूए वह अशुद्ध ठहरे। 37 और यदि इनकी लोय में का कुछ किसी प्रकार के बीज पर जो बोने के लिथे हो पके, तो वह बीज शुद्ध रहे; 38 पर यदि बीज पर जल डाला गया हो और पीछे लोय में का कुछ उस पर पड़ जाए, तो वह तुम्हारे लिथे अशुद्ध ठहरे।। 39 फिर जिन पशुओं के खाने की आज्ञा तुम को दी गई है यदि उन में से कोई पशु मरे, तो जो कोई उसकी लोय छूए वह सांफ तक अशुद्ध रहे। 40 और उसकी लोय में से जो कोई कुछ खाए वह अपके वस्त्र धोए और सांफ तक अशुद्ध रहे; और जो कोई उसकी लोय उठाए वह भी अपके वस्त्र धोए और सांफ तक अशुद्ध रहे। 41 और सब प्रकार के पृय्वी पर रेंगनेवाले जन्तु घिनौने हैं; वे खाए न जाएं। 42 पृय्वी पर सब रेंगनेवालोंमें से जितने पेट वा चार पांवोंके बल चलते हैं, वा अधिक पांववाले होते हैं, उन्हें तुम न खाना; क्योंकि वे घिनौने हैं। 43 तुम किसी प्रकार के रेंगनेवाले जन्तु के द्वारा अपके आप को घिनौना न करना; और न उनके द्वारा अपके को अशुद्ध करके अपवित्र ठहराना। 44 क्योंकि मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं; इस प्रकार के रेंगनेवाले जन्तु के द्वारा जो पृय्वी पर चलता है अपके आप को अशुद्ध न करना। 45 क्योंकि मैं वह यहोवा हूं जो तुम्हें मिस्र देश से इसलिथे निकाल ले आया हूं कि तुम्हारा परमेश्वर ठहरूं; इसलिथे तुम पवित्र बनो, क्योंकि मैं पवित्र हूं।। 46 पशुओं, पझियों, और सब जलचक्की प्राणियों, और पृय्वी पर सब रेंगनेवाले प्राणियोंके विषय में यही व्यवस्या है, 47 कि शुद्ध अशुद्ध और भझय और अभझय जीवधारियोंमें भेद किया जाए।।

लैव्यवस्था 12

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 2 इस्त्राएलियोंसे कह, कि जो स्त्री गभिर्णी हो और उसके लड़का हो, तो वह सात दिन तक अशुद्ध रहेगी; जिस प्रकार वह ऋतुमती होकर अशुद्ध रहा करती। 3 और आठवें दिन लड़के का खतना किया जाए। 4 फिर वह स्त्री अपके शुद्ध करनेवाले रूधिर में तेंतीस दिन रहे; और जब तक उसके शुद्ध हो जाने के दिन पूरे न होंतब तक वह न तो किसी पवित्र वस्तु को छुए, और न पवित्रस्यान में प्रवेश करे। 5 और यदि उसके लड़की पैदा हो, तो उसको ऋतुमती की सी अशुद्धता चौदह दिन की लगे; और फिर छियासठ दिन तक अपके शुद्ध करनेवाले रूधिर में रहे। 6 और जब उसके शुद्ध हो जाने के दिन पूरे हों, तब चाहे उसके बेटा हुआ हो चाहे बेटी, वह होमबलि के लिथे एक वर्ष का भेड़ी का बच्चा, और पापबलि के लिथे कबूतरी का एक बच्चा वा पंडुकी मिलापवाले तम्बू के द्वार पर याजक के पास लाए। 7 तब याजक उसको यहोवा के साम्हने भेंट चढ़ाके उसके लिथे प्रायश्चित्त करे; और वह अपके रूधिर के बहने की अशुद्धता से छूटकर शुद्ध ठहरेगी। जिस स्त्री के लड़का वा लड़की उत्पन्न हो उसके लिथे यही व्यवस्या है। 8 और यदि उसके पास भेड़ वा बकरी देने की पूंजी न हो, तो दो पंडुकी वा कबूतरी के दो बच्चे, एक तो होमबलि और दूसरा पापबलि के लिथे दे; और याजक उसके लिथे प्रायश्चित्त करे, तब वह शुद्ध ठहरेगी।।

लैव्यवस्था 13

1 फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, 2 जब किसी मनुष्य के शरीर के चर्म में सूजन वा पपक्की वा फूल हो, और इस से उसके चर्म में कोढ़ की व्याधि सा कुछ देख पके, तो उसे हारून याजक के पास या उसके पुत्र जो याजक हैं उन में से किसी के पास ले जाएं। 3 जब याजक उसके चर्म की व्याधि को देखे, और यदि उस व्याधि के स्यान के रोएं उजले हो गए होंऔर व्याधि चर्म से गहरी देख पके, तो वह जान ले कि कोढ़ की व्याधि है; और याजक उस मनुष्य को देखकर उसको अशुद्ध ठहराए। 4 और यदि वह फूल उसके चर्म में उजला तो हो, परन्तु चर्म से गहरा न देख पके, और न वहां के रोएं उजले हो गए हों, तो याजक उनको सात दिन तक बन्दकर रखे; 5 और सातवें दिन याजक उसको देखे, और यदि वह व्याधि जैसी की तैसी बनी रहे और उसके चर्म में न फैली हो, तो याजक उसको और भी सात दिन तक बन्दकर रखे; 6 और सातवें दिन याजक उसको फिर देखे, और यदि देख पके कि व्याधि की चमक कम है और व्याधि चर्म पर फैली न हो, तो याजक उसको शुद्ध ठहराए; क्योंकि उसके तो चर्म में पपक्की है; और वह अपके वस्त्र धोकर शुद्ध हो जाए। 7 और यदि याजक की उस जांच के पश्चात्‌ जिस में वह शुद्ध ठहराया गया या, वह पपक्की उसके चर्म पर बहुत फैल जाए, तो वह फिर याजक को दिखाया जाए; 8 और यदि याजक को देख पके कि पपक्की चर्म में फैल गई है, तो वह उसको अशुद्ध ठहराए; क्योंकि वह कोढ़ ही है।। 9 यदि कोढ़ की सी व्याधि किसी मनुष्य के हो, तो वह याजक के पास पहुचाया जाए; 10 और याजक उसको देखे, और यदि वह सूजन उसके चर्म में उजली हो, और उसके कारण रोएं भी उजले हो गए हों, और उस सूजन में बिना चर्म का मांस हो, 11 तो याजक जाने कि उसके चर्म में पुराना कोढ़ है, इसलिथे वह उसको अशुद्ध ठहराए; और बन्द न रखे, क्योंकि वह तो अशुद्ध है। 12 और यदि कोढ़ किसी के चर्म में फूटकर यहां तक फैल जाए, कि जहां कहीं याजक देखें व्याधित के सिर से पैर के तलवे तक कोढ़ ने सारे चर्म को छा लिया हो, 13 जो याजक ध्यान से देखे, और यदि कोढ़ ने उसके सारे शरीर को छा लिया हो, तो वह उस व्याधित को शुद्ध ठहराए; और उसका शरीर जो बिलकुल उजला हो गया है वह शुद्ध ही ठहरे। 14 पर जब उस में चर्महीन मांस देख पके, तब तो वह अशुद्ध ठहरे। 15 और याजक चर्महीन मांस को देखकर उसको अशुद्ध ठहराए; कयोंकि वैसा चर्महीन मांस अशुद्ध ही होता है; वह कोढ़ है। 16 पर यदि वह चर्महीन मांस फिर उजला हो जाए, तो वह मनुष्य याजक के पास जाए, 17 और याजक उसको देखे, और यदि वह व्याधि फिर से उजली हो गई हो, तो याजक व्याधित को शुद्ध जाने; वह शुद्ध है।। 18 फिर यदि किसी के चर्म में फोड़ा होकर चंगा हो गया हो, 19 और फोड़े के स्यान में उजली सी सूजन वा लाली लिथे हुए उजला फूल हो, तो वह याजक को दिखाया जाए। 20 और याजक उस सूजन को देखे, और यदि वह चर्म से गहिरा देख पके, और उसके रोएं भी उजले हो गए हों, तो याजक यह जानकर उस मनुष्य को अशुद्ध ठहराए; क्योंकि वह कोढ़ की व्याधि है जो फोड़े में से फूटकर निकली है। 21 और यदि याजक देखे कि उस में उजले रोएं नहीं हैं, और वह चर्म से गहिरी नहीं, और उसकी चमक कम हुई है, तो याजक उस मनुष्य को सात दिन तक बन्द कर रखे। 22 और यदि वह व्याधि उस समय तक चर्म में सचमुच फैल जाए, तो याजक उस मनुष्य को अशुद्ध ठहराए; क्योंकि वह कोढ़ की व्याधि है। 23 परन्तु यदि वह फूल न फैले और अपके स्यान ही पर बना रहे, तो वह फोड़े को दाग है; याजक उस मनुष्य को शुद्ध ठहराए।। 24 फिर यदि किसी के चर्म में जलने का घाव हो, और उस जलने के घाव में चर्महीन फूल लाली लिथे हुए उजला वा उजला ही हो जाए, 25 तो याजक उसको देखे, और यदि उस फूल में के रोएं उजले हो गए होंऔर वह चर्म से गहिरा देख पके, तो वह कोढ़ है; जो उस जलने के दाग में से फूट निकला है; याजक उस मनुष्य को अशुद्ध ठहराए; क्योंकि उस में कोढ़ की व्याधि है। 26 और यदि याजक देखे, कि फूल में उजले रोएं नहीं और न वह चर्म से कुछ गहिरा है, और उसकी चमक कम हुई है, तो वह उसको सात दिन तक बन्द कर रखे, 27 और सातवें दिन याजक उसको देखे, और यदि वह चर्म में फैल गई हो, तो वह उस मनुष्य को अशुद्ध ठहराए; क्योंकि उसको कोढ़ की व्याधि है। 28 परन्तु यदि वह फूल चर्म में नहीं फैला और अपके स्यान ही पर जहां का तहां ही बना हो, और उसकी चमक कम हुई हो, तो वह जल जाने के कारण सूजा हुआ है, याजक उस मनुष्य को शुद्ध ठहराए; क्योंकि वह दाग जल जाने के कारण से है।। 29 फिर यदि किसी पुरूष वा स्त्री के सिर पर, वा पुरूष की डाढ़ी में व्याधि हो, 30 तो याजक व्याधि को देखे, और यदि वह चर्म से गहिरी देख पके, और उस में भूरे भूरे पतले बाल हों, तो याजक उस मनुष्य को अशुद्ध ठहराए; वह व्याधि सेंहुआं, अर्यात्‌ सिर वा डाढ़ी का कोढ़ है। 31 और यदि याजक सेंहुएं की व्याधि को देखे, कि वह चर्म से गहिरी नहीं है और उस में काले काले बाल नहीं हैं, तो वह सेंहुएं के व्याधित को सात दिन तक बन्द कर रखे, 32 और सातवें दिन याजक व्याधि को देखे, तब यदि वह सेंहुआं फैला न हो, और उस में भूरे भूरे बाल न हों, और सेंहुआं चर्म से गहिरा न देख पके, 33 तो यह मनुष्य मूंड़ा जाए, परन्तु जहां सेंहुआं हो वहां न मूंड़ा जाए; और याजक उस सेंहुएंवाले को और भी सात दिन तक बन्द करे; 34 और सातवें दिन याजक सेहुएं को देखे, और यदि वह सेंहुआं चर्म में फैला न हो और चर्म से गहिरा न देख पके, तो याजक उस मनुष्य को शुद्ध ठहराए; और वह अपके वस्त्र धोके शुद्ध ठहरे। 35 और यदि उसके शुद्ध ठहरने के पश्चात्‌ सेंहुआं चर्म में कुछ भी फैले, 36 तो याजक उसको देखे, और यदि वह चर्म में फैला हो, तो याजक यह भूरे बाल न ढूंढ़े, क्योंकि मनुष्य अशुद्ध है। 37 परन्तु यदि उसकी दृष्टि में वह सेंहुआं जैसे का तैसा बना हो, और उस में काले काले बाल जमे हों, तो वह जाने की सेंहुआं चंगा हो गया है, और वह मनुष्य शुद्ध है; याजक उसको शुद्ध ही ठहराए।। 38 फिर यदि किसी पुरूष वा स्त्री के चर्म में उजले फूल हों, 39 तो याजक देखे, और यदि उसके चर्म में वे फूल कम उजले हों, तो वह जाने कि उसको चर्म में निकली हुई चाईं ही है; वह मनुष्य शुद्ध ठहरे।। 40 फिर जिसके सिर के बाल फड़ गए हों, तो जानना कि वह चन्दुला तो है परन्तु शुद्ध है। 41 और जिसके सिर के आगे के बाल फड़ गए हों, तो वह माथे का चन्दुला तो है परन्तु शुद्ध है। 42 परन्तु यदि चन्दुले सिर पर वा चन्दुले माथे पर लाली लिथे हुए उजली व्याधि हो, तो जानना कि वह उसके चन्दुले सिर पर वा चन्दुले माथे पर निकला हुआ कोढ़ है। 43 इसलिथे याजक उसको देखे, और यदि व्याधि की सूजन उसके चन्दुले सिर वा चन्दुले माथे पर ऐसी लाली लिथे हुए उजली हो जैसा चर्म के कोढ़ में होता है, 44 तो वह मनुष्य कोढ़ी है और अशुद्ध है; और याजक उसको अवश्य अशुद्ध ठहराए; क्योंकि वह व्याधि उसके सिर पर है।। 45 और जिस में वह व्याधि हो उस कोढ़ी के वस्त्र फटे और सिर के बाल बिखरे रहें, और वह अपके ऊपरवाले होंठ को ढांपे हुए अशुद्ध, अशुद्ध पुकारा करे। 46 जितने दिन तक वह व्याधि उस में रहे उतने दिन तक वह तो अशुद्ध रहेगा; और वह अशुद्ध ठहरा रहे; इसलिथे वह अकेला रहा करे, उसका निवास स्यान छावनी के बाहर हो।। 47 फिर जिस वस्त्र में कोढ़ की व्याधि हो, चाहे वह वस्त्र ऊन का हो चाहे सनी का, 48 वह व्याधि चाहे उस सनी वा ऊन के वस्त्र के ताने में हो चाहे बाने में, वा वह व्याधि चमड़े में वा चमड़े की किसी वस्तु में हो, 49 यदि वह व्याधि किसी वस्त्र के चाहे ताने में चाहे बाने में, वा चमड़े में वा चमड़े की किसी वस्तु में हरी हो वा लाल सी हो, तो जानना कि वह कोढ़ की व्याधि है और वह याजक को दिखाई जाए। 50 और याजक व्याधि को देखे, और व्याधिवाली वस्तु को सात दिन के लिथे बन्द करे; 51 और सातवें दिन वह उस व्याधि को देखे, और यदि वह वस्त्र के चाहे ताने में चाहे बाने में, वा चमड़े में वा चमड़े की बनी हुई किसी वस्तु में फैल गई हो, तो जानना कि व्याधि गलित कोढ़ है, इसलिथे वह वस्तु, चाहे कैसे ही काम में क्योंन आती हो, तौभी अशुद्ध ठहरेगी। 52 वह उस वस्त्र को जिसके ताने वा बाने में वह व्याधि हो, चाहे वह ऊन का हो चाहे सनी का, वा चमड़े की वस्तु हो, उसको जला दे, वह व्याधि गलित कोढ़ की है; वह वस्तु आग में जलाई जाए। 53 और यदि याजक देखे कि वह व्याधि उस वस्त्र के ताने वा बाने में, वा चमड़े की उस वस्तु में नहीं फैली, 54 तो जिस वस्तु में व्याधि हो उसके धोने की आज्ञा दे, तक उसे और भी सात दिन तक बन्द कर रखे; 55 और उसके धोने के बाद याजक उसको देखे, और यदि व्याधि का न तो रंग बदला हो, और न व्याधि फैली हो, तो जानना कि वह अशुद्ध है; उसे आग में जलाना, क्योंकि चाहे वह व्याधि भीतर चाहे ऊपक्की हो तौभी वह खा जाने वाली व्याधि है। 56 और यदि याजक देखे, कि उसके धोने के पश्चात्‌ व्याधि की चमक कम हो गई, तो वह उसको वस्त्र के चाहे ताने चाहे बाने में से, वा चमड़े में से फाड़के निकाले; 57 और यदि वह व्याधि तब भी उस वस्त्र के ताने वा बाने में, वा चमड़े की उस वस्तु में देख पके, तो जानना कि वह फूट के निकली हुई व्याधि है; और जिस में वह व्याधि हो उसे आग में जलाना। 58 और यदि उस वस्त्र से जिसके ताने वा बाने में व्याधि हो, वा चमड़े की जो वस्तु हो उस से जब धोई जाए और व्याधि जाती रही, तो वह दूसरी बार धुल कर शुद्ध ठहरे। 59 ऊन वा सनी के वस्त्र में के ताने वा बाने में, वा चमड़े की किसी वस्तु में जो कोढ़ की व्याधि हो उसके शुद्ध और अशुद्ध ठहराने की यही व्यवस्या है।।

लैव्यवस्था 14

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 2 कोढ़ी के शुद्ध ठहराने की व्यवस्या यह है, कि वह याजक के पास पहुंचाया जाए। 3 और याजक छावनी के बाहर जाए, और याजक उस कोढ़ी को देखे, और यदि उसके कोढ़ की व्याधि चंगी हुई हो, 4 तो याजक आज्ञा दे कि शुद्ध ठहराने वाले के लिथे दो शुद्ध और जीवित पक्की, देवदारू की लकड़ी, और लाल रंग का कपड़ा और जूफा थे सब लिथे जाएं; 5 और याजक आज्ञा दे कि एक पक्की बहते हुए जल के ऊपर मिट्टी के पात्र में बलि किया जाए। 6 तब वह जीवित पक्की को देवदारू की लकड़ी और लाल रंग के कपके और जूफा इन सभोंको लेकर एक संग उस पक्की के लोहू में जो बहते हुए जल के ऊपर बलि किया गया है डुबा दे; 7 और कोढ़ से शुद्ध ठहरनेवाले पर सात बार छिड़ककर उसको शुद्ध ठहराए, तब उस जीवित पक्की को मैदान में छोड़ दे। 8 और शुद्ध ठहरनेवाला अपके वोंको धोए, और सब बाल मुंड़वाकर जल से स्नान करे, तब वह शुद्ध ठहरेगा; और उसके बाद वह छावनी में आने पाए, परन्तु सात दिन तक अपके डेरे से बाहर ही रहे। 9 और सातवें दिन वह सिर, डाढ़ी और भौहोंके सब बाल मुंड़ाए, और सब अंग मुण्डन कराए, और अपके वोंको धोए, और जल से स्नान करे, तब वह शुद्ध ठहरेगा। 10 और आठवें दिन वह दो निर्दोष भेड़ के बच्चे, और अन्नबलि के लिथे तेल से सना हुआ एपा का तीन दहाई अंश मैदा, और लोज भर तेल लाए। 11 और शुद्ध ठहरानेवाला याजक इन वस्तुओं समेत उस शुद्ध होनेवाले मनुष्य को यहोवा के सम्मुख मिलापवाले तम्बू के द्वार पर खड़ा करे। 12 तब याजक एक भेड़ का बच्चा लेकर दोषबलि के लिथे उसे और उस लोज भर तेल को समीप लाए, और इन दोनो को हिलाने की भेंट के लिथे यहोवा के साम्हने हिलाए; 13 तब याजक एक भेड़ के बच्चे को उसी स्यान में जहां वह पापबलि और होमबलि पशुओं का बलिदान किया करेगा, अर्यात्‌ पवित्रस्यान में बलिदान करे; क्योंकि जैसा पापबलि याजक का निज भाग होगा वैसा ही दोषबलि भी उसी का निज भाग ठहरेगा; वह परमपवित्र है। 14 तब याजक दोषबलि के लोहू में से कुछ लेकर शुद्ध ठहरनेवाले के दहिने कान के सिक्के पर, और उसके दहिने हाथ और दहिने पांव के अंगूठोंपर लगाए। 15 और याजक उस लोज भर तेल में से कुछ लेकर अपके बाएं हाथ की हथेली पर डाले, 16 और याजक अपके दहिने हाथ की उंगली को अपके बाईं हथेली पर के तेल में डुबाकर उस तेल में से कुछ अपक्की उंगली से यहोवा के सम्मुख सात बार छिड़के। 17 और जो तेल उसकी हथेली पर रह जाएगा याजक उस में से कुछ शुद्ध होनेवाले के दहिने कान के सिक्के पर, और उसके दहिने हाथ और दहिने पांव के अंगूठोंपर दोषबलि के लोहू के ऊपर लगाएं; 18 और जो तेल याजक की हथेली पर रह जाए उसको वह शुद्ध होनेवाले के सिर पर डाल दे। और याजक उसके लिथे यहोवा के साम्हने प्रायश्चित्त करे। 19 और याजक पापबलि को भी चढ़ाकर उसके लिथे जो अपक्की अशुद्धता से शुद्ध होनेवाला हो प्रायश्चित्त करे; और उसके बाद होमबलि पशु का बलिदान करके: 20 अन्नबलि समेत वेदी पर चढ़ाए: और याजक उसके लिथे प्रायश्चित्त करे, और वह शुद्ध ठहरेगा।। 21 परन्तु यदि वह दरिद्र हो और इतना लाने के लिथे उसके पास पूंजी न हो, तो वह अपना प्रायश्चित्त करवाने के निमित्त, हिलाने के लिथे भेड़ का बच्चा दोषबलि के लिथे, और तेल से सना हुआ एपा का दसवां अंश मैदा अन्नबलि करके, और लोज भर तेल लाए; 22 और दो पंडुक, वा कबूतरी के दो बच्चे लाए, जो वह ला सके; और इन में से एक तो पापबलि के लिथे और दूसरा होमबलि के लिथे हो। 23 और आठवें दिन वह इन सभोंको अपके शुद्ध ठहरने के लिथे मिलापवाले तम्बू के द्वार पर, यहोवा के सम्मुख, याजक के पास ले आए; 24 तब याजक उस लोज भर तेल और दोष बलिवाले भेड़ के बच्चे को लेकर हिलाने की भेंट के लिथे यहोवा के साम्हने हिलाए। 25 फिर दोषबलि के भेड़ के बच्चे का बलिदान किया जाए; और याजक उसके लोहू में से कुछ लेकर शुद्ध ठहरनेवाले के दहिने कान के सिक्के पर, और उसके दहिने हाथ और दहिने पांव के अंगूठोंपर लगाए। 26 फिर याजक उस तेल में से कुछ अपके बाएं हाथ की हथेली पर डालकर, 27 अपके दहिने हाथ की उंगली से अपक्की बाईं हथेली पर के तेल में से कुछ यहोवा के सम्मुख सात बार छिड़के; 28 फिर याजक अपक्की हथेली पर के तेल में से कुछ शुद्ध ठहरनेवाले के दहिने कान के सिक्के पर, और उसके दहिने हाथ और दहिने पांव के अंगूठोंपर दोषबलि के लोहू के स्यान पर, लगाए। 29 और जो तेल याजक की हथेली पर रह जाए उसे वह शुद्ध ठहरनेवाले के लिथे यहोवा के साम्हने प्रायश्चित्त करने को उसके सिर पर डाल दे। 30 तब वह पंडुकोंवा कबूतरी के बच्चोंमें से जो वह ला सका हो एक को चढ़ाए, 31 अर्यात्‌ जो पक्की वह ला सका हो, उन में से वह एक को पापबलि के लिथे और अन्नबलि समेत दूसरे को होमबलि के लिथे चढ़ाए; इस रीति से याजक शुद्ध ठहरनेवाले के लिथे यहोवा के साम्हने प्रायश्चित्त करे। 32 जिसे कोढ़ की व्याधि हुई हो, और उसके इतनी पूंजी न हो कि वह शुद्ध ठहरने की सामग्री को ला सके, तो उसके लिथे यही व्यवस्या है।। 33 फिर यहोवा ने मूसा और हारून से कहा, 34 जब तुम लोग कनान देश में पहुंचो, जिसे मैं तुम्हारी निज भूमि होने के लिथे तुम्हें देता हूं, उस समय यदि मैं कोढ़ की व्याधि तुम्हारे अधिक्कारने के किसी घर में दिखाऊं, 35 तो जिसका वह घर हो वह आकर याजक को बता दे, कि मुझे ऐसा देख पड़ता है कि घर में मानोंकोई व्याधि है। 36 तब याजक आज्ञा दे, कि उस घर में व्याधि देखने के लिथे मेरे जाने से पहिले उसे खाली करो, कहीं ऐसा न हो कि जो कुछ घर में हो वह सब अशुद्ध ठहरे; और पीछे याजक घर देखने को भीतर जाए। 37 तब वह उस व्याधि को देखे; और यदि वह व्याधि घर की दीवारोंपर हरी हरी वा लाल लाल मानोंखुदी हुई लकीरोंके रूप में हो, और थे लकीरें दीवार में गहिरी देख पड़ती हों, 38 तो याजक घर से बाहर द्वार पर जाकर घर को सात दिन तक बन्द कर रखे। 39 और सातवें दिन याजक आकर देखे; और यदि वह व्याधि घर की दीवारोंपर फैल गई हो, 40 तो याजक आज्ञा दे, कि जिन पत्यरोंको व्याधि है उन्हें निकाल कर नगर से बाहर किसी अशुद्ध स्यान में फेंक दें; 41 और वह घर के भीतर ही भीतर चारोंओर खुरचवाए, और वह खुरचन की मिट्टी नगर से बाहर किसी अशुद्ध स्यान में डाली जाए; 42 और उन पत्यरोंके स्यान में और दूसरे पत्यर लेकर लगाएं और याजक ताजा गारा लेकर घर की जुड़ाई करे। 43 और यदि पत्यरोंके निकाले जाने और घर के खुरचे और लेसे जाने के बाद वह व्याधि फिर घर में फूट निकले, 44 तो याजक आकर देखे; और यदि वह व्याधि घर में फैल गई हो, तो वह जान ले कि घर में गलित कोढ़ है; वह अशुद्ध है। 45 और वह सब गारे समेत पत्यर, लकड़ी और घर को खुदवाकर गिरा दे; और उन सब वस्तुओं को उठवाकर नगर से बाहर किसी अशुद्ध स्यान पर फिंकवा दे। 46 और जब तक वह घर बन्द रहे तब तक यदि कोई उस में जाए तो वह सांफ तक अशुद्ध रहे; 47 और जो कोई उस घर में सोए वह अपके वोंको धोए; और जो कोई उस घर में खाना खाए वह भी अपके वोंको धोए। 48 और यदि याजक आकर देखे कि जब से घर लेसा गया है तब से उस में व्याधि नहीं फैली है, तो यह जानकर कि वह व्याधि दूर हो गई है, घर को शुद्ध ठहराए। 49 और उस घर को पवित्र करने के लिथे दो पक्की, देवदारू की लकड़ी, लाल रंग का कपड़ा और जूफा लिवा लाए, 50 और एक पक्की बहते हुए जल के ऊपर मिट्टी के पात्र में बलिदान करे, 51 तब वह देवदारू की लकड़ी लाल रंग के कपके और जूफा और जीवित पक्की इन सभोंको लेकर बलिदान किए हुए पक्की के लोहू में और बहते हुए जल में डूबा दे, और उस घर पर सात बार छिड़के। 52 और वह पक्की के लोहू, और बहते हुए जल, और जूफा और लाल रंग के कपके के द्वारा घर को पवित्र करे; 53 तब वह जीवित पक्की को नगर से बाहर मैदान में छोड़ दे; इसी रीति से वह घर के लिथे प्रायश्चित्त करे, तब वह शुद्ध ठहरेगा। 54 सब भांति के कोढ़ की व्याधि, और सेहुएं, 55 और वस्त्र, और घर के कोढ़, 56 और सूजन, और पपक्की, और फूल के विषय में, 57 शुद्ध और अशुद्ध ठहराने की शिझा की व्यवस्या यही है। सब प्रकार के कोढ़ की व्यवस्या यही है।।

लैव्यवस्था 15

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 2 कि इस्त्राएलियोंसे कहो, कि जिस जिस पुरूष के प्रमेह हो, तो वह प्रमेह के कारण से अशुद्ध ठहरे। 3 और चाहे बहता रहे, चाहे बहना बन्द भी हो, तौभी उसकी अशुद्धता बनी रहेगी। 4 जिसके प्रमेह हो वह जिस जिस बिछौने पर लेटे वह अशुद्ध ठहरे, और जिस जिस वस्तु पर वह बैठे वह भी अशुद्ध ठहरे। 5 और जो कोई उसके बिछौने को छूए वह अपके वोंको धोकर जल से स्नान करे, और सांफ तक अशुद्ध ठहरा रहे। 6 और जिसके प्रमेह हो और वह जिस वस्तु पर बैठा हो, उस पर जो कोई बैठे वह अपके वोंको धोकर जल से स्नान करे, और सांफ तक अशुद्ध ठहरा रहे। 7 और जिसके प्रमेह हो उस से जो कोई छू जाए वह अपके वोंको धोकर जल से स्नान करे और सांफ तक अशुद्ध रहे। 8 और जिसके प्रमेह हो यदि वह किसी शुद्ध मनुष्य पर यूके, तो वह अपके वोंको धोकर जल से स्नान करे, और सांफ तक अशुद्ध रहे। 9 और जिसके प्रमेह हो वह सवारी की जिस वस्तु पर बैठे वह अशुद्ध ठहरे। 10 और जो कोई किसी वस्तु को जो उसके नीचे रही हो छूए वह अपके वोंको धोकर जल से स्नान करे, और सांफ तक अशुद्ध रहे। 11 और जिसके प्रमेह हो वह जिस किसी को बिना हाथ धोए छूए वह अपके वोंको धोकर जल से स्नान करे, और सांफ तक अशुद्ध रहे। 12 और जिसके प्रमेह हो वह मिट्टी के जिस किसी पात्र को छूए वह तोड़ डाला जाए, और काठ के सब प्रकार के पात्र जल से धोए जाएं। 13 फिर जिसके प्रमेह हो वह जब अपके रोग से चंगा हो जाए, तब से शुद्ध ठहरने के सात दिन गिन ले, और उनके बीतने पर अपके वोंको धोकर बहते हुए जल से स्नान करे; तब वह शुद्ध ठहरेगा। 14 और आठवें दिन वह दो पंडुक वा कबूतरी के दो बच्चे लेकर मिलापवाले तम्बू के द्वार पर यहोवा के सम्मुख जाकर उन्हें याजक को दे। 15 तब याजक उन में से एक को पापबलि; और दूसरे को होमबलि के लिथे भेंट चढ़ाए; और याजक उसके लिथे उसके प्रमेह के कारण यहोवा के साम्हने प्रायश्चित्त करे।। 16 फिर यदि किसी पुरूष का वीर्य्य स्खलित हो जाए, तो वह अपके सारे शरीर को जल से धोए, और सांफ तक अशुद्ध रहे। 17 और जिस किसी वस्त्र वा चमड़े पर वह वीर्य्य पके वह जल से धोया जाए, और सांफ तक अशुद्ध रहे। 18 और जब कोई पुरूष स्त्री से प्रसंग करे, तो वे दोनो जल से स्नान करें, और सांफ तक अशुद्ध रहें।। 19 फिर जब कोई स्त्री ऋतुमती रहे, तो वह सात दिन तक अशुद्ध ठहरी रहे, और जो कोई उसको छूए वह सांफ तक अशुद्ध रहे। 20 और जब तक वह अशुद्ध रहे तब तक जिस जिस वस्तु पर वह लेटे, और जिस जिस वस्तु पर वह बैठे वे सब अशुद्ध ठहरें। 21 और जो कोई उसके बिछौने को छूए वह अपके वस्त्र धोकर जल से स्नान करे, और सांफ तक अशुद्ध रहे। 22 और जो कोई किसी वस्तु को छूए जिस पर वह बैठी हो वह अपके वस्त्र धोकर जल से स्नान करे, और सांफ तक अशुद्ध रहे। 23 और यदि बिछौने वा और किसी वस्तु पर जिस पर वह बैठी हो छूने के समय उसका रूधिर लगा हो, तो छूनेहारा सांफ तक अशुद्ध रहे। 24 और यदि कोई पुरूष उस से प्रसंग करे, और उसका रूधिर उसके लग जाए, तो वह पुरूष सात दिन तक अशुद्ध रहे, और जिस जिस बिछौने पर वह लेटे वे सब अशुद्ध ठहरें।। 25 फिर यदि किसी स्त्री के अपके मासिक धर्म के नियुक्त समय से अधिक दिन तक रूधिर बहता रहे, वा उस नियुक्त समय से अधिक समय तक ऋतुमती रहे, तो जब तक वह ऐसी दशा में रहे तब तक वह अशुद्ध ठहरी रहे। 26 उसके ऋतुमती रहने के सब दिनोंमें जिस जिस बिछौने पर वह लेटे वे सब उसके मासिक धर्म के बिछौने के समान ठहरें; और जिस जिस वस्तु पर वह बैठे वे भी उसके ऋतुमती रहे के दिनोंकी नाई अशुद्ध ठहरें। 27 और जो कोई उन वस्तुओं को छुए वह अशुद्ध ठहरे, इसलिथे वह अपके वोंको धोकर जल से स्नान करे, और सांफ तक अशुद्ध रहे। 28 और जब वह स्त्री अपके ऋतुमती से शुद्ध हो जाए, तब से वह सात दिन गिन ले, और उन दिनोंके बीतने पर वह शुद्ध ठहरे। 29 फिर आठवें दिन वह दो पंडुक या कबूतरी के दो बच्चे लेकर मिलापवाले तम्बू के द्वार पर याजक के पास जाए। 30 तब याजक एक को पापबलि और दूसरे को होमबलि के लिथे चढ़ाए; और याजक उसके लिथे उसके मासिक धर्म की अशुद्धता के कारण यहोवा के साम्हने प्रायश्चित्त करे।। 31 इस प्रकार से तुम इस्त्राएलियोंको उनकी अशुद्धता से न्यारे रखा करो, कहीं ऐसा न हो कि वे यहोवा के निवास को जो उनके बीच में है अशुद्ध करके अपक्की अशुद्धता में फंसे हुए मर जाएं।। 32 जिसके प्रमेह हो और जो पुरूष वीर्य्य स्खलित होने से अशुद्ध हो; 33 और जो स्त्री ऋतुमती हो; और क्या पुरूष क्या स्त्री, जिस किसी के धातुरोग हो, और जो पुरूष अशुद्ध स्त्री के प्रसंग करे, इन सभोंके लिथे यही व्यवस्या है।।

लैव्यवस्था 16

1 जब हारून के दो पुत्र यहोवा के साम्हने समीप जाकर मर गए, उसके बाद यहोवा ने मूसा से बातें की; 2 और यहोवा ने मूसा से कहा, अपके भाई हारून से कह, कि सन्दूक के ऊपर के प्रायश्चित्तवाले ढ़कने के आगे, बीचवाले पर्दे के अन्दर, पवित्रस्यान में हर समय न प्रवेश करे, नहीं तो मर जाएगा; क्योंकि मैं प्रायश्चित्तवाले ढ़कने के ऊपर बादल में दिखाई दूंगा। 3 और जब हारून पवित्रस्यान में प्रवेश करे तब इस रीति से प्रवेश करे, अर्यात्‌ पापबलि के लिथे एक बछड़े को और होमबलि के लिथे एक मेढ़े को लेकर आए। 4 वह सनी के कपके का पवित्र अंगरखा, और अपके तन पर सनी के कपके की जांघिया पहिने हुए, और सनी के कपके का कटिबन्द, और सनी के कपके की पगड़ी बांधे हुए प्रवेश करे; थे पवित्र स्यान हैं, और वह जल से स्नान करके इन्हें पहिने। 5 फिर वह इस्त्राएलियोंकी मण्डली के पास से पापबलि के लिथे दो बकरे और होमबलि के लिथे एक मेढ़ा ले। 6 और हारून उस पापबलि के बछड़े को जो उसी के लिथे होगा चढ़ाकर अपके और अपके घराने के लिथे प्रायश्चित्त करे। 7 और उन दोनोंबकरोंको लेकर मिलापवाले तम्बू के द्वार पर यहोवा के साम्हने खड़ा करे; 8 और हारून दोनोंबकरोंपर चिट्ठियां डाले, एक चिट्ठी यहोवा के लिथे और दूसरी अजाजेल के लिथे हो। 9 और जिस बकरे पर यहोवा के नाम की चिट्ठी निकले उसको हारून पापबलि के लिथे चढ़ाए; 10 परन्तु जिस बकरे पर अजाजेल के लिथे चिट्ठी निकले वह यहोवा के साम्हने जीवता खड़ा किया जाए कि उस से प्रायश्चित्त किया जाए, और वह अजाजेल के लिथे जंगल में छोड़ा जाए। 11 और हारून उस पापबलि के बछड़े को जो उसी के लिथे होगा समीप ले आए, और उसको बलिदान करके अपके और अपके घराने के लिथे प्रायश्चित्त करे। 12 और जो वेदी यहोवा के सम्मुख है उस पर के जलते हुए कोयलोंसे भरे हुए धूपदान को लेकर, और अपक्की दोनोंमुट्ठियोंको फूटे हुए सुगन्धित धूप से भरकर, बीचवाले पर्दे के भीतर ले आकर 13 उस धूप को यहोवा के सम्मुख आग में डाले, जिस से धूप का धुआं साझीपत्र के ऊपर के प्रायश्चित्त के ढकने के ऊपर छा जाए, नहीं तो वह मर जाएगा; 14 तब वह बछड़े के लोहू में से कुछ लेकर पूरब की ओर प्रायश्चित्त के ढकने के ऊपर अपक्की उंगली से छिड़के, और फिर उस लोहू में से कुछ उंगली के द्वारा उस ढकने के साम्हने भी सात बार छिड़क दे। 15 फिर वह उस पापबलि के बकरे को जो साधारण जनता के लिथे होगा बलिदान करके उसके लोहू को बीचवाले पर्दे के भीतर ले आए, और जिस प्रकार बछड़े के लोहू से उस ने किया या ठीक वैसा ही वह बकरे के लोहू से भी करे, अर्यात्‌ उसको प्रायश्चित्त के ढकने के ऊपर और उसके साम्हने छिड़के। 16 और वह इस्त्राएलियोंकी भांति भांति की अशुद्धता, और अपराधों, और उनके सब पापोंके कारण पवित्रस्यान के लिथे प्रायश्चित्त करे; और मिलापवाला तम्बू जो उनके संग उनकी भांति भांति की अशुद्धता के बीच रहता है उसके लिथे भी वह वैसा ही करे। 17 और जब हारून प्रायश्चित्त करने के लिथे पवित्रस्यान में प्रवेश करे, तब से जब तक वह अपके और अपके घराने और इस्त्राएल की सारी मण्डली के लिथे प्रायश्चित्त करके बाहर न निकले तब तक कोई मनुष्य मिलापवाले तम्बू में न रहे। 18 फिर वह निकलकर उस वेदी के पास जो यहोवा के साम्हने है जाए और उसके लिथे प्रायश्चित्त करे, अर्यात्‌ बछड़े के लोहू और बकरे के लोहू दोनोंमें से कुछ लेकर उस वेदी के चारोंकोनोंके सींगो पर लगाए। 19 और उस लोहू में से कुछ अपक्की उंगली के द्वारा सात बार उस पर छिड़ककर उसे इस्त्राएलियोंकी भांति भांति की अशुद्धता छुड़ाकर शुद्ध और पवित्र करे। 20 और जब वह पवित्रस्यान और मिलापवाले तम्बू और वेदी के लिथे प्रायश्चित्त कर चुके, तब जीवित बकरे को आगे ले आए; 21 और हारून अपके दोनोंहाथोंको जीवित बकरे पर रखकर इस्त्राएलियोंके सब अधर्म के कामों, और उनके सब अपराधों, निदान उनके सारे पापोंको अंगीकार करे, और उनको बकरे के सिर पर धरकर उसको किसी मनुष्य के हाथ जो इस काम के लिथे तैयार हो जंगल में भेजके छुड़वा दे। 22 और वह बकरा उनके सब अधर्म के कामोंको अपके ऊपर लादे हुए किसी निराले देश में उठा ले जाएगा; इसलिथे वह मनुष्य उस बकरे को जंगल में छोड़े दे। 23 तब हारून मिलापवाले तम्बू में आए, और जिस सनी के वोंको पहिने हुए उस ने पवित्रस्यान में प्रवेश किया या उन्हें उतारकर वहीं पर रख दे। 24 फिर वह किसी पवित्र स्यान में जल से स्नान कर अपके निज वस्त्र पहिन ले, और बाहर जाकर अपके होमबलि और साधारण जनता के होमबलि को चढ़ाकर अपके और जनता के लिथे प्रायश्चित्त करे। 25 और पापबलि की चरबी को वह वेदी पर जलाए। 26 और जो मनुष्य बकरे को अजाजेल के लिथे छोड़कर आए वह भी अपके वोंको धोए, और जल से स्नान करे, और तब वह छावनी में प्रवेश करे। 27 और पापबलि का बछड़ा और पापबलि का बकरा भी जिनका लोहू पवित्रस्यान में प्रायश्चित्त करने के लिथे पहुंचाया जाए वे दोनोंछावनी से बाहर पहुंचाए जाएं; और उनका चमड़ा, मांस, और गोबर आग में जला दिया जाए। 28 और जो उनको जलाए वह अपके वोंको धोए, और जल से स्नान करे, और इसके बाद वह छावनी में प्रवेश करने पाए।। 29 और तुम लोगोंके लिथे यह सदा की विधि होगी कि सातवें महीने के दसवें दिन को तुम अपके अपके जीव को दु:ख देना, और उस दिन कोई, चाहे वह तुम्हारे निज देश को हो चाहे तुम्हारे बीच रहने वाला कोई परदेशी हो, कोई भी किसी प्रकार का काम काज न करे; 30 क्योंकि उस दिन तुम्हें शुद्ध करने के लिथे तुम्हारे निमित्त प्रायश्चित्त किया जाएगा; और तुम अपके सब पापोंसे यहोवा के सम्मुख पवित्र ठहरोगे। 31 यह तुम्हारे लिथे परमविश्रम का दिन ठहरे, और तुम उस दिन अपके अपके जीव को दु:ख देना; यह सदा की विधि है। 32 और जिसका अपके पिता के स्यान पर याजक पद के लिथे अभिषेक और संस्कार किया जाए वह याजक प्रायश्चित्त किया करे, अर्यात्‌ वह सनी के पवित्र वोंको पहिनकर, 33 पवित्रस्यान, और मिलापवाले तम्बू, और वेदी के लिथे प्रायश्चित्त करे; और याजकोंके और मण्डली के सब लोगोंके लिथे भी प्रायश्चित्त करे। 34 और यह तुम्हारे लिथे सदा की विधि होगी, कि इस्त्राएलियोंके लिथे प्रतिवर्ष एक बार तुम्हारे सारे पापोंके लिथे प्रायश्चित्त किया जाए। यहोवा की इस आज्ञा के अनुसार जो उस ने मूसा को दी यी हारून ने किया।।

लैव्यवस्था 17

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 2 हारून और उसके पुत्रोंसे और कुल इस्त्राएलियोंसे कह, कि यहोवा ने यह आज्ञा दी है, 3 कि इस्त्राएल के घराने में से कोई मनुष्य हो जो बैल वा भेड़ के बच्चे, वा बकरी को, चाहे छावनी में चाहे छावनी से बाहर घात करके 4 मिलापवाले तम्बू के द्वार पर, यहोवा के निवास के साम्हने यहोवा को चढ़ाने के निमित्त न ले जाए, तो उस मनुष्य को लोहू बहाने का दोष लगेगा; और वह मनुष्य जो लोहू बहाने वाला ठहरेगा, वह अपके लोगोंके बीच से नाश किया जाए। 5 इस विधि का यह कारण है कि इस्त्राएली अपके बलिदान जिनको वह खुले मैदान में वध करते हैं, वे उन्हें मिलापवाले तम्बू के द्वार पर याजक के पास, यहोवा के लिथे ले जाकर उसी के लिथे मेलबलि करके बलिदान किया करें; 6 और याजक लोहू को मिलापवाले तम्बू के द्वार पर यहोवा की वेदी के ऊपर छिड़के, और चरबी को उसके सुखदायक सुगन्ध के लिथे जलाए। 7 और वे जो बकरोंके पूजक होकर व्यभिचार करते हैं, वे फिर अपके बलिपशुओं को उनके लिथे बलिदान न करें। तुम्हारी पीढिय़ोंके लिथे यह सदा की विधि होगी।। 8 और तू उन से कह, कि इस्त्राएल के घराने के लोगोंमें से वा उनके बीच रहनेहारे परदेशियोंमें से कोई मनुष्य क्योंन हो जो होमबलि वा मेलबलि चढ़ाए, 9 और उसको मिलापवाले तम्बू के द्वार पर यहोवा के लिथे चढ़ाने को न ले आए; वह मनुष्य अपके लोगोंमें से नाश किया जाए।। 10 फिर इस्त्राएल के घराने के लोगोंमें से वा उनके बीच रहनेवाले परदेशियोंमें से कोई मनुष्य क्योंन हो जो किसी प्रकार का लोहू खाए, मैं उस लोहू खानेवाले के विमुख होकर उसको उसके लोगोंके बीच में से नाश कर डालूंगा। 11 क्योंकि शरीर का प्राण लोहू में रहता है; और उसको मैं ने तुम लोगोंको वेदी पर चढ़ाने के लिथे दिया है, कि तुम्हारे प्राणोंके लिथे प्रायश्चित्त किया जाए; क्योंकि प्राण के कारण लोहू ही से प्रायश्चित्त होता है। 12 इस कारण मैं इस्त्राएलियोंसे कहता हूं, कि तुम में से कोई प्राणी लोहू न खाए, और जो परदेशी तुम्हारे बीच रहता हो वह भी लोहू कभी न खाए।। 13 और इस्त्राएलियोंमें से वा उनके बीच रहनेवाले परदेशियोंमें से कोई मनुष्य क्योंन हो जो अहेर करके खाने के योग्य पशु वा पक्की को पकड़े, वह उसके लोहू को उंडेलकर धूलि से ढंाप दे। 14 क्योंकि शरीर का प्राण जो है वह उसका लोहू ही है जो उसके प्राण के साय एक है; इसी लिथे मैं इस्त्राएलियोंसे कहता हूं, कि किसी प्रकार के प्राणी के लोहू को तुम न खाना, क्योंकि सब प्राणियोंका प्राण उनका लोहू ही है; जो कोई उसको खाए वह नाश किया जाएगा। 15 और चाहे वह देशी हो वा परदेशी हो, जो कोई किसी लोय वा फाड़े हुए पशु का मांस खाए वह अपके वोंको धोकर जल से स्नान करे, और सांफ तक अशुद्ध रहे; तब वह शुद्ध होगा। 16 और यदि वह उनको न धोए और न स्नान करे, तो उसको अपके अधर्म का भार स्वयं उठाना पकेगा।।

लैव्यवस्था 18

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 2 इस्त्राएलियोंसे कह, कि मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं। 3 तुम मिस्र देश के कामोंके अनुसार जिस में तुम रहते थे न करना; और कनान देश के कामोंके अनुसार भी जहां मैं तुम्हें ले चलता हूं न करना; और न उन देशोंकी विधियोंपर चलना। 4 मेरे ही नियमोंको मानना, और मेरी ही विधियोंको मानते हुए उन पर चलना। मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं। 5 इसलिथे तुम मेरे नियमोंऔर मेरी विधियोंको निरन्तर मानना; जो मनुष्य उनको माने वह उनके कारण जीवित रहेगा। मैं यहोवा हूं। 6 तुम में से कोई अपक्की किसी निकट कुटुम्बिन का तन उघाड़ने को उसके पास न जाए। मैं यहोवा हूं। 7 अपक्की माता का तन जो तुम्हारे पिता का तन है न उघाड़ना; वह तो तुम्हारी माता है, इसलिथे तुम उसका तन न उघाड़ना। 8 अपक्की सौतेली माता का भी तन न उघाड़ना; वह तो तुम्हारे पिता ही का तन है। 9 अपक्की बहिन चाहे सगी हो चाहे सौतेली हो, चाहे वह घर में उत्पन्न हुई हो चाहे बाहर, उसका तन न उघाड़ना। 10 अपक्की पोती वा अपक्की नतिनी का तन न उघाड़ना, उनकी देह तो मानो तुम्हारी ही है। 11 तुम्हारी सोतेली बहिन जो तुम्हारे पिता से उत्पन्न हुई, वह तुम्हारी बहिन है, इस कारण उसका तन न उघाड़ना। 12 अपक्की फूफी का तन न उघाड़ना; वह तो तुम्हारे पिता की निकट कुटुम्बिन है। 13 अपक्की मौसी का तन न उघाड़ना; क्योंकि वह तुम्हारी माता की निकट कुटुम्बिन है। 14 अपके चाचा का तन न उघाड़ना, अर्यात्‌ उसकी स्त्री के पास न जाना; वह तो तुम्हारी चाची है। 15 अपक्की बहू का तन न उघाड़ना वह तो तुम्हारे बेटे की स्त्री है, इस कारण तुम उसका तन न उघाड़ना। 16 अपक्की भौजी का तन न उघाड़ना; वह तो तुम्हारे भाई ही का तन है। 17 किसी स्त्री और उसकी बेटी दोनोंका तन न उघाड़ना, और उसकी पोती को वा उसकी नतिनी को अपक्की स्त्री करके उसका तन न उघाड़ना; वे तो निकट कुटुम्बिन है; ऐसा करना महापाप है। 18 और अपक्की स्त्री की बहिन को भी अपक्की स्त्री करके उसकी सौत न करना, कि पहली के जीवित रहते हुए उसका तन भी उघाड़े। 19 फिर जब तक कोई स्त्री अपके ऋतु के कारण अशुद्ध रहे तब तक उसके पास उसका तन उघाड़ने को न जाना। 20 फिर अपके भाई बन्धु की स्त्री से कुकर्म करके अशुद्ध न हो जाना। 21 और अपके सन्तान में से किसी को मोलेक के लिथे होम करके न चढ़ाना, और न अपके परमेश्वर के नाम को अपवित्र ठहराना; मैं यहोवा हूं। 22 स्त्रीगमन की रीति पुरूषगमन न करना; वह तो घिनौना काम है। 23 किसी जाति के पशु के साय पशुगमन करके अशुद्ध न हो जाना, और न कोई स्त्री पशु के साम्हने इसलिथे खड़ी हो कि उसके संग कुकर्म करे; यह तो उल्टी बात है।। 24 ऐसा ऐसा कोई भी काम करके अशुद्ध न हो जाना, क्योंकि जिन जातियोंको मैं तुम्हारे आगे से निकालने पर हूं वे ऐसे ऐसे काम करके अशुद्ध हो गई है; 25 और उनका देश भी अशुद्ध हो गया है, इस कारण मैं उस पर उसके अधर्म का दण्ड देता हूं, और वह देश अपके निवासिक्कों उगल देता है। 26 इस कारण तुम लोग मेरी विधियोंऔर नियमोंको निरन्तर मानना, और चाहे देशी चाहे तुम्हारे बीच रहनेवाला परदेशी हो तुम में से कोई भी ऐसा घिनौना काम न करे; 27 क्योंकि ऐसे सब घिनौने कामोंको उस देश के मनुष्य तो तुम से पहिले उस में रहते थे वे करते आए हैं, इसी से वह देश अशुद्ध हो गया है। 28 अब ऐसा न हो कि जिस रीति से जो जाति तुम से पहिले उस देश में रहती यी उसको उस ने उगल दिया, उसी रीति जब तुम उसको अशुद्ध करो, तो वह तुम को भी उगल दे। 29 जितने ऐसा कोई घिनौना काम करें वे सब प्राणी अपके लोगोंमें से नाश किए जाएं। 30 यह आज्ञा जो मैं ने तुम्हारे मानने को दी है उसे तुम मानना, और जो घिनौनी रीतियां तुम से पहिले प्रचलित हैं उन में से किसी पर न चलना, और न उनके कारण अशुद्ध हो जाना। मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं।।

लैव्यवस्था 19

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 2 इस्त्राएलियोंकी सारी मण्डली से कह, कि तुम पवित्र बने रहो; क्योंकि मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा पवित्र हूं। 3 तुम अपक्की अपक्की माता और अपके अपके पिता का भय मानना, और मेरे विश्रम दिनोंको मानना; मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं। 4 तुम मूरतोंकी ओर न फिरना, और देवताओं की प्रतिमाएं ढालकर न बना लेना; मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं। 5 जब तुम यहोवा के लिथे मेलबलि करो, तब ऐसा बलिदान करना जिससे मैं तुम से प्रसन्न हो जाऊं। 6 उसका मांस बलिदान के दिन और दूसरे दिन खाया जाए, परन्तु तीसरे दिन तक जो रह जाए वह आग में जला दिया जाए। 7 और यदि उस में से कुछ भी तीसरे दिन खाया जाए, तो यह घृणित ठहरेगा, और ग्रहण न किया जाएगा। 8 और उसका खानेवाला यहोवा के पवित्र पदार्य को अपवित्र ठहराता है, इसलिथे उसको अपके अधर्म का भार स्वयं उठाना पकेगा; और वह प्राणी अपके लोगोंमें से नाश किया जाएगा।। 9 फिर जब तुम अपके देश के खेत काटो तब अपके खेत के कोने कोने तक पूरा न काटना, और काटे हुए खेत की गिरी पक्की बालोंको न चुनना। 10 और अपक्की दाख की बारी का दाना दाना न तोड़ लेना, और अपक्की दाख की बारी के फंड़े हुए अंगूरोंको न बटोरना; उन्हें दीन और परदेशी लोगोंके लिथे छोड़ देना; मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं। 11 तुम चोरी न करना, और एक दूसरे से न तो कपट करना, और न फूठ बोलना। 12 तुम मेरे नाम की फूठी शपय खाके अपके परमेश्वर का नाम अपवित्र न ठहराना; मैं यहोवा हूं। 13 एक दूसरे पर अन्धेर न करना, और न एक दूसरे को लूट लेना। और मजदूर की मजदूरी तेरे पास सारी रात बिहान तक न रहने पाएं। 14 बहिरे को शाप न देना, और न अन्धे के आगे ठोकर रखना; और अपके परमेश्वर का भय मानना; मैं यहोवा हूं। 15 न्याय में कुटिलता न करना; और न तो कंगाल का पझ करना और न बड़े मनुष्योंका मुंह देखा विचार करना; उस दूसरे का न्याय धर्म से करना। 16 लूतरा बनके अपके लोगोंमें न फिरा करना, और एक दूसरे के लोहू बहाने की युक्तियां न बान्धना; मैं यहोवा हूं। 17 अपके मन में एक दूसरे के प्रति बैर न रखना; अपके पड़ोसी को अवश्य डांटना नहीं, तो उसके पाप का भार तुझ को उठाना पकेगा। 18 पलटा न लेना, और न अपके जाति भाइयोंसे बैर रखना, परन्तु एक दूसरे से अपके समान प्रेम रखना; मैं यहोवा हूं। 19 तुम मेरी विधियोंको निरन्तर मानना। अपके पशुओं को भिन्न जाति के पशुओं से मेल न खाने देना; अपके खेत में दो प्रकार के बीज इकट्ठे न बोना; और सनी और ऊन की मिलावट से बना हुआ वस्त्र न पहिनना। 20 फिर कोई स्त्री दासी हो, और उसकी मंगनी किसी पुरूष से हुई हो, परन्तु वह न तो दास से और न सेंतमेंत स्वाधीन की गई हो; उस से यदि कोई कुकर्म करे, तो उन दोनोंको दण्ड तो मिले, पर उस स्त्री के स्वाधीन न होने के कारण वे दोनोंमार न डाले जाएं। 21 पर वह पुरूष मिलापवाले तम्बू के द्वार पर यहोवा के पास एक मेढ़ा दोषबलि के लिथे ले आए। 22 और याजक उसके किथे हुए पाप के कारण दोषबलि के मेढ़े के द्वारा उसके लिथे यहोवा के साम्हने प्रायश्चित्त करे; तब उसका किया हुआ पाप झमा किया जाएगा। 23 फिर जब तुम कनान देश में पंहुचकर किसी प्रकार के फल के वृझ लगाओ, तो उनके फल तीन वर्ष तक तुम्हारे लिथे मानोंखतनारहित ठहरें रहें; इसलिथे उन में से कुछ न खाया जाए। 24 और चौथे वर्ष में उनके सब फल यहोवा की स्तुति करने के लिथे पवित्र ठहरें। 25 तब पांचवें वर्ष में तुम उनके फल खाना, इसलिथे कि उन से तुम को बहुत फल मिलें; मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं। 26 तुम लोहू लगा हुआ कुछ मांस न खाना। और न टोना करना, और न शुभ वा अशुभ मुहूर्तोंको मानना। 27 अपके सिर में घेरा रखकर न मुंड़ाना, और न अपके गाल के बालोंको मुंड़ाना। 28 मुर्दोंके कारण अपके शरीर को बिलकुल न चीरना, और न उस में छाप लगाना; मैं यहोवा हूं। 29 अपक्की बेटियोंको वेश्या बनाकर अपवित्र न करना, ऐसा न हो कि देश वेश्यागमन के कारण महापाप से भर जाए। 30 मेरे विश्रमदिन को माना करना, और मेरे पवित्रस्यान का भय निरन्तर मानना; मैं यहोवा हूं। 31 ओफाओं और भूत साधने वालोंकी ओर न फिरना, और ऐसोंको खोज करके उनके कारण अशुद्ध न हो जाना; मै तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं। 32 पक्के बालवाले के साम्हने उठ खड़े होना, और बूढ़े का आदरमान करना, और अपके परमेश्वर का भय निरन्तर मानना; मैं यहोवा हूं। 33 और यदि कोई परदेशी तुम्हारे देश में तुम्हारे संग रहे, तो उसको दु:ख न देना। 34 जो परदेशी तुम्हारे संग रहे वह तुम्हारे लिथे देशी के समान हो, और उस से अपके ही समान प्रेम रखना; क्योंकि तुम भी मिस्र देश में परदेशी थे; मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं। 35 तुम न्याय में, और परिमाण में, और तौल में, और नाप में कुटिलता न करना। 36 सच्चा तराजू, धर्म के बटखरे, सच्चा एपा, और धर्म का हीन तुम्हारे पास रहें; मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं जो तुम को मिस्र देश से निकाल ले आया। 37 इसलिथे तुम मेरी सब विधियोंऔर सब नियमोंको मानते हुए निरन्तर पालन करो; मैं यहोवा हूं।।

लैव्यवस्था 20

1 फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 2 इस्त्राएलियोंसे कह, कि इस्त्राएलियोंमें से, वा इस्त्राएलियोंके बीच रहनेवाले परदेशियोंमें से, कोई क्योंन हो जो अपक्की कोई सन्तान मोलेक को बलिदान करे वह निश्चय मार डाला जाए; और जनता उसको पत्यरवाह करे। 3 और मैं भी उस मनुष्य के विरूद्ध होकर उसको उसके लोगोंमें से इस कारण नाश करूंगा, कि उस ने अपक्की सन्तान मोलेक को देकर मेरे पवित्रस्यान को अशुद्ध किया, और मेरे पवित्र नाम को अपवित्र ठहराया। 4 और यदि कोई अपक्की सन्तान मोलेक को बलिदान करे, और जनता उसके विषय में आनाकानी करे, और उसको मार न डाले, 5 तब तो मैं स्वयं उस मनुष्य और उसके घराने के विरूद्ध होकर उसको और जितने उसके पीछे होकर मोलेक के साय व्यभिचार करें उन सभोंको भी उनके लोगोंके बीच में से नाश करूंगा। 6 फिर जो प्राणी ओफाओं वा भूतसाधनेवालोंकी ओर फिरके, और उनके पीछे होकर व्यभिचारी बने, तब मैं उस प्राणी के विरूद्ध होकर उसको उसके लोगोंके बीच में से नाश कर दूंगा। 7 इसलिथे तुम अपके आप को पवित्र करो; और पवित्र बने रहो; क्योंकि मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूं। 8 और तुम मेरी विधियोंको मानना, और उनका पालन भी करना; क्योंकि मैं तुम्हारा पवित्र करनेवाला यहोवा हूं। 9 कोई क्योंन हो जो अपके पिता वा माता को शाप दे वह निश्चय मार डाला जाए; उस ने अपके पिता वा माता को शाप दिया है, इस कारण उसका खून उसी के सिर पर पकेगा। 10 फिर यदि कोई पराई स्त्री के साय व्यभिचार करे, तो जिस ने किसी दूसरे की स्त्री के साय व्यभिचार किया हो तो वह व्यभिचारी और वह व्यभिचारिणी दोनोंनिश्चय मार डाले जाएं। 11 और यदि कोई अपक्की सौतेली माता के साय सोए, वह जो अपके पिता ही का तन उघाड़नेवाला ठहरेगा; सो इसलिथे वे दोनोंनिश्चय मार डाले जाएं, उनका खून उन्हीं के सिर पर पकेगा। 12 और यदि कोई अपक्की पतोहू के साय सोए, तो वे दोनोंनिश्चय मार डाले जाएं; क्योंकि वे उलटा काम करनेवाले ठहरेंगे, और उनका खून उन्हीं के सिर पर पकेगा। 13 और यदि कोई जिस रीति स्त्री से उसी रीति पुरूष से प्रसंग करे, तो वे दोनोंघिनौना काम करनेवाले ठहरेंगे; इस कारण वे निश्चय मार डाले जाएं, उनका खून उन्हीं के सिर पर पकेगा। 14 और यदि कोई अपक्की पत्नी और अपक्की सांस दोनोंको रखे, तो यह महापाप है; इसलिथे वह पुरूष और वे स्त्रियां तीनोंके तीनोंआग में जलाए जाएं, जिस से तुम्हारे बीच महापाप न हो। 15 फिर यदि कोई पुरूष पशुगामी हो, तो पुरूष और पशु दोनोंनिश्चय मार डाले जाएं। 16 और यदि कोई स्त्री पशु के पास जाकर उसके संग कुकर्म करे, तो तू उस स्त्री और पशु दोनोंको घात करना; वे निश्चय मार डाले जाएं, उनका खून उन्हीं के